झोला बनाने वाली महिलाओं से बातचीत

08 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
हमारे घरों में कपड़े के थैलों में कोई न कोई सामान आता ही रहता है। कभी पोशाक तो कभी मिठाइयाँ। इन कपड़ों के झोलों का चलन बढ़ता जा रहा है। हमारे मन में शायद ही कभी ख्याल आता है कि इन झोलों को बनाने वालों की जिन्दगी कैसी होगी। इसे जानने के लिए हम उन महिलाओं के बीच गये जो झोला बनाती हैं। हमें उनको करीब से जानने का मौका मिला। मेरठ के मलियाना में मजदूर पाठशाला चलती है, वहाँ कई ऐसे बच्चे पढ़ते हैं, जिनके घरों में महिलाएँ इन कपड़े के झोले सिलने का काम करती हैं। जब हम पाठशाला के बाद बच्चों के घरवालों से मिलने गये तब हमें इलाके में होने वाले इस काम के बारे में पहली बार पता चला। हम उनसे मिलने गये और इस काम पर उनसे बात की। हमें पता चला कि यह पीस रेट पर होने वाला काम है। मजदूर पाठशाला से थोड़ी दूरी पर एक चैराहा है जिसके आसपास लगभग 15 घरों की महिलाएँ यह काम करती हैं। जिस महिला से हमने बात की, उनकी उम्र 35 साल होगी। लम्बा कद, दुबला–पतला शरीर और गेहुँआ रंग। पूछने पर पता चला कि वह पिछले पाँच साल से झोला सिलने का काम कर रही हैं। उसका परिवार संयुक्त है जिसमें देवरानी, जेठानी और सास–ससुर तथा उनके बाल–बच्चों समेत कुल बीस सदस्य हैं। सभी के हिस्से में एक छोटा–सा कमरा और रसोई के नाम पर अँधेरी कोठरी है। सबने अपना चूल्हा अलग किया हुआ है। उस महिला के दो बच्चे हैं, पति की जूते–चप्पल की एक छोटी सी दुकान है। उन्होंने बताया कि उनका और भी एक लड़का था, जो मानसिक रूप से बीमार था। जब हमने उसके बारे में पूछना चाहा तो उनकी आँखों में आसूँ आ गये। उन्होंने बताया कि उसके इलाज में कर्ज ले कर बहुत पैसे लगाये लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। डॉक्टर ने पहले ही बता दिया था कि वह कभी ठीक नहीं हो पायेगा। अभी तीन साल पहले उसने यहीं खाट पर दम तोड़ दिया। माहौल काफी भावुक हो गया था, जिसको थोड़ा हल्का करने के लिए हमने बात को दूसरी दिशा में मोड़ा। हमने काम के बारे में पूछना शुरू किया। वह असहज होकर बोली, वैसे तो मैं कई सालों से यह काम कर रही हूँ लेकिन मेरे साथ काम करने वाली तुमको ज्यादा अच्छे से बता पायेंगी। मैं पढ़ी–लिखी नहीं हूँ और मुझे इतना पता भी नहीं है। मैं तो बस गोदाम तक जाती हूँ, माल ले कर आती हूँ और बना कर वापस कर आती हूँ। क्या आप उन औरतों को बुला कर ला सकती हैं? हमने पूछा तो वह तैयार हो गयी। कुछ दिनों बाद उनके घर पर 5 महिलाएँ आयीं। वे काफी उत्साहित थीं जब उनको पता चला कि हम उनके काम के बारे जानना चाहते हैं। जो महिला उन सब में सबसे पुरानी थीं, जिसने सबसे पहले वहाँ झोला सिलना शुरू किया था उनकी उम्र 45 साल थी। उन्होंने बताया कि जब झोला बनाना शुरू किया था, तब उसका मेहनमाना 60 से 70 पैसे प्रति पीस था। यह सुनकर दूसरी औरतें हक्का–बक्का रह गयीं। यह बात आज से पहले उनको भी मालूम नहीं थी। जब हमने पूछा कि यह कितने साल पुरानी बात है? तो एक अन्य महिला ने बीच में ही टोकते हुए कहा कि यह बात पाँच साल पहले की होगी क्योंकि जब से मैं काम कर रही हूँ तब से रेट 80 पैसे से ऊपर ही है। हमने उनसे विस्तार से झोला बनाने की प्रक्रिया बताने को कहा। उन महिलाओं में एक जो काफी देर से हमारी बातें चुपचाप सुन रही थी, वह बोली, यहाँ कई तरह के झोले बनने आते हैं। छोटे झोले, बड़े झोले, चेन वाले, बिना चेन वाले, लम्बी हैण्डल के, छोटी हैण्डल के। कुछ झोलों में तो सिर्फ चेन लगने का काम ही आता है, लेकिन वह काम कभी कभार ही आता है। हमने पूछा कि जो झोले ज्यादातर बनते हैं, उनमें क्या–क्या काम होते हैं? उन्होंने बताया, तीन तरह के कपड़ों के बण्डल आते हैं, पहले बण्डल में झोले के दोनों साइड होते हैं, जिसमें सुन्दर डिजाइन बने होते हैं। इसको दूसरे बण्डल के कपड़े के साथ जोड़ा जाता है, फिर इसकी तीन तरफ से सिलाई की जाती है। तीसरा बण्डल हैण्डल का होता है, जिसे काटकर, सिलकर और सीधा करके झोले के साथ जोड़ा जाता है। कभी–कभी हैण्डल में डबल सिलाई भी लगानी पड़ती है, जिससे कई बार सुई टूट जाती है। एक झोला कई बार हमारे हाथों