फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
संपादकीय (अंक 1)

आज फासीवादी शक्तियाँ मजदूर वर्ग और अन्य मेहनतकश जनता पर बर्बर हमले कर रही हैं। उन्होंने मजदूरों पर श्रम संहिता, ठेका प्रथा, हायर और फायर, थोड़े समय का रोजगार जैसी नीतियों को थोप दिया है। वे मजदूरों की रोजी–रोटी छीनकर पूँजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने पर ही आमादा नहीं हैं, बल्कि मेहनतकश जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन भी कर रही हैं। यूनियन बनाने, हड़ताल करने, अपना प्रतिनिधि चुनने और न्याय पाने के अधिकार को खत्म करने की पुरजोर कोशिश चल रही है।

इतना ही नहीं, वे मजदूर वर्ग और अन्य मेहनतकश जनता के बीच सामन्ती और पुरातनपंथी विचारों का प्रचार–प्रसार करके उनकी एकता को तोड़ रही हैं। जनता को दिमागी गुलामी का शिकार बनाया जा रहा है। उसे धर्मोन्माद और दंगे–फसाद का मुहरा बना देने की साजिश रची जा रही है।

मजदूरों से 12–12 घण्टे काम कराया जा रहा है। इतने से मन नहीं भरा तो पूँजीपति बड़ी बेशर्मी से कह रहे हैं कि मजदूरों को हफ्ते में 90 घण्टे काम करना चाहिए। वे मजदूरों के खून की आखिरी बूँद तक निचोड़ लेते हैं। मजदूरों को पूरी तरह निचोड़ लेने के बाद आम की गुठली की तरह फेंक दिया जाता है। मजदूरों के शोषण–उत्पीड़न की कोई सीमा नहीं है। अथाह शोषण और लूट ने उनकी जिन्दगी को तबाह कर डाला है।

इलाज के अभाव में मजदूर ऐसी छोटी–छोटी बीमारियों से असमय मौत के मुँह में समाते जा रहे हैं जिनकी दवाइयाँ मौजूद हैं। इलाज और शिक्षा को भी पूँजीपतियों की लूट का साधन बना दिया गया है। महँगी शिक्षा और इलाज मजदूरों की पहुँच से दूर चले गये हैं। इन्हें हासिल करने के लिए मजदूर कर्ज ले रहे हैं और उसके मकड़ जाल में फँसते जा रहे हैं। बेशर्म पूँजीपतियों को मजदूरों की जिन्दगी से कोई मतलब नहीं। वे मजदूरों को अपनी मशीन का पुर्जा मानते हैं जो उनके मुनाफे का साधन भर है।

मजदूर और अन्य मेहनतकश जनता बेरोजगारी की मार झेल रही है। वे रोजगार की तलाश में एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे तक धक्के खा रहे हैं। अपमान और पीड़ा बर्दाश्त कर रहे हैं। केन्द्र और राज्य सरकारें मजदूरों का शोषण–उत्पीड़न करने में पूँजीपतियों का साथ दे रही हैं। वे अर्थव्यवस्था के संकट का सारा बोझ मेहनतकश जनता पर डाल रही हैं। इसके लिए वे फासीवादी शासन के तौर–तरीके अपना रही हैं।

मजदूरों के ऊपर महँगाई का बोझ लादा जा रहा है। केन्द्र सरकार ने टैक्स बढ़ाकर उपयोगी सामान की कीमतों को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है जिन तक मजदूरों का हाथ पहुँच ही नहीं सकता। इसके चलते वे मिलावटी सस्ते सामान पर जिन्दगी गुजार रहे हैं। पौष्टिक खाने जैसे–– दूध, घी, फल, सब्जी और दाल के अभाव में उनका शरीर कमजोर होता जा रहा है। अपनी मजबूत कद–काठी और मेहनत–मशक्कत के लिए मशहूर मजदूर आज शरीर की कमजोरी, बीमारी और पीड़ा से ग्रस्त हैं। वे समय से पहले ही बूढ़े हो जा रहे हैं जबकि चुनावबाज नेताओं, हीरो–हीरोइनों और पूँजीपतियों के गाल बुढ़ापे में भी चमक रहे हैं। मजदूर वर्ग को पूँजीपति वर्ग और उसकी रहनुमा सरकारों ने लूटकर तबाह कर डाला है।

इस लूट–खसोट की व्यवस्था के खिलाफ मजदूरों ने जहाँ कहीं भी अपने विरोध और गुस्से का इजहार किया है, उसे दबाने के लिए फासीवादी भेड़िये अपनी माँद से निकल आते हैं। इसके बावजूद देश में हर जगह विरोध प्रदर्शन, धरना और हड़ताल में रोज–रोज बढ़ोतरी हो रही है। जनता अपनी जायज माँगों को लेकर सड़कों पर उतर रही है। उसे दबाने के लिए पुलिस–प्रशासन और फासीवादी गुण्डा गिरोहों के हमले तेज हो रहे हैं। फासीवादी भेड़िये अपने खूनी पंजों और नुकीले दाँतों से मजदूरों की बोटी–बोटी नोच खाने को आतुर हैं।

