मजदूरों के जुझारू नेता दत्ता सामन्त

01 Jan 2025 • मजदूर एकता पत्रिका- ९ • 4 बार पढ़ा गया

हर आदमी की जिन्दगी सीमित होती है। कोई अमर होकर नहीं आता। मरना सबको है, लेकिन नेक आदमी ऐसा कुछ कर जाते हैं कि सदियों तक उन्हें आदर से याद किया जाता है। ऐसे ही मजदूरों के महान नेता हैं दत्ता सामन्त। उनकी कुर्बानी को याद करके आज भी हमारी आँखों में बरबस आँसू और दिलों में जोश भर जाता है।

18 जनवरी 1982 को मुम्बई की कपड़ा मिलों में एक ऐतिहासिक हड़ताल हुई थी। ढाई लाख से ज्यादा मजदूर वेतन बढोतरी, उचित बोनस, कार्यस्थल पर सुरक्षा, ठेका प्रथा के अन्त आदि माँगों को लेकर हड़ताल पर चले गये थे। मालिकों को लगा कि कुछ दिन में थक–हारकर मजदूर काम पर लौट आएँगे। लेकिन किसी को अन्दाजा नहीं था कि यह हड़ताल दो साल तक चलेगी। मजदूरों के अदम्य साहस ने सरकार और मालिकों की परेशानी बढ़ा दी थी। भारत के मजदूर आन्दोलन के इतिहास में इस आन्दोलन ने अमिट छाप छोड़ी। इसकी व्यापकता का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस आन्दोलन के पहले और बाद का मुम्बई एक जैसा नहीं रह गया था। मजदूरों के जुझारूपन और त्याग की अनेक मिसालें इस आन्दोलन ने पेश की थी। इस हड़ताल में एक खास बात यह थी कि इसका नेतृत्व कोई स्थापित ट्रेड–यूनियन नहीं बल्कि एक सामान्य डॉक्टर दत्ता सामन्त कर रहे थे। एक समय उनकी ख्याति इतनी बढ़ गयी थी कि  हमेशा इनके आवास पर मजदूरों की कतार लगी रहती थी। वे अपने संघर्षों में दत्ता सामन्त का दृढ़ नेतृत्व चाहते थे। उनके नेतृत्व में मजदूरों ने अनेक संघर्षों में जीत हासिल की थी। मालिक उनसे इतना खौफ खाते थे कि खुद उनके दफ्रतर आकर मजदूरों के बीच बैठकर समझौता करने को मजबूर हो जाते थे। अपनी जिन्दगी का लम्बा समय उन्होंने मजदूरों को संगठित करने और उनके संघर्षों को आगे बढाने में लगा दिया। वह जिन्दगीभर मजदूरों के सच्चे नेता के तौर पर काम करते रहे। उन्हें मालिकों के गुण्डों द्वारा 17 गोलियाँ मारी गयी थीं, इसी से समझा जा सकता है कि मालिक उनसे कितनी नफरत करते थे। 1970–80 के दशक में मुम्बई के मजदूर आन्दोलन को दत्ता सामन्त से अलग करके नहीं समझा जा सकता है। आज जब व्यवस्था द्वारा मजदूरों पर चैतरफा हमला जारी है, ऐसे समय में मजदूर आन्दोलन में अमिट छाप छोड़ने वाले उनके सच्चे नेताओं के बारे में जानना निश्चय ही हमारे लिए प्रेरणादायक और सही रास्ता दिखलाने वाला है। इसी कड़ी में हम दत्ता सामन्त की जिन्दगी और मजदूर आन्दोलन में उनके योगदान को यहाँ रेखांकित करेंगे।

