रैपिड रेल के निर्माण के दौरान मजदूरों की मौत

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

–– एमएसएस, टीम

बीती 17 जुलाई को रात करीब दो से तीन बजे के बीच मेरठ के शॉप्रिक्स मॉल के पास दिल दहला देने वाला एक हादसा हो गया। यहाँ मेरठ–दिल्ली रैपिड रेल के निर्माणाधीन पुल का एक हिस्सा गिर गया, जिससे दिल्ली रोड पर भयंकर जाम लग गया। हमारी पहचान का एक साथी जो बीएड द्वितीय वर्ष का छात्र है और मेरठ की एक फैक्टरी में काम भी करता है, वह उसी दिन बीएड का पेपर देने गया था। उसने बताया कि जब वह दोपहर दो बजे अपने घर से कॉलेज की ओर निकला तो देखा कि मलियाना पुल से आगे की तरफ भयंकर जाम लगा हुआ था। उसने एक दुकान पर अपनी बाइक खड़ी की और पैदल ही परीक्षा केन्द्र पर पहुँचा। परीक्षा के बाद वापस निकला तो वापसी में भी जाम था। करीब सात बजे फैक्टरी में पहुँचकर काम शुरू किया। मालिक ने परीक्षा के बारे में पूछा और बताया कि दिल्ली रोड पर जाम इसलिए था क्योंकि रात रैपिड रेल का एक स्लैब गिर गया था। स्लैब के नीचे आठ मजदूर काम कर थे, जिसमें से 6 मजदूरों की उसी जगह दर्दनाक मौत हो गयी और दो मजदूर गम्भीर रूप से घायल होे गये। इस सूचना के साक्ष्य को जुटाने के लिए हमने छानबीन शुरू की।

हमारे साथी ने इस दुखद घटना की सूचना हमें दी। उसके चेहरे पर गुस्सा और बेचैनी साफ दिख रही थी। हमने घटना से जुड़ी जानकारी सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों पर खोजनी शुरू की। हिन्दुस्तान टाइम्स और एक अन्य ऑनलाइन मीडिया के अलावा यह खबर कहीं और नहीं छपी है। इन दोनों माध्यमों में भी केवल इतना दिया हुआ है कि रैपिड रेल के स्लैब नीचे गिरने से आठ लोग दब गये जिसमें 6 मजदूर गम्भीर रूप से घायल हैं। कहीं भी यह खबर नहीं थी कि 6 मजदूर मर गये। खबर देख यह साफ समझ में आ गया कि घटना को दबा दिया गया।

अगले दिन स्थानीय लोगों से पूछताछ की गयी। लोगों ने बेलाग–लपेट के 6 मजदूरों की मौत की खबर को सही बताया। कुछ मजदूरों का यह भी कहना था कि बात ज्यादा आगे न बढ़ जाये, इस डर से घटना को दबाया जा रहा है। इस घटना ने हमें झकझोर दिया। हम सोच रहे थे कि मजदूरों की मौत की खबर को दबाकर किसका फायदा होगा। इस मामले में न कोई एफआईआर हुई और न कोई कार्रवाई। येे मजदूर कहाँ से आये थे? कौन थे? न्यूज में इनके नाम के अलावा कोई डेटा नहीं है।

मजदूरों ने यह भी बताया हैं कि एक बार अंडर–ग्राउंड काम वाले हिस्से में टनल का कुछ हिस्सा धँस गया था और बहुत से मजदूर दब गये थे और कुछ गम्भीर रूप से घायल भी हुए थे। यह घटना न्यूज में इस तरह दी गयी कि मेरठ में रैपिड मेट्रो रेल में अंडर ग्राउंड काम के दौरान उसका कुछ हिस्सा धँस गया। इसमें जिक्र नहीं था कि कितने मजदूर घायल हुए या कितने मजदूर मरे?

वहाँ काम कर रहे मजदूरों का कहना है कि रैपिड मेट्रो रेल के ज्यादातर मजदूर ठेके पर हैं जिनके बारे में कोई भी जानकारी किसी रजिस्टर्ड में दर्ज नहीं होती। यहाँ आये दिन कोई न कोई घटना होती रहती है और ऐसी घटनाओं के शिकार जितने भी मजदूर हैं उनमें से ज्यादातर का कोई भी डेटा नहीं होता है। यही वजह है कि दुर्घटना होने पर कम्पनियाँ ठोस कार्रवाई से बच जाती हैं और मजदूरों को मुआवजा भी नहीं देती हैं।

यहाँ काम करने वाले ज्यादातर मजदूर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं। ठेकेदार मनमाने तरीके से मजदूरों को रखता है जिसका कोई लिखित विवरण नहीं होता और न ही उन्हें कोई सुरक्षा मिलती है और न ही उचित मजदूरी। पीएफ और ईएसआई का कोई मतलब ही नहीं। मजदूरों के मेहनत की खुली लूट की जा रही है। ऐसे में, इससे सीधा मुनाफा कमा रहे ठेकेदार और मालिक, जिन्हें खुली छूट मिली हुई है। क्या ये लोग मजदूरों के इस शोषण–उत्पीड़न को बन्द होने देंगे? नहीं, वे पूरी कोशिश करेगे कि यह लूट जारी रहे। मजदूरों को खुद आगे आना होगा और अपनी एकजुट ताकत के दम पर ऐसी हालत को बदलना होगा।

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