मजदूरों में फैले अन्धविश्वास को कैसे दूर करें?
07 Jun 2025
• फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
हमारे समाज में ढोंग–पाखंड, जादू–टोना, बाबा–ओझा और अन्धविश्वास का बहुत बोलबाला है। मजदूर वर्ग भी इनसे मुक्त नहीं है। हम देखते हैं कि अन्धविश्वास के चलते ही छोटे बच्चों की बलि चढ़ा दी जाती है, इनसान की जानवरों से शादी करायी जाती है, गम्भीर बीमारी या साँप काटने के बाद झाड–फूँक से मरीज की मौत हो जाती है। अन्धविश्वास से मजदूरों का इससे भी बड़ा नुकसान होता है। अन्धविश्वासी मजदूर अपने शोषण–उत्पीड़न से लड़ने के लिए सही संगठन नहीं बना पाते हैं। मजदूरों की समझदारी कुन्द होने का एक कारण अन्धविश्वास भी है, इसी के चलते वे अपनी समस्याओं के सही कारणों को समझ नहीं पाते हैं और उनकी एकता कमजोर पड़ जाती है। सही विचारों पर आधारित मजदूरों का जुझारू संगठन बनाने के लिए उनके बीच फैले ढोंग–पाखंड और अन्धविश्वास को दूर करना जरूरी है। मजदूरों में फैले अन्धविश्वास को किस तरह समझें और इसे कैसे दूर करें? इसे समझाने के लिए यहाँ दो कहानियाँ दी जा रही हैं––
पहला, कई कम्पनियों का एक अमीर मालिक अचानक घाटे में चला जाता है और एक–एक कर उसकी सभी कम्पनियाँ बन्द होने लगती हैं। एक बाबा आकर घर में हवन से लेकर तमाम तरह के कर्मकांड करता है। बाबा गृह दोष बता कर पति पत्नी को हर दिन अलग–अलग रंग के कपड़े पहनने की सलाह देता है। उनके आलीशान कमरे में वास्तुशास्त्र का दोष बताता है। वह समस्या के समाधान के लिए धुँआ सुलगाता है, झाड–फूँक करता है और पति–पत्नी को गंडे–ताबीज बाँधता है।
दूसरा उदाहरण है, एक फैक्ट्री मजदूर के परिवार का जो झुग्गी में रहता है। न पीने को साफ पानी, न ताजी धूप और न साफ हवा। खाने में भी पोषक आहार नहीं। परिवार में बीमारी तो होगी ही। आलू, चावल और चीनी से पेट भरने से कहीं शरीर स्वस्थ भी हो सकता है भला? मजदूर ने फैक्ट्री में दस साल काम किया। पता चला कि उसे कैंसर हो गया है। इलाज इतना महँगा कि पूरा परिवार खाना भी छोड़ दे तो भी दवा न खरीद पाये। किसी ने एक बाबा बताया कि वह गेहूँ के दाने खिलाकर मरीज को सही कर देता है। बाबा को दिखाकर लौटते समय रास्ते में ही उस मजदूर की मौत हो गयी।
ऊपर के दोनों उदाहरणों से साफ है कि अन्धविश्वास अमीर और गरीब दोनों में है। अमीर मुनाफा कमाने के लिए अन्धविश्वास को एक साधन के रूप में इस्तेमाल करता है और मजदूरों में अन्धविश्वास का कारण अभाव है यानी गरीबी, भुखमरी, इलाज का अभाव, शिक्षा और रोजगार न होने से अन्धविश्वास पैदा होता है। अन्धविश्वासी लोग कार्य–कारण सम्बन्ध को समझने के बजाय आँख मूँदकर किसी चमत्कार का इन्तजार करते हैं। उनकी समस्या का कारण यह सड़ती हुई व्यवस्था है जो गन्दगी और बीमारी फैला रही है। इसे समझने और समस्या हल करने के बजाय लोग बाबा–ओझा के पास दौड़ते हैं।
बिना जाँची–परखी बात पर आँख मूँदकर भरोसा करना ही अन्धविश्वास है। अन्धविश्वास और वैज्ञानिक ज्ञान में एक बुनियादी फर्क है। अन्धविश्वास तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता जबकि वैज्ञानिक ज्ञान तर्क से आगे बढ़ता है। इसलिए अन्धविश्वासी आदमी तर्क से बचकर भागता है जबकि वैज्ञानिक सोच वाला आदमी तर्क का सम्मान करता है। हमारा समाज दो सौ साल अंग्रेजों का गुलाम रहा, समाज का बड़ा हिस्सा पढ़ाई–लिखाई से दूर रहा। कुछ लोगों को पढ़ने का अवसर मिला भी तो उसका उद्देश्य महज अंग्रेजों की क्लर्की करना रहा। आज भी देश में साक्षरता दर हैरान कर देने वाली है। जो साक्षर हैं वे भी अन्धविश्वास में फँसे हुए हैं। हमारे स्कूल–कॉलेज साक्षर तो बनाते हैं पर अन्धविश्वास से लड़ना नहीं सिखाते। कुछ मामलों में तो स्कूल–कॉलेज के शिक्षक ही छात्रों को अन्धविश्वासी बनाते हैं। अंग्रेजों के दौर की तरह आज भी स्कूली शिक्षा महज क्लर्क और कर्मचारी मानसिकता के नागरिक पैदा कर रही है। अन्धविश्वास से लड़ने के लिए छात्रों को तर्कशील वैज्ञानिक शिक्षा–दीक्षा से लैश करना होगा।
