कहानी: कचरा बाबा
08 Jun 2025
• फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
जब वो अस्पताल से बाहर निकला तो उसकी टांगें काँप रही थीं और उसका सारा जिस्म भीगी हुई रुई का बना मालूम होता था। और उसका जी चलने को नहीं चाहता था, वहीं फुटपाथ पर बैठ जाने को चाहता था। कायदे से उसे अभी एक माह और अस्पताल में रहना चाहिए था, मगर अस्पताल वालों ने उसकी छुट्टी कर दी थी। साढे़ चार माह तक वो अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में रहा था और डेढ़ माह तक जनरल वार्ड में, इस दरमियान उसका गुर्दा निकाल दिया गया था और उसकी आँतों का एक हिस्सा काट के आँतों की बीमारी को दुरुस्त किया गया था। अभी तक उसके कलेजे की बीमारी सही नहीं हुई थी। उसे अस्पताल से निकल जाना पड़ा। क्योंकि दूसरे लोग इन्तजार कर रहे थे, जिनकी हालत उस से भी बदतर थी। डॉक्टर ने उसके हाथ में एक लम्बा सा नुस्खा दे दिया और कहा––
"ये टॉनिक पियो और ताकत देने वाले खाने खाओ, बिल्कुल तन्दुरुस्त हो जाओगे। अब अस्पताल में रहने की कोई जरूरत नहीं है।”
"मगर मुझसे चला नहीं जाता, डॉक्टर साहब!”उसने कमजोर आवाज में प्रतिरोध किया।
"घर जाओ! चन्द दिन बीवी खिदमत करेगी, बिल्कुल ठीक हो जाओगे।”
बहुत ही धीरे–धीरे लड़खड़ाते हुए कदमों से फुटपाथ पर चलते उसने सोचा, ‘घर? मेरा घर कहाँ है?’ चन्द माह पहले एक घर जरूर था। एक बीवी भी थी, जिसके एक बच्चा होने वाला था। वो दोनों उस आने वाले बच्चे के तसव्वुर से किस कदर खुश थे। होगी दुनिया में ज्यादा आबादी, मगर वो तो उन दोनों का पहला बच्चा था। दुलारी ने अपने बच्चे के लिए बड़े खूबसूरत कपड़े सिये थे और अस्पताल में लाकर उसे दिखाये थे। और उन कपड़ों की नर्म सतह पर हाथ फेरते हुए उसको ऐसा महसूस हुआ, जैसे वो अपने बच्चे को बाँहों में लेकर उसे प्यार कर रहा हो। मगर फिर अगले चन्द महीनों में बहुत कुछ लुट गया। जब उसके गुर्दे का पहला ऑप्रेशन हुआ, तो दुलारी ने अपने जेवर बेच दिये कि ‘ऐसे ही मौकों के लिए होते हैं। लोग यह समझते हैं कि जेवर औरत की खूबसूरती में बढ़ोतरी के लिए होते हैं, वो तो किसी दूसरे दर्द का इलाज होते हैं। शौहर का ऑप्रेशन, बच्चे की तालीम, लड़की की शादी, ये बैंक ऐसे ही मौकों के लिए खुलता है और खाली कर दिया जाता है। औरत तो उस जेवर की ट्रस्टी होती है। और जिन्दगी में मुश्किल से पाँच छः बार उसे इस जेवर को पहनने का नसीब हासिल होता है।’
गुर्दे के दूसरे ऑप्रेशन से पहले दुलारी का बच्चा कोख में मर गया। वो तो होना ही था। दुलारी को दिन–रात जो कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी, उसमें ये खतरा सबसे पहले मौजूद था। ऐसा लगता जैसे दुलारी का यह छरहरा सुनहरा बदन इस कदर कड़ी मशक्कत के लिए नहीं बनाया गया। इसलिए वो भ्रूण बच्चे ही में से कहीं लटक गया था। खराब माहौल देखकर और माँ–बाप की पतली हालत भाँप कर उसने खुद ही पैदा होने से इनकार कर दिया। कुछ बच्चे ऐसे ही अकलमन्द होते हैं। दुलारी कई दिनों तक अस्पताल नहीं आ सकी। और जब उसने आ कर खबर दी, तो वो किस कदर रोया था। अगर उसे मालूम होता कि आगे चल कर उसे इससे कहीं