भारत के मजदूर वर्ग के लिए ‘पेरिस कम्यून’ के सबक
आज भारत के मजदूरों की हालत पर नजर डालने से हमें भयंकर शोषण, गरीबी और अभाव नजर आता है। देश में आत्महत्या करने वाला हर चौथा व्यक्ति दिहाड़ी मजदूर है। सुबह से शाम तक जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी करोड़ों मेहनतकशों की हालत बहुत खराब है। वहीं दूसरी तरफ मुट्ठीभर धन्नासेठ, व्यापारी और पूँजीपति बिना किसी मेहनत के दिन दोगुनी रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं, रोज नोटों के नये–नये महल खड़े कर रहे हैं। इससे साफ है कि दुनिया दो हिस्सों में बँटी हुई है। एक तरफ करोड़ों मेहनतकश आबादी, मजदूर वर्ग और दूसरी तरफ मुट्ठीभर धनपशु, पूँजीपति वर्ग।
क्या मजदूरों की समस्याओं का कोई अन्त है? अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो इसका जवाब हमें ‘हाँ’ में मिलता है। यहाँ हम पेरिस कम्यून के उन जाबांज, साहसी और कर्मठ मजदूरों की बात करेंगे जिन्होंने एकजुट होकर अपने भाग्य को बदल दिया था और मजदूरों का पहला राज्य कायम किया था। इतिहास में यह घटना ‘पेरिस कम्यून’ के नाम से अमर है। अपनी इस वीरगाथा से आज का मजदूर वर्ग अनजान है। आगे हम मजदूरों के इसी पहले राज्य की अचरज से भर देनेवाली सफलताओं और शिक्षाओं पर चर्चा करेंगे।
भारत से लगभग साढ़े छ: हजार किलोमीटर दूर अंग्रेजों का देश इंग्लैण्ड है, जिनकी गुलामी से लड़कर हमने आजादी हासिल की थी। इंग्लैण्ड के पड़ोस में अजूबे कारनामों वाला देश फ्रांस है। आज से लगभग 150 साल पहले 18 मार्च 1871 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में पहली बार मजदूरों ने पूँजीपतियों की सरकार को हटाकर अपनी सरकार बना ली थी। उन्होंने अपनी सत्ता लड़कर हासिल की थी। दुनिया के इतिहास में यह पहली बार हुआ था कि मजदूरों ने अपनी सरकार बनायी थी।
मजदूरों की यह पहली सरकार महज 72 दिनों तक चली, लेकिन इन 72 दिनों में मजदूरों ने इतने बड़े–बड़े कारनामे कर दिखाये कि वे इतिहास में अमर हैं। उस दौर में यूरोप के कल–कारखानों का तेजी से विकास हो रहा था। भाप की अचरज भरी ताकत की खोज हो चुकी थी। इंग्लैण्ड के मानचेस्टर, लिओं जैसे बड़े शहर उद्योगों का केन्द्र बनकर उभर रहे थे। इस औद्योगीकरण के कारण इंग्लैण्ड, फ्रांस समेत यूरोप में दो वर्ग बन गये। एक वर्ग पूँजीपतियों का था, जो कारखानों का मालिक था। दूसरा वर्ग इन कारखानों में काम करने वाले मजदूरों का था।
मजदूर वर्ग के पास अपनी श्रम–शक्ति बेचने के अलावा जीविका का कोई दूसरा साधन नहीं था। मजदूर वर्ग संख्या में बहुत अधिक था। इनकी बेबसी का फायदा उठाकर पूँजीपति बेहद कम मजदूरी में इन्हें दिन–रात कारखानों में खटने को मजबूर करते थे। सप्ताह में बिना किसी छुट्टी के इनसे 16 से 18 घंटे तक जबरदस्ती काम लिया जाता था। इनमें बड़ी संख्या महिला मजदूरों और बच्चों की होती थी क्योंकि वह बेहद सस्ते में उपलब्ध थे। सुबह से शाम तक कारखानों में ही खटने के कारण महीनो–महीनों तक मजदूरों को धूप तक नसीब नहीं होती थी। इस कारण बेहद कम उम्र में बीमारियों के शिकार होकर कितने ही मजदूर मर जाते थे। टेक्सटाइल मिलों में काम करने वाले मजदूर अक्सर अन्धाधुन्ध रफ्तार से चलने वाली मशीनों की चपेट में आ जाते थे। लगभग हर मजदूर किसी–न–किसी चोट का शिकार जरूर होता था। मजदूरों के इस निर्मम शोषण पर मुट्ठीभर पूँजीपतियों की सम्पत्ति के पहाड़ खड़े हो रहे थे।
