गन्ना छिलाई करने वाले खेत मजदूर से बातचीत

07 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
हम गन्ना छिलाई करने वाले खेत मजदूरों से बातचीत करने के लिए निकले और एक खेत मजदूर के पास जाकर बैठ गये। उसका लड़का हमारी मजदूर पुस्तिका लगातार पढ़ता है। लड़का तो घर पर मिला नहीं, लेकिन उसके पिताजी खाट पर बैठकर बीड़ी पी रहे थे। उनके कहने पर हम भी बैठ गये, काफी देर तक हम बातचीत करते रहे, इनका नाम सुभाष है। उम्र 43 साल, लेकिन देखने में लगते हैं 55 से 60 साल के बीच, चेहरे की एक–एक हड्डी दिखायी दे रही थी। माँस तो चेहरे पर है ही नहीं सिर्फ हड्डी और खाल है। फिर हम उनसे उनके काम पर बातचीत करने लगे। वह बताने लगे कि “भाई सुबह 7 बजे खेत में चले जा और शाम को 6 बजे घर आवे। सूरज खेत में ही निकले और वहीं पर छिप जा।”दो पशुओं को दिखाकर कहने लगे, “दोपहर में रोटी खाने आवे, फिर डाँगरों को घास–पानी करने के बाद फिर चले जा।” शाम तक कितना गन्ना छिलाई हो जाता है? यह पूछने पर कहने लगे, “भाई 40 पुली गन्ना काटने के बाद 15 से 20 पूली बँधे मुश्किल से। 20 से 25 पूली घरवाली कर दे, दोनों 40 ले कर दे पूरा हंगा लगाके।” मजदूरी ठीक–ठाक पड़ जाती है? “हाँ भाई गुजारा हो जा बस और कुछ काम भी तो ना है गाँव में। गन्ना छिलाई का ही ठेका ले लेते हैं 5 साल से गाँव में। 40 से 50 रुपये क्विटल भाव है। महँगाई बढ़ती जा रेट ना बढ़ता, मजबूरी है बाहर भी तो कुछ काम ना है। अगर बाहर जाये करन तो बच्चों की पढ़ाई छूट जा। यहाँ कम से कम बच्चे तो अपनी पढ़ाई कर लें। बाहर भी काम करके देख लिया। जैसे जावे, वैसे ही वापस आ जावे, कुछ हाथ पल्ले ना लगता।” एक सीजन में कितना बीघा छिलाई हो जाती है? “15 बीघा एक किसान का और 30 बीघा दूसरे किसान का ठेका था पिछले साल। दम लगाके यही पूरा हुआ था। इसके बाद कुछ गेहूँ कटाई कर ली थी। घर नाज हो गया, नहीं तो यह भी मोल लेना पड़ता। कुछ भुस भी हो गया था। बारिश में डाँगरों के लिए घास से भी काम चल जा।” दोनों किसानों से कितना पैसा आया था? “एक पे से 25 हजार रुपये आये थे और एक पे से 40 हजार रुपये। 25 हजार रुपये वाले के तो बस पूरे हुए थे। 30 बीघे वाले का गन्ना बढ़िया होरा था इस पे ते 15 हजार रुपये आ गे थे बाद में फसल बुआने तक।” जब खर्चे के बारे में पूछा तो बताने लगे कि “कुछ न बचा भाई और ब्याज पर कर्ज लेकर काम चलाया। 40 हजार रुपये तो लड़की की फीस के चले गये और कुछ डॉक्टर के और घर खर्चे में आ गये।” बीच के खर्च कैसे चलें? “दूध बेचकर और उधारी पर।” आगे बताने लगे, “वैसे तो रोज की दवाई खानी पड़े। अगर बीच में ज्यादा बीमार हो जाये तो ब्याज पर पैसा लेकर इलाज कराना पड़े। कभी कमर दर्द, कभी शरीर दर्द, कभी बुखार, यो काम ही ऐसा, मिट्टी में मिट्टी होना पड़े। आधा पैसा तो बीमारी में ही चला जा। अबकी बार तो ऐसे–ऐसे बुखार चल रे। एक–एक महीने में ठीक होवे । एक ठीक होवे, दूसरा बीमार पड़ जा, दूसरा ठीक होवे, तीसरा बीमार पड़ जा। गाँव के डॉक्टर भी इतने महँगे हो रे, तीन दिन की दवाई 300–400 रुपये की दें। अगर बोतल लगा दी तो बस फिर 2000 रुपये सीधे कर लें डॉक्टर। इलाज कराने की भी हिम्मत ना पड़ती। गोली लेकर काम चलाना पड़े बीच–बीच में।” बात के बीच में बाहर से किसी की आवाज आयी। वह देखने चले गये। हम बैठे–बैठे जब तक हिसाब लगाने लगे। दोनों जवाँ–वीर को महीने में 13,000 रुपये यानी हर एक को 220 रुपये रोजाना की मजदूरी पड़ती है। जब हमने उनको हिसाब समझाया तो उन्होंने कहा, “इतनी भी ना पड़ती। लड़का भी बीच–बीच में काम करने आवे और शाम को गन्ने काट जा, कभी–कभी बुग्गी भी भरवा दे। लड़की रोटी बनाकर कॉलेज चली जा। इस हिसाब से तीन आदमी काम करते हैं। इस हिसाब से 150 रुपये से भी कम की मजदूरी पड़ती है। टाइम काट रे बस भाई।” फिर पशुओं की तरफ देखकर कहने लगे, “दो डाँगरों का घास भी आजा। ये भी साथ–साथ पल जा।” ”पिछले साल तो क्या बताये” बस कहने लगे, ”उधार लेकर 20 हजार रुपये की गाय ले आये थे। जब लाये तो दूध भी दे रही थी और हट्टी–कट्टी भी थी। थोड़े दिन बाद दूध देना भी बन्द कर दिया और घास खाना भी। इतने इलाज करा लिये पर कुछ न हुआ। तंग आकर फिर 3 हजार रुपये की बेचनी पड़ी। फिर हमारे पड़ोसी ने एक गाय बतायी। हमें जरूरत थी दूध–पानी तो हो जायेगा ही। गाय बढ़िया थी। ब्याज पर 22 हजार रुपये लेकर ले आये। 5 किलो दूध देती थी। 4 महीने की गाबिन थी। कुछ दिनों बाद उसके भी बीमारी पड़ गी। कुछ दिनों बाद लुवारा गेर दिया। पता नहीं डाँगरों में भी कैसी–कैसी बीमारी आरी। पेशाब की जगह खून मूतने लगी। 10 हजार रुपये उसके इलाज में लग गये। वे भी ब्याज पर लिये थे। गाय का तो खून रुक गया पर म्हारे खून के आँसू निकालवा दिये।” बताते–बताते वह इतने गम्भीर हो गये कि कभी भी आँखों से आँसू टपक सकते थे। हमने चलने की सोची तो कहने लगे, “यह सोचकर काम पर लगते हैं ब्याज चुका कर दो रोटी चैन से खायेंगे। पर म्हारी तो किस्मत फूटरी। कर्जा बढ़ता ही जा, घटने का नाम न लेता।” हम दुखी मन से वापस लौट आये। अगली बार उनसे मिलकर और बातें करेंगे। –– सागर
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