ज्यादा रोना पड़ेगा, तो वो इस हादसे पर रोने के बजाय खुशी का इजहार करता। गुर्दे के दूसरे ऑप्रेशन के बाद उसकी नौकरी जाती रही। लम्बी बीमारी में यही होता है। कोई कहाँ तक इन्तजार कर सकता है। बीमारी इनसान का अपना व्यक्तिगत मुआमला है। इसलिए अगर वो चाहता कि उसकी नौकरी कायम रहे, तो उसे ज्यादा देर तक बीमार न पड़ना चाहिए। इनसान मशीन की तरह है। अगर एक मशीन लम्बे अर्से के लिए बिगड़ी रहती है, तो उसे उठा के एक तरफ रख दिया जाता है। और उसकी जगह नयी मशीन आ जाती है। क्योंकि काम रुक नहीं सकता, बिजनेस बन्द नहीं हो सकता। और वक्त थम नहीं सकता। इसलिए जिसे मालूम हो कि उसकी नौकरी भी जाती रही है, तो उसे गहरा झटका–सा लगा। जैसे उसका दूसरा गुर्दा भी निकाल लिया गया। इस झटके से उसके आँसू भी सूख गये। असली और बड़ी मुसीबत में आँसू नहीं आते। उसने महसूस किया, सिर्फ दिल के अन्दर एक खालीपन महसूस होता है। जमीन कदमों के नीचे से खिसकती मालूम होती। और रगों में खून के बजाय खौफ दौड़ता हुआ मालूम होता है।
कई दिनों तक वो आनेवाली जिन्दगी के खौफ और दहश्त से सो नहीं सका था। लम्बी बीमारी के खर्चे भी बड़े होते हैं और कर्जदार करने वाले। हौले–हौले घर की सब कीमती चीजें चली गयीं। मगर दुलारी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने साढे़ चार माह तक एक–एक चीज बेच दी। और आखिर में नौकरी भी कर ली। वो एक फर्म में मुलाजिम हो गयी थी। और रोज अपनी फर्म के मालिक को लेकर अस्पताल भी आती थी। वो एक दुबला पतला, छोटा कद, अधेड़ उम्र का शर्मीला आदमी दिखायी देता था। कम बोलनेवाला और मीठी मुस्कुराहट वाला। सूरत शक्ल से वो किसी बड़ी फर्म का मालिक होने के बजाय, किताबों की किसी दुकान का मालिक मालूम होता था। दुलारी उसकी फर्म में सौ रुपये महीने पर नौकर हो गयी थी। चूँकि वो ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, इसलिए उसका काम लिफाफों पर टिकट्स लगाना था।
"ये तो बहुत आसान काम है!”दुलारी के शौहर ने कहा।
फर्म का बॉस बोला, फ्काम तो आसान है, मगर जब दिन में पाँच–छः सौ खतों पर टिकट्स लगानी पड़ें, तो इसी तरह का काम बहुत आसान के बजाय बहुत मुश्किल हो जाता है।”
और वो इस मंजिल से गुजर चुका था। जिसका वो किसी को कसूरवार नहीं ठहरा सकता था। इतनी चोटें लगातार उस पर पड़ी थीं कि वो बिल्कुल बौखला गया। बिल्कुल सन्नाटे में आ गया। वो खुद बेकार था और उसमें कोई ताकत नहीं बची थी। अब उसकी मुसीबत और तकलीफ में किसी तरह का कोई जज्बा या आँसू नहीं रह गया था, बार–बार हथौड़े की चोटें खा–खा कर उसका दिल धात के एक दोष की तरह बेदम हो गया। इसलिए आज जब उसे अस्पताल से निकाला गया, तो उसने डॉक्टर को किसी जहनी तकलीफ को दूर करने की शिकायत नहीं की थी। उसने उससे यह नहीं कहा था कि ‘अब वो इस अस्पताल से निकल कर कहाँ जाएगा?’ अब उसका कोई घर नहीं था। कोई बीवी नहीं थी, कोई बच्चा नहीं, कोई नौकरी नहीं, उसका दिल खाली था। उसकी जेब खाली थी। और उसके सामने एक खाली और सपाट आनेवाला कल था। मगर उसने ये सब कुछ नहीं कहा था।
उसने सिर्फ ये कहा था, “डॉक्टर साहिब, मुझसे चला नहीं जा रहा है!”