दत्ता सामन्त का जन्म 21 नवम्बर सन 1932 में कोंकण तट के देवबाग गाँव में हुआ था। उनके पिता व्यापारी थे। इसके साथ ही वह मुफ्रत में स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का घरेलू उपचार भी करते थे। पिता के दयालू स्वभाव का बचपन से ही दत्ता सामन्त पर गहरा असर पड़ा था। वंचितों की मदद करने के उद्देश्य से उन्होंने डॉक्टर की पढ़ाई करने का फैसला लिया था। पिता ने बालक दत्ता सामन्त के इस फैसले को सराहा और उन्हें अपना सपना पूरा करने में भरपूर मदद की। कड़ी मेहनत और लगन के चलते उन्होंने कम उम्र में ही डॉक्टर की पढ़ाई पूरी कर ली थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह किसी अस्पताल में नौकरी करके लाखों रुपये कमा सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी प्रैक्टिस घाटकोपर स्थित मजदूर बस्ती पन्तनगर से शुरू की। यह वह समय था जब दत्ता सामन्त ने मजदूरों की जिन्दगी और उनकी समस्याओं को करीब से समझा। उनका पहला सम्पर्क खदान मजदूरों से हुआ था। वहाँ उन्हें यह समझ आ गया था कि मजदूरों के खराब स्वास्थ्य का असली कारण सुबह से शाम तक हाड़तोड़ मेहनत करना है। 2 से 3 रुपये प्रतिदिन के वेतन पर उनसे 14–14 घण्टे काम लिया जाता था। उनका वेतन इतना कम था कि पौष्टिक भोजन तो दूर उन्हें बमुश्किल दो वक्त का खाना नसीब होता था। मालिकों की थोड़ी भी नाफरमानी की सजा अक्सर उन्हें शारीरिक दंड देकर दी जाती थी। वे बेहद संकरी गलियों में छोटी–छोटी झुग्गियों में रहते थे। उनमें धूप न आने के कारण हमेशा नमी बनी रहती थी। दूसरी तरफ उनके मालिक बड़ी–बड़ी हवेलियों में अÕयाशी भरी जिन्दगी जीते थे। दत्ता सामन्त को यह असमानता और मजदूरों का शोषण नागवार गुजरता था। वह न केवल बहुत कम पैसों में मजदूरों का इलाज करते थे बल्कि उनकी जिन्दगी के अहम फैसलों में भी जरूरी राय देते थे।

मजदूरों के साथ उनका एक भावनात्मक रिश्ता बन गया था। इसी रिश्ते के चलते वह मजदूरों की नारकीय जिन्दगी में बदलाव चाहते थे। उन्होंने अनेक स्थापित ट्रेड–यूनियनों से अपील की कि वे इन खदान मजदूरों को उचित मजदूरी और न्याय दिलाने में इनकी मदद करें। लेकिन किसी भी यूनियन ने उन मजदूरों का साथ नहीं दिया। इस स्थिति में दत्ता सामन्त को समझ आ गया था कि मजदूरों की जिन्दगी बदलने के लिए उन्हें खुद आगे आना होगा। इसी उद्देश्य के तहत 1965 में उन्होंने महाराष्ट्र खदान कामगार यूनियन की स्थापना की। मजदूर आन्दोलन में अधिक समय लगने के चलते जल्दी ही उन्होंने अपना डॉक्टरी पेशा छोड़ दिया और अपनी जिन्दगी मजदूर आन्दोलन को समर्पित कर दी। इस तरह 1960 के दशक में दत्ता सामन्त ने मजदूर संघर्षों में अपनी भागीदारी शुरू की।

दत्ता सामन्त ‘महाराष्ट्र खदान कामगार यूनियन’ के अन्तर्गत खदान मजदूरों को संगठित करने में सफल रहे। मजदूरों की संगठित ताकत से खदान मालिक भयभीत हो गये। वे किसी भी कीमत पर इस यूनियन को तोड़ना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने दत्ता सामन्त की हत्या की साजिश रची। एक दिन जब वह खदान क्षेत्र में मजदूरों से मिलने जा रहे थे तो मालिकों के गुण्डों ने उन पर बुरी तरह हमला कर दिया। वह 8 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहे। मालिकों को लगा कि इस हमले से वे सामन्त को खत्म कर देंगे, लेकिन अस्पताल से बाहर आते ही वह और अधिक दृढ़ निश्चय से मजदूरों को संगठित करने के काम में लग गये। उन्होंने हजारों खदान मजदूरों का अभूतपूर्व मोर्चा निकाला। मजदूरों की संगठित ताकत के आगे आखिरकार मालिकों को झुकना पड़ा। उन पर होने वाले शारिरिक उत्पीड़न का अन्त हुआ, इसके साथ ही उनके काम के घण्टे निश्चित हुए और उनके वेतन में भी बढ़ोतरी हुई।

