150 साल पहले शुरू हुआ था भारत का मजदूर आन्दोलन
आज मजदूर वर्ग अपने इतिहास के संघर्षों को भूलता जा रहा है। यही वजह है कि उसके लड़ने के जज्बे में कमी आयी है और उसकी एकता कमजोर पड़ गयी है। क्या अपने इतिहास से कटकर मजदूर वर्ग अपनी लड़ाई में जीत हासिल कर सकता है? नहीं। अपने इतिहास को भूलने जानेवाले मजदूर की हालत एक कटी पतंग जैसी हो जाती है। वह तमाम दुख झेलता हुआ, खुद में घुटता रहता है, लेकिन अपनी समस्याओं से बाहर नहीं निकल सकता। कुछ लोग सवाल करते हैं कि हम अपना इतिहास जानकर क्या करेंगे। यह तो वही बात हुई कि कोई अपने बाप–दादा को भूल जाये, अपनी जड़ों को भूल जाये, जैसे वह आसमान से आ टपका हो। जिसका इतिहास नहीं होता, उसका कोई भविष्य नहीं होता। अगर मजदूर वर्ग अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहता है तो उसे अपने इतिहास से परिचित होना होगा और उससे जरूरी सबक सीखने होंगे।
इस लेख के जरिये हम मजदूरों के संघर्ष की परम्परा से परिचित होंगे। इस लेख में देश के शुरुआती उद्योगों के विकास से लेकर सन 1900 तक हुए प्रमुख मजदूर संघर्षों की दास्तान पेश की गयी है।
भारत में 1853 में रेल बिछाने के समय से आधुनिक उद्योगों की शुरुआत हुई। इसी दौरान बिहार और बंगाल में खदानों से कोयला निकाला जाने लगा। इसी के साथ कलकत्ता, मद्रास, मुम्बई और सूरत जैसे बड़े शहरों में जूट और कपास की आधुनिक मिलों का विकास हुआ। इन कारखानों में काम करने वाले अधिकतर मजदूर पहले खेतिहर बँधुआ मजदूर थे, साथ ही बड़े पैमाने पर दलित, आदिवासी समुदायों से आने वाले लोग थे। इन्हें आशा थी कि इन उद्योगों के विकास के साथ इनकी जिन्दगी में भी खुशहाली आएगी, लेकिन इनकी जिन्दगी बद से बदतर ही होती गयी।
इन कारखानों में काम करने का कोई नियम नहीं था। छोटे–छोटे बच्चे, महिलाएँ, बूढ़े और वयस्क मजदूर इन कारखानों में दिन–रात काम करते थे। हफ्ते में एक दिन की भी छुट्टी उन्हें नहीं दी जाती थी, छुट्टी करने पर बेहिसाब जुर्माना लगा दिया जाता था। इन्हें बेहद नरकीय हालत में काम करना पड़ता था। काम के दौरान किसी भी तरह की सुरक्षा के अभाव में दुर्घटना से किसी–न–किसी मजदूर की मौत होना रोज की बात थी। यहाँ तक कि बिना रुके छोटे–छोटे बच्चों से 14 से 16 घण्टों तक काम लिया जाता था। मजदूरों को खाना खाने तक का भी समय नहीं दिया जाता था।
कपड़ा उद्योग में काम करने वाले मजदूरों को बेहद कम रोशनी में काम करना पड़ता था। इसके चलते कुछ ही सालों में वे अपनी आँखों की रोशनी खो देते थे। बच्चे अपना बचपन भूल गये थे और उद्योगों के गुलाम बन चुके थे। मजदूर बेहद तंग बस्तियों में छोटी–छोटी झुग्गियों में रहते थे। एक झुग्गी में तीन से चार परिवारों को रहने के लिए मजबूर होना पड़ता था। वहीं दूसरी तरफ इन मजदूरों के निर्मम शोषण–उत्पीड़न से पैदा हुए मुनाफे पर देशी–विदेशी दोनों ही मालिक अÕयाशी भरी जिन्दगी जी रहे थे। वह दिन रात इसी प्रयास में लगे थे कि कैसे मजदूरों के खून की एक–एक बून्द को मुनाफे में बदल सकें।
शुरुआत से ही अपनी बदतर जिन्दगी के खिलाफ मजदूरों ने संघर्ष का बिगुल बजा दिया था। लेकिन अभी मजदूर वर्ग अपनी संगठित ताकत से अनजान थे। अधिकतर हड़तालें कारखाने के किसी एक महकमे तक ही सिमट कर रह जाती थीं। मजदूर हड़ताल तो करते थे लेकिन मालिकों के झाँसे में आकर अपनी हड़ताल वापस ले लेते थे। इन छिटपुट संघर्षों से मजदूरों का गुस्सा तो फूट रहा था लेकिन उसकी जिन्दगी में कोई बदलाव नहीं आ रहा था।