बस यही एक हकीकत थी, जो उसे उस वक्त याद थी। बाकी हर बात उसके दिल से मिटायी जा सकती है। उस वक्त चलते–चलते वो सिर्फ ये महसूस कर सकता था कि उसका जिस्म गीली रुई का बना हुआ है। उसकी रीढ़ की हड्डी किसी पुरानी जर्जर चारपाई की तरह चटख रही है। धूप बहुत तेज है। रोशनी काँटों की तरह चुभती है। आसमान पर एक मैले और पीले रंग का वार्निश फिरा हुआ और माहौल अंधियारा कर रहा था और गन्दी मक्खियाँ फुर्ती से भिनभिना रही हैं। और लोगों की निगाहें भी गन्दे लहू और पीप की तरह उसके जिस्म से चस्पाँ हो कर रह जातीं। उसे भाग जाना चाहिए, कहीं उन लम्बे उलझे बिजली के तारों वाले खम्बों और उनके दरमियान गड्ड–मड्ड होने वाले रास्तों से। कहीं दूर का अपना भाई भी याद आया, जो अर्ीका में था। सन सन सन एक ट्राम उसके करीब से अन्दर घुसती चली जा रही थी। और पूरी ट्राम को अपने जिस्म के अन्दर चलता हुआ महसूस कर सकता था। उसे ऐसा महसूस हुआ, जैसे वो कोई इनसान नहीं है, एक घिसा–पिटा रास्ता है। देर तक वो चलता रहा, हाँफता रहा और चलता रहा। अन्दाजे से एक खयाली रास्ते की तरफ चलता रहा। जिधर कभी उसका घर था। हालाँकि, उसे मालूम था कि अब उसका कोई घर नहीं है। मगर वो जानते हुए भी उधर ही चलता रहा। घर जाने की आदत से मजबूर हो कर। मगर धूप बहुत तेज थी, उसके सारे जिस्म में च्यूंटीयाँ सी रेंग रही थीं। और वो किसी मुसाफिर से रास्ता ही पूछ के, मालूम कर ले ये शहर का कौन–सा हिस्सा है? हौले–हौले उसके कानों में ट्रामों और बसों का शोर बढ़ने लगा। निगाहों में दीवारें टेढ़ी होने लगीं। इमारतें गिरने लगीं। बिजली के खम्बे गडमड करने लगे। फिर उसकी आँखों तले अँधेरा और कदमों तले भूचाल–सा आया। और वो यकायक जमीन पर गिर पड़ा।
जब होश में आया तो रात हो चुकी थी। एक नीम ठंडा–सा अँधेरा चारों तरफ छाया हुआ था। उसने आँखें खोल कर देखा कि जिस जगह पर गिरा था, अब तक वहीं पड़ा है। यह फुटपाथ ऐसा था, जिसके पिछवाड़े में दो तरफा दो दीवारें थीं। दूसरी उत्तर से पूरब को। और वो दोनों दीवारों के संगम पर लेटा हुआ था। ये दोनों दीवारें कोई चार फुट के करीब ऊँची थीं। यहाँ पर अमरूद और जामुन के पेड़ थे। और उन पेड़ों के पीछे क्या था? वो उसे उस वक्त तक कहीं नजर नहीं आया था। दूसरी तरफ पश्चिमी दीवार के सामने पच्चीस–तीस फुट का फासला छोड़कर, एक पुरानी इमारत का पिछवाड़ा था। तीन मंजिला इमारत थी। और मंजिल में पीछे की तरफ सिर्फ एक खिड़की थी। और छ% बड़े पाइप थे। पाइप और पश्चिमी दीवार के बीच में पच्चीस–तीस फुट चैड़ी एक अन्धी गली बन गयी थी जिसके तीन तरफ दीवार थी और चैथी तरफ सड़क थी। कोहनियों पर जोर देकर जरा–सा ऊपर उठाकर और इधर–उधर देखने लगा। सड़क बिल्कुल खाली थी। सामने की दुकानें बन्द थीं। और फुटपाथ पर कहीं–कहीं बिजली के कमजोर बल्ब झिलमिला रहे थे। चन्द लम्हों के लिए उसे ये ठंडा अँधियारा बहुत भला