खदान मजदूरों का सफल नेतृत्व करने से दत्ता सामन्त का नाम मुम्बई का हर मजदूर जान गया। प्रीमियर ऑटोमोबाइल, दोम्बोवली, एपीआई, गोदरेज आदि उद्योगों के मजदूर अपनी–अपनी समस्याओं को लेकर दत्ता सामन्त के पास आने लगे। दत्ता सामन्त को अपनी यूनियनों का अध्यक्ष बनाने को लेकर मजदूरों में होड़ लग गयी। उनकी ख्याति इतनी बढ़ गयी कि वह 1967 का राज्य विधानसभा का चुनाव भारी बहुमत से जीत गये। लेकिन दूसरे पूँजीवादी नेताओं से अलग, उन्होंने राजनीति का उपयोग मजदूरों के हकों की आवाज को बुलन्द करने में किया।

मजदूर आन्दोलन में कदम रखने के बाद एक तरफ जहाँ मजदूरों के दिलों में दत्ता सामन्त राज करते थे वहीं दूसरी तरफ वह हमेशा मालिक और सरकार के निशाने पर रहने लगे थे। उन्हें मजदूर आन्दोलन से हटाने के अनेक असफल प्रयास किये गये। सितम्बर 1972 में गोदरेज कम्पनी प्रबन्धन के शोषण–उत्पीड़न के खिलाफ मजदूर धरना–प्रदर्शन कर रहे थे। इस संघर्ष का नेतृत्व सामन्त ही कर रहे थे। सरकार के साथ साँठ–गाँठ करके गोदरेज कम्पनी के प्रबन्धन ने मजदूरों के इस आन्दोलन को कुचलने की भरसक कोशिश की लेकिन मजदूर अपनी जायज माँगों के लिए डटे रहे। शान्तिपूर्वक आन्दोलन कर रहे निहत्थे मजदूरों पर पुलिस ने गोलियाँ चलायी जिसमें अनेक मजदूर मारे गये थे। अपने मजदूर भाइयों को खून से लथपथ देख बाकी मजदूरों का गुस्सा पुलिस वालों पर फूट पड़ा। इस झड़प में मजदूर समेत दो पुलिसवाले भी मारे गये। सरकार ने डॉक्टर सामन्त और यूनियन के 100 लोगों पर हत्या का मुकदमा दायर कर उन्हें जेल भेज दिया। मजदूरों ने चन्दा जुटाकर कोर्ट में केस लड़ा और कुछ समय बाद दत्ता सामन्त को छुड़वा लिया।

1980 के दशक में राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों में तेजी से बदलाव आ रहे थे। मजदूर आन्दोलन पर इनका गहरा असर हो रहा था। देश आर्थिक संकट के भँवर में फँस रहा था। इस संकट का पूरा बोझ मेहनतकश आबादी पर डाला जा रहा था। मालिक अपने मुनाफे को बरकरार रखने के लिए मजदूरों के खून की एक–एक बूँद निचोड़ने को आतुर थे। मजदूरों के अथक प्रयास और हजारों कुर्बानियों के बाद मिले अधिकार एक–एक कर छीने जा रहे थे। 27 जुलाई 1981 को सरकार ने ‘एसेंशियल सर्विस मेंटिनेस ऑर्डिनेंस’ नामक अध्यादेश लागू कर दिया। इस अध्यादेश के जरिये देश भर में मजदूरों की यूनियनों और उनके हड़ताल के अधिकार को खत्म करने का प्रयास किया गया। इस अध्यादेश में हड़ताल करने वाले या उसका समर्थन करने वालों को 6 महीने की जेल का प्रावधान किया गया था। इस अध्यादेश के आते ही देश भर में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये। मुम्बई में लगभग 1 लाख मजदूरों ने संगठित होकर इस अध्यादेश के खिलाफ रैली निकाली। इस रैली में सूती मिल में काम करने वाले मजदूरों की संख्या सबसे अधिक थी।