1862 में पहली बार मजदूरों का एक संगठित आन्दोलन हुआ। यह आन्दोलन हावड़ा रेलवे स्टेशन पर काम करने वाले कर्मचारियों ने शुरू किया था। दरअसल, इन रेलवे कर्मचारियों से 12 से 14 घंटे तक काम लिया जाता था। उन्होंने पहली बार 8 घंटे के कार्यदिवस का नारा दिया। यह वह दौर था जब पूरी दुनिया के मजदूर अपने हकों की लड़ाई लड़ रहे थे। अमरीका के जाँबाज मजदूरों ने 20 साल बाद 8 घंटे काम के इस नारे को पूरी दुनिया में बुलन्द किया। काम के घंटे घटाने और काम की स्थिति में बदलाव के लेकर यह पहला बड़ा आन्दोलन था। अन्य उद्योगों में लगे मजदूरों ने इस आन्दोलन से प्रेरणा ली। मजदूरों की सामूहिक चेतना विकसित होने के साथ–साथ उनके आन्दोलन भी मजबूत हो रहे थे।
मजदूरों की अमानवीय स्थिति देख शिक्षित मध्यमवर्ग के अनेक लोग और कुछ समाजसेवी भी आन्दोलन से जुड़े। इन्होंने मजदूर आन्दोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। हालाँकि ये लोग आन्दोलनकर्ता नहीं थे लेकिन फिर भी इन्होंने मजदूरों के शोषण–उत्पीड़न को पूरे देश के सामने लाने का काम किया। साथ ही इन्होंने मजदूरों की शुरुआती कमेटियाँ बनाने में भी सहयोग किया।
बंगाल के शशिपद बनर्जी ने 1874 में ‘श्रमजीवी’ नामक पत्रिका निकालनी शुरू की। यह मजदूरों की समस्याओं पर केन्द्रित देश की पहली पत्रिका थी। इसी तरह मुम्बई में नारायण मेधाजी लोखंडे ने ‘दीनबंधु’ नाम की पत्रिका निकाली जो मराठी में पढ़ी जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी पत्रिका बनी। इन पत्रिकाओं के प्रचार–प्रसार ने अनेक बु(िजीवियों को आन्दोलन से जोड़ने का काम किया।
कलकत्ता के पास जूट मिल मजदूरों की बस्तियों में 8 रात्रिकालीन स्कूल खोले गये। इनमें मजदूरों को अक्षर ज्ञान के साथ–साथ राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था के बारे में भी शिक्षित किया जाता था। इन स्कूलों ने मजदूरों को अपने अधिकारों के लिए चेतनशील बनाया। इसी कारण हर जगह मजदूरों ने अपनी माँगों के लिए संघर्ष तेज कर दिया था। 1882 से 1890 तक मुम्बई और मद्रास में मजदूरों ने 25 महत्वपूर्ण हड़ताल कीं। इनमें 1886 में कोलकाता के जूट मजदूरों की 8 दिन की हड़ताल बेहद महत्वपूर्ण थी। इन सभी हड़तालों में मजदूरों ने काम के भारी बोझ से आजादी, तनख्वाह में बढ़ोतरी, काम करने के दौरान सुरक्षा आदि की माँग उठायी थी।
‘बोम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन’ नामक मजदूरों की पहली संस्था अस्तित्व में आयी। इस संस्था का निर्माण 1890 में नारायण मेधाजी ने मुम्बई में मजदूरों की एक सभा के दौरान किया था, जिसका अध्यक्ष उन्हें ही चुना गया। हालाँकि इस संस्था का स्वरूप अधिक स्पष्ट नहीं था फिर भी इस संस्था में संगठित होकर मजदूरों ने पहली बार सरकार को अपनी माँगें मनवाने के लिए मजबूर कर दिया था। नारायण मेधाजी की अध्यक्षता में 24 अप्रैल 1890 दस हजार मजदूरों ने एकत्रित होकर अपनी माँगों का ज्ञापन मालिकों के संगठन को सौंपा। इन माँगों में सप्ताह में एक छुट्टी, दोपहर को भोजन करने के लिए आधे घंटे का अवकाश, काम के घंटे निर्धारित हों, वेतन समय पर दिया जाये, काम के दौरान होने वाले हादसों पर मुआवजा मिले, बच्चों के काम करने पर रोक आदि शामिल थी। ब्रिटिश सरकार को मजबूरन मजदूरों की संगठित ताकत के सामने झुकना पड़ा। ‘फैक्ट्री एक्ट–1891’ बनने के बाद मजदूरों को कुछ राहत मिली। सप्ताह में एक दिन की छुट्टी की माँग मान ली गयी। शुरआती संघर्षों में मजदूरों की यह बड़ी जीत थी।