फासीवाद के पीछे इजारेदार वित्तीय पूँजीपति और सट्टेबाजों का स्वार्थ काम कर रहा है। इन पूँजीपतियों ने मजदूरों के शोषण और देश की सम्पदा की लूट से जो दौलत हासिल की है, उसका कुछ टुकड़ा फासीवादी गुण्डा गिरोह, फासीवादी संगठनों और पार्टियों की ओर फेंक कर उन्हें पालने–पोसने का काम कर रहे हैं। इसी दौलत के दम पर उन्होंने अफवाह–तंत्र, मीडिया और ट्रोल आर्मी तैयार की है जो दिन–रात मजदूरों–मेहनतकशों को भरमाने और डराने का घिनौना खेल खेलते हैं। वे संसद से लेकर सड़क तक विरोध के हर साधन पर कब्जा करते जा रहे हैं।

वे अखबार, टीवी चैनल और सोशल मीडिया के प्रचारतंत्र के जरिये जनता के बड़े हिस्से में साम्प्रदायिक नफरत की राजनीति को स्थापित कर रहे हैं। जहरीले बयानों के जरिये जनता को हिन्दू–मुसलमान में बाँटा जा रहा है। जगह–जगह दंगे–फसाद फैला कर जनता की एकता को तोड़ दिया गया है। लोकतंत्र खून के आँसू रो रहा है और खूँखार दरिन्दे इनसानियत की बोटी नोचकर खा रहे हैं। लाशों पर जश्न मना रहे हैं। उनके घिनौने कारनामों की फेहरिस्त इतनी लम्बी है कि लिखना चाहें तो कागज और कलम कम पड़ जायें।

केन्द्र सरकार अपनी नवउदारवादी नीतियों से पूँजीपति वर्ग की सेवा कर रही है। इसके लिए वह अपनी फासीवादी सत्ता के खूनी पंजों को दिन–ब–दिन पैने करती जा रही है। हाल ही में तीन नये आपराधिक कानूनों–– भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को पास करके उसने अपना इरादा जाहिर कर दिया है। उसने चुनाव आयोग, न्यायपालिका और दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ ईडी और सीबीआई को अपनी मुट्ठी में कर लिया है। वह इनका इस्तेमाल विरोधियों को डराने और दबाने के लिए कर रही है।

आरएसएस और भाजपा द्वारा बहुप्रचारित ‘हिन्दू राष्ट्र’ एक छलावा है। वह मजदूर वर्ग के लिए धोखे का सबब है। वह बाबा साहब अम्बेडकर के पंथ–निरपेक्ष संविधान पर हमला है। साम्प्रदायिक शक्तियाँ मजदूरों को जाति–धर्म में बाँट रही हैं। उनकी एकता तोड़ रही हैं। आज फासीवादी शक्तियाँ ऐसे पत्रकारों, कलाकारों, कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों पर हमले कर रही हैं जो न्याय के लिए मजदूर वर्ग के पक्ष में खड़े हैं। वे इन न्यायप्रिय और अमनपसन्द लोगों की आवाज को दबाकर जनता को गूँगा–बहरा बना देना चाहती हैं जिससे जनता अपने हक–हुकूक की माँग न कर सके।

मजदूर–मेहनतकश साथियो, हमें फासीवादियों के नापाक मंसूबों को कामयाब नहीं होने देना है।  हम तय कर लें कि पूँजीपतियों और उसके बर्बर फासीवादी हमलों के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। मजदूरों को चाहिए कि वे अपने बीच की जाति–धर्म की दीवार को गिराकर आपस में मजबूत एकता कायम करें। मजदूर वर्ग अपनी एकता और क्रान्तिकारी विचारधारा के दम पर ही फासीवादी हमलों का मुँहतोड़ जवाब दे सकता है। उसे इन हमलों का जवाब देना ही होगा। मजदूर वर्ग की जिम्मेदारी है कि वह इस महा–संग्राम में जनता के अन्य हिस्सों को भी सही रास्ता दिखाये। आज हम हाथ–पर–हाथ धरे बैठे नहीं रह सकते। फासीवादियों के अश्वमेघ के घोड़े को पकड़ने और रोकने के लिए मजदूर वर्ग को आगे आना ही होगा। यही आज मजदूर वर्ग का सबसे बड़ा ऐतिहासिक कार्यभार है। इसलिए मेहनतकश साथियो, हमने अपने खून–पसीने से जिस दुनिया का निर्माण किया है, उसे हम यूँ ही लुटते–पिटते नहीं देख सकते। हमें फासीवाद–पूँजीवाद को हराने के लिए और उसके बाद न्याय और बराबरी पर आधारित समाजवादी व्यवस्था की नींव रखने के लिए आगे आना चाहिए।