1854 से मुम्बई कपड़ा उद्योग का केन्द्र रहा था। यहाँ हर 10 में से 7 मजदूर इन्हीं कपड़ा मिलों में काम करते थे। इतनी बड़ी तादाद होने के बाद भी इनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। इन्हें बेहद कम पैसों में लम्बे समय तक काम करने को मजबूर होना पड़ता था। इनके काम की स्थिति भी बहुत खराब थी, काम के दौरान दुर्घटनाओं में मजदूरों के हताहात होने की बात आये दिन जारी थी। लेकिन 1980 के शुरुआती दशक में इनका गुस्सा फूट पड़ा। मिल मालिकों ने मजदूरों से सीधे टक्कर लेने की जगह उनकी एकता और यूनियन को खत्म करने का प्रयास शुरू कर दिया। उन्होंने स्थापित ट्रेड यूनियनों से साँठ–गाँठ कर ली। वे केवल इन्हीं ट्रेड यूनियनों को मान्यता देते थे। ये मालिकपरस्त यूनियनें मजदूर के संघर्षों को कमजोर करने का काम करने लगीं। मजदूरों को यह बात समझने में देर नहीं लगी कि ये ट्रेड यूनियनें उनकी नहीं बल्कि मालिकों की हैं। उन्हें अपने संघर्षों को आगे बढ़ाने के लिए इन स्थापित ट्रेड यूनियनों को छोड़ना जरूरी हो गया था। उस समय मजदूरों को ऐसे नेतृत्व की जरूरत थी जो इन ट्रेड यूनियनों से सम्बन्धित न हो, साथ ही वह किसी राजनीतिक पार्टी का पिछलग्गू भी न हो। वह मालिकों के खिलाफ लम्बा संघर्ष चलाने में सक्षम हो और समझौतावादी न हो। दत्ता सामन्त के अन्दर ये सभी गुण थे। वह मजदूरों की नब्ज पकड़ लेते थे और मजदूर आन्दोलन के ऐतिहासिक युग की शुरुआत करने में लगे हुए थे। उन्होंने ‘महाराष्ट्र जनरल कामगार यूनियन’ और ‘सिल्क मजदूर सभा’ नामक मजदूर यूनियन की शुरुआत की। जल्द ही स्थापित ट्रेड यूनियनों की जगह मजदूर इन नयी यूनियनों पर विश्वास करने लगे, कुछ ही समय में इनमें शामिल मजदूरों की संख्या लाखों में पहुँच गयी।

