1974 की रेलवे मजदूरों की ऐतिहासिक हड़ताल

07 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

“हड़ताल कौन करेगा?, मैं करूँगा, हम करेंगे।” यह नारा 1974 के ऐतिहासिक आन्दोलन में मजदूरों ने बुलन्द किया था। इस नारे के साथ लाखों मजदूरों ने 20 दिन तक रेलवे की देशव्यापी हड़ताल की थी। यह हड़ताल मजदूरों की असीम ताकत का एक नमूना थी। उन्होंने दिखा दिया कि वह अपने खिलाफ होने वाले निर्मम शोषण को बर्दास्त नहीं करेंगे। इस आन्दोलन ने सरकार की चूले हिला दी।

केवल भारत ही नहीं दुनिया भर में इस आन्दोलन की गूँज सुनाई दी। कई देशों की मजदूर यूनियनों ने इस संघर्ष की प्रशंसा की। यह आन्दोलन केवल रेलवे कर्मचारियों तक सीमित नहीं था बल्कि देश की बड़ी मेहनतकश आबादी इसमें सक्रिय रूप से शामिल हुई। इतिहास की यह घटना आम मजदूरों के अदम्य साहस और कुर्बानी की गाथा है। आज जब मजदूरों के हकों पर चैतरफा हमले हो रहे हैं, ऐसे में हमें अपने अमिट इतिहास से शिक्षित होना बेहद जरूरी है। इतिहास की यह कड़ी 1974 के आन्दोलन से भी जुड़ती है।

1960 के दशक में अनाज, खाने के तेल और केरोसिन के दाम बढ़ गये थे। मजदूरों के लिए इस महँगाई में जीना दूभर हो गया था। सुबह से शाम तक हाड़तोड़ मेहनत के बाद किसी तरह दो जून की रोटी नसीब हो रही थी। मजदूरों और अन्य मेहनतकश जनता में गुस्सा पैदा हो रहा था। ऐसे हालात में रेलवे कर्मचारियों का अभूतपूर्व आन्दोलन शुरू हुआ। रेलवे विभाग के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाये गये काले कानूनों से आजाद भारत में भी मजदूरों का निर्मम शोषण जारी था। इन कानूनों के तहत उनके काम को ‘निरन्तर’ माना जाता था। यानी लोको मजदूरों को तब तक ड्यूटी पर रहना पड़ता था, जब तक ट्रेन चलती रहती थी। इस कारण लगातार कई दिनों तक मजदूरों से जबरन काम लिया जाता था। इसके बावजूद उनका वेतन बेहद कम था। वेतन आयोग में जहाँ अन्य उद्योगों में लगे कर्मचारियों को बोनस देने की बात कही गयी, वहीं रेलवे मजदूरों को इससे बाहर कर दिया गया। अपनी स्थिति में बदलाव के लिए बार–बार माँग उठाने के बावजूद सरकार और स्थापित ट्रेड यूनियनों का रवैया मजदूरों की इस दयनीय स्थिति को नजरन्दाज करने वाला ही था। लेकिन अपनी स्थिति के खिलाफ मजदूरों ने खुद संगठित होकर संघर्ष का बिगुल बजा दिया। 1967 से 1974 तक इन्होंने 4 बड़ी हड़तालें कीं। इन हड़तालों में मजदूर अनेक माँगों को मनवाने में सफल रहे। लम्बे संघर्षों के दौरान उन्हें अपनी संगठित ताकत का एहसास हुआ। इससे प्रेरित होकर उन्होंने आगे की लड़ाई के लिए कमर कस ली। उनकी माँगें थीं–– 8 घंटे काम, सम्मानजनक वेतन, भोजन जैसी सामाजिक सुरक्षा, नौकरियों का औपचारिकीकरण, बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण आदि। अपने हक के लिए उन्होंने एक अभूतपूर्व आन्दोलन की शुरुआत की।

