रेलवे ट्रैकमैन की कार्य स्थितियाँ और हालात

07 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
अगर ट्रैकमैन को भारतीय रेलवे की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है तो ठीक ही कहा जाता है क्योंकि ट्रैकमैन सर्दी–गर्मी, धूप–बरसात हर तरह के मौसम में खुले आसमान के नीचे काम करता है। दिन हो चाहे रात, हर समय कोई न कोई ट्रैकमैन ट्रैक की देखरेख के काम में जुटा रहता है। उसका मुख्य काम रेलवे ट्रैक की मरम्मत और हिफाजत करना होता है, ताकि रेलवे का परिचालन बिना रुकावट के चलता रहे। वह बुनियादी तौर पर अकुशल मजदूर होता है जिस पर अपने सीनियर अधिकारियों के निर्देशों का आँख मूँदकर पालन करने का दबाव होता है। लेकिन अफसोस की बात है कि इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कर्मचारियों की रेलवे प्रशासन द्वारा कोई सुध नहीं ली जाती है। रेलवे में ट्रैकमैन और अधिकारियों के बीच का रिश्ता मजदूर–मलिक जैसा ही है। रेलवे में ट्रैकमैन की संख्या अधिक है और वह सबसे शोषित–पीड़ित कैडर भी है। मौजूदा वक्त में ट्रैकमैन बनने के लिए आवेदन करने की न्यूनतम योग्यता दसवीं है। लेकिन देश में बेरोजगारी के भयानक आलम के चलते उच्च शिक्षा प्राप्त नौजवान मजबूरी में इस नौकरी को चुन रहे हैं। पहले के दौर में सभी ट्रैकमैन कैजुअल लेबर यानी अस्थाई मजदूर के तौर पर रेलवे से जुड़ते थे जिन्हें बाद में स्थाई मजदूर का दर्जा दे दिया जाता था। सरकार की गलत नीतियों के चलते उच्च शिक्षित नौजवानों के इस नौकरी में आने से ट्रैकमैन कैडर की दयनीय हालत को बदलने की माँग जोर पकड़ रही है। रेलवे में ट्रैकमैनों की बँधुआ मजदूरों जैसी दुर्दशा है। उन्हें साल के 6 महीने लंच सहित 12 घण्टे और बाकी 6 महीने लंच सहित 9 घण्टे काम करना पड़ता है। उनकी कार्य स्थितियाँ ऐसी हैं कि रोजाना हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। ड्यूटी के दौरान उनके काम की कोई तय सीमा नहीं होती। इसी का फायदा उठाकर अधिकारी उन्हें ज्यदा काम करने को मजबूर करते हैं। रेलवे अधिकारियों द्वारा एक के बाद दूसरा काम बताकर उनको शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। उन्हें खुले आसमान के नीचे गंदगी भरे ट्रैक पर काम करना पड़ता है जिससे हर वक्त संक्रमण का खतरा बना रहता है। ट्रैकमैन चाहते हैं कि उन्हें संक्रमण भत्ता दिया जाये लेकिन रेल प्रशासन का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। उनको रोजाना सुबह ठीक 7 बजे अपने प्रस्थान बिन्दु फ्टूल बॉक्स”पर उपस्थित होना पड़ता है। उसके बाद वे बेहद भारी औजारों को साइकिल या बाइक पर लादकर कार्यस्थल की ओर बढ़ जाते हैं। अक्सर ये भारी औजार उनको अपने कन्धे पर लादकर ही ले जाने पड़ते हैं। काम के भारी बोझ के चलते वे कमर और बदन दर्द की समस्या से जूझते रहते हैं। काम की कोई तय मात्रा न होने के चलते उनको न कोई इंसेंटिव मिलता है और न ही ओवरटाइम है। ट्रैकमैनों के साथ भेदभाव बरता जाता है। उन्हें रेलवे में महादलित की तरह निचले पायदान पर माना जाता है। रेलवे के दूसरे विभागों के कर्मचारियों के साथ–साथ सीनियर