दिल्ली के असंगठित मजदूरों की हालत
08 Jun 2025
• फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
दिल्ली भारत की राजधानी है। जहाँ हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को देश के प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं। जहाँ हमारे देश का संविधान बनाया गया है। जहाँ बड़ी–बड़ी मीटिंग होती हैं कि देश को कैसे चलाना है, व्यापार कैसे करना है? दिल्ली एक चमचमाता शहर है। पर इसी चमचमाते शहर में न जाने कितने मेहनतकश मजदूर दिन–रात मेहनत करते–करते भूख और गरीबी में दम तोड़ रहे हैं। जिन्दगी की जंग हार रहे हैं।
मजदूर अपना खून–पसीना एक करके सामान बनते हैं, महल उठाते हैं लेकिन आज उनके खून–पसीने का कोई मोल नहीं है। इस लेख के द्वारा यही प्रयास किया गया है कि मैं खून–पसीने की अहमियत को वापस लोगों के दिलों मेंं जिन्दा कर सँकू और साथ ही इस चमचमाती हुई दिल्ली की गरीबी, बेबसी और लाचारी सबके सामने ला सकूँ।
मैं और मेरा परिवार दिल्ली के एक छोटे से इलाके गंगा विहार में रहता है। यहाँ की गलियाँ कच्ची–तंग हैं और नालियाँ कूडे़ के ढेर से भरी हुई हैं क्योंकि यहाँ कचरा उठाने और सफाई करने वाली गाड़ी अकसर नहीं आती है। चार या पाँच महीने में एक बार आती है। फिर भी वह उस समय यहाँ का सारा कचरा उठाकर नहीं ले जाती है। थोड़ी बहुत सफाई करके गाड़ी वापस चली जाती है। कचरे का ढेर ऐसे ही पड़ा रहता है। हर तरफ कचरा होने के चलते पूरे मोहल्ले में गन्दी बदबू फैली रहती है। नालियों में मच्छर और कीड़े पैदा हो जाते हंै। इससे यहाँ हर रोज कोई न कोई बीमार होता ही रहता है।
बारिश के समय चारों तरफ गन्दगी और भी ज्यादा बढ़ जाती है। नालियों का पानी गलियों में भर जाता है। इससे लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। हमारे ठीक सामने वाले मोहल्ले में रोज सफाई वाली गाड़ी आती है और कूड़ा उठाकर ले जाती है। वहाँ कहीं भी गन्दगी दिखायी नहीं देती है। आप सोचेंगे कि यह कैसे हो सकता है? वह मोहल्ला मध्यम वर्ग के सभ्य लोगों का है। लेकिन हमारे मोहल्ले में गन्दगी के ढेर से यह साबित होता है कि आज भी शासान प्रशासन अमीर–गरीब में भेदभाव करता है।
नशाखोरी से बर्बाद होते परिवार
हमारे मोहल्ले की दूसरी समस्या है नशाखोरी। यहाँ के पुरुष सत्तर रुपये की देशी शराब पीकर नशे में धुत रहते हैं। आपस में लड़ाई–झगड़ा करते हैं, छोटे–छोटे बच्चे अपने पिता के घर आने का इन्तजार करते रहते हैं और जब उनके पिता घर आते हैं, तो वे देखते हैं कि वे शराब पीकर नशे में घर वापिस आये हैं। उनकी माँ के साथ लड़ाई करते हैं। कुछ तो अपनी पत्नियों को मारते–पीटते हैं। यह सब देख कर बच्चों के दिमाग में बहुत गहरा असर पड़ता है। निराशा में छोटे–छोटे बच्चे नशे की चपेट में आ रहे हैं। अपने पिता का बर्ताव देखकर बच्चे भी अपनी माँ–बहनों का सम्मान करना बन्द कर देते हैं। कही न कहीं इन सब की वजह सरकार की गलत नीतियाँ ही हैं जो शराबखोरी को बढ़ावा देती हैं।
सरकार चाहे तो इन नशीले पदार्थों को बन्द करवा सकती है। पर वह ऐसा नहीं करेगी, क्योंकि वह चाहती है कि मजदूर नशे में पड़े रहें, ताकि उसका शासन ऐसे ही बरकरार रहे और वह हमें यूँ ही कठपुतली की तरह नचाती रहे। हम उनसे कोई सवाल न कर सकें। वह हमारा शोषण–उत्पीड़न करती रहे।
बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे इलाके के बच्चों की हालत भी ठीक नहीं है। बचपन से ही उनके छोटे कन्धों पर जिम्मेदारियों का भारी बोझ लाद दिया जाता है। लेकिन ऐसा करना हम जैसे गरीब लोगों की मजबूरी है, न कि लालच के चलते हम ऐसा करते हैं। यहाँ के बच्चे आठ या नौ साल की उम्र में ही काम पर जाने लगते हैं। कोई चेन लगाने का काम करता है, तो कोई जूते पॉलिस करता है। यहाँ के बच्चे फैक्टी में भी काम करते हैं और शादियों में छतरी उठाने का काम भी करते हैं। सच में यह सब कितने शर्म की बात है! क्या हम किसी सभ्य समाज में रहते हैं?