आखिरकार, 8 मई 1974 से रेलवे की देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया। मजदूरों का आक्रोश देख सरकार इस आन्दोलन को शुरू होने से पहले ही खत्म करने पर आमादा थी। सरकार ने जॉर्ज फर्नांडिस, उमरावमल पुरोहित आदि मजदूर नेताओं को पकड़कर जेल में बन्द कर दिया। जॉर्ज फर्नांडिस उस समय ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन के अध्यक्ष थे, जिन्होंने अन्य रेल कर्मचारियों के संगठनों को मिलाकर ‘राष्ट्रीय समन्वय समिति’ का गठन किया था। 7 मई 1974 को मुबई में ‘नेशनल मजदूर यूनियन’ के महामंत्री मलगी की पुलिस हवालात में अचानक मृत्यु होने से मजदूर आक्रोशित हो गये और हड़ताल ने पूरे देश को अपनी गिरफ्रत में ले लिया।

 बिहार के गया में रेलवे कर्मचारियों ने अपने परिवारों के साथ पटरियों पर कब्जा कर लिया। मद्रास में हजारों महिलाओं और बच्चों ने रेलवे के मंडल मुख्यालय में जोरदार रैली निकालकर अपनी माँगों के लिए प्रदर्शन किया। इसी तरह तमिलनाडु स्थित त्रिची में रेलवे कॉलोनी में रहने वाले लोगों ने मार्च निकाला। देश की राजधानी दिल्ली में भी सभी कर्मचारी हड़ताल पर चले गये। कुछ ही दिनों में इस आन्दोलन को अभूतपूर्व सफलता मिलने लगी। सफाई कर्मचारी से लेकर ट्रेन ड्राईवर समेत सभी इस हड़ताल में शामिल हो गये। स्टेशन खाली होने लगे, ट्रेनों की आवाजाही बन्द हो गयी। मजदूरों की संगठित ताकत को देखकर हर कोई हैरान था। रेलवे मजदूरों की इस सफलता से दूसरे मजदूर भी उत्साहित हुए। उन्हें भी अपनी नारकीय जिन्दगी से छुटकारा पाने की आशा नजर आने लगी। इसलिए कुछ ही दिनों में टैक्सी ड्राइवर, इलेक्ट्रिसिटी और ट्रांसपोर्ट यूनियन इस आन्दोलन से जुड़ गयी। मद्रास के कोयला फैक्ट्री के 10 हजार मजदूर भी इस आन्दोलन के समर्थन में आ गये।

15 मई तक देश में भीषण चक्काजाम हो गया। उस समय की प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने मजदूरों की जायज माँगों को मानने की जगह इस आन्दोलन को गैर–कानूनी घोषित कर दिया। इसके साथ ही मजदूरों को धमकाते हुए उन्होंने हड़ताल खत्म होने तक किसी भी तरह की बातचीत से साफ इनकार कर दिया। लेकिन मजदूर अपनी माँगों को लेकर अडिग थे। आन्दोलन के विस्तार से सरकार थर–थर काँपने लगी। इसलिए सरकार ने निर्मम दमन कर आन्दोलन को कुचलना चाहा। जल्द ही रेल कर्मचारियों पर और उनके समर्थकों पर सरकारी हमले तेज हो गये। रेलवे कालोनी में रहने वाले मजदूरों के घरों की बिजली–पानी की आपूर्ति ठप्प कर दी गयी। इसके बावजूद मजदूरों का मनोबल तोड़ने पर सरकार जब असफल रही तो उसने अपने ही देश के मजदूरों के साथ दुश्मनाना व्यवहार शुरू कर दिया। पुलिस वाले महिलाओं के साथ जोर–जबरदस्ती करते, उनकी रसोई नष्ट कर दी गयी, उनके सामान घरों से बाहर फेंक दिये गये। बच्चों, बूढों और बीमार लोगों पर भी कोई तरस नहीं किया गया। हजारों मजदूरों पर ‘मीसा’ जैसे देशद्रोही कानून लगाकर उन्हें जेल में बन्द कर दिया गया। 3 हजार स्थायी कर्मचारियों को नौकरी से हटाया गया, 10 लाख स्थायी कर्मचारियों को नयी भर्ती के तौर पर माना गया। लेकिन मजदूर झुकने को तैयार नहीं थे।