से हो कर गुजरता है तब जाकर तैयार होता है। इसकी तह बना कर गिनती कर के मालिक को दिया जाता है। वह भी उसको दोबारा गिनता है और पैसे देता है। हमने पूछा कि मालिक पैसे देने में कोई दिक्कत तो नहीं करता? इस पर वह बोली कि जी बिलकुल करता है, कभी–कभी अगली बार पैसे देने के लिए टाल देता है और अगर मालिक के हिसाब से कोई पीस ठीक नहीं है, तो उसकी एक कौड़ी भी देने से मना कर देता है। हमने पूछा कि मालिक कहाँ रहता है? उन्होंने बताया, पास में ही रेल पटरी की दूसरी तरफ मोहल्ला है नयी बस्ती, वहीं पर। हमने फिर पूछा कि आप माल लेने और देने खुद से जाती हैं? इस पर उन्होंने जवाब दिया, जी हाँ, हमें पैसे की जरूरत है तो हम ही लेने जाते हैं। मालिक को क्या गरज, जो हमारे पास माल पहुँचाने आये। आपकी तरफ से मालिक के पास एक दिन में कितने झोले पहुँचते हैं, पूछने पर उन्होंने बताया, सिर्फ हमारे इलाके से ही हर रोज मालिक के पास हजार से ज्यादा झोले पहुँचते हैं। क्योंकि हम लोग एक दिन में बैठ कर दो–दो सौ से ज्यादा झोले तैयार कर देती हैं। हमने पूछा कि इन झोलों के कितने पैसे मिलते हैं? इस पर वे बोलीं, एक रुपये दस पैसे के हिसाब से एक झोले का दाम मिलता है। फिर हमने पूछा कि झोला बनाते समय क्या–क्या दिक्कतें आती हैं? उन्होंने बताया, सबसे बड़ी दिक्कत तो मशीन में आती है, अक्सर धागा फँसनें के कारण मशीन बन्द हो जाती है। हर महीने मशीन पर 200 से 300 रुपये का खर्चा हो जाता है। इसमें पड़ने वाला धागा पहले खुद ही लाना पड़ता था। प्लास्टिक का धागा होता है, जिसकी बड़ी–सी रील होती है जो बाजार में 300–400 रुपये किलो मिलता है। जब झोले का दाम एक रुपये करवाया गया था, तभी सभी झोला बनाने वालों ने धागा देने की भी माँग रखी थी। मालिक ने तभी से धागा देना शुरू किया। हमारे पास पैर से दबा कर बिजली से चलने वाली मशीन है। इसका बिल भी तो आता ही होगा और कौन उसे भरता है? उन्होंने जवाब दिया, जी बिलकुल वो तो आयेगा ही, वो भी हम ही देते हैं। इतने कम पैसे में तो बिजली का बिल देना बहुत मुश्किल होता होगा? ऐसे में जब आप लोग मालिक से पैसे बढ़ाने को कहते हो तो वह क्या करता है? उन्होंने जवाब दिया मुश्किल तो होता है इतने कम पैसे में घर भी नहीं चल पाता है तो बिल की तो बात ही छोड़ो। अगर मालिक से कहो पैसे बढ़ाने को तो वह फटकार कर बोलता है कि अगर झोले बनाने हों तो बनाओ, वरना तुमसे भी कम पैसे में काम करने वाली और भी औरतें तैयार बैठी हैं। इसके बावजूद हमने अभी कुछ महीने पहले हड़ताल कर के मालिक से दस पैसे बढ़वाये थे। आज के समय में महँगाई इतनी बढ़ रही है, आपको क्या लगता है कि इतने पैसे काफी हैं घर चलाने के लिए? काफी तो नहीं हैं, लेकिन मजबूरी इतनी है कि बिना काम किये आज घर चलाना मुमकिन नहीं है। महीने भर काम कर के 4500–5000 रुपये मिलते हैं जिससे थोड़ा बहुत गुजारा तो हो ही जाता है। बहुत उदास स्वर में उन्होंने जवाब दिया। आपकी सेहत पर इस काम का क्या असर पड़ता है? उन्होंने जवाब दिया, सेहत की तो बस पूछो मत, हम सभी को ही हर समय कमर और घुटनों में दर्द रहता है। उनमें से एक दूसरी महिला जिसकी उम्र लगभग 32 साल होगी, उसने बातचीत को बीच में काटते हुए कहा, मेरे पेट के नीचे बहुत तेज दर्द उठता है जो कभी–कभी बिलकुल सहने लायक नहीं होता। डॉक्टर को दिखाने पर वह बोलता है कि ज्यादा देर बैठने का काम मत करो लेकिन ऐसा हो नहीं पता। मैं अक्सर दर्द की दवाई खाकर झोला बनाने बैठ जाती हूँ। आज के समय में सिर्फ पति के पैसे से घर चलाना बहुत मुश्किल है। ये औरतें दिन को दिन, रात को रात नहीं समझती और बैठ कर झोले सिलती रहती हैं। सभी महिलाएँ इस काम के साथ–साथ घर का काम भी करती हैं। उन पर काम की दोहरी जिम्मेदारी होती है। यह काम बहुत ही उबाऊ और कठिन है, फिर भी पैसे के नाम पर कुछ नहीं मिलता। हम सभी को यह ध्यान रखना चाहिये कि जब हम मजदूरी बढ़ाने की बात करते हैं तब पीस रेट पर काम करने वाले सभी मजदूरों की मजदूरी का भी हिसाब करना चाहिए। उनकी मजदूरी का उनको इतना दाम मिलना चाहिए जिससे वे इस महँगाई में सम्मानजनक जीवन जी सकें। ––जैनब
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