आशा वर्करों से गुफ्तगू
08 Jun 2025
• फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
हमने तीन आशा वर्करों––रज्जो, रोशनी और सीता से बातचीत की जो मेरठ के प्यारेलाल अस्पताल में काम करती हैं। इन सबसे बात करके हमें अच्छा लगा क्योंकि वे खुशमिजाज और निडर हैं। वे बहुत मेहनती भी हैं। रज्जो और सीता की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। इनके पति मजदूरी करते हैं, जबकि रोशनी की आर्थिक हालत थोड़ी ठीक है। उसके पति की प्रिंटिंग की दुकान है। इन तीनों में अच्छी यारी–दोस्ती है। उनके काम और समस्याओं आदि से सम्बन्धित जो बातचीत हमने की उसका कुछ हिस्सा हम यहाँ दे रहे हैं।
टीम–– आप क्या–क्या काम करती हैं?
आशा वर्कर–– हमारे दो तरह के काम होते हैं, फील्ड वर्क और अस्पताल में।
फील्ड वर्क में सर्वे करने का काम होता है। जैसे–– लोगों के पास जाकर पता करना कि उनका घर कच्चा है या पक्का, परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी है? इसके अलावा घर के मुखिया का नाम, घर के सभी सदस्यों के नाम, उम्र के हिसाब से उनकी श्रेणी, जैसे पाँच साल से छोटे कितने हैं और 18 साल से छोटे कितने हैं, यह भी पता करते हैं?
सर्वे का काम करने के लिए हमें ऊपर के अधिकारी कहते हैं। अगर हम ठीक से सर्वे न करके ले जायें तो वे हमें खरी–खोटी सुनाते हैं। अधिकारी कहते हैं कि तुम लोग ठीक से सर्वे नहीं करती हो तो फिर हम कैसे पता कर सकते हैं कि किन घरों में कितने लोग बीमार हैं। ठीक से सर्वे न करने पर वे हमें डाँटते हैं। कई बार उनका बर्ताव बहुत खराब होता है।
हम टीकाकरण के लिए देय लिस्ट बनवाती हैं। घर–घर जाकर ओआरएस देती हैं। संचारिका अभियान चलाती हैं, जैसे जो मौसम के अनुसार बीमारी होती है, उन्हें देखना होता है। योग्य दम्पति (18 वर्ष से 49 वर्ष तक) और गर्भवती की देखभाल करना होता है। हम आभा कार्ड (हेल्थ आईवी) और आयुष्मान कार्ड बनवाने का काम भी करती हैं।
हमें अस्पताल में भी काम करना पड़ता है। जैसे–– गर्भवती महिला की तीन बार अस्पताल विजिट करानी होती है और देखभाल बहुत करनी पड़ती है। दवाई उनके घर जाकर देनी होती है और अगर हम उस महिला को अस्पताल ले जाना चाहें तो उसका किराया भी हमें ही देना पड़ता है।
टीम–– आपके काम के घण्टे कितने हैं?
आशा वर्कर–– हमारा कोई समय फिक्स नहीं होता है, जैसे टीकाकरण का समय सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होता है। उसी के साथ घर–घर जाकर सर्वे भी करना होता है, फील्ड वर्क करने के बाद घर पर भी रिपोर्ट बनाने का काम करना पड़ता है।
टीम–– फील्ड वर्क महीने में कितने दिन करना पड़ता है?
आशा वर्कर–– 20 से 25 दिन।
टीम–– क्या आपको टैम्पो या रिक्शा का किराया मिलता है?
आशा वर्कर–– कौन दे रहा है जी?
टीम–– क्या फील्ड वर्क के लिए साधन जैसे ई रिक्शा का इन्तजाम होना चहिए।
आशा वर्कर–– हाँ, गर्मियों में ज्यादा दिक्कत होती है, क्योंकि थकान हो जाती है और कभी–कभी तो चक्कर भी आ जाता है। हमें बीमारी में भी काम करना पड़ता है।
टीम–– अपको काम के दौरान किन–किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है?