सरकार ने मजदूरों के बीच भ्रम पैदा करने के लिए फर्जी तरीके से ट्रैक पर ट्रेनों के इंजन भी चलावाये थे। इन्हें सेना के लोग चलाते थे। यह ट्रेनें सीटी बजाती जाती थीं, ताकि लोग यह सोचे कि दमन चक्र से भयभीत होकर कर्मचारियों ने हड़ताल तोड़ दी है। लेकिन सरकार की यह कुत्सित चाल भी किसी काम न आयी। सरकार को यह डर था कि अगर उसने मजदूरों की माँगें मान ली तो अन्य क्षेत्रों में लगे मजदूर भी अपने हकों के लिए संगठित हो जाएँगे। एक अनुमान के मुताबिक हड़ताल की माँग मानकर जितना खर्चा सरकार को होता उससे दस गुना खर्चा सरकार ने आन्दोलन को तोड़ने में लगा दिया।

मजदूरों का अदम्य साहस और बलिदान निरर्थक नहीं गया। हालाँकि परिपक्व नेतृत्व और क्रान्तिकारी संगठन के अभाव में यह हड़ताल 20 दिन बाद वापस ले ली गयी। लेकिन इसका प्रभाव लम्बे समय तक रहा। इस विशाल आन्दोलन ने ही इन्दिरा गाँधी को सत्ता से हटाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस हड़ताल के परिणामस्वरूप ही अस्थायी रेल कर्मचारियों को स्थायी करने की प्रक्रिया शुरू हुई। रेलवे कर्मचारियों के काम के घंटे कम हुए, उनके वेतन में न्यायसंगत बढ़ोतरी हुई। इस हड़ताल ने समूचे देश के मजदूरों और कर्मचारियों में एक आत्मविश्वास और संघर्ष का जज्बा पैदा किया। मजदूरों के संघर्ष ने सरकार को झुका दिया। आन्दोलन के डर से 3 साल बाद सभी निष्काषित कर्मचारियों को दुबारा काम पर रख लिया गया। 

 इस आन्दोलन के 50 साल बाद आज आम मेहनतकश जनता की जिन्दगी कहीं ज्यादा निराशाजनक नजर आ रही है। रेलवे कर्मचारी निजीकरण के खिलाफ संघर्षरत हैं। लम्बे संघर्षों और बलिदानों के बाद मिले उनके अधिकार छीने जा रहे हैं। सरकार मजदूरों को क्षेत्रीय, भाषायी, जातीय और धार्मिक आधार पर बाँट रही है। यह बँटवारा मजदूरों की ताकत को कमजोर बना रहा है। इसका फायदा उठाकर सरकार तेजी से जनविरोधी कानूनों को पारित करने में सफल हो रही है। ऐसे में 1974 का आन्दोलन हमारे लिए एक मशाल का काम कर रहा है। वह हमें प्रेरणा दे रहा है कि आज के मजदूर अपनी समस्याओं को लेकर संघर्ष में उतरें और पूरे देश के मजदूरों की एकता कायम हो, तभी सरकार को झुकाया जा सकता है और मजदूर अपनी माँगों को मनवाने में सफल होंगे।

संघर्ष को नये सिरे से शुरू करने के लिए मजदूर वर्ग को अपना संगठन बनाना पड़ेगा और उसे नये और सच्चे नेताओं की तलाश करनी पड़ेगी। आज पहले से कही अधिक परिपक्व और सच्चे नेताओं के बलबूते ही नया आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है। मजदूरों का जुझारू संगठन ही उन्हें जीत दिला सकता है।

← अंक में अन्य लेख देखें

पत्रिका प्राप्त करें

नवीनतम अंक और लेख सीधे अपने ईमेल में प्राप्त करें