मालूम हुआ। चन्द लम्हों के लिए उसने अपनी आँखें बन्द करके सोचा, शायद वो किसी मेहरबान समुन्दर के पानियों में डूब रहा है। मगर इस एहसास से वो अपने आपको सिर्फ चन्द लम्हों तक धोका दे सका। क्योंकि अब उसने महसूस कर लिया कि उस पर तेज भूक तारी हो चुकी है। चन्द लम्हों की खुशगवार ठंडक के बाद उसने महसूस कर लिया कि वो बेहद भूका है। जिससे उसकी आँतों की आग को जगा के, उसके साथ किसी तरह की भलाई नहीं की। उसके पेट के अन्दर अजीब एँठन–सी हो रही थी। और आँतें अन्दर ही अन्दर तड़प–तड़प कर रोटी का सवाल कर रही थीं। और इस वक्त उसके नथुने किसी शहरी इनसान के नथनों की तरह नहीं, किसी जंगली जानवर के नथनों की तरह काम कर रहे थे।
अजीब–अजीब सी बूएँ उसकी नाक में आ रही थीं। बूओं की एक सिम्फनी थी, जो उसके एहसास पर फैली हुई थी। और हैरत की बात ये थी कि वो इस सिम्फनी के एक एक सिरे का अलग–अलग वजूद पहचान सकता था। ये जामुन की खुशबू है, ये अमरूद की, ये रात की रानी के फूलों की, ये तेल में तली हुई पूरियों की, ये प्याज और लहसुन में भगारे हुए आलुओं की, ये मूली की, ये टमाटर की, ये किसी सड़े–गले फल की, ये पेशाब की, ये पानी में भीगी हुई मिट्टी की। जो शायद बाँसों के झुण्ड से आ रही है। वो हर बू की तासीर, शिद्दत, दिशा और फासले तक का अन्दाजा कर सकता है। यकायक उसे यह एहसास भी हुआ। और वो इस बात पर चैंका भी कि किस तरह से भूक ने उसकी छिपी हुई ताकतों को जगा दिया। मगर इस बात पर ज्यादा गौर किये बगैर, उसने उस तरफ घिसटना शुरू कर दिया। जिधर से उसे तेल में तली हुई पूरियों और लहसुन से भगारे हुए आलुओं की बू आयी थी। वो धीरे–धीरे अन्धी गली के अन्दर घिसटने लगा। क्योंकि वो अपने जिस्म में चलने की हिम्मत बिल्कुल नहीं पाता था। फिर उसे ऐसा महसूस होता जैसे कोई धोबी उसकी आँतों को पकड़ कर मरोड़ रहा है। फिर उसके नथुने में पूरियों और आलू की इशतहा बू आयी और वो बेकरार हो कर, अध मुँदी आँखों से अपने तकरीबन बेजान से जिस्म को उधर घसीटने की कोशिश करता, जिधर से आलू, पूरी की बू आ रही थी।
कुछ अर्से के बाद जब वो उस जगह पर पहुँचा, तो उसने देखा कि पश्चिमी दीवार और उसके सामने की पाइपों के दरमियान पच्चीस–तीस फुट के फासले में आयताकार कचरे का एक बहुत बड़ा खुला लोहे का बना हुआ टब रखा है। ये टब कोई पन्द्रह फुट चैड़ा होगा और तीस फुट लम्बा और उसमें तरह–तरह का कूड़ा–करकट भरा है। गले–सड़े फलों के छिलकों और डबल रोटियों के गन्दे टुकड़े और चाय की पत्तियाँ और एक पुरानी जैकेट और बच्चों के गन्दे पोतड़े और अण्डे के छिलके और अखबार के टुकड़े और रिसालों के फटे पन्ने और रोटी के टुकड़े और लोहे की लोइयाँ और प्लास्टिक के टूटे हुए खिलौने और मटर के छिलके और पोदीने के पत्ते और केले की छिलकों पर चन्द अध खायी पूरियाँ–––और आलू की भाजी। पूरियों और आलू की भाजी को देख कर गोया