‘टाटा स्टील’ कम्पनी के खिलाफ मजदूरों का ऐतिहासिक आन्दोलन

07 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
देश के मजदूरों के संघर्ष का इतिहास बेमिसाल रहा है। अलग–अलग दौर में उन्होंने जबरदस्त संघर्षों के दम पर अपनी माँगों को मनवाया और अपने हितों के हिसाब से कानून में संशोधन करने के लिए शासक वर्ग को मजबूर कर दिया। आज हम इसी सिलसिले में यहाँ 100 साल पुराने मजदूर आन्दोलन का जिक्र करेंगे। यह आन्दोलन है–– सन 1920 का ‘टाटा स्टील’ कम्पनी के खिलाफ मजदूरों का ऐतिहासिक संघर्ष। यह आन्दोलन एक ऐसे पूँजीपति घराने के खिलाफ चलाया गया था जिसे देश में सबसे उदार हृदय वाला कहकर प्रचारित किया जाता है। इस आन्दोलन के दौरान लगभग 10 साल तक अनेक कुर्बानियों और लगातार संघर्षों के बाद मजदूरों ने संगठन बनाने का अधिकार और न्यूनतम मजदूरी की गारण्टी हासिल की थी। इस आन्दोलन ने मजदूरों को शिक्षित किया कि संगठित होकर लड़े बिना मालिक से कोई भी अधिकार हासिल नहीं किया जा सकता है। इस आन्दोलन की व्यापकता एक समय इतनी बढ़ गयी थी कि महात्मा गाँधी और सुभाषचंद्र बोस जैसे प्रतिष्ठित लोगों को भी इसमें मध्यस्तता करने के लिए आना पड़ा। यह आन्दोलन मजदूरों के शुरुआती संघर्षों की गाथा बताता है। आज मजदूर अपने इतिहास को भूलने के चलते अनेक भ्रमों का शिकार हैं। इस आन्दोलन के बारे में जानने के बाद हम ऐसे भ्रमों से सावधान हो जायेंगे। यह बात पहले विश्व युद्ध के समय की है जब देश में अंग्रेजों का शासन था। विश्व युद्ध के साजो–सामान की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अंग्रेजों ने भारत में उद्योगों को प्रोत्साहन दिया। इसके चलते उद्योगों का तेजी से विकास हुआ। इससे देशी और विदेशी मालिक तबका मालामाल हो रहा था। इस विकास के मायने मजदूरों और मालिकों के लिए अलग–अलग थे। इन उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों की जिन्दगी और काम के हालात बद से बदतर होते जा रहे थे। उन पर काम का बोझ कहीं ज्यादा बढ़ गया। अंग्रेज सरकार ने युद्धकाल का बहाना बनाकर उन पर कई आपातकालीन काठोर नियम थोप दिये। मजदूरों से दो से तीन पारियों में जबरन काम लिया जाने लगा। उनके सभी अधिकारों और हकों को खत्म कर दिया गया। रोज 10 से 12 घण्टे काम करने का नियम बना दिया गया। सप्ताह में मिलने वाली एक दिन की छुट्टी भी खत्म कर दी गयी। दिन–रात काम लेने के चलते मजदूरों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। दुर्घटनाओं में अभूतपूर्व इजाफा हो गया। काम करते समय मजदूरों के हताहत होने की घटना बहुत बढ़ गयी थी। मजदूरों ने अपनी नरक जैसी हालत को शान्ति से स्वीकारने की जगह संघर्ष का बिगुल बजाया। बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, कानपुर समेत देश के अलग–अलग हिस्सों में मजदूर आन्दोलनों ने तेजी पकड़ ली। शुरुआत में इन आन्दोलनों में शामिल होने वाले मजदूरों की संख्या कम थी। लेकिन मजदूर जल्द ही अपनी सामूहिक ताकत को पहचान गये। इसके चलते कुछ सालों में ही इन हड़तालों में हिस्सा लेने वाले मजदूरों की संख्या लाखों तक पहुँच गयी। यह देश का पहला संगठित मजदूर आन्दोलन था। इसी समय जमशेदपुर स्थित ‘टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी लिमिटेड’ यानी टिस्को में भी मजदूरों ने बेमिसाल आन्दोलन किये थे। युद्ध के समय टाटा स्टील कम्पनी भी उभर कर सामने आयी। इसने युद्ध में अंग्रेजों को लाखों टन लोहे और स्टील की आपूर्ति की। इस विशाल उत्पादन के पीछे हजारों मजदूरों की दिन–रात की कड़ी मेहनत थी। जमशेदपुर के कारखाने में ही लगभग 30 हजार से ज्यादा मजदूर दिन–रात हाडतोड़ मेहनत करते थे। उनकी मजदूरी इतनी कम थी कि उन्हें कम्पनी के बाहर झोपड़ी डालकर रहने को मजबूर होना पड़ता था। काम के दौरान अंग्रेज अधिकारी अक्सर उन्हें प्रताड़ित करते थे। उन्हें गोरी नस्लवाद का भी शिकार होना पड़ता था। लोहे को पिघलाने के लिए बड़ी–बड़ी भट्टियाँ बनी हुई थीं जिनमें किसी खास सुरक्षा के बिना उनसे काम लिया जाता था। अक्सर इनमें गिरकर मजदूरों की दर्दनाक मौत हो जाती थी। एक तरफ टाटा के मुनाफे में दिन–दुगुनी, रात–चैगुनी बढ़ोतरी हो रही थी। कुछ ही समय में मुनाफा 200 प्रतिशत तक बढ़ गया था। वहीं दूसरी तरफ इस अकूत मुनाफे को पैदा करने वाले मजदूरों की हालत बद से बदतर हो चली थी। एक तरफ काम का बोझ लगातार बढ़ाया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ विश्व युद्ध के चलते जीवन के जरूरी रोजमर्रा के सामानों के दाम अचानक बढ़ा दिये गये थे। खुद अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारियों का मानना था कि महँगाई के अनुपात में मजदूरी इस कदर घट गयी कि मजदूरों में भुखमरी की हालत पैदा हो गयी। 1917 में टिस्को प्रबन्धन ने मजदूरी में महज 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी जबकि केवल खाद्य पदार्थों की कीमत ही 100 फीसदी तक बढ़ चुकी थी। इस स्थिति में मजदूरों के सामने संगठित होकर लड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था और ऐसा ही हुआ। 24 फरवरी 1920 की सुबह आखिरकार मजदूरों का गुस्सा फूट पड़ा। ब्लैक स्मिथ और मशीन शॉप के कुछ कर्मचारियों ने बिना किसी सूचना के शॉप से बाहर आकर प्रबन्धन के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। इसके कुछ देर बाद ही अन्य मजदूर भी कम्पनी से बाहर निकल आये और मजदूरी बढ़ाने, काम के घण्टे कम करने जैसी माँगों को लेकर धरने पर बैठ गये। उस समय मजदूरों का दैनिक वेतन महज 4 से 5 आना था, जिसमें एक सप्ताह का खर्च चलाना भी बहुत मुश्किल काम था। मजदूरों के लिए संघर्ष का यह पहला अनुभव था। उनके पास अपनी लड़ाई लड़ने की न तो कोई योजना थी और न ही अपना कोई संगठन। इसके चलते मालिक शुरू से ही मजदूरों पर हावी रहा। कम्पनी प्रबन्धन ने अंग्रेज सरकार के साथ मिलकर मजदूरों के इस शान्तिपूर्ण धरने को कुचलने की योजना बनायी। बड़ी संख्या में कम्पनी के बाहर पुलिस बल तैनात किया गया जिसमें घुड़सवार पुलिसवाले भी थे। लेकिन मजदूर बिना डरे अपनी माँगों पर अड़े रहे। आन्दोलन को तोड़ने के लिए 15 मार्च 1920 को निहत्थे मजदूरों पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया और गोली तक चलायी जिसमें 5 मजदूर शहीद  हो गये और 20 से ज्यादा गम्भीर रूप से घायल हुए। टाटा का हाथ मजदूरों के खून से रंग गया। उसने इस आन्दोलन को तोड़कर जश्न मनाया। मजदूरों ने इस शोक की घड़ी में