इस अंक के लेख

कविता

लौह पटरियों की अनसुनी धुन

सादगी और विनम्रता ट्रैकमैन का आभूषण है ये कमजोरी का संकेत नहीं जो कठोर हाथ देश के सीने में पिघला हुआ लोहा उतार सकते हैं वे उनका गुरूर भी तोड़ सकते हैं जो आज सत्ता के नशे में चूर हैं..............

कविता

कैसे बनती है पत्रिका

नहीं बनती है जनता की पत्रिका केवल कागज, कलम और स्याही से उसमें लगते हैं–– दिन और रातें सुबहों और शामें अनगिनत कार्यकर्ताओं के जो सड़कों पर आवारागर्दी कर सकते थे, मौज–मस्ती और सैर–सपाटे में दिन गुजार सकते थे लेकिन उन्होंने अपना हर पल उस तरह खर्च किया..........

मजदूर एकता पत्रिका-9

दिल्ली के असंगठित मजदूरों की हालत

दिल्ली भारत की राजधानी है। जहाँ हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को देश के प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं। जहाँ हमारे देश का संविधान बनाया गया है। जहाँ बड़ी–बड़ी मीटिंग होती हैं कि देश को कैसे चलाना है, व्यापार कैसे करना है? दिल्ली एक चमचमाता शहर है। पर इसी चमचमाते शहर में न जाने कितने मेहनतकश मजदूर दिन–रात मेहनत करते–करते भूख और गरीबी में दम तोड़ रहे हैं। जिन्दगी की जंग हार रहे हैं।...

मजदूर आन्दोलन

आशा वर्करों से गुफ्तगू

हमने तीन आशा वर्करों––रज्जो, रोशनी और सीता से बातचीत की जो मेरठ के प्यारेलाल अस्पताल में काम करती हैं। इन सबसे बात करके हमें अच्छा लगा क्योंकि वे खुशमिजाज और निडर हैं। वे बहुत मेहनती भी हैं। रज्जो और सीता की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। इनके पति मजदूरी करते हैं, जबकि रोशनी की आर्थिक हालत थोड़ी ठीक है। उसके पति की प्रिंटिंग की दुकान है। इन तीनों में अच्छी यारी–दोस्ती है। उनके काम और समस्याओं आदि से सम्बन्धित जो बातचीत हमने की उसका कुछ हिस्सा हम यहाँ दे रहे हैं।...

कहानी

कहानी: कचरा बाबा

जब वो अस्पताल से बाहर निकला तो उसकी टांगें काँप रही थीं और उसका सारा जिस्म भीगी हुई रुई का बना मालूम होता था। और उसका जी चलने को नहीं चाहता था, वहीं फुटपाथ पर बैठ जाने को चाहता था। कायदे से उसे अभी एक माह और अस्पताल में रहना चाहिए था, मगर अस्पताल वालों ने उसकी छुट्टी कर दी थी। साढे़ चार माह तक वो अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में रहा था और डेढ़ माह तक जनरल वार्ड में, इस दरमियान उसका गुर्दा निकाल दिया गया था और उसकी आँतों का एक हिस्सा काट के आँतों की बीमारी को दुरुस्त किया गया था। अभी तक उसके कलेजे की बीमारी सही नहीं हुई थी। उसे अस्पताल से निकल जाना पड़ा। क्योंकि दूसरे लोग इन्तजार कर रहे थे, जिनकी हालत उस से भी बदतर थी। डॉक्टर ने उसके हाथ में एक लम्बा सा नुस्खा दे दिया और कहा––...

मजदूर इंटरव्यू

झोला बनाने वाली महिलाओं से बातचीत

हमारे घरों में कपड़े के थैलों में कोई न कोई सामान आता ही रहता है। कभी पोशाक तो कभी मिठाइयाँ। इन कपड़ों के झोलों का चलन बढ़ता जा रहा है। हमारे मन में शायद ही कभी ख्याल आता है कि इन झोलों को बनाने वालों की जिन्दगी कैसी होगी। इसे जानने के लिए हम उन महिलाओं के बीच गये जो झोला बनाती हैं। हमें उनको करीब से जानने का मौका मिला।...

