हमारे समाज में ढोंग–पाखंड, जादू–टोना, बाबा–ओझा और अन्धविश्वास का बहुत बोलबाला है। मजदूर वर्ग भी इनसे मुक्त नहीं है। हम देखते हैं कि अन्धविश्वास के चलते ही छोटे बच्चों की बलि चढ़ा दी जाती है, इनसान की जानवरों से शादी करायी जाती है, गम्भीर बीमारी या साँप काटने के बाद झाड–फूँक से मरीज की मौत हो जाती है। अन्धविश्वास से मजदूरों का इससे भी बड़ा नुकसान होता है। अन्धविश्वासी मजदूर अपने शोषण–उत्पीड़न से लड़ने के लिए सही संगठन नहीं बना पाते हैं। मजदूरों की समझदारी कुन्द होने का एक कारण अन्धविश्वास भी है, इसी के चलते वे अपनी समस्याओं के सही कारणों को समझ नहीं पाते हैं और उनकी एकता कमजोर पड़ जाती है। सही विचारों पर आधारित मजदूरों का जुझारू संगठन बनाने के लिए उनके बीच फैले ढोंग–पाखंड और अन्धविश्वास को दूर करना जरूरी है। मजदूरों में फैले अन्धविश्वास को किस तरह समझें और इसे कैसे दूर करें?
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अंधविश्वास और तर्कशीलता
हमारे समाज में ढोंग–पाखंड, जादू–टोना, बाबा–ओझा और अन्धविश्वास का बहुत बोलबाला है। मजदूर वर्ग भी इनसे मुक्त नहीं है। हम देखते हैं कि अन्धविश्वास के चलते ही छोटे बच्चों की बलि चढ़ा दी जाती है, इनसान की जानवरों से शादी करायी जाती है, गम्भीर बीमारी या साँप काटने के बाद झाड–फूँक से मरीज की मौत हो जाती है। अन्धविश्वास से मजदूरों का इससे भी बड़ा नुकसान होता है। अन्धविश्वासी मजदूर अपने शोषण–उत्पीड़न से लड़ने के लिए सही संगठन नहीं बना पाते हैं। मजदूरों की समझदारी कुन्द होने का एक कारण अन्धविश्वास भी है, इसी के चलते वे अपनी समस्याओं के सही कारणों को समझ नहीं पाते हैं और उनकी एकता कमजोर पड़ जाती है। सही विचारों पर आधारित मजदूरों का जुझारू संगठन बनाने के लिए उनके बीच फैले ढोंग–पाखंड और अन्धविश्वास को दूर करना जरूरी है। मजदूरों में फैले अन्धविश्वास को किस तरह समझें और इसे कैसे दूर करें?
1990 में नवउदारवादी नीतियों में उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण को लागू करने का मकसद था–– देश को फिर एक बार गुलामी की बेड़ियों में जकड़ देना, मजदूरों और किसानों के निर्मम शोषण का रास्ता साफ करना और देशी–विदेशी पूँजीपतियों–धन्ना सेठों की दिल खोलकर मदद करना। अमरीका के द्वारा आईएमएफ, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के जरिये लागू इन नीतियों ने पिछले 30 सालों में देश के मजदूरों को गरीबी में धकेल दिया, नौजवानों को बेरोजगार कर दिया और किसानों को कर्ज के जाल में फँसा दिया। अपनी बदहाल हालत के प्रति मजदूर, किसान और नौजवान जागरूक न हो जायें, इसके लिए इन नीतियों के साथ साम्प्रदायिक और धार्मिक राजनीति को बढ़ावा दिया गया। शासक वर्ग ने जनता को मन्दिर–मस्जिद और हिन्दू–मुस्लिम के दंगों में उलझा दिया।
इतिहास
“हड़ताल कौन करेगा?, मैं करूँगा, हम करेंगे।” यह नारा 1974 के ऐतिहासिक आन्दोलन में मजदूरों ने बुलन्द किया था। इस नारे के साथ लाखों मजदूरों ने 20 दिन तक रेलवे की देशव्यापी हड़ताल की थी।.... केवल भारत ही नहीं दुनिया भर में इस आन्दोलन की गूँज सुनाई दी। कई देशों की मजदूर यूनियनों ने इस संघर्ष की प्रशंसा की।
“हड़ताल कौन करेगा?, मैं करूँगा, हम करेंगे।” यह नारा 1974 के ऐतिहासिक आन्दोलन में मजदूरों ने बुलन्द किया था। इस नारे के साथ लाखों मजदूरों ने 20 दिन तक रेलवे की देशव्यापी हड़ताल की थी।.... केवल भारत ही नहीं दुनिया भर में इस आन्दोलन की गूँज सुनाई दी। कई देशों की मजदूर यूनियनों ने इस संघर्ष की प्रशंसा की।
आज मजदूर वर्ग अपने इतिहास के संघर्षों को भूलता जा रहा है। यही वजह है कि उसके लड़ने के जज्बे में कमी आयी है और उसकी एकता कमजोर पड़ गयी है। क्या अपने इतिहास से कटकर मजदूर वर्ग अपनी लड़ाई में जीत ह...