उसकी आँतें उबल पड़ीं। उसने चन्द लम्हों के लिए अपने बेकरार हाथ रोक लिये। मगर दूसरी बदबुओं के मुकाबले में उसके नथनों में अगले चन्द लम्हों तक पूरी और भाजी को देख कर, भूख बढ़ानेवाली खुशबू इस तरह तेज हो गयी, जैसे किसी सिम्फनी में यकायक कोई खास सुर एक दम ऊँचे हो जाते हैं। और यकायक तहजीब की आखिरी दीवारें ढह गयीं। और उसके काँपते हुए बेकरार हाथों ने केले के उस पत्ते को दबोच लिया। और वो इक भयानक भूख से बेचैन हो कर, उन पूरियों पर टूट पड़ा। पूरी, भाजी खाके उसने केले के पत्ते को बार–बार चाटा और ऐसे साफ कर के छोड़ दिया, जैसे कुदरत ने उसे बनाया था। पत्ते चाटने के बाद उसने अपनी उँगलियाँ चाटी और लम्बे–लम्बे नाखुनों में भरी हुई आलू की भाजी जबान की नोक से निकाल के खायी। और जब इससे भी उसकी तसल्ली न हुई, तो उसने हाथ बढ़ा कर कूड़े के ढेर को घँघोलते हुए, उसमें से पोदीने के पत्ते निकाल कर खाये। और मूली के दो टुकड़े और एक आधा टमाटर अपने मुँह में डाल कर मजे से उसका रस पिया। और वो सब कुछ खा चुका, तो उस के सारे जिस्म में आधी गर्म और ठंडी सी इक लहर उठी और वो वहीं टब के किनारे गिर कर सो गया।
आठ–दस रोज इसी आधी खुमारी और आधी बेहोशी के आलम में गुजरे। वो घिसट–घिसट कर टब के करीब जाता और जो खाने को मिलता खा लेता। और जब भूख बढ़ानेवाली बुओं की सन्तुष्टि हो जाती और वो दूसरी गन्दी बूएँ उभरने लगतीं, तो वो घिसट–घिसट कर टब से फुटपाथ के नुक्कड़ पर चला जाता। और पीछे की दीवार से टेक लगा कर बैठ जाता या सो जाता। पन्द्रह–बीस रोज के बाद हौले–हौले उसके जिस्म में ताकत उभरने लगी। हौले–हौले वो अपने माहौल से वाकिफ होने लगा। ये जगह कितनी अच्छी है, यहाँ धूप नहीं थी, यहाँ दरख्तों का साया था। अन्धी गली सुनसान और वीरान थी। यहाँ कोई नहीं आता था। कभी–कभी पीछे की इमारत से कोई खिड़की खुलती थी और कोई हाथ फैला कर नीचे के टब में रोजमर्रा का कूड़ा फेंक देता था। ये कूड़ा जो उसका अन्नदाता था। उसके रात और दिन का रोजी देने वाला था। उसकी जिन्दगी का रखवाला था। दिन में सड़क चलती थी, दुकानें खुलती थीं, लोग घूमते थे। बच्चे अबाबीलों की तरह चहकते हुए सड़क से गुजर जाते थे। औरतें रंगीन पतंगों की तरह डोलती हुई गुजर जाती थीं। लेकिन ये एक दूसरी दुनिया थी। इस दुनिया में उस का कोई इलाका न था। इस दुनिया में अब उसका कोई न था। और वो उसके लिए खयाली साये बन गये। और उससे बाहर मैदान और खेत और खुला आसमान एक बेमानी तसव्वुर, घर, काम–काज, जिन्दगी–समाज, जद्द–ओ–जहद बेमानी अलफाज जो गल–सड़ कर इस कूड़े कचरे के ढेर में मिलकर उसके जैसे हो गये। इस दुनिया से उसने मुँह मोड़ लिया था और अब यही उसकी दुनिया थी। पन्द्रह फुट लम्बी और तीस फुट चौड़ी।