अपने साथियों को श्रद्धांजलि दी और अपने जायज अधिकारों को प्राप्त न करने तक संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया। मजदूरों का यह पहला संघर्ष सफल नहीं रहा। आन्दोलन में शामिल मजदूरों के साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया गया। अनेक मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया गया। मजदूरों के खून से सने हाथ वाले इसी टाटा घराने को आज दरियादिल और उधार कहकर प्रचारित किया जाता है। हाल ही में रतन टाटा की मौत पर आँसू बहाने वाले भी देखे गये। मजदूरों ने अपने पहले संघर्ष से कई सबक सीखे। वे समझ चुके थे कि अपना संगठन बनाये बिना वे प्रबन्धन के सामने टिक नहीं सकते। यह वह समय था जब रेलवे कर्मचारियों और सूती मिल के मजदूरों ने अपना संगठन बनाकर अपने कुछ अधिकारों को हासिल कर लिया था। 1918 में मद्रास लेबर यूनियन तथा 1919 में अन्तरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन यआइएलओद्ध का गठन हो चुका था। देश के अन्य उद्योगों में लगे मजदूरों को भी यह समझ में आने लगा था कि बिना संगठन बनाये अपने अधिकारों को हासिल करना सम्भव नहीं है। लेकिन प्रबन्धन मजदूरों के संगठन को कानूनी मान्यता नहीं देता था। अपनी पुरानी गलतियों से सीखते हुए मजदूरों ने 1922 के सितम्बर महीने में फिर से हड़ताल शुरू कर दी। मजदूरों ने प्रबन्धन के सामने अपनी माँगें रखीं जिनमें यूनियन को मान्यता, आठ घण्टे की जनरल पारी, ओवरटाइम की अनिवार्यता को खत्म करना, बर्खास्त कर्मचारियों की पुन% काम पर बहाली आदि माँगें शामिल थीं। 19 सितम्बर तक कम्पनी में पूर्ण हड़ताल हो चुकी थी। एक महीने तक मजदूर हड़ताल पर रहे, लेकिन प्रबन्धन मजदूरों की एक भी माँग मानने को तैयार नहीं था। प्रबन्धन ने मजदूरों को झूठे आश्वासन देने चाहे पर मजदूर उनकी बातों में नहीं आये। मजदूरों की कुछ माँगें मान ली गयीं। लेकिन बाकी माँगों के लिए प्रबन्धन और मजदूरों के बीच लगभग 2 सालों तक तनातनी चलती रही। आखिरकार प्रबन्धन ने मजदूरों की इस लम्बी हड़ताल को तोड़ने के लिए महात्मा गाँधी का सहारा लिया। मजदूरों का प्रतिनिधि बनकर गाँधीजी जमशेदपुर आये। कम्पनी प्रबन्धन ने उनका भव्य स्वागत किया। इस दौरान मालिक टाटा ने गाँधी को एक सन्दूक और पर्स भी भेंट किया। गाँधीजी ने मजदूरों के सामने टाटा की दरियादिली और उदार व्यवहार की खूब तारीफ की। उन्होंने मजदूरों को यह विश्वास दिलाया कि टाटा देश का निर्माण कर रहा है। इस निर्माण के लिए थोड़ा कष्ट आपको भी उठाना पड़ेगा। कुछ मजदूर गाँधीजी की बातों में आ गये और उन्होंने प्रबन्धन पर विश्वास किया कि जल्द ही उनको उनके जायज अधिकार मिल जाएँगे। लेकिन मजदूरों का भ्रम जल्द ही दूर हो गया। कम्पनी प्रबन्धन ने अपनी पुरानी नीति ही जारी रखी। वह मजदूरों के निर्मम शोषण पर मुनाफे के रोज नये पहाड़ खड़े करता रहा। जिस समय मजदूर छँटनी, वेतन कटौती, काम के अतिरिक्त बोझ और अन्य जरूरी ज्वलन्त समस्याओं से जूझ रहे थे, उस समय मजदूरों के मसीहा बनने वाले मालिक द्वारा संचालित लेबर एसोसिएशन और गाँधीजी जैसे प्रतिष्ठित लोग मजदूरों के प्रतिनिधित्व के नाम पर प्रबन्धकों के साथ मेल मिलाप में व्यस्त थे। उनका काम