आशा वर्कर–– डॉक्टर हमसे ठीक से बात नहीं करते हैं। हमारे साथ जातीय भेदभाव किया जाता है। हमें अपमानित किया जाता है। कई बार हमें रात में भी काम पर जाना पड़ जाता है। हम बहुत मेहनत करके मरीजों को अस्पताल तक ले जाते हैं, लेकिन डॉक्टर मरीज को ठीक से नहीं देखते हैं। इसके चलते मरीज से हमें उल्टी–सीधी बात सुननी पड़ती है। बहुत दुख होता है इन सब से।
डॉक्टर केवल हमसे बुरे तरीके से बात ही नहीं करते हैं, बल्कि स्लिप पर हस्ताक्षर करवाने के लिए हमसे कई चक्कर लगवाते हैं। उन्हें तो हमें परेशान ही करना है। हमारे अधिकारी हमसे जातीय भेदभाव भी करते हैं। वे जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं।
एक एनम हमारे साथ बदतमीजी करती थी। हम भी पलटकर जवाब दे देते थे। तू करके बात करती थी। बहुत भेदभाव करती थी। हमारे घर के अन्दर तक नहीं आ सकती थी, हमारे घर का पानी भी नहीं पीती थी। यह जातिवाद नहीं तो फिर और क्या है?
एक बार तो मेरे ऊपर गुस्से में आकर उसने हाथ उठा दिया था। हमने उसके खिलाफ लेटर दिया था। फिर उसने उलटा हम पर ही दबाव बनाना चाहा। हमने सीएमओ आफिस जाकर धरना दिया। आशा वर्कर यूनियन की अध्यक्ष ने हमारा साथ दिया। एनम ने हमें तोड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन हम एकजुट रहे। इस तरह से उसका ही ट्रांसफर हो गया क्योंकि जाँच में एनम ही दोषी पायी गयी।
टीम–– आप लोगों ने कमाल का संघर्ष किया। आपको मुबारक। क्या आपके लिए अलग से किसी रूम की व्यवस्था होती है?
आशा वर्कर–– मुबारकबाद के लिए धन्यवाद जी। इतना तो हम समझे कि मिलजुल कर लड़ने से ही हक मिलता है। जहाँ तक रूम की बात है, हाँ, रूम तो है, लेकिन उसका इस्तेमाल हम लोग नहीं कर पाती हैं क्योंकि यहाँ का स्टाफ (सफाई कर्मचारी) हमारे रूम का इस्तेमाल करते हैं।
टीम–– आपको महीने का कितना वेतन मिलता है?
आशा वर्कर–– वेतन? (वे हँसती हैं!) वेतन काहे का जी। 2200 रुपये तय हैं, लेकिन हमें केवल 2000 रुपये मिलते हैं। इसके अलावा 1500 रुपये अलग से मिलते हैं, लेकिन ये तीन महीने के एक साथ मिलते हैं यानी कि 4500 रुपये। डिलीवरी कराने पर 400 रुपये मिलते हैं, ये कभी मिलते हैं और कभी नहीं, क्योंकि कभी–कभी मरीज डिलीवरी प्राइवेट में करा लेते हैं। नसबन्दी के 300 रुपये, टीकाकरण के 1500 रुपये आदि। कुल मिलाकर सुबह से शाम तक कड़ी मेहनत करने के बाद हमें महीने में 6 हजार रुपये से अधिक नहीं मिलते हैं।
टीम–– यह तो बहुत कम है। इतने में घर खर्च कैसे चल पाता है?
आशा वर्कर–– देखो जी, घर खर्च का तो पूछो मत। बस आँसू आ जाते हैं। आज के समय में अगर 15 हजार रुपये महीने के नहीं मिलते तो समझ लो कि घर चलाना मुश्किल है। इतना तो होना ही चाहिए। हमारे परिवार का इलाज मुफ्त में होना चाहिए। काम पर जायें तो चाय–पानी का इन्तजाम होना चाहिए।
हम अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं और हम अपना हक हासिल कर लेंगे। इसलिए हमें संगठन बनाने का अधिकार भी होना चाहिए।
टीम–– आप अपने संघर्ष में जीत हासिल करें, हम यही कामना करते हैं।
आशा वर्कर–– आपका बहुत धन्यवाद जी।
––एमएसएस मेरठ टीम