इन्हीं यूनियनों में मजदूरों को संगठित कर दत्ता सामन्त ने मजदूरों की सबसे बड़ी हड़ताल की शुरुआत की। इस हड़ताल ने मजदूरों की एकता, उनके जुझारूपना, संगठन के प्रति उनके विश्वास और अमिट त्याग की भावना का प्रदर्शन किया। सरकार मजदूरों पर टूट पड़ी। वह सीधे–सीधे पूँजीपतियों और मालिकों के साथ जा मिली थी। मजदूर नेताओं को जेल में डालने, उन्हें डराने धमकाने और गुण्डों से उन्हें पिटवाने के कई प्रयास किये गये। मजदूरों की जायज माँगों को मानने की जगह मलिक अपने उद्योग–धन्धों को ही मुम्बई से गुजरात ले गये। सरकार ने गुजरात में बेहद सस्ते में पूँजीपतियों को उद्योग–धन्धे चलाने के लिए जमीन दी। कई सालों के लिए स्टेट टैक्स भी माफ कर दिया गया। इसके साथ ही मजदूरों के पक्ष में काम करने वाले कई कानूनों को खत्म भी कर दिया। एक तरफ लम्बी हड़ताल के कारण मजदूर और उनके परिवार भुखमरी की कगार पर आ गये थे। यह बताया जाता है कि 50 हजार मजदूर लापता हो गये थे, इनकी कोई खबर नहीं मिल पायी थी। वहीं दूसरी तरफ मिल मालिकों के लिए सरकार ने दूसरे राज्य में जगह देकर उनके मुनाफे को बदस्तूर जारी रखा था। इस तरह सरकार की क्रूर मशीनरी मजदूरों के जुझारू आन्दोलन को खत्म करने में लगी हुई थी।

इसी समय मुम्बई में साम्प्रदायिक संगठन शिवसेना पार्टी को बढ़ावा दिया गया। एक तरफ जहाँ दत्ता सामन्त मजदूरों के गैर समझौतावादी आन्दोलन को चला रहे थे, वहीं शिवसेना अपनी मजदूर यूनियन के तहत मालिकों से जा मिली थी। इसके गुण्डे सच्चे मजदूर नेताओं को डराने–धमकाने और मारने तक का काम करते थे। शिवशेना मजदूरों को जाति, धर्म और क्षेत्र में बाँटकर उनकी संगठित ताकत को कमजोर कर रही थी। अधिकतर मजदूर इनकी असलियत जानते थे, लेकिन मजदूरों का एक हिस्सा इनके साम्प्रदायिक और अन्धराष्ट्रवादी विचारों का समर्थक भी बन गया। इनकी पूरी कोशिश मजदूर आन्दोलन को तबाह करने की थी। दत्ता सामन्त ने सरकार और मालिकों के खिलाफ ही नहीं बल्कि मजदूर आन्दोलन में अन्धराष्ट्रवादी और साम्प्रदायिक विचारों के खिलाफ भी जमकर संघर्ष चलाया। 1980 से 1990 तक के दौर में शिवशेना ने दत्ता सामन्त पर अनेक बार हमले करवाये, उन्हें बदनाम करने के भरसक प्रयास किये, लेकिन वह असफल रही।

1990 की नयी आर्थिक नीतियों के आने के बाद मुम्बई के उद्योगों को दूसरे राज्यों में हस्तान्तरित किया जाने लगा। लाखों मजदूरों की जीविका को खत्म करने पर सरकार तुली हुई थी। उद्योगों के लिए आवण्टित जमीनों को बेचकर उनपर बड़ी–बड़ी व्यवसायिक इमारतें बनायी जा रही थी। अपने अन्तिम दिनों में दत्ता सामन्त इस मजदूर विरोधी कदम के खिलाफ सरकार, कम्पनी मालिकों और ठेकेदारों से पुरजोर संघर्ष कर रहे थे। 16 जनवरी 1997 की एक सुबह जब वह घाटकोपर स्थित अपने कार्यालय जा रहे थे, तो घर से 200 मीटर दूर ही उनकी गाड़ी रोककर दो हमलावारों ने 64 वर्ष की उम्र में उनकी निर्मम हत्या कर दी। उनकी अन्तिम यात्रा में मजदूरों का हुजूम उमड़ पड़ा। मजदूरों ने हाथ उठाकर अपने नेता को अन्तिम सलाम किया। उनकी हत्या अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन से करवायी गयी थी। उसे बाद में सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। अपने अन्तिम समय तक सामन्त लगभग 4 लाख मजदूरों की सदस्यता वाले 500 ट्रेड यूनियनों के उपाध्यक्ष थे। उन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़ने में लगा दी थी।

ऐसे सच्चे मजदूर नेता सामन्त को क्रान्तिकारी सलाम।

-मोहित भारती

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