आपको लग रहा होगा कि ऐसी हालत तो आज भारत में भी है। इसीलिए यह समझ लेना जरूरी है कि पेरिस के मजदूरों ने अपनी समस्याओं का समाधान जिस तरीके से किया, वह कितना महत्वपूर्ण है।
इंग्लैण्ड और फ्रांस के मजदूरों ने अपनी इस नारकीय हालत से बाहर निकलने के लिए जल्दी ही संघर्ष का बिगुल बजा दिया था। लेकिन शुरुआत में उनकी लड़ाई अकेले–अकेले या फिर एक–दो उद्योगों तक ही सीमित थी। संघर्षों के दौरान मजदूर अपनी संगठित ताकत को पहचानने लगे थे। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के मजदूर अपने शोषण के खिलाफ संघर्ष को ज्यादा से ज्यादा एकजुट होकर चलाने लगे थे। इसी का नतीजा यह था कि 1865 में पहली बार मजदूरों का अन्तरराष्ट्रीय संगठन बना जिसे ‘प्रथम इंटरनेशनल’ नाम से जाना जाता है। इसने यूरोप में मजदूर आन्दोलन को बहुत प्रभावित किया और पूँजीपतियों को मजदूरों की संगठित ताकत का एहसास कराया। इसी दौर में ‘पेरिस कम्यून’ का भी जन्म हुआ।
जुलाई 1870 में फ्रांस और प्रशा के बीच युद्ध छिड़ गया था। दोनों देशों की सरकारें अपने फायदे के लिए आम जनता को युद्ध में झोंक रही थीं। सितम्बर 1870 में फ्रांस इस युद्ध में हार गया। इस हार के बाद फ्रांस की राजधानी पेरिस में पूँजीपतियों ने शासन अपने हाथ में ले लिया। यह नयी सरकार मजदूरों की उभरती ताकत से भी डर रही थी। दरअसल, युद्ध के दौरान बने सैन्यदल यानी ‘नेशनल गार्ड्स’ में मुख्यत: मजदूर ही शामिल थे। इन मजदूरों के पास तोपें और भारी मात्रा में हथियार थे। फ्रांस का शासक थियेर मजदूरों से उन हथियारों को छीनना चाहता था। फ्रांस का पूरा शासन मजदूरों के निर्मम शोषण पर टिका हुआ था। उसे डर था कि कहीं मजदूर इन हथियारों के दम पर अपनी आजादी की लड़ाई न शुरू कर दें।
1 मार्च 1871 को थियेर ने अपनी फौजों को हुक्म दिया कि वे पेरिस के मजदूरों से सारे हथियार छीन लें। लेकिन मजदूर यह समझ चुके थे कि अगर उनसे यह हथियार चले गये तो वह अपनी मुक्ति की लड़ाई में शासक वर्ग के सामने टिक नहीं पाएँगे। इसलिए शहर के सभी मजदूर अपने हथियारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतर आये। मजदूरों के हौसलों को देखकर सेना का एक बड़ा हिस्सा भी उनके समर्थन में आ गया।
फ्रांस में मजदूर और शासक वर्ग आमने–सामने थे। मजदूरों पर गोलियाँ चलायी गयीं लेकिन उन्होंने भी बदले में मोर्चा सम्हाला। मजदूरों की जवाबी कार्रवाई में थियेर की सेना बुरी तरह हार गयी और उसके दो बड़े सैनिक जनरल मार दिये गये। मजदूरों की ताकत को थियेर ने भाप लिया था और वह डरकर वहाँ से भाग गया। वह दिन इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। पहली बार मजदूरों ने किसी एक प्रदेश में शासक वर्ग को हटाकर शोषण के खात्में की नींव रख दी थी। इस घटना से एक तरफ पूरी दुनिया के मजदूरों में नयी उम्मीद पैदा हुई तो वहीं दुनिया भर के लुटेरे शासक थर–थर काँपने लगे।
