मजदूर वर्ग की दुश्मन है साम्प्रदायिक राजनीति

07 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
आज के दौर में साम्प्रदायिकता अपने चरम पर है। असली हिन्दू होने का मतलब मुस्लिमों से नफरत करना, उन्हें गाली देना हो गया है। भारत में साम्प्रदायिकता का अपना इतिहास रहा है और वह धीरे–धीरे बढ़ते हुए यहाँ तक पहुँची है। 1990 में देश की केन्द्र सरकार ने मेहनतकश जनता को गरीबी में झोंकने वाली नवउदारवादी नीतियों को लागू किया और अमरीका की गुलामी स्वीकार कर ली। मजदूर विरोधी इन नीतियों को साम्प्रदायिक दंगों की आड़ में लागू किया गया। 1990 में नवउदारवादी नीतियों में उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण को लागू करने का मकसद था–– देश को फिर एक बार गुलामी की बेड़ियों में जकड़ देना, मजदूरों और किसानों के निर्मम शोषण का रास्ता साफ करना और देशी–विदेशी पूँजीपतियों–धन्ना सेठों की दिल खोलकर मदद करना। अमरीका के द्वारा आईएमएफ, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के जरिये लागू इन नीतियों ने पिछले 30 सालों में देश के मजदूरों को गरीबी में धकेल दिया, नौजवानों को बेरोजगार कर दिया और किसानों को कर्ज के जाल में फँसा दिया। अपनी बदहाल हालत के प्रति मजदूर, किसान और नौजवान जागरूक न हो जायें, इसके लिए इन नीतियों के साथ साम्प्रदायिक और धार्मिक राजनीति को बढ़ावा दिया गया। शासक वर्ग ने जनता को मन्दिर–मस्जिद और हिन्दू–मुस्लिम के दंगों में उलझा दिया। 6 दिसम्बर 1992 में भाजपा और आरएसएस से जुड़े हिन्दू कारसेवकों ने यह दावा करते हुए बाबरी मस्जिद पर हमला करके तोड़ दिया कि वहाँ पहले राम मन्दिर था। यह सरकार द्वारा सोची–समझी साजिश के तहत किया गया। सभी जानते हैं कि के के नायर सरकार का आदमी था, उसने मस्जिद का ताला खुलवा कर उसमें राम की मूर्ति रखवायी थी जिससे मजदूरों–किसानों को हिन्दू–मुसलमान में बाँटने, दंगे कराने और साम्प्रदायिक राजनीति को तेज करने में मदद मिली। बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद फैली हिंसा में हजारों लोग बलि चढ़ गये। इस कुकर्म में भाजपा और आरएसएस जैसे हिन्दुत्ववादी और साम्प्रदायिक संगठन तो शामिल थे ही, साथ ही इसमें कांग्रेस पार्टी भी लिप्त थी। उस समय केन्द्र में कांग्रेस की नरसिम्हा सरकार थी और नरसिम्हा सरकार ने कारसेवकों को बाबरी मस्जिद तोड़ने से नहीं रोका। साथ ही कांग्रेस ने भी साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया क्योंकि वह नवउदारवादी नीतियों सेे नाराज मजदूरों–किसानों को गुमराह करना चाह रही थी। वह कॉरपोरेट पूँजी की सेवा करने के लिए साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दे रही थी। इसके बाद 2002 के गुजरात दंगे ने देश में साम्प्रदायिक राजनीति की जहरीली हवा चला दी। किसान और मजदूर इस जहरीली हवा की चपेट में आ गये। वे हिन्दू–मुसलमान में बँट गये। इसका फायदा गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी ने उठाया। मोदी के सामने गुजरात में हिन्दुत्ववादियों ने मुसलमानों का कत्लेआम मचाया। दंगे में न केवल इनसानों का कत्ल हुआ बल्कि इनसानियत की रूह भी घायल हो गयी। दंगा–फसाद कराने वाले आदमी को पूँजीपतियों ने हाथों–हाथ उठा लिया। इसके बाद 2012 में मुजफ्रफरनगर में हिन्दू–मुसलमान के दंगे कराये गये। इससे राजनीति में भाजपा और आरएसएस को बढ़त मिली। पूँजीपतियों और उनकी जरखरीद मीडिया ने नरेन्द्र मोदी को हिन्दू हृदय सम्राट घोषित किया। भारत की घायल आत्मा रोती–कराहती रही और दंगाई अट्टहास करते हुए देश की राजनीति पर छा गये। 