महीने और साल गुजरते गये और इस नुक्कड़ पर बैठा–बैठा एक पुराने ठूँठ की तरह और किसी पुरानी यादगार की तरह सबकी नजरों में वाकिफ होता चला गया। वो किसी से बात नहीं करता था। किसी को फायदा नहीं पहुँचाता था। किसी से भीक नहीं माँगता था, लेकिन अगर वो किसी दिन वहाँ से उठकर चला जाता, तो इस इलाके के हर शख्स को इस बात पर हैरत होती। और शायद किसी कदर तकलीफ भी होती। सब लोग उसे ‘कचरा बाबा’ कहते थे। क्योंकि यह सबको मालूम था कि वो सिर्फ कचरे के टब में से अपनी खुराक निकाल कर खाता है। और जिस दिन उसे वहाँ से कुछ न मिलता, वो भूका ही सो जाता। बरसों से राहगीर और ईरानी रेस्तराँ वाले उसकी आदत को पहचान गये थे। और अक्सर इमारत की पिछली खिड़कियों से अब कूड़े के अलावा खाने–पीने की दूसरी चीजें भी फेंकी जातीं। सही सलामत पूरियाँ और बहुत सी भाजी और गोश्त के टुकड़े और अध चूसे आम और चटनी और कबाब के टुकड़े और खीर में लिथड़े हुए पत्तल। खाने–पीने, दावत की हर नेअमत कचरा बाबा को इस टब में से मिल जाती। कभी–कभी कोई फटा हुआ पाजामा, कोई उधड़ी हुई नेकर, कोई तार–तार शिकस्ता कमीज, प्लास्टिक का गिलास। ये कचरे का टब क्या था, उसके लिए एक खुला बाजार था। जहाँ वो दिन–दहाड़े सबकी आँखों के सामने आवारागर्दी किया करता था। जिस दुकान से जो सौदा चाहता, मुफ्रत लेता था। वो इस बाजार का, उस दौलत का जो बगैर मेहनत के हासिल हो जाये, का अकेला मालिक था। शुरू–शुरू में चन्द बिल्लियों और खुजली वाले कुत्तों ने तीखा विरोध किया था। मगर उसने मार–मार कर सबको बाहर निकाल दिया। और अब इस कचरे के टब का अकेला मालिक था। और उसके हक को सबने स्वीकार कर लिया था। महीने में एक बार म्यूंसिपल्टी वाले आते हैं और उस टब को खाली करके चले जाते थे। और ‘कचरा बाबा’ उनसे किसी तरह का विरोध नहीं करता था। क्योंकि उसे मालूम था कि दूसरे दिन टब फिर उसी तरह भरना शुरू हो जाएगा। और उसको पूरा यकीन था कि इस दुनिया से नेकी खत्म हो सकती है, लेकिन गन्दगी खत्म नहीं हो सकती। भाईचारा खत्म हो सकता है, लेकिन बदबू और गन्दगी कभी खत्म नहीं हो सकती।
सारी दुनिया से मुँह मोड़ कर उसने जीने का आखिरी तरीका सीख लिया था। मगर ये बात नहीं है कि उसे बाहर की दुनिया की खबर न थी, जब शहर में चीनी महँगी हो जाती, तो महीनों कचरे के टब में मिठाई के टुकड़े की सूरत नजर नहीं आती। जब गेहूँ महँगे हो जाते, तो डबल रोटी का एक टुकड़ा तक न मिलता। जब सिगरेट महँगे होते, तो सिगरेट के जले हुए टुकड़े इतने छोटे मिलते कि उन्हें सुलगा कर पिया भी नहीं जा सकता। जब भंगियों ने हड़ताल की थी, तो महीने तक उसके टब की किसी ने सफाई नहीं की थी। और किसी रोज उसको टब में इतना गोश्त नहीं मिलता था, जितना बकरईद के रोज। और दीवाली के दिन तो टब के अलग–अलग कोनों से मिठाई के बहुत से टुकड़े मिल जाते थे। बाहर की दुनिया का कोई हादसा या वाकया ऐसा न था जिसका सुराग वो कचरे के टब से न जान सकता था। दूसरी जंग–ए–अजीम से लेकर औरतों के गुप्त दोष तक। मगर बाहर की