मजदूरों के लिए नारायण मूर्ति के बयानों का मतलब

07 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
नारायण मूर्ति एक बार फिर बड़ा बयान देकर विवादों में घिर गये हैं। वे 1990 के बाद, नंगे पूँजीवादी, नव–उदारवादी दौर के नौबढ़ पूँजीपति हैं। उन्होंने यह बयान माँ–बाप के कर्त्तव्यों को लेकर दिया है। उन्होंने कहा है कि बच्चों की पढ़ाई के लिए घर में अनुशासित माहौल बनाना माता–पिता की जिम्मेदारी है। माँ–बाप यह उम्मीद करते हुए फिल्में नहीं देख सकते कि बच्चे अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाएँगे। यानी माँ–बाप को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए समय निकालना चाहिए। इसके जवाब में सोशल मीडिया के एक यूजर ने लिखा, "आपकी सलाह के अनुसार अगर माँ–बाप 72 घण्टे काम करेंगे तो वे बच्चों को समय कब देंगे?”यह मूर्ति के नसीहत वाले बयान पर करारा तमाचा ही है। इंफोसिस के सह–संस्थापक नारायण मूर्ति अपने बयानों को लेकर लगातार सुर्खियों में रहते हैं। उन्होंने डेढ़ साल पहले कहा था कि देश के युवाओं को एक हफ्ते में 70 घंटे काम करना चाहिए। जब देश का युवा हफ्ते में 70 घंटे काम करेगा, तब भारत उन अर्थव्यवस्थाओं का मुकाबला कर सकेगा, जिन्होंने पिछले दो से तीन दशकों में कामयाबी हासिल की है। उनका इशारा चीन की तरफ था। नारायण मूर्ति एक सफल पूँजीपति हैं और उद्योग जगत में उनका बड़ा सम्मान है। उनकी बात को गम्भीरता से न लिया जाये, ऐसा नहीं हो सकता। इसलिए उनके बयान पर विवाद होना ही था और विवाद हुआ भी। उनके इस बयान को लेकर देश भर में बहस का माहौल गर्म रहा। ट्वीटर, फेसबुक, यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया पर बहस की जंग ही छिड़ गयी। कुछ लोगोंं ने इस बयान का समर्थन किया। कई लोगों ने उनके बयान का कड़ा विरोध भी किया जिसमें चिकित्सा विशेषज्ञ भी शामिल हैं। नारायण मूर्ति के इस बयान पर सरसरी नजर डालने से ऐसा लगता है कि वे देश के विकास के लिए बहुत चिन्तित हैं और चाहते हैं कि नौजवान कड़ी मेहनत करके देश के पिछड़ेपन को दूर करें और उसे आगे ले जायें। लेकिन देश के हालात पर नजर डालने से हकीकत कुछ और ही सामने आती है। कुछ महीने पहले कोच्चि की रहने वाली चार्टर्ड अकाउंटेंट अन्ना सेबेस्टियन पेरायिल की मौत हो गयी। उनकी मौत हद से ज्यादा काम करने की वजह से महज 26 साल की उम्र में हो गयी। यह एक बेहद चैकाने वाली घटना है। उनकी माँ ने एक पत्र  लिखकर उनकी कम्पनी की खराब कार्य स्थिति का खुलासा किया। इसी तरह की एक दर्दनाक घटना में चेन्नई के 38 साल के सॉफ्रटवेयर इंजीनियर कार्तिकेयन ने काम के अधिक दबाव में करंट लगाकर आत्महत्या कर ली। वहीं झांसी में बजाज फाइनेंस के एरिया मैनेजर 42 साल के तरुण सक्सेना ने भी काम के अधिक दवाब के कारण आत्महत्या का रास्ता चुन लिया। वे 45 दिनों से सो नहीं पाये थे, बहुत कम खाना खा पा रहे थे और बहुत तनाव में थे। उन पर लक्ष्य पूरा करने या नौकरी छोड़ने का दबाव था। इन घटनाओं के सामने आने के बाद काम के अधिक बोझ को लेकर देश भर में फिर से चर्चाएँ होने लगीं। ये सभी घटनाएँ ऊँची आय वाली नौकरी की हैं। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि साधारण मजदूरों और कर्मचारियों पर काम का कितना अधिक दबाव होता होगा। यह देखकर हैरानी होती है कि भारत में काम का अधिक बोझ बहुत आम बात है। नौकरी में सफलता पाने के लिए ज्यादा से ज्यादा काम कराने का चलन बढ़ता जा रहा है। यह सब मालिकों के दबाव के चलते ही हो रहा है। लेकिन ज्यादा काम करना जानलेवा साबित हो रहा है। 