कामकाजी जनता पर पर्यावरण प्रदूषण की मार

08 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
अखबार, टीवी और तमाम सूचना माध्यम से यह बात जगजाहिर है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के पैमाने के 60 गुणा से भी ज्यादा खराब है। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले परिवारों में से 75 प्रतिशत परिवारों में किसी न किसी को गले में सूजन या खाँसी की शिकायत है। 58 प्रतिशत परिवारों में सरदर्द के मरीज हैं और 50 प्रतिशत परिवारों में दमा या दूसरे साँस सम्बन्धी बीमारी के मरीज हैं। खराब हवा के चलते जब दिल्ली सरकार और केन्द्रीय सरकार स्कूल और सरकारी दफ्रतर तथा बहुत से निजी कम्पनी के कर्मचारियों के लिए छुट्टी या घर काम करने की इजाजत दे रही है तब बहुत जरूरी क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर बाहर निकलने को मजबूर हैं। उत्पादन, यातायात आदि उद्योग में काम करने वाले मजदूरों के लिए घर से काम करना सम्भव ही नहीं है। इसलिए न केन्द्रीय सरकार और न ही सम्बन्धित राज्य सरकारों ने ऐसे मजदूरों के लिए इस भयानक प्रदूषण के दौरान किसी राहत कह कोशिश की है। अखबारों में आयी रिपोर्टों के अनुसार ऑटो चलाने वाले, ठेले वाले और झाड़ू लगाने वाले मजदूरों की आँखें लाल होना, आँखों में जलन, नजला–जुखाम, कन्धों और पीठ में दर्द, लगातार खाँसी की शिकायत होती ही रहती है। इसके अलावा बड़ी–बड़ी बिल्डिंग बनाने वाले मजदूरों को भारी धूल की हवा में काम करने की मजबूरी के चलते कमजोरी, थकान, फेंफड़े की दिक्कत आदि से भुगतना पड़ता है। पिछले कई साल से जब भी दिल्ली में प्रदूषण बढ़ता है तो सबसे पहले बिल्डिंग बनाने के काम पर रोक लगा दी जाती है। यहाँ काम करने वाले मजदूर बीमारी और प्रदूषण के साथ–साथ बेरोजगारी के भी शिकार होते हैं। ठेले–खोमचे लगाने वाले, अपने घर में पीस रेट पर काम करने वाले, घर–घर जाकर झाड़ू–पोंछा करने वाले मजदूर भी इस प्रदूषण के चपेट से नहीं बचते। आर्थिक तंगी के चलते खाँसी, जुखाम, बुखार आदि को तो बीमारी ही नहीं मानते। जब तक गम्भीर कोई समस्या न हो तो डॉक्टर से सलाह लेने और उसके अनुसार दवाई लेने से भी बचते हैं। गम्भीर रूप से बीमार होने पर निजी डॉक्टर या अस्पताल जाते हैं, वह भी भारी कर्ज लेकर। इसके चलते कमाई का एक बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में ही लग जाता है। दिल्ली में करीब एक दशक पहले मिट्टी के तेल का चूल्हा बन्द करने के बावजूद ज्यादातर झुग्गी–झोपड़ी में रहने वाले परिवारों के पास गैस का चूल्हा नहीं है और न ही वे उसका खर्च उठा सकते हैं। पिछले दस साल में गैस की कीमत में दोगुना से भी ज्यादा वृद्धि ने ऐसे मजदूर परिवरों को इन योजनाओं के दायरे से बाहर ही कर दिया है। ऐसे परिवार अब भी यमुना के खादर या उसके आस–पास के इलाके से इकट्ठा की हुई लकड़ी का र्इंधन ही इस्तेमाल करते हैं। इन्हें इकट्ठा करने के लिए इन परिवारों की महिलाएँ हफ्रते में तयशुदा दिन 10–12 किलोमीटर पैदल चलकर लकड़ी लाने का काम करती हैं। अक्सर इन झुग्गियों के आस–पास ज्यादा प्रदूषण करने वाला कोई कारखाना भी होता है जैसे झिलमिल, शाहदरा इलाके में देखने को मिलता है। यहाँ सिर्फ सर्दी ही नहीं, सालभर एक खट्टी गंध हवा में तैरती रहती है। इसलिए कुछ दिन रहने के बाद यहाँ के लोगों को वह बदबू आनी भी बन्द हो जाती है। सड़कों में सालभर पानी और कीचड़ भरा रहता है। ऐसे मोहल्ले में रहने वाले लोग सीलन के चलते भी अक्सर न्यूमोनिया के शिकार होते हैं। सीलन के साथ पोषण की कमी के चलते टीबी की बीमारी भी खूब होती है। दुनिया भर के एक चैथाई टीबी के मरीज भारत के मेहनतकश लोग हैं। ऐसे में न सिर्फ स्वास्थ्य व्यवस्था पर बल्कि जीवन स्तर की बढ़ोतरी पर कोई कदम उठाये बिना मेहनतकश लोगों को बीमारी से आजाद कर पाना नामुमकिन है। –– एमएसएस, दिल्ली
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