लेकिन मजदूरों की यह आंशिक जीत जुझारू संघर्षों का नतीजा थी। ब्रिटिश सरकार और देशी मालिकों ने मिलकर कितनी ही बार मजदूरों की एकता को तोड़ने का प्रयास किया। मजदूरों के बीच जाति, धर्म और क्षेत्र के भेदभाव को बढ़ाने का प्रयास किया गया। कई जगह पर मजदूरों के बीच धार्मिक दंगे भड़काने की भी कोशिश की गयी। इन प्रयासों में कितनी ही बार मालिक वर्ग सफल रहा और मजदूरों की एकता टूट गयी। लेकिन मजदूरों को यह समझ आ गया था कि जब तक वह अपने बीच जड़ जमाये जाति, धर्म और क्षेत्र के भेदभाव को खत्म कर अपनी पहचान मजदूरों के रूप में विकसित नहीं करेंगे तब तक उनकी सामूहिक ताकत बरकरार नहीं रह सकती। इसलिए मजदूर आन्दोलन केवल भत्ते की माँग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश में व्याप्त जातिगत भेदभाव और साम्प्रदायिकता के खिलाफ भी आवाज बुलन्द की गयी।
आज फिर से पूँजीपति और सरकार मजदूरों पर दिन–रात हमले कर रही है। हालत यह है कि सुबह से शाम तक हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी मजदूरों के हिस्से गरीबी, लाचारी और बेबसी आ रही है। जबकि देश के मुट्ठीभर मालिक वर्ग के हाथों में बिना कोई मेहनत किये देश की अधिकतर सम्पत्ति, संसाधन और पूँजी इकट्ठी हो रही है। इनकी यह सम्पत्ति इसलिए बढ़ रही है कि वे मजदूरों को बहुत की कम मजदूरी देकर उनका निर्मम शोषण कर रहे हैं और देश के प्राकृतिक संसाधनों को भी जमकर लूट रहे हैं। मजदूरों की खराब जिन्दगी के जिम्मेदार यही मालिक वर्ग है।
अपनी बुरी स्थिति के खिलाफ देश के अलग–अलग हिस्सों में मजदूर संघर्ष कर रहे हैं। वहीं मालिक पँूजीपति और सरकार इन संघर्षों को दबाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। देश की शोषित–उत्पीड़ित जनता का साथ देने की जगह सरकार भी इन मुट्ठीभर देशी–विदेशी मालिक वर्ग के हाथों में खेल रही है। मजदूरों को बरगलाने के लिए वह उन्हें जाति–धर्म के झगड़े में फँसा रही है।
मालिक और मजदूर वर्ग के बीच का यह संघर्ष 150 साल से भी ज्यादा पुराना है। 150 सालों के इस लम्बे समय में मजदूरों ने अपनी संगठित ताकत के बलबूते अनेक बार जीत हासिल की है। उन्होंने लड़कर अपने अधिकार पाये हैं। लेकिन आज उन अधिकारों को खत्म किया जा रहा है। इसका कारण यह है कि आज मालिक वर्ग ज्यादा मजबूत और धूर्त है। वह सजग और संगठित है। लेकिन आज मजदूर वर्ग कमजोर है। वह संगठित नहीं है और अपने उस संघर्षों के इतिहास से कट गया है।
मजदूरों के शुरुआती संघर्षों से हमें सीखना चाहिए कि अगर हमें बाँटने में मालिक वर्ग सफल रहा तो हमारी हार होनी तय है। साथ ही जब मजदूर अपनी नरकीय जिन्दगी के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे उस समय कांग्रेस भी अस्तित्व में आ गयी थी। लेकिन उसने मेहनतकश आवाम के मुद्दों को कभी गम्भीरता से नहीं उठाया। मजदूरों को अपनी लड़ाई खुद आगे आकर लड़नी पड़ी। आज यही सवाल हमारे सामने भी है। मजदूरों ने अपने शुरुआती संघर्षों के अनुभवों के आधार पर 20वीं शताब्दी की शुरुआत में अनेक आन्दोलन किये। इन आन्दोलनों में मजदूर वर्ग की मजबूती और समझदारी नजर आती है।
इस इतिहास से हमें कई सबक मिलते हैं, जैसे––
1– मजदूर को मालिक की बातों को आँख मूँदकर नहीं मान लेना चाहिए।
2– जीत हासिल करने के लिए मजदूरों को अपना संगठन बनाना चाहिए।
3– मजदूर वर्ग को संगठन बनाने और एकजुट होने के लिए जाति, धर्म और
क्षेत्र का भेदभाव खत्म कर देना चाहिए।
4– बिना संघर्ष के सफलता नहीं मिलती है।
आज इतिहास के संघर्षों से प्रेरणा और रोशनी लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है। नहीं तो मजदूर वर्ग अपनी समस्याओं से निजात नहीं पा सकेगा।