पेरिस में अब पुराने शासन की पुलिस–फौज सहित पूरी नौकरशाही को खत्म कर दिया गया था। शासन चलाने की जिम्मेदारी अब मजदूरों पर थी। दुनिया की निगाहें पेरिस के मजदूरों पर टिकी हुई थीं। मजदूरों ने सभी मेहनतकश लोगों की भागेदारी से नये शासन की नींव रखी। इसके लिए नगर भवन के सामने एक आम सभा का आयोजन किया गया जिसमें बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ, पुरुष सबने बढ़–चढ़कर हिस्सा लिया। इस सभा में मजदूरों के कम्यून की घोषणा हुई। इस कम्यून ने थोड़े ही समय में अनेक कारनामे कर दिखाये। इसने इतिहास में पहली बार सभी पुरुषों को मताधिकार मुहैया कराया। महिलाओं को मताधिकार देने की बात उठायी जा रही थी। जनसमुदाय अपने भाग्य का वास्तविक स्वामी बन गया था।
अलग–अलग स्तर पर पेरिस में जनता के अनेक संगठनों का निर्माण किया गया। इन संगठनों के जरिये हर पेशे से जुड़े लोग सरकारी मामलों में सीधा हस्तक्षेप कर सकते थे। पेरिस में हर तरफ बैठकों और गोष्ठियों का सिलसिला चलता रहता था। इनमें हर रोज हजारों लोग हिस्सा लेते थे। वे अपनी माँगों को पत्र और लेख के जरिये कम्यून तक पहुँचाते थे। कम्यून जो अगुआ मजदूरों का कार्यकारी संगठन था, वह हर रोज जनता से मिलने वाले इन पत्रों पर गम्भीर विचार–विमर्श करता और उनकी जरूरी सलाहों पर अमल करता था। पेरिस में उस समय मेहनतकश जनता का अपना राज था जिसमें उनकी अवहेलना नहीं होती थी, बल्कि उनके सच्चे प्रतिनिधियों द्वारा राज्य चलाया जा रहा था।
आज हम अपने देश के उन चुनावी नेताओं की जिन्दगी को देखें जो मेहनतकश जनता का प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं, उनकी कथनी–करनी में भारी अन्तर है। इसके साथ ही जनता की जिन्दगी और उनकी जिन्दगी में जमीन–आसमान का अन्तर है। नेता बड़े–बड़े बंगले में रहते हैं, महँगी कारों में घूमते हैं और उनके बच्चे विदेशों में महँगी शिक्षा हासिल करते हैं। वहीं दूसरी ओर मेहनतकश जनता अपनी पूरी जिन्दगी दो जून की रोटी के जुगाड़ में जीतोड़ मेहनत करती रहती है। लेकिन ‘पेरिस कम्यून’ में जनता के प्रतिनिधियों के पास इस तरह का कोई विशेषाधिकार नहीं था। उनकी जिन्दगी भी आम नागरिकों जैसी थी। मजदूरों के इस राज्य में मजदूरों और बु(िजीवियों के बीच की खाई को भी कम किया गया। पदाधिकारियों के लिए ऊँची तानख्वाओं की व्यवस्था समाप्त कर दी गयी थी। राज्य के नेता और एक कुशल मजदूर की तनख्वाह बराबर कर दी गयी थी। सबके लिए सम्मानजनक रोजगार और उचित वेतन तय किया गया था। शिक्षा के द्वार सबके लिए खुल गये थे।
जो काम पूँजीवादी सरकारें 100 सालों में भी नहीं कर सकी थीं, मजदूरों की सरकार ने वह कारनामे कुछ महीनों में कर दिखाये थे। पूरी दुनिया के मेहनतकश इस छोटे से राज्य में पूरी मानवता की मुक्ति की राह देख रहे थे। मजदूरों की इन सफलताओं से यूरोप के सारे पूँजीवादी शासक भयभीत हो रहे थे जो हर तरह से अपने देश के मजदूरों को लूटते–पीटते थे। उन्हें डर था कि कहीं उनके देश के मजदूर भी पेरिस के मजदूरों की तरह उन्हें भगाकर अपना राज न कायम कर लें।