दुनिया से अब उसे किसी तरह की कोई दिलचस्पी न रही थी। पच्चीस साल तक वो इस कचरे के टब के किनारे बैठा–बैठा अपनी उम्र गुजार रहा था। रात और दिन, महीने और साल, उसके सर से हवा की लहरों की तरह गुजरते गये। और उसके सर के बाल सूख–सूख कर रबड़ की शाखों की तरह लटकने लगे। उसकी काली दाढ़ी खिचड़ी हो गयी। उसके जिस्म का रंग मैला–कुचैला, मटमैला और हरा सा होता गया। वो अपने मजबूत बालों, फटे चीथड़ों और बदबूदार जिस्म से राह चलते लोगों को खुद भी कचरे का एक ढेर दिखाई देता था। जो कभी–कभी हरकत करता था और बोलता था। किसी दूसरे से नहीं सिर्फ अपने आपसे। ज्यादा से ज्यादा कचरे के टब से। ‘कचरा बाबा’ उन लोगों से कुछ कहता नहीं था। मगर उनकी हैरत को देखकर दिल में जरूर सोचता होगा कि इस दुनिया में कौन है, जो किसी दूसरे से गुफ्रतगू करता है। इस दुनिया में जितनी गुफ्रतगू होती है, इनसानों के दरमियान नहीं होती, बल्कि सिर्फ खुद और उसकी किसी जरूरत के दरमियान होती है। दूसरों के दरमियान जो भी गुफ्रतगू होती है, वो दरअसल एक तरह से अपने आप से बात करना होती है। ये दुनिया एक बहुत बड़ा कचरे का ढेर है। जिसमें से हर शख्स अपनी गरज का कोई टुकड़ा, फायदे का कोई टुकड़ा, फायदे का कोई छिलका या मुनाफे का कोई चीथड़ा दबोचने के लिए हर वक्त तैयार रहता है। और कहता होगा,
“ये लोग जो मुझे हकीर, फकीर या जलील समझते हैं, जरा अपनी आत्मा के पिछवाड़े में तो झाँक कर देखें। वहाँ इतनी बदबू भरी है कि जिसे सिर्फ मौत का फरिश्ता ही उठा कर ले जाएगा।”
इसी तरह दिन पर दिन गुजरते गये। मुल्क आजाद हुए। मुल्क गुलाम हुए। हुकूमतें आयीं, हुकूमतें चली गयीं। मगर ये कचरे का टब वहीं रहा और उसके किनारे बैठने वाला ‘कचरा बाबा’ उसी तरह आधी खुमारी में, बेहोशी के आलम में दुनिया से मुँह मोड़े हुए होंठों ही होंठों कुछ बुदबुदाता रहा। कचरे के टब को घँघोलता रहा। तब एक रात अन्धी गली में जब वो टब से चन्द फुट के फासले पर दीवार से पीठ लगाये, अपने फटे चीथडों में दुबका सो रहा था। उसने रात के सन्नाटे में एक खौफनाक चीख सुनी और वो हड़बड़ा कर नींद से जागा। फिर उसने एक जोर की तेज चीख सुनी और घबराकर कचरे के टब की तरफ भागा। जिधर से ये चीखें सुनाई दे रही थीं। कचरे के टब के पास जाकर उसने टटोला, तो उसका हाथ किसी नर्म–नर्म लोथड़े से जा टकराया। और फिर एक जोर की चीख बुलन्द हुई। ‘कचरा बाबा’ ने देखा कि टब के अन्दर डबलरोटी के टुकड़ों, चचोड़ी हुई हड्डियों, पुराने जूतों, काँच के टुकड़ों, आम के छिलकों, बासी दीनियों और ठर्रे की टूटी हुई बोतलों के दरमियान एक नवजात बच्चा नंगा पड़ा है। और अपने हाथ–पाँव हिला–हिला कर जोर–जोर से चीख रहा है।