2016 में खबर आयी कि हर साल देश के 2 लाख नागरिक ज्यादा काम करने के चलते अपनी जान गँवा देते हैं। यानी ज्यादा काम करना मौत को बुलावा दे रहा है। ऐसी खबरों को छिपा दिया जाता है जिससे पूँजीपति के बिजनेस पर खराब असर न पड़े। इसके बावजूद हर बार सच्चाई धुन्ध को चिरती हुई रोशनी की तरह बाहर निकल आती है। भारत के आईटी क्षेत्र के आँकड़ों से पता चलता है कि इस क्षेत्र के कर्मचारी हर हफ्ते 57.5 घण्टे से अधिक काम करते हैं, जो अन्तरराष्ट्रीय मानक 48 घण्टे से लगभग 9 घण्टे ज्यादा है। साल 2023 में मैककिंसे एण्ड कम्पनी ने 30 देशों का एक सर्वे कराया जिसमें पता चला कि भारत में काम के अधिक दबाव के चलते 60 प्रतिशत लोगों ने बहुत ज्यादा थकावट और चिन्ता महसूस की। साल 2018 के एक सर्वे में पाया गया था कि भारतीयों को दुनिया में सबसे कम छुट्टियाँ मिलीं। अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के आँकड़े से पता चलता है कि भारत के आधे से अधिक नौकरीपेशा लोग (51.4 प्रतिशत) हर हफ्ते  49 घंटे या उससे ज्यादा काम करते हैं। इस मामले में भूटान (61.3 प्रतिशत) के बाद भारत दुनिया में दूसरे पायदान पर है। इससे साफ पता चलता है कि भारत में कम काम करना समस्या नहीं है, बल्कि काम का अधिक बोझ होना समस्या बनता जा रहा है। लगभग डेढ़ सौ साल पहले अन्तरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन ने 8 घण्टे काम, 8 घण्टे आराम और 8 घण्टे मनोरंजन का नारा दिया था यानी 6 दिन में 48 घण्टे जो पूरी तरह वैज्ञानिक और मजदूरों के हित में था। 2021 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और (आईएलओ) ने अधिक काम करने के प्रभाव पर अपनी रिपोर्ट जारी की। इसमें बताया गया कि सप्ताह में 35 से 40 घण्टे की तुलना में 55 घण्टे या उससे अधिक काम करने से मौत का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। इससे हृदय–आघात का खतरा 35 प्रतिशत और दिल की बीमारी से मौत का खतरा 17 प्रतिशत बढ़ जाता है। लम्बे समय तक काम करने के चलते मरने वाले लोगों की सबसे ज्यादा संख्या भारत में ही है। इन सबके बावजूद नारायण मूर्ति कहते हैं कि हफ्ते में 70 घण्टे यानी 6 दिन के हिसाब से रोज 12 घण्टे काम करना चाहिए। इतना ही नहीं, वे सीएनबीसी ग्लोबल लीडरशिप समिट में एक बार फिर कहते हैं कि "मुझे खेद है, मैं अपना दृष्टिकोण नहीं बदल सकता। मैं इसे अपने साथ ही कब्र तक ले जाऊँगा।”यह बेहयाई की हद है। वे यह भी कहते हैं कि  "मैं वर्कलाइफ बैलेंस को नहीं मानता। स्पष्ट रूप से कहूँ तो मैं थोड़ा निराश था, जब 1986 में हम हफ्ते में 6 दिन से 5 दिन काम की तरफ बढ़े, मैं इससे खुश नहीं था। मुझे लगता है कि इस देश में हमें मेहनत करनी चाहिए क्योंकि मेहनत का कोई तोड़ नहीं।”उनका मानना है कि हमारे देश की प्रगति के लिए त्याग करने की आवश्यकता है। इसके लिए वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 18–18 घण्टे काम के बयान का उदाहरण भी पेश करते हैं जो कि एक जुमला ही है। यह हम सभी जानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि चीन ने केवल 44 वर्षों में भारत को बड़े अन्तर से पीछे छोड़ दिया है। चीनी अर्थव्यवस्था भारत से 6 गुना बड़ी है। 