कॉर्पोरेट

कम्पनी में काम का मेरा अनुभव

मजदूरों पर अत्याचार हो रहे है और मजदूरों की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। मैं खुद भी एक आम मजदूर हूँ और उत्तराखण्ड के सेलाकुई औद्योगिक क्षेत्र में एक प्राइवेट कम्पनी में ठेकेदार के नीचे काम करता हूँ। हम अपनी औकात से अधिक काम करते हैं फिर भी हमारे साथ हमारे ही सीनियर, कम्पनी में ऊँचे पद पर बैठे कर्मचारियों और कम्पनी मालिक द्वारा अत्याचार किया जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि शिक्षित होकर के भी हम श्रम कानूनों और अपने अधिकारों के बारे में नहीं जानते हैं। यह बहुत दुर्भाग्य की बात है।...

दुर्घटना

फैक्ट्रियों की आग में झुलस कर मरते मजदूर

बीती 4 जनवरी को तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले के सत्तूर इलाके में एक पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट की दिल दहलाने देने वाली घटना सामने आयी। इस धमाके में फैक्ट्री का एक कमरा पूरी तरह से तबाह हो गया जिसमें कई ......

कॉर्पोरेट

कामकाजी जनता पर पर्यावरण प्रदूषण की मार

अखबार, टीवी और तमाम सूचना माध्यम से यह बात जगजाहिर है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के पैमाने के 60 गुणा से भी ज्यादा खराब है। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले परिवारों में से 75 प्रतिशत परिवारों में किसी न किसी को गले में सूजन या खाँसी की शिकायत है। 58 प्रतिशत परिवारों में सरदर्द के मरीज हैं और 50 प्रतिशत परिवारों में दमा या दूसरे साँस सम्बन्धी बीमारी के मरीज हैं। खराब हवा के चलते जब दिल्ली सरकार और केन्द्रीय सरकार स्कूल और सरकारी दफ्रतर तथा बहुत से निजी कम्पनी के कर्मचारियों के लिए छुट्टी या घर काम करने की इजाजत दे रही है तब बहुत जरूरी क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर बाहर निकलने को मजबूर हैं।...

अंधविश्वास और तर्कशीलता

मजदूरों में फैले अन्धविश्वास को कैसे दूर करें?

हमारे समाज में ढोंग–पाखंड, जादू–टोना, बाबा–ओझा और अन्धविश्वास का बहुत बोलबाला है। मजदूर वर्ग भी इनसे मुक्त नहीं है। हम देखते हैं कि अन्धविश्वास के चलते ही छोटे बच्चों की बलि चढ़ा दी जाती है, इनसान की जानवरों से शादी करायी जाती है, गम्भीर बीमारी या साँप काटने के बाद झाड–फूँक से मरीज की मौत हो जाती है। अन्धविश्वास से मजदूरों का इससे भी बड़ा नुकसान होता है। अन्धविश्वासी मजदूर अपने शोषण–उत्पीड़न से लड़ने के लिए सही संगठन नहीं बना पाते हैं। मजदूरों की समझदारी कुन्द होने का एक कारण अन्धविश्वास भी है, इसी के चलते वे अपनी समस्याओं के सही कारणों को समझ नहीं पाते हैं और उनकी एकता कमजोर पड़ जाती है। सही विचारों पर आधारित मजदूरों का जुझारू संगठन बनाने के लिए उनके बीच फैले ढोंग–पाखंड और अन्धविश्वास को दूर करना जरूरी है। मजदूरों में फैले अन्धविश्वास को किस तरह समझें और इसे कैसे दूर करें?...

कविता

हमारी जिन्दगी

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं। हमेशा काम करते हैं, मगर.........

ट्रेड यूनियन

रेलवे ट्रैकमैन की कार्य स्थितियाँ और हालात

अगर ट्रैकमैन को भारतीय रेलवे की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है तो ठीक ही कहा जाता है क्योंकि ट्रैकमैन सर्दी–गर्मी, धूप–बरसात हर तरह के मौसम में खुले आसमान के नीचे काम करता है। दिन हो चाहे रात, हर समय कोई न कोई ट्रैकमैन ट्रैक की देखरेख के काम में जुटा रहता है। उसका मुख्य काम रेलवे ट्रैक की मरम्मत और हिफाजत करना होता है, ताकि रेलवे का परिचालन बिना रुकावट के चलता रहे। वह बुनियादी तौर पर अकुशल मजदूर होता है जिस पर अपने सीनियर अधिकारियों के निर्देशों का आँख मूँदकर पालन करने का दबाव होता है। लेकिन अफसोस की बात है कि इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कर्मचारियों की रेलवे प्रशासन द्वारा कोई सुध नहीं ली जाती है। रेलवे में ट्रैकमैन और अधिकारियों के बीच का रिश्ता मजदूर–मलिक जैसा ही है। रेलवे में ट्रैकमैन की संख्या अधिक है और वह सबसे शोषित–पीड़ित कैडर भी है।...

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