जिस समय पेरिस के मजदूर अपने राज्य को बेहतरीन बनाने के लिए कई शानदार प्रयोग कर रहे थे, उसी समय विदेश में थियेर और दूसरे देशों के शासक अपने बीच के सारे मतभेद भुलाकर किसी भी कीमत पर इन जाँबाज मजदूरों के राज्य को कुचलने की योजना बना रहे थे। आखिरकार 1871 की मई आते–आते थियेर के सैनिकों ने पेरिस पर हमला बोल दिया। इस काम में दुश्मन देश प्रशा की सेना ने भी थियेर की मदद की। 21 मई को यह सेना पेरिस में घुसने में कामयाब हुई। शहर की सड़कों, चौराहों, मजदूर बस्तियों में हर जगह दोनों तरफ से घमासान युद्ध हो रहा था। बड़े पैमाने पर मजदूर पुरुषों और महिलाओं ने शहर की अलग–अलग जगहों पर दुश्मनों से लोहा लिया। आखिरकार, 8 दिनों के बहादुराना सघर्ष के बाद पेरिस के मजदूर इस युद्ध में हार गये। लगभग 30 हजार मजदूर कम्यून की रक्षा करते हुए शहीद हुए।
72 दिनों के अपने शासन में मजदूरों ने अमिट इतिहास रच दिया था। इसने मजदूर आन्दोलन को बेहद जरूरी शिक्षाएँ और सबक दिये। पेरिस के भोले–भाले मजदूर नेता मक्कार थियेर की चालबाजियों को समझ न सके। मजदूर नेता उसकी शान्ति–वार्ताओं के झूठे झाँसे में आ गये। इससे वे समय रहते उचित तैयारी नहीं कर पाये और हार गये।
उस समय के एक महान मजदूर नेता और विचारक ने कहा था कि फ्यदि कम्यून को नष्ट भी कर दिया गया, तब भी संघर्ष सिर्फ स्थगित होगा। कम्यून के सिद्धान्त शाश्वत और अनश्वर हैं, जब तक मजदूर वर्ग मुक्त नहीं हो जाता, तब तक ये सिद्धान्त बार–बार प्रकट होते रहेंगे।”
पेरिस कम्यून के लगभग 50 साल बाद उससे प्रेरणा लेते हुए रूस के मजदूरों ने अत्याचारी और निरंकुश शासक जार की सरकार को उखाड़कर फेंक दिया। उसके बाद उन्होंने रूस के किसानों के साथ मिलकर पूँजीपतियों को हराया और अपना राज कायम किया। मजदूरों–किसानों के इस राज को समाजवादी सोवियत रूस के नाम से जाना जाता है। आज रूस पूँजीवादी रास्ते पर चल पड़ा है। लेकिन समाजवादी रूस के कारनामे आज भी अमर है। इसलिए आज भी दुनिया भर के मजदूर रूस के समाजवाद से प्यार करते हैं, जबकि दुनिया भर के पूँजीपति उससे नफरत करते हैं। उसके बारे में सुनकर ही डर के मारे उनकी घिग्घी बँध जाती है। वे आज भी सोवियत रूस को पानी पी–पीकर कोसते हैं और मनभर गाली देते हैं। पूँजीपतियों की सरकार और उनका मीडिया लगातार सोवियत रूस को बदनाम करते हैं, वे नहीं चाहते कि उनके देश के मजदूर भी सोवियत रूस की तरह सरकार की ताकत अपने हाथ में ले लें।
दुनिया जानती है कि समाजवादी रूस की प्रेरणा और सहयोग से ही हमारे देश के क्रान्तिकारी अंग्रेजों को भगाने में सफल हो पाये थे। आज समाजवादी रूस और पेरिस कम्यून भारत के मजदूरों को संघर्ष की प्रेरणा दे रहे हैं। मजदूर वर्ग की मुक्ति का रास्ता पेरिस कम्यून से होकर जाता है। इसलिए मजदूरों को चाहिए कि वह उससे सही शिक्षा ग्रहण करें।
आज भारत के मजदूर अपनी मजदूर पहचान को भुलाकर जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र आदि की नकली पहचान में फँसा दिये गये हैं। शासक वर्ग सचेत रूप से समय–समय पर मजदूरों के बीच की खाई को बढ़ाने का प्रयास करता रहता है। जब तक भारत के मजदूर अपनी मजदूर पहचान को अपनाकर खुद को संगठित करके पेरिस कम्यून और सोवियत रूस के मजदूरों की तरह संघर्ष का रास्ता नहीं अपनायेंगे, तब तक उनकी मुक्ति सम्भव नहीं है।