यह देखकर मन दुख से भर जाता है कि आज देश में छोटे–छोटे बच्चे गुलामों की तरह काम कर रहे हैं, ताकि उनके घर में खाना खाने के लिए पैसे आ सके। मासूम बच्चे खाली पेट ही सुबह–सुबह काम पर जाते हैं। धूप, गर्मी, बरसात, सर्दी बिना इन सब की परवाह किए उन्हें सिर्फ इस चीज की चिन्ता रहती है कि काश उन्हें इतने पैसे मिल जायें जिससे रात को भूखे पेट न सोना पड़े। काम पर इन बच्चों को न जाने कितनी सारी मुसीबतों का सामना करना पड़ता हैं। फैक्ट्री मालिको की गालियाँ सुननी पड़ती हैं। जून–जुलाई की गर्मी में खुद को जलाना पड़ता है। मजबूरी न हो तो कौन से ऐसे माँ–बाप होंगे जो अपने छोटे से मासूम बच्चे को काम पर भेजना चाहेंगे? इसे देख आँखों में आँसू आ जाते हैं। यह सब बहुत दुखद अनुभव है। जब हमारे देश के बच्चे खेल का सामान और स्कूल छोड़ कर काम पर जा रहे हैं तो हम इसे आजाद देश कैसे कह सकते हैं? जहाँ का भविष्य इतने अन्धकार में डूबा हुआ है।
मजदूर माँ–बाप भी यही चाहते हैं कि उनका बच्चा अच्छे कपड़े पहने, अच्छा खाना खाये, अच्छे स्कूल में पढ़ाई करे, अपनी जिन्दगी को सँवारे। लेकिन इतने बेबस और लाचार हैं कि चाह कर भी वे कुछ नहीं कर सकते हैं। उनके लिए यह सब सपना बनकर ही रह जाता है। माँ–बाप का मन पसीज जाता है यह सोचकर कि न जाने उनके बच्चे काम के समय कितना दुख–दर्द सहते होंगे।
मैंने राजेश जोशी की यह कविता में पढी है–– फ्बच्चे काम पर जा रहे हैं––––”पूरी कविता बहुत मार्मिक है। कितना दर्द भरा है कविता में, इस कविता की सच्चाई है कि आज भी बच्चे काम पर जा रहे हैं। अपने नन्हे–नन्हे पैरों में टूटी हुई चप्पल पहने, फटे–पुराने कपड़े पहने, कन्धों पर अपना थैला अपनी जिम्मेदारियाँ उठाये, बच्चे काम पर जा रहे हैं।
आपसी लड़ाई–झगड़े और मारपीट
हमारे मोहल्ले में आये दिन लड़ाई–झगड़ा चलता रहता है। कोई किसी से बदला लेने के लिए, पुराना हिसाब चुकाने के लिए या दिल की भड़ास निकालने के लिए सिर–फुटौवल करते रहते हैं। यह बात हम सबको पता है कि इन बेवजह झगड़ों से कोई भी समस्या हल नहीं होती, बल्कि समस्या बढ़ जाती है। यह सच्चाई सब जानते हैं फिर भी इससे अनजान बने रहते हैं, क्योंकि उन्हें अपना बदला लेना होता है। फिर चाहे किसी की जिन्दगी ही क्यों न खत्म हो जाये। अब उन्हें यह कौन समझाये कि उनका भला एक दूसरे से दूर होने में नहीं है, बल्कि एक साथ होने में है।
आपस में लड़ने से सरकार और पूँजीपति का ही फायदा होता है जो हमारा शोषण करते हैं। सरकार तो चाहती ही है कि ये लोग ऐसे ही एक–दूसरे के साथ लड़ते रहे जिससे इनकी आड़ में सरकार अपने काले कारनामे छिपाती रहे। इस लड़ाई–झगड़े का मुख्य कारण भी सरकार ही है। आजकल टीवी, मोबाइल और इंटरनेट का जमाना है। इनके जरिये सरकार लोगों के मन में गुस्सा, बदले की भावना, जलन की भावना, जात–पाँत और उँच–नीच का भेदभाव पैदा करती है। सोशल मीडिया और टीवी चैनल्स का इस्तेमाल लोगों में आपसी फूट नफरत फलाने में हो रहा है। हमारे नेता भी हमें लड़ाने का काम करते हैं जिससे उन्हें वोट मिलता रहे।