अधिकारियों का बर्ताव भी उनके प्रति हीन भावना से भरा रहता है। कड़ी मेहनत के बावजूद अक्सर अधिकारियों द्वारा उनको अब्सेंट और चार्जशीट की धमकी दी जाती है। अब्सेंट और चार्जशीट को शोषण का हथियार बनाकर उन्हें इतना दबाया और डराया जाता है कि वे अपने हक–अधिकार को भूलकर अधिकारियों के गलत और गैर–कानूनी आदेशों का भी पालन करने को मजबूर हो जाते हैं। ट्रैकमैन की कार्य परिस्थितियों के अनुसार उन्हें विभिन्न तरह के सुरक्षा उपकरणों, जैसे– सेफ्रटी शूज, दस्ताने, मास्क, सैनेटाइजर, टॉर्च आदि की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन सुरक्षा उपकरण निर्धारित समय पर नहीं मिलते और मिलते भी हैं तो भ्रष्टाचार के चलते उनकी गुणवत्ता घटिया होती है और उनके भरोसे सुरक्षा के बजाय असुरक्षा ही बढ़ती है। नतीजतन, ट्रैकमैनों को अपनी जेब से पैसे खर्च करके अपनी सुरक्षा का इन्तजाम करना पड़ता है। रेलवे में अनुशासन उल्लंघन का बहाना बनाकर ट्रैकमैन को सबसे अधिक दण्ड दिया जाता है। जहाँ अन्य विभागों में अब्सेंट दर्ज करना और चार्जशीट जारी करने की घटना कभी कभार होती है वहीं ट्रैकमैनों के लिए यह आये दिन होने वाली घटना है। जब से रेलवे में ठेकेदारी प्रथा और निजीकरण का चलन हुआ है, तब से संकट और अधिक गहरा गया है। एक तरफ तो सरकार की निजीकरण की नीति के चलते नये कर्मचारियों की भर्ती बेहद कम हो रही है जिससे मौजूदा ट्रैकमैनों पर काम का दबाव बढ़ता जा रहा है। दूसरी तरफ ठेकेदारी प्रथा के चलते बहुत सारे काम ठेका मजदूरों से करवाये जा रहे हैं। ठेकेदारी प्रथा के चलते ट्रैक मरम्मत की गुणवत्ता में गिरावट आयी है तथा प्रशिक्षण और जवाबदेही के बिना, ठेका मजदूरों द्वारा आधी–अधूरी मरम्मत से ट्रैक भी असुरक्षित हो गया है जिसके चलते आये दिन दुर्घटनाएँ हो रही हैं। कई बार कागजों में ठेकेदार के नाम दर्ज हुआ काम भी ट्रैकमैनों के मत्थे मढ़ दिया जाता है जिससे वे दोहरे उत्पीड़न का शिकार होते हैं। कार्यरत ट्रैकमैनों की लगातार गिरती संख्या के चलते उन्हें सुरक्षा से समझौता करते हुए काम करने को मजबूर किया जा रहा है। हर साल जितने ट्रैकमैन रिटायर होते हैं उसके आधे नये ट्रैकमैन भी सरकार भर्ती नहीं करती। ट्रैक की ड्यूटी की प्रकृति ऐसी है कि कुछ कर्मचारियों को सीधे मरम्मत का काम सौंपा जाता है तो अन्य को मरम्मत करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा जाता है। कर्मचारियों के अभाव में अक्सर सुरक्षा के लिए कर्मचारी तैनात नहीं किये जाते और नतीजतन, ड्यूटी के दौरान हर साल लगभग 400 ट्रैकमैन रेल के नीचे आकर अपनी जान गँवा देते हैं। यह संख्या हर साल देश की सरहद पर शहादत देने वाले सैनिकों से भी बहुत अधिक है। पहिये के नीचे कुचल कर यरन ओवर होकरद्ध भयानक तरीके से मौत का शिकार हो जाना ट्रैकमैन कैडर के लिए बेहद गम्भीर और डरावनी समस्या है। इस समस्या के समाधान के लिए ट्रैकमैनों की लम्बे समय से माँग है कि उन्हें ट्रेन की पूर्व सूचना देने वाला एक यंत्र उपलब्ध कराया जाये, लेकिन सरकार और रेलवे प्रशासन को ट्रैकमैनों की कोई फिक्र नहीं है। देश–दुनिया में बढ़ते तकनीकी विकास