मजदूरों के संघर्षों को कमजोर करना था। वे मजदूरों को भ्रमित करने का काम कर रहे थे। मजदूरों ने अपने संघर्ष के दौरान यह अनुभव हासिल किया कि मालिकों के क्रूर हृदय के परिवर्तन की गाँधीजी की सभी बातें बकवास और उन्हें छलने वाली हैं। उनके अधिकारों के लिए सच्ची लड़ाई केवल उनका जुझारू संगठन लड़ सकता है। वह मालिक हित में खड़ी राजनैतिक पार्टियों और उनके नेताओं की चाल भी समझने लगे। किसी अन्य विकल्प के अभाव में 17 फरवरी 1928 को तीसरी बार फिर से मजदूर हड़ताल पर उतर आये। इस हड़ताल की शुरुआत विद्युतचालित क्रेन के चालकों ने की जिसके चलते कम्पनी में माल ढोने का काम ठप पड़ गया। कुछ ही दिन बाद रेल तैयार करने वाले मजदूरों ने भी काम रोक दिया जिससे रेल पटरियाँ बनाने और उन्हें भेजने का काम भी रुक गया। देखते ही देखते कोयला भट्टी, स्टील मिल, ब्वायलर प्लांट समेत सफाई कर्मचारियों ने भी अपना काम बन्द कर दिया। लगभग 30 हजार मजदूर हड़ताल में शामिल हो गये। कम्पनी पूरी तरह ठप्प पड़ गयी। मजदूरों ने वेतन बढ़ोतरी समेत 15 मजदूरों की एक कमेटी के गठन की माँग की जो किसी भी मजदूर को निलम्बित या बर्खास्त करने से पहले विचार–विमर्श करेगी। कम्पनी मजदूरों की एक भी माँग मानने की जगह मजदूर नेताओं को हटाने पर आमादा हो गयी। लेकिन मजदूर भी डटे रहे। इस दौरान गतिरोध की स्थिति में सुभाषचंद्र बोस को मध्यस्तता करने के लिए बुलाया गया। 3 सितम्बर को आखिरकार प्रबन्धकों के साथ समझौता हुआ। हड़ताल में बर्खास्त मजदूरों को नौकरी पर बहाली, नगण्य वेतन वृद्धि , हड़ताल में शामिल होने पर कोई उत्पीड़न नहीं और एक माह का अग्रिम वेतन देने पर समझौता हुआ। 6 माह की लम्बी हड़ताल के बाद आखिरकार 13 सितम्बर को मजदूर काम पर लौटे। इस समझौते के बारे में सुभाषचन्द्र बोस ने लिखा, फ्मजदूरों और प्रबन्धन के बीच एक समझौता तो हुआ, लेकिन अधिकतम प्रबन्धन के पक्ष में।” 10 साल तक संघर्ष करने के बाद मजदूरों को कुछ अधिकार हासिल हुए। इन्हीं मजदूरों के खून–पसीने से टाटा घराना मालामाल हुआ है। बीते अक्टूबर महीने में इसी टाटा घराने के एक वृद्ध उद्योगपति की मृत्यु हुई। इस पर सरकार ने राष्ट्रीय शोक मनाया। कई दिनों तक अखबारों–खबरों में उनकी उदारता और जिन्दादिली के पाठ पढ़ाये गये। नेताओं, खिलाड़ियों और फिल्मी अभिनेताओं ने भी शोक जताया। अपने इतिहास से कटे होने के चलते मजदूर भी अक्सर इस तरह के प्रचार तंत्र का शिकार हो जाते हैं। उनमें यह भ्रम पैदा हो जाता है कि मालिक पूँजीपति वर्ग ही देश का निर्माता है, उसी के चलते मजदूरों के घर आबाद होते हैं। लेकिन हमने देखा कि इसी पूँजीपति की कम्पनी में मजदूरों के शोषण–उत्पीड़न का एक लम्बा इतिहास रहा है। मूलभूत अधिकारों के लिए भी मजदूरों को सालों–साल संघर्ष करना पड़ा और जान कुर्बानी देनी पड़ी। इतिहास हमें यही सिखाता है कि बिना लड़े पूँजीपतियों के रहमोकरम से मजदूरों को कभी कोई अधिकार नहीं मिला है। हमें इस वर्गीय सच्चाई को अपनी आँखों से कभी ओझल नहीं होने देना चाहिए कि कमेरा और लुटेरा वर्गों में कभी मेल–मिलाप सम्भव नहीं है। उनके बीच संघर्ष ही अटल सत्य है। -- मोहित पुण्डीर
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