उत्तरदायित्व
1– हम आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों में पूरी निष्ठा के साथ भाग लेते हैं। हम उत्पीड़न, शोषण और हर प्रकार के गलत कार्यों के खिलाफ स्वत-स्फूर्त संघर्षों में पूरे जुझारूपन के साथ भाग लेते हैं। हम मजदूरों की इच्छाओं के खिलाफ जाकर उनके संघर्षों को अवरुद्ध नहीं करते। 2– हम ट्रेड यूनियन मामलों में नौकरशाही तौर–तरीकों के जरिये मजदूर–कार्यकर्ताओं के उत्साह को कुन्द नहीं करते। हम मजदूरों के विचारों का दमन करने की नीति की न सिर्फ भर्त्सना करते हैं, बल्कि उसके खिलाफ संघर्ष भी करते हैं।
1– हम आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों में पूरी निष्ठा के साथ भाग लेते हैं। हम उत्पीड़न, शोषण और हर प्रकार के गलत कार्यों के खिलाफ स्वत-स्फूर्त संघर्षों में पूरे जुझारूपन के साथ भाग लेते हैं। हम मजदूरों की इच्छाओं के खिलाफ जाकर उनके संघर्षों को अवरुद्ध नहीं करते। 2– हम ट्रेड यूनियन मामलों में नौकरशाही तौर–तरीकों के जरिये मजदूर–कार्यकर्ताओं के उत्साह को कुन्द नहीं करते। हम मजदूरों के विचारों का दमन करने की नीति की न सिर्फ भर्त्सना करते हैं, बल्कि उसके खिलाफ संघर्ष भी करते हैं।
समाज के शिक्षित लोगों में डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, सरकारी कर्मचारी, निजी कर्मचारी और दूसरे पढ़े–लिखे लोग आते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह शिक्षित तबका समाज का अगुआ है। समाज के बाकी लोगों को जागरूक कर...
कथन
नारायण मूर्ति एक बार फिर बड़ा बयान देकर विवादों में घिर गये हैं। वे 1990 के बाद, नंगे पूँजीवादी, नव–उदारवादी दौर के नौबढ़ पूँजीपति हैं। उन्होंने यह बयान माँ–बाप के कर्त्तव्यों को लेकर दिया है। उन्होंने कहा है कि बच्चों की पढ़ाई के लिए घर में अनुशासित माहौल बनाना माता–पिता की जिम्मेदारी है। माँ–बाप यह उम्मीद करते हुए फिल्में नहीं देख सकते कि बच्चे अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाएँगे। यानी माँ–बाप को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए समय निकालना चाहिए। इसके जवाब में सोशल मीडिया के एक यूजर ने लिखा, "आपकी सलाह के अनुसार अगर माँ–बाप 72 घण्टे काम करेंगे तो वे बच्चों को समय कब देंगे?”यह मूर्ति के नसीहत वाले बयान पर करारा तमाचा ही है।
नारायण मूर्ति एक बार फिर बड़ा बयान देकर विवादों में घिर गये हैं। वे 1990 के बाद, नंगे पूँजीवादी, नव–उदारवादी दौर के नौबढ़ पूँजीपति हैं। उन्होंने यह बयान माँ–बाप के कर्त्तव्यों को लेकर दिया है। उन्होंने कहा है कि बच्चों की पढ़ाई के लिए घर में अनुशासित माहौल बनाना माता–पिता की जिम्मेदारी है। माँ–बाप यह उम्मीद करते हुए फिल्में नहीं देख सकते कि बच्चे अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाएँगे। यानी माँ–बाप को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए समय निकालना चाहिए। इसके जवाब में सोशल मीडिया के एक यूजर ने लिखा, "आपकी सलाह के अनुसार अगर माँ–बाप 72 घण्टे काम करेंगे तो वे बच्चों को समय कब देंगे?”यह मूर्ति के नसीहत वाले बयान पर करारा तमाचा ही है।