हमारे मोहल्ले में एक कार वॉश वाला है। वह गाड़ियों की सफाई का काम करता है। वह मोहल्ले में इतनी ज्यादा गुण्डागर्दी दिखाता है, जैसे वह यहाँ का बदमाश हो। राह चलते किसी भी इनसान को गाली दे देता है और अगर यहाँ कोई उसके खिलाफ आवाज उठाये, तो उसके साथ मारपीट करता है। एक मकान मालिक भी इन लोगों का ही साथ देता है। यहाँ तक कि पुलिस भी इनका साथ देती है। मजदूर कुछ नहीं कर पाते हैं। यहाँ के गरीब मजदूर इनकी मनमानी और गुण्डागर्दी झेल रहे हैं।
पैसे की तंगी और कलह
हमारे मकान मालिक मोहल्ले में गुण्ड़ागर्दी करते फिरते हैं। मकान का किराया समय से न देने पर मकान मालिक सभी किरायेदारों को माँ–बहन की भद्दी गालियाँ देते हैं और मकान खाली करवाने की धमकी देते हैं। पैसे समय से न मिलने पर मकान मालिक किरायेदारों से अपना सारा काम भी करवाते हैं, जैसे अपने घर में झाड़ू–पोछा लगवाना, अपनी गाड़ी साफ करवाना, पल–पल में कुछ न कुछ काम बताना। किरायेदार भी बेचारे मजबूरी में उनकी जी–हजूरी करते हैं। ज्यादा पैसे न कमा पाने के कारण लोग कर्जा लेकर किराया चुकाते हैं। फिर उस कर्जे का ब्याज चुकाते हैं। जितने रुपये कर्जे के लेते हैं उससे दो गुना ज्यादा ब्याज भरते हैं। ये सारी बातें कहने में कितनी आसान लग रही हैं, लेकिन जिनके ऊपर गुजरती हैं उन्हें ही इन सब का एहसास होता है।
जब मजदूरों के बच्चे दूसरों के निवाले देखते हैं और माँ–बाप की जेब में एक फूटी कौड़ी नहीं होती तो यह पीड़ा सहन नहीं होती। पैसे की तंगी से ज्यादातर बीमार माँ–बाप की दवाई नहीं आ पाती है। बच्चों की पढ़ाई–लिखाई बन्द हो जाती है। लड़कियों की शादी नहीं हो पाती। पति अपनी बीवी के लिए नयी साड़ी खरीदकर नहीं ला पाता। भूखा रहना तो हमारे लिए रोजमर्रे की बात है। अगर मजदूर जरूरी काम जैसे–– इलाज या खाने–खर्चे के लिए कर्ज ले लें तो कर्ज दिन–प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है। फिर उस कर्ज को भरने के लिए कभी बीवी के गहने गिरवी रखना पड़ता है, तो कभी अपनी घड़ी। इन सबसे भाई–भाई में, बाप–बेटे में और पति–पत्नी में झगड़े बढ़ गये हैं। कोई परिवार ऐसा नहीं है जो कलह से मुक्त हो। कर्ज में फँस कर मजदूर आत्माहत्या करने को मजबूर हो रहे हैंै। आज हालात इतने खराब और बुरे हो गये हैं कि अगर इनके खिलाफ आवाज नहीं उठायी गयी तो यह व्यवस्था सड़ती जायेगी और सबकी जिन्दगियों को तबाह होते देर नहीं लगेगी।
क्षेत्रवाद का दंश
यह सब किसी नरक से कम नहीं हैं। हमारी गली में दिल्ली की सीमा से लगती है। यहाँ अगर किसी भी प्रकार की कोई घटना हो जाती है और हम पुलिस या एम्बुलेंस को बुलायें तो हमारी मदद के लिए जल्दी कोई भी नहीं आता है और जब उनसे उनकी इस लापरवाही का जवाब माँगा जाता हैं, तो वे बड़ी बेशर्मी के साथ कह देते हैं कि हम तो दिल्ली वाले हैं और जहाँ तुम रहते हो वो उत्तर प्रदेश है।