आजादी के बाद वैज्ञानिक नजरिया विकसित करने के प्रयास तो हुए, वैज्ञानिक नजरिये के विचार को संविधान में भी शामिल किया गया। पर असल में आज भी पूरे देश में अन्धविश्वास किसी खतरनाक बीमारी की तरह फैला हुआ है। नेता–मंत्री चुनाव जीतने के लिए जनता को अन्धविश्वासी बना रहे हैं। अन्धविश्वासी लोगों को धर्म के नाम पर दंगों में इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि तर्क करने वाले लोगों से सरकार भी डरती हैं, उन्हें डर होता है कि कहीं लोग शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल न खड़े कर दें। कहीं लोग अपने मूल अधिकारों के लिए एकजुट न हो जायें।
अन्धविश्वास एक ऐसी दिमागी बीमारी है जिसका इलाज सम्भव है। पर इसके इलाज के लिए बाजार में कोई दवा की पुड़िया नहीं मिलती। इसकी सबसे पहली दवा है–– अन्धविश्वासी आदमी का यह स्वीकार करना कि वह अन्धविश्वासी है। वह घटनाओं के पीछे के सही कारणों को नहीं जानता। यही सबसे मुश्किल बात है। बच्चा पैदा होते ही अन्धविश्वासी नहीं होता बल्कि समाज में बचपन से ही उसे गलत जानकारी देकर अन्धविश्वासी बनाया जाता है। उसे बचपन से ही धार्मिक कर्मकांडों में शामिल किया जाता है। बड़ा होने तक वह अपनी जिन्दगी में भाग्य, हाथों की रेखा, भूत–भभूत, डायन–चुड़ैल, पुनर्जन्म और स्वर्ग–नरक जैसी काल्पनिक बातों में यकीन करने लगता है।
वैज्ञानिक चेतना विकसित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी सरकार और शिक्षा व्यवस्था की है। जो सरकार तमाम तरह के झूठ–फरेब, ढोंग, मक्कारी, लोकतंत्र की हत्या पर टिकी हो, उससे समाज में सच, न्याय, वैज्ञानिक चेतना और तर्कशीलता बढ़ाने की उम्मीद रखना भोलापन होगा। बल्कि वैज्ञानिक और तर्कशील शिक्षा आज सरकार की आँखों में एक चुभते काँटे की तरह है। जिस किसी व्यक्ति या संगठन ने अन्धविश्वास के खिलाफ परचम उठाया उसे तोड़ने की भरपूर कोशिश की जाती है। इसलिए अन्धविश्वास के खिलाफ लड़ना व्यवस्था के ढोंग–पाखंड के खिलाफ विद्रोह करना भी है। एक साहसी व्यक्ति ही, एक सच्चा मजदूर कार्यकर्ता ही इस विद्रोह की मसाल जला सकता है।
मजदूरों के बीच अन्धविश्वास को दूर करने के लिए मजदूर कार्यकर्ता का होना जरूरी है। ऐसे कार्यकर्ताओं के लिए जरूरी है कि वे मजदूर वर्ग के बारे में अच्छी तरह जान लें। उन्हें समझ लेना चाहिए कि शिक्षा दिन–ब–दिन इतनी महँगी होती जा रही है कि मजदूरों के लिए उसे खरीदना सम्भव नहीं। विज्ञान की रोशनी मजदूर बस्तियों में स्वयं ही नहीं दमक सकती। इसलिए उन्हें मजदूरों के लिए मुफ्रत–शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए।
हम जानते हैं कि मजदूर बस्तियों में बच्चों से लेकर बड़ों तक हर कोई व्यवहारिक काम में लगा होता है। सड़क हो, खेत हो, दुकान हो या फैक्ट्री हर जगह मजदूर तकनीकी के सम्पर्क में रहते हैं। पर वे इनके पीछे के वैज्ञानिक ज्ञान से कटे रहते हैं। वे इनके कार्य–कारण सम्बन्धों को नहीं समझते। मजदूर कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वे मजदूरों को घटनाओं के कार्य–कारण सम्बन्धों की जानकारी देकर उनके बीच प्रचलित अन्धविश्वासों को दूर करें। बदले में वे मजदूरों से उनके व्यवहारिक ज्ञान को सीखें। फ्जनता से सीखो और जनता को सिखाओ”की कार्यशैली को लागू करने का यह सही तरीका है।
अगर वैज्ञानिक ज्ञान की मशाल को मजदूरों के व्यवहारिक ज्ञान से जोड़ दिया जाये तो निश्चय ही जो रोशनी होगी उससे पूरी मानवजाति जगमगा जायेगी। इसके लिए मजदूर बस्तियों में मजदूर कार्यकर्ताओं को पुस्तकालय और तर्कशील संस्थाओं को स्थापित करना चाहिए। विज्ञान प्रदर्शनी, वाद–विवाद प्रतियोगिता, कारण बताओ प्रतियोगिता आदि का आयोजन करना चाहिए। अन्धविश्वास पर आधारित विचार गोष्ठी, सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे–– गीत–संगीत, नुक्कड़ नाटक आदि भी आयोजित करना चाहिए। तभी मजदूरों को अन्धविश्वास से मुक्त किया जा सकता है। इसके अलावा अन्धविश्वास को दूर करने वाली फिल्में और यूट्यूब चैनल मजदूरों को दिखाने चाहिए। उन्हें वाट्सएप और फेसबुक के जरिये एक–दूसरे से शेयर करना चाहिए।