चन्द लम्हों तक ‘कचरा बाबा’ हैरत में डूबा हुआ शान्त और स्थिर उस नन्हे इनसान को देखता रहा, जो अपने छोटे से सीने की पूरी ताकत से अपने आने का ऐलान कर रहा था। चन्द लम्हों तक वो चुपचाप, परेशान, फटी–फटी आँखों से इस मंजर को देखता रहा। फिर उसने तेजी से आगे झुक कर, कचरे के टब से उस बच्चे को उठा कर अपने सीने से लगा लिया। मगर बच्चा उसकी गोद में जाकर भी किसी तरह चुप न रहा। वो इस जिन्दगी में नया–नया आया था और बिलक–बिलक कर अपनी भूक का ऐलान कर रहा था। अभी उसे मालूम न था कि गरीबी क्या होती है, ममता किस तरह बुजदिल हो जाती है। जिन्दगी कैसे हराम बन जाती है। वो किस तरह मलबे पैकेट और कूड़ा–करकट बना कर, कचरे के टब में डाल दी जाती है। अभी उसे ये सब कुछ मालूम न था। अभी वो सिर्फ भूका था और रो–रो कर अपने पेट पर हाथ मार रहा था। ‘कचरा बाबा’ की समझ में कुछ न आया कि वो कैसे इस बच्चे को चुप कराये। उसके पास कुछ न था। न दूध न चुसनी, उसे तो कोई लोरी भी याद नहीं थी। वो बेकरार हो कर, बच्चे को गोद में लेकर देखने लगा। और थपथपाने लगा और गहरी नींद से रात के अँधेरे में चारों तरफ देखने लगा कि इस वक्त बच्चे के लिए दूध कहाँ से मिल सकता है। लेकिन जब उसकी समझ में कुछ नहीं आया, तो उसने जल्दी से कचरे के टब से आम की एक गुठली निकाली और इस का दूसरा सिरा बच्चे के मुँह में दे दिया। अध खाये आम का मीठा–मीठा रस जब बच्चे के मुँह में जाने लगा, तो वो रोता–रोता चुप हो गया। और चुप होते–होते कचरा बाबा की बाँहों में सो गया। आम की गुठली खिसक कर जमीन पर जा गिरी। और अब बच्चा उसकी बाँहों में बेखबर सो रहा था। आम का पीला–पीला रस अभी तक उसके नाजुक होंठों पर था। और उसके नन्हे से हाथ ने ‘कचरा बाबा’ का अँगूठा बड़े जोर से पकड़ रखा था।
एक लम्हे के लिए ‘कचरा बाबा’ के दिल में खयाल आया कि वो बच्चे को यहीं फेंक कर कहीं भाग जाये। धीरे से कचरा बाबा ने उस बच्चे के हाथ से अपने अँगूठे को छुड़ाने की कोशिश की, मगर बच्चे की गिरफ्रत बड़ी मजबूत थी। और ‘कचरा बाबा’ को ऐसे महसूस हुआ, जैसे जिन्दगी ने उसे फिर से पकड़ लिया है। और धीरे–धीरे झटकों से उसे अपने पास बुला रही है। यकायक उसे दुलारी की याद आ जाती है। और वो बच्चा, जो उसकी कोख में मर गया था। और यकायक कचरा बाबा फूट–फूटकर रोने लगा। आज समुन्दर के पानियों में इतने कतरे न थे, जितने आँसू उसकी आँखों में थे। गुजिश्ता पच्चीस बरसों में जितनी मैल और गन्दगी उसकी आत्मा पर जम चुकी है, वो इस तूफान के एक ही रेले में साफ हो गयी। रात–भर ‘कचरा बाबा’ उस नवजात बच्चे को अपनी गोद में लिए बेचैन और बेकरार हो कर फुटपाथ पर टहलता रहा। और जब सुबह हुई और सूरज निकला, तो लोगों ने देखा कि ‘कचरा बाबा’ आज कचरे के टब के पास नहीं है, बल्कि सड़क पार नयी बननेवाली इमारत के नीचे खड़ा हो कर, र्इंटें ढो रहा है। और उस इमारत के करीब गुलमोहर के एक पेड़ की छाँव में एक फूलदार कपड़े में लिपटा इक नन्हा बच्चा मुँह में दूध की चुसनी लिए मुस्कुरा रहा है।
–– कृष्ण चन्दर
उर्दू से अनुवाद–– जाहिद खान