पर तब उत्तर प्रदेश वालों को बुलाओ तो बिल्कुल यही बात उत्तर प्रदेश वालों के लिए हमारा मोहल्ला दिल्ली में आ जाता है। ये खुलेकर अपनी मनमर्जी करते हैं और हम कुछ नहीं कर पाते हैं। ऐसे हालात में आखिर हम किससे मदद की उम्मीद करें, क्योंकि सरकार, मीडिया, पुलिस, इन सबसे उम्मीद लगाना अपनी आँखों में धुल झोकने के बराबर है। एक बात हमें अच्छी तरह पता चल चुकी है कि यह सरकार कभी मजदूर–मेहनतकश के बारे में अच्छा नहीं सोचने वाली है। हाँ, उन्हें लूटना कैसे है? उनसे गुलामों की तरह काम कैसे करवाना है? उन्हें इनसान से जानवर कैसे बनाना हैं? इसके लिए सरकार दिन–रात नियम, कानून, योजना बनाती रहती है।
मोहल्ले में पीने के पानी की एक भी टंकी तक नहीं लगी है यहाँ के छोटे–छोटे बच्चे, बूढ़े और जवान औरतें सभी पानी भरने 500 मीटर की दूरी पर पैदल चलकर जाते हैं। अपने हाथों में पानी के बड़े–बडे़ डब्बे–बर्तन लेकर अगर यहाँ के सभी लोग पानी भरकर न लायें तो सभी प्यासे मर जाएँगे। जहाँ सब लोग पानी भरने जाते हैं, अगर कभी वहाँ पानी नहीं आता हैं तो सभी लोग पैदल दो किलोमीटर दूर दिल्ली जल बोर्ड़ में पानी भरने जाते हैंै। क्या आप यकीन करेंगे कि यह दिल्ली की हालत है।
मैं यहाँ बचपन से रह रही हूँ। इस मोहल्ले में मैंने आज तक पानी का टैंकर नहीं देखा। जबकि हमारी सड़क से हमेशा पानी के भरे हुए टैंकर आते–जाते रहते हैं। यहाँ सभी लोग गरीबी से जूझ रहे हैं। गरीबी के कारण यहाँ के सिर्फ गिने–चुने बच्चे ही सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। वहाँ भी उन्हें अच्छे से नहीं पढ़ाया जाता है। वहाँ भी अमीर–गरीब और जाति–धर्म का भेदभाव किया जाता है।
उन्हें कंजर कहा जाता है, इसलिए यहाँ के ज्यादातर बच्चे अनपढ़ हैं। हालत इतनी बुरी है कि जो यहाँ के 10वीं–12वीं में पढ़ने वाले बच्चे हैं, उन्हें अपना नाम तक लिखना नहीं आता, हिन्दी पढ़नी नहीं आती। ऐसा नहीं है कि ये बच्चे पढ़ना नहीं चाहते। ये पढ़ना चाहते हैं पर इन्हें उस तरीके से पढ़ाया ही नहीं जाता जिससे वे पढ़ना सीख सकें।
घर में पैसे न होने के चलते कभी दाल उबाल कर गुजारा करते हैं तो कभी आलू। जो पौष्टिक आहार मिलना चाहिए, वो मिल ही नहीं पाता। पौष्टिक आहार तो बहुत दूर की बात है, पेटभर खाना तक नहीं मिल पाता है। यहाँ के किराये वाले कमरे बहुत छोटे हैं जिनमें मुश्किल से मुश्किल एक या दो लोगों की जगह है, लेकिन उसमें 12–13 लोग रहते हैं, अब आप इस बात से यह अन्दाजा लगा ही सकते हैं कि वह एक किराये का कमरा कितना बड़ा होगा। उस एक कमरे का किराया 2 हजार से लेकर 25 सौ तक है। उस पर बिजली का बिल इतना बढ़कर आता है, जिससे मजदूरों की बची हुई हिम्मत भी टूट जाती है। यहाँ किसी भी घर में गैस सिलेण्डर नहीं है। सभी लोगों के घर मिट्टी के चूल्ले हैं। उस पर खाना बनाते हैं। चूल्हे को जलाने के लिए लकड़ियों की जरूरत पड़ती है। यहाँ की सारी औरतें लकड़ियाँ चुनने बहुत दूर–दूर जाती हैं।
औरतें एक–एक लकड़ी इकट्ठी करती हैं, तब जाकर उनके घर का चूल्हा जलता है। उस चूल्हे पर जब वे खाना बनाती हैं, तो उनका गर्मी और धुँए से बुरा हाल हो जाता है। 10 साल पहले गैस चूल्हे की कीमत 400 रुपये थी जो अब 800 से 1100 रुपये हो गयी है। अब ऐसे हालात में गरीब आदमी कैसे गैस सिलिण्डर खरीद सकता है। यहाँ सभी लोग सरकारी योजनाओं से वंचित है। अगर यहाँ के सभी लोगों को अपने हक और अपनी जिम्मेदारी का एहसास हो जाये तो शायद कुछ हद तक यहाँ की हालत सुधरे!
