सीएचओ आन्दोलन की संक्षिप्त रिपोर्ट
07 Jun 2025
• फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
बीते अगस्त महीने में हजारों की संख्या में सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी यसीएचओद्ध अपनी माँगों को लेकर लखनऊ में एकजुट हुए। लम्बे समय से वे शासन–प्रशासन के सामने अपनी जायज माँगें रख रहे थे। इन्हीं माँगों को लेकर सीएचओ और राज्य स्तर के अधिकारियों में टकराव चल रहा था। 14 सितम्बर को यह टकराव तेज हो गया। दरअसल, प्रदेश सरकार ने उपस्थिति लगाने के लिए एक ऐप आधारित प्रणाली, यानी अटेंडेंस मैनेजमेंट सिस्टम यएएमएसद्ध लागू कर दिया था। इसने सीएचओ के गुस्से को और बढ़ा दिया। इसके विरोध मे प्रदेश के सभी सीएचओ में एक जबरदस्त एकजुटता पैदा हो गयी। इनकी प्रमुख माँगों में एएमएस हटाने की माँग भी जुड़ गयी। 21 सितम्बर से सभी ऑनलाइन काम बन्द कर दिये गये जिसके बाद भी प्रदेश सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी, उल्टे सरकार ने बेशर्मी से अधिकारियों के जरिये उन्हें डराना–धमकाना शुरू कर दिया। सरकार की इस जोर–जबरदस्ती ने सीएचओ के गुस्से की आग में घी का काम किया।
कोई सुनवाई नहीं होने के चलते आखिरकार सीएचओ ने 28 सितम्बर से पूर्ण कार्य बहिष्कार की घोषणा कर दी और लखनऊ में एनएचएम कार्यालय को घेर लिया। उनकी मुख्य माँगें थीं–– संविदा के 6 साल पूरा होने पर 4800 ग्रेड पे निर्धारित कर नियमितीकरण करना, कार्याधारित प्रोत्साहन राशि और सैलरी को मिलाकर एक सम्मानजनक वेतन निर्धारित करना, वेतन विसंगति को दूर कर न्यूनतम 25 हजार रूपये सेलरी, स्थानान्तरण खोलना आदि।
‘हम अपना अधिकार माँगते हैं, नहीं किसी से भीख माँगते हैं’ आदि नारों से आन्दोलन गूँज उठा। प्रदेश के विभिन्न जिलों से हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके भी सीएचओ सुबह–सुबह ही इस आन्दोलन के लिए लखनऊ पहुँच गये। सीएचओ की भारी एकजुटता से अधिकारियों के कान खड़े हो गये। उन्होंने बड़ी संख्या में पुलिस बुलाकर आन्दोलन को इकोगार्डेन की तरफ विस्थापित कर दिया। सभी सीएचओ सड़कों पर मार्च करते हुए इकोगार्डेन की तरफ बढ़े। वहाँ मंच लगाया गया और अगले 5 दिन तक वहीं पर धरना दिया गया। वहाँ का नजारा देखने लायक था। भाषण, गीत और नारों से माहौल सराबोर था। अलग–अलग जिलों की टोलियाँ बनायी गयीं जो समय–समय पर कार्यक्रम करतीं और उपस्थित लोगों का मनोरंजन और उत्साह बढ़ातीं।
इस आन्दोलन में महिला सीएचओ की बड़ी भागीदारी थी। कितनी ही महिलाएँ अपने परिवार के साथ इस आन्दोलन में उपस्थित थीं। छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इस आन्दोलन का हिस्सा बन रहे थे। सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों का ऐसा बेजोड़ आन्दोलन अभूतपूर्व था। आन्दोलन को जारी रखने के लिए लोग स्वेच्छा से चन्दा दे रहे थे।
इस बेजोड़ एकजुटता को देखकर शासन–प्रशासन के हाथ–पाँव फूल गये। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के उच्च अधिकारियों को मजबूरन रविवार को भी आफिस खोलकर आन्दोलनकारी सीएचओ से मिलने आना पड़ा। लेकिन सीएचओ की माँग मानने की जगह उन्होंने आन्दोलन के नेतृत्वकारी लोगों पर एफआईआर दर्ज कर दिया और उन पर तरह–तरह के दबाव बनाये गये जिसके चलते पाँच दिन बाद आन्दोलन पीछे हट गया। इस आन्दोलन के चलते ही सीएचओ की न्यूनतम वेतन 20 हजार रुपये से बढ़कर 25 हजार कर दिया गया। यह इस आन्दोलन की आंशिक जीत रही। इस आन्दोलन ने अनेक लोगों के भ्रम तोड़े। एकता में ही ताकत होती है इसका अनुभव इस आन्दोलन ने सभी सीएचओ को करा दिया। आंशिक सफलता ने ही उनमें अपने आन्दोलन को आगे बढ़ाने की हिम्मत और अनुभव भी दिया है।
–– सीएचओ टीम