1978 से 2022 के बीच 44 सालों में चीन ने भारत को बहुत ज्यादा पछाड़ दिया है। छह गुना ज्यादा बड़ा होना कोई चुटकुला नहीं है। यदि आप लोग मेहनत करते हैं तो भारत भी वैसा ही सम्मान पाएगा, जैसा आज चीन को मिलता है। लेकिन यह बयान देते समय वह चीन के आगे बढ़ने के इतिहास को छिपा देते हैं। यह बताना भूल जाते हैं कि कैसे चीन में समाजवादी निर्माण के दौरान मजदूरों और किसानों के हित में काम किया गया। समाजवादी योजनाओं के चलते ही चीन तेजी से विकास कर पाया। वहाँ मूर्ति जैसे पूँजीपतियों पर लगाम कस दी गयी थी और उन्हें मेहनतकशों को गुलाम बनाने और उनका शोषण करने की इजाजत नहीं थी। सभी की जिन्दगी सम्मानजनक थी। मेहनतकश वर्ग खुद अपने भाग्य का विधाता था। बेंगलुरु में टेक समिट 2023 के 26वें संस्करण में बोलते हुए नारायण मूर्ति ने कहा है कि कुछ भी मुफ्त में नहीं दिया जाना चाहिए। उनका इशारा मजदूरों, किसानों और नौजवानों को दी जाने वाली सब्सिडी की तरफ था। यह बात हम सभी जानते हैं कि सरकार कुछ भी मुफ्त नहीं देती। सरकार के पास जो भी धन–सम्पत्ति है वह जनता की गाढ़ी कमाई से हासिल की गयी है। देश का हर व्यक्ति सरकार को टैक्स देता है चाहे वह भिखारी ही क्यों न हो। अमरीकी कम्पनी जेपी मॉर्गन के सीईओ जेमी डायमन का मानना है कि एआई से कार्य सप्ताह साढ़े तीन दिन का हो सकता है और लोगों की उम्र 100 साल तक पहुँच सकती है। ऐसा लग सकता है कि उनका यह बयान नारायण मूर्ति के 70 घंटे काम करने की नसीहत का उल्टा है। लेकिन हकीकत यह है कि डायमन का बयान मूर्ति के बयान का दूसरा पहलू भर है। दरअसल, एआई तकनीक का फायदा मजदूरों को नहीं मिल रहा है। इससे छँटनी और बेरोजगारी और अधिक बढ़ गयी है और मौजूद कामगारों पर काम का दबाव भी बढ़ता जा रहा है। दूसरों को नसीहत देने वाले मूर्ति की जिन्दगी कोई आदर्श नहीं है। वे टैक्स की चोरी करने वाले पूँजीपति हैं। वस्तु एवं सेवा कर खुफिया महानिदेशालय ने मूर्ति की कम्पनी इंफोसिस को 32,400 करोड़ रुपये टैक्स चोरी का नोटिस भेजा है। इतना ही नहीं, उनकी कम्पनी इंफोसिस पर अमरीका में 283 करोड़ रुपये का भारी–भरकम जुर्माना भी लगाया गया है। इंफोसिस पर आरोप है कि वह अमरीका में वीजा मामले के फ्रॉड में लिप्त है। कब्र में पैर लटकाये नारायण मूर्ति मेहनतकशों के लिए नसीहत भरे बयान देते जा रहे हैं। अगर वे कोई सामान्य इनसान होते या गली–नुक्कड़ के छुटभैये नेता होते तो कोई बात नहीं होती। उनके बयान को अनदेखा किया जा सकता था लेकिन वे एक सफल पूँजीपति हैं और नौजवानों के सामने उनको आदर्श के रूप में पेश किया जाता है। ऐसे में उनके बयान समाज पर काफी खतरनाक प्रभाव डालते हैं क्योंकि मीडिया में उन्हें बड़े पैमाने पर जगह दी जाती है। उन्हें प्रचारित–प्रसारित किया जाता है। उनके बयान ट्रेण्ड सेट करने वाले बन जाते हैं जिनका सहारा लेकर देश के मेहनतकशों को और अधिक निचोड़ा जाता है। आज देश के पूँजीपति मजदूरों से अधिक से अधिक काम ले रहे हैं। मजदूरों को पूरी तरह निचोड़ने के बाद भी उन्हें सम्मानजनक जिन्दगी जीने लायक मजदूरी नहीं दी जा रही है। लेकिन पूँजीपति को इतने से ही संतोष नहीं है। वे मेहनतकश–मजदूरों को भरमाने के लिए नसीहत भरे बयान दे रहे हैं जिससे उन्हें और निचोड़ा जा सके। ऐसी बातों से हमें सावधान रहने की जरूरत है। –– उत्कर्ष विश्वकर्मा
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