का ट्रैकमैनों को कोई लाभ नहीं मिल रहा है। वे आज भी दशकों पुराने ढर्रे पर ड्यूटी करने को मजबूर हैं। इतनी खराब हालात के बावजूद ट्रैकमैनों को अपनी नौकरी में प्रमोशन पाने के सभी दरवाजे बन्द मिलते हैं। रेलवे के अन्दर के इक्के–दुक्के विभागों को छोड़कर अधिकतर विभागों की स्थिति ऐसी ही है। एक ट्रैकमैन कर्मचारी योग्यता के बावजूद प्रमोशन की  विभागीय परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पाता क्योंकि रेलवे के अपने नियम उसे रोक देते हैं। इस कारण से शिक्षित ट्रैकमैनों के अन्दर बेहद गुस्सा है। ट्रैकमैन के साथ नौकरी में हर स्तर पर भेदभाव किया जाता है। रेलवे में न ट्रैकमैन की कदर है, न उनके काम की कदर है और न उनके भविष्य की फिक्र है। उनके लिए कुछ है तो बस यही कि एक बार ट्रैकमैन बन जाने पर पूरी नौकरी जलालत झेलते हुए और प्रमोशन के अवसर मिले बिना खुद को रेलवे के मुनाफे के लिए खपाते जाना। ट्रैकमैन कैडर की मुख्य माँगें निम्नलिखित हैं–– 1– प्रमोशन की सभी विभागीय परीक्षाओं में उन्हें शामिल किया जाये। 2– उनके काम का निर्धारित रोस्टर हो! 3– ट्रेन के आवागमन की सूचना देने वाला रक्षक यंत्र उपलब्ध कराया जाये। 4– काम के औजारों का आधुनिकीकरण हो। 5– रेलवे में निजीकरण और ठेका प्रथा बन्द हो। 6– सभी खाली पदों को शीघ्र भरा जाये। रेलवे कर्मचारियों की पुरानी और स्थापित ट्रेड यूनियनें भी ट्रैकमैनों की हालत सुधारने के लिए कोई संघर्ष नहीं करती हैं। जिस तरह देश की राजनीतिक पार्टियाँ जनता को वोट बैंक से ज्यादा कुछ नहीं समझती, बिल्कुल उसी तरह रेलवे कर्मचारियों की यूनियनें भी ट्रैकमैनों को चुनावी वोट बैंक से ज्यादा अहमियत नहीं देतीं। यूनियनों को मान्यता देने के लिए रेलवे प्रशासन चुनाव करवाता है। चुनाव के वक्त जरूर पुरानी यूनियनों के नेता ट्रैकमैनों से मिलने आते हैं, लेकिन बाकी वक्त वे गायब रहते हैं। चूँकि ट्रैकमैन ऐतिहासिक तौर पर अशिक्षित कैडर रहा है, और उसकी ड्यूटी बेहद कड़ी मेहनत वाली रही है इसलिए उसमें अपने अधिकारों के प्रति बिल्कुल जागरूकता नहीं रही है। स्थापित रेलवे ट्रेड यूनियनों ने ट्रैकमैन के असल दर्द को कभी भी रेल प्रशासन के सामने नहीं रखा। इन यूनियनों के नेता जमीनी संघर्ष से मुँह मोड़कर बस नामचारे के लिए यूनियनें चला रहे हैं। इसलिए अब शिक्षित ट्रैकमैन खुद ही जागरूक और संगठित हो रहे हैं और उनके बीच से ही उनका सही नेतृत्व विकसित हो रहा है। शोषण और भेदभाव की चक्की में पिस रहे ट्रैकमैन को खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता खोजना होगा। बाकी मजदूरों की तरह ट्रैकमैन भी शोषण, उत्पीड़न और भेदभाव से मुक्ति पा सकते हैं। वे इसके लिए किसी पीर–पैगम्बर या देवी–देवता के इन्तजार में बैठे नहीं रह सकते। उन्हें जागरूक होना होगा तथा अपने हकों और अधिकारों को समझना होगा। उन्हें एक ऐसी यूनियन में खुद को संगठित करना होगा जो उनके द्वारा उनके लिए शोषण–उत्पीड़न से मुक्ति का रास्ता दिखाये जिसकी बागडोर सच्चे और जुझारू नेताओं के हाथ में हो। --विशाल विवेक
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