यहाँ कुछ समय पहले एक पड़ोसी के घर के हॉल में एक आँगनबाड़ी खोली गयी, जिनका घर थोड़ा बड़ा बना हुआ है। उस आँगनबाड़ी में बहुत थोड़ा सामान बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए आता था। जैसे–– कुर्सी, बच्चों के लिए साईकिल, खिलौने, पौस्टिक लड्डू, फल, आदि। यह सब सामान भी आँगनबाड़ी में काम करने वाली औरतें ले जाती थीं। यहाँ के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को सिर्फ दलिया और सूखे चने दिये जाते थे। अगर यहाँ के लोगों को अपने अधिकारों का एहसास होता तो वे एक साथ मिलकर आवाज उठाते और कहते कि हमारे बच्चों के लिए और गर्भवती महिलाओं के लिए जो सामान आ रहा हैं, आखिर वह हम तक क्यों पहुँच नहीं रहा। आखिर हमारे मोहल्ले में खुली–सी जगह में आँगनबाड़ी क्यों नहीं है। किसी के छोटे से घर में क्यों आँगनबाड़ी बनायी गयी है। वहाँ हमारे बच्चे न ही ढंग से खेल सकते हैं। न ही पढ़ सकते हैं, आज हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम लोगों के बीच जायें और उन्हें उनकी जिम्मेदारियों और हकों का एहसास दिलायें। हमारे मोहल्ले में जो एक आँगनबाड़ी थी अब वह भी नहीं बची। आँगनबाड़ी अब किसी और जगह चली गयी है। मोहल्ले में अब कोई भी आँगनबाड़ी नहीं है।
कहने को तो जमाना बहुत आगे बढ़ चुका है, पर हम लोगों की सोच आज भी पाँच सौ साल पीछे ही है। आज भी लड़के और लड़की में भेदभाव किया जाता है। यहाँ हमारे मोहल्ले में लड़कियों को कॉलेज में पढ़ने की आजादी नहीं है। अगर यहाँ की लड़की 12वीं पास कर लेती है, उसे आगे पढ़ने की और आगे बढ़ने की इजाजत नहीं। एक या दो साल के अन्दर ही उसकी शादी कर दी जाती है। उसके बाद पूरी जिन्दगी उसे नरक भोगना पड़ता है।
मोहल्ले में हर जगह अब भट्ठियाँ ही भट्ठियाँ
मोहल्ले में हर जगह अब भट्ठियाँ खोल दी गयी हैं। उन भट्ठियों में लोहे को पिघलाकर उनकी टंकियाँ बनायी जाती है। यह काम दिन–रात ऐसे ही चलता रहता है। उसका धुआँ काफी ज्यादा जहरीला होता है। धुआँ दिन–रात हमारे घरों में भरता रहता है। इस वजह से हम जल्दी अपने घर के भीतर नहीं जाते। यहाँ जहर की तरह सब तरफ धुआँ फैलता जा रहा है।
इस धुएँ से लोगों को साँस की बीमारी भी होने लगी है। यहाँ पर ये भट्ठियाँ गैर कानूनी हैं। ये बात सभी को पता है। फिर भी कोई कुछ नहीं करता। अगर यहाँ इत्तेफाक से कभी पुलिस आ जाती है तो भट्ठियों के मालिक उनकी जेब गर्म कर देते है। इसलिए पुलिस भी उन्हें कुछ नहीं कहती। इन भट्ठियों में बहुत ज्यादा मजदूर काम करते हैं। दिन–रात इन भट्ठियों में खुद को जलाते हैं। फिर उनके लिए किसी भी प्रकार की कोई सुरक्षा नहीं है। एक बार भट्ठी में काम कर रहे एक मजदूर की जहरीले धुएँ से मौत हो गयी थी और उसके बाद उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई। आखिर ऐसी भट्ठियों के होने का क्या फायदा जो मेहनतकशों की जान लेती हैं। यही है दिल्ली के ज्यादातर वासियों की जिन्दगी की झलक। उम्मीद है आपको इससे हमारे बारे में जानने में मदद मिली होगी।
–– अंजली