इस अंक के लेख

चार श्रम संहिता

फरीदाबाद के ऑटोमोबाइल उद्योग के मजदूरों की हालत

वे इन कारखानों में थोड़ा ज्यादा कमाने की आस में काम ढूँढते हैं। यहाँ नौकरी पाने में बहुत से लोग सफल होते हैं और बहुत से नौजवान अपने किसी दोस्त या रिश्तेदार जो पहले से यहाँ काम पर लगे हैं उनके पास एक–आध महीना रुककर काम न मिले तो वापस अपने गाँव चले जाते हैं या किसी दूसरे औद्योगिक शहर में जाकर नौकरी तलाशना शुरू करते हैं। दूर–दराज के इलाकों से आये हुए नौजवान मजदूर यहाँ आसपास के गाँवों में किराये पर मकान लेकर रहते हैं। ज्यादातर मजदूरों की स्थिति अकेले के दम पर एक कमरा लेने की नहीं है। इसका कारण है मजदूरों को मिलने वाली अपर्याप्त तनख्वाह। आज किसी भी कम्पनी में स्थायी कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है जिन्हें लाख रुपये तक तनख्वाह मिलती है।......

ट्रेड यूनियन

‘टाटा स्टील’ कम्पनी के खिलाफ मजदूरों का ऐतिहासिक आन्दोलन

देश के मजदूरों के संघर्ष का इतिहास बेमिसाल रहा है। अलग–अलग दौर में उन्होंने जबरदस्त संघर्षों के दम पर अपनी माँगों को मनवाया और अपने हितों के हिसाब से कानून में संशोधन करने के लिए शासक वर्ग को मजबूर कर दिया। आज हम इसी सिलसिले में यहाँ 100 साल पुराने मजदूर आन्दोलन का जिक्र करेंगे। यह आन्दोलन है–– सन 1920 का ‘टाटा स्टील’ कम्पनी के खिलाफ मजदूरों का ऐतिहासिक संघर्ष।...

कहानी

गंगो का जाया

गंगो की जब नौकरी छूटी तो बरसात का पहला छींटा पड़ रहा था। पिछले तीन दिन से गहरे नीले बादलों के पुंज आकाश में करवटें ले रहे थे, जिनकी छाया में गरमी से अलसाई हुई पृथ्वी अपने पहले ठण्डे उच्छ्वास छोड़ रही थी, और शहर–भर के बच्चे–बूढ़े बरसात की पहली बारिश का नंगे बदन स्वागत करने के लिए उतावले हो रहे थे। यह दिन नौकरी से निकाले जाने का न था। मजदूरी की नौकरी थी बेशक, पर बनी रहती, तो इसकी स्थिरता में गंगो भी बरसात के छींटे का शीतल स्पर्श ले लेती। पर हर शगुन के अपने चिन्ह होते हैं। गंगो ने बादलों की पहली गर्जन में ही जैसे अपने भाग्य की आवाज सुन ली थी।...

कविता

हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएँ

पूछने लगे मजदूर पूछने लगे मजदूर भवन बनाने वाले भैया हमसे क्यों घिन खाते भवन में रहने वाले हम ही इसे उठाते ऊँचा हम ही इसे रंग पोत चमकाने वाले काम हुआ खत्म हम पर ही लग जाते ताले...

उत्तरदायित्व

मजदूर संगठन की कार्यशैली

1– हम आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों में पूरी निष्ठा के साथ भाग लेते हैं। हम उत्पीड़न, शोषण और हर प्रकार के गलत कार्यों के खिलाफ स्वत-स्फूर्त संघर्षों में पूरे जुझारूपन के साथ भाग लेते हैं। हम मजदूरों की इच्छाओं के खिलाफ जाकर उनके संघर्षों को अवरुद्ध नहीं करते। 2– हम ट्रेड यूनियन मामलों में नौकरशाही तौर–तरीकों के जरिये मजदूर–कार्यकर्ताओं के उत्साह को कुन्द नहीं करते। हम मजदूरों के विचारों का दमन करने की नीति की न सिर्फ भर्त्सना करते हैं, बल्कि उसके खिलाफ संघर्ष भी करते हैं।...

ट्रेड यूनियन

सीएचओ आन्दोलन की संक्षिप्त रिपोर्ट

‘हम अपना अधिकार माँगते हैं, नहीं किसी से भीख माँगते हैं’ आदि नारों से आन्दोलन गूँज उठा। प्रदेश के विभिन्न जिलों से हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके भी सीएचओ सुबह–सुबह ही इस आन्दोलन के लिए लखनऊ पहुँच गये। सीएचओ की भारी एकजुटता से अधिकारियों के कान खड़े हो गये। उन्होंने बड़ी संख्या में पुलिस बुलाकर आन्दोलन को इकोगार्डेन की तरफ विस्थापित कर दिया। सभी सीएचओ सड़कों पर मार्च करते हुए इकोगार्डेन की तरफ बढ़े। वहाँ मंच लगाया गया और अगले 5 दिन तक वहीं पर धरना दिया गया। वहाँ का नजारा देखने लायक था। भाषण, गीत और नारों से माहौल सराबोर था। अलग–अलग जिलों की टोलियाँ बनायी गयीं जो समय–समय पर कार्यक्रम करतीं और उपस्थित लोगों का मनोरंजन और उत्साह बढ़ातीं।...

मजदूर इंटरव्यू

गन्ना छिलाई करने वाले खेत मजदूर से बातचीत

हम गन्ना छिलाई करने वाले खेत मजदूरों से बातचीत करने के लिए निकले और एक खेत मजदूर के पास जाकर बैठ गये। उसका लड़का हमारी मजदूर पुस्तिका लगातार पढ़ता है। लड़का तो घर पर मिला नहीं, लेकिन उसके पिताजी खाट पर बैठकर बीड़ी पी रहे थे। उनके कहने पर हम भी बैठ गये, काफी देर तक हम बातचीत करते रहे, इनका नाम सुभाष है। उम्र 43 साल, लेकिन देखने में लगते हैं 55 से 60 साल के बीच, चेहरे की एक–एक हड्डी दिखायी दे रही थी। माँस तो चेहरे पर है ही नहीं सिर्फ हड्डी और खाल है।...

कॉर्पोरेट

कछुआ–खरगोश की कहानी और कॉर्पोरेट पूँजीवाद 

बहुत पुरानी कहानी है, कछुआ और खरगोश के बीच दौड़ प्रतियोगिता की। हम सभी जानते हैं कि दोनों में दौड़ जीतने को लेकर शर्त लगी। दौड़ शुरू हुई, खरगोश तेज दौड़कर आगे निकल गया और बीच रास्ते में सो गया। कछुआ एक चाल से लगातार चलता गया और दौड़ जीत गया। इससे सबक निकाला जाता है कि लगातार मेहनत करना सफलता की कुंजी है। कॉर्पोरेट ने इस कहानी को बदल दिया है।.......

कथन

मजदूरों के लिए नारायण मूर्ति के बयानों का मतलब

नारायण मूर्ति एक बार फिर बड़ा बयान देकर विवादों में घिर गये हैं। वे 1990 के बाद, नंगे पूँजीवादी, नव–उदारवादी दौर के नौबढ़ पूँजीपति हैं। उन्होंने यह बयान माँ–बाप के कर्त्तव्यों को लेकर दिया है। उन्होंने कहा है कि बच्चों की पढ़ाई के लिए घर में अनुशासित माहौल बनाना माता–पिता की जिम्मेदारी है। माँ–बाप यह उम्मीद करते हुए फिल्में नहीं देख सकते कि बच्चे अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाएँगे। यानी माँ–बाप को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए समय निकालना चाहिए। इसके जवाब में सोशल मीडिया के एक यूजर ने लिखा, "आपकी सलाह के अनुसार अगर माँ–बाप 72 घण्टे काम करेंगे तो वे बच्चों को समय कब देंगे?”यह मूर्ति के नसीहत वाले बयान पर करारा तमाचा ही है।...

मजदूर एकता पत्रिका-9

फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

आज फासीवादी शक्तियाँ मजदूर वर्ग और अन्य मेहनतकश जनता पर बर्बर हमले कर रही हैं। उन्होंने मजदूरों पर श्रम संहिता, ठेका प्रथा, हायर और फायर, थोड़े समय का रोजगार जैसी नीतियों को थोप दिया है। वे मजदूरों की रोजी–रोटी छीनकर पूँजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने पर ही आमादा नहीं हैं, बल्कि मेहनतकश जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन भी कर रही हैं। यूनियन बनाने, हड़ताल करने, अपना प्रतिनिधि चुनने और न्याय पाने के अधिकार को खत्म करने की पुरजोर कोशिश चल रही है।...

दुर्घटना

रैपिड रेल के निर्माण के दौरान मजदूरों की मौत

–– एमएसएस, टीम बीती 17 जुलाई को रात करीब दो से तीन बजे के बीच मेरठ के शॉप्रिक्स मॉल के पास दिल दहला देने वाला एक हादसा हो गया। यहाँ मेरठ–दिल्ली रैपिड रेल के निर्माणाधीन पुल का एक हिस्सा गिर गया, जिसस......

इतिहास

भारत के मजदूर वर्ग के लिए ‘पेरिस कम्यून’ के सबक

आज भारत के मजदूरों की हालत पर नजर डालने से हमें भयंकर शोषण, गरीबी और अभाव नजर आता है। देश में आत्महत्या करने वाला हर चौथा व्यक्ति दिहाड़ी मजदूर है। सुबह से शाम तक जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी करोड़ों म......

पत्रिका प्राप्त करें

नवीनतम अंक और लेख सीधे अपने ईमेल में प्राप्त करें