2014 में पूँजीपतियों के चहेते मोदी को प्रधानमंत्री बनाया गया। सत्ता में टिके रहने के लिए और इस सड़ी–गली पूँजीवादी व्यवस्था को बनाये रखने के लिए मोदी सरकार ने किसानों–मजदूरों के हितों पर खुल कर हमला किया। उनकी पार्टी भाजपा और आरएसएस के नेताओं ने साम्प्रदायिकता का सहारा लिया। जहरीले बयान दिये। लोगों की भावनाओं को भड़काया, उन्हें हिन्दू–मुसलमान में बाँटा और इनसान को इनसान का दुश्मन बना दिया। हर रोज साम्प्रदायिकता की सैंकड़ों घटनाएँ होती हैं जिनकी गिनती करना भी मुमकिन नहीं है। आज छोटे–छोटे बच्चों के दिमाग में भी इतना जहर भर दिया गया कि वे हिन्दू मुसलमान कर रहे हैं। सांप्रदायिकता का जहर फैलाने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाये गये। फिल्मों, न्यूज चैनलों, अखबारों, व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिये यह जहर फैलाया जा रहा है। ‘उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘केरला स्टोरी’, ‘द कश्मीर फाइल्स’ आदि फिल्मों के जरिये लोगों को मुसलमानों के खिलाफ भड़काया जा रहा है। इन फिल्मों की कहानी को झूठ की चासनी में डुबोकर और इतिहास को तोड़–मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। ‘केरला स्टोरी’ में जिन 32,000 महिलाओं का धर्म परिवर्तन कराकर मुस्लिम बनाने की बात की गयी है, वह सरासर झूठ निकली। असल में तीन महिलाएँ धर्म बदलकर मुस्लिम बनी थीं। इनमें से दो महिलाएँ ईसाई धर्म की थीं। इस फिल्म के जरिये न सिर्फ मुस्लिमों को बल्कि महिलाओं को भी निशाना बनाया गया है। लव जेहाद जैसे झूठ को परोसनेवाली इस फिल्म की चर्चा भारत के प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में करते हैं और लोगो को देखने की अपील करते हैं। इससे साफ हो जाता है कि साम्प्रदायिक राजनीति ने देश के प्रधानमंत्री को भी अपनी गिरफ्रत में ले लिया है। वे भी आरएसएस की हिन्दुत्ववादी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म में भी जनता के सामने इसी तरह का खुला झूठ परोसा गया है। फिल्म में दिखाया गया है कि मुस्लिमों ने हिन्दू पंडितों के साथ मारकाट की और उनके घर तोड़े। लेकिन ऐसा नहीं है, यह भी एक कोरा झूठ है। आतंकवादियों ने कश्मीर में हिन्दुओं के साथ–साथ मुस्लिमों के भी घर तोड़े थे, मुस्लिमों की भी हत्या की थी। कई हिन्दुओं को स्थानीय मुस्लिमों ने अपने घर पर ठिकाना देकर बचाया था। ये सब बातें इस फिल्म में नहीं दिखायी गयीं क्योंकि इस फिल्म का मकसद नफरत फैलाना है। भारत के गृह मंत्री अमित शाह अपने एक भाषण में बोलते हैं कि कोई खबर चाहे झूठी हो या सच्ची, खट्टी हो या मीठी हम उसे जनता के हर एक आदमी तक पहुँचा देते हैं। इसके लिए हमारे 32 लाख व्हाट्सएप ग्रुप काम कर रहे हैं। जिस तरह मोटर गाड़ी के अलग–अलग पुर्जे मिलकर एक साथ काम करते हैं और गाड़ी चलती है, इस तरह भाजपा–आरएसएस की व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी भी अलग–अलग विभागों के जरिये लोगों के दिमाग में जहर भरने का काम करती है। भाजपा–आरएसएस हिन्दुओं को निशाना बनाकर काम करते हैं क्योंकि हिन्दू भारत की बहुसंख्यक आबादी है और वह उनके अन्दर डर पैदा करना चाहते हैं। जर्मनी के हिटलर की तरह ही इनका भी फासीवादी एजेंडा है। हिटलर ने भी अपने देश के जर्मन आर्यों को यह डर दिखाया था कि उन्हें यहूदियों से खतरा है। हिटलर ने देश को फासीवादी राजनीति की प्रयोगशाला बना दिया। लाखों यहूदियों का कत्लेआम किया और दुनिया को दूसरे विश्व यु( में झोंककर करोड़ों लोगों की जिन्दगी बर्बाद कर दी। आरएसएस और भाजपा का आईटी सेल व्हाट्सएप मैसेज पर यह सन्देश फैलाते हैं कि हजारों साल पहले हिन्दुओं का गौरवशाली इतिहास रहा है। इसमें रामायण का रामराज्य और महाभारत शामिल है। वे यह बात छिपाते हैं कि किस तरह राम के समय तप करके ज्ञान हासिल करने वाले शम्बूक को मार दिया जाता है क्योंकि वे शूद्र थे। इसी तरह महाभारत में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अँगूठा कटवा दिया जाता है ताकि वे सर्वश्रेष्ठ धुनर्धर न बन सके। ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि वे भी शूद्र थे। उस दौर में महिलाओं को गुलाम बनाने के लिए ग्रन्थ रचे गये। मनुस्मृति लिखी गयी जो महिलाओं और शूद्रों को गुलाम बनाने पर आधारित है। लेकिन भाजपा के लोग कहते हैं कि हमें इन सब पर गर्व करना चाहिए। भाजपा का आईटी सेल कहता है कि भारत के गौरवशाली इतिहास को मुसलमानों ने आकर खराब किया है। बाबर, औरंगजेब, अकबर, हुमायूँ ने हिन्दुओं पर अत्याचार किये हैं। वे मुसलमानों को खलनायक बनाकर पेश करते हैं। इतिहास उठाकर देखने पर पता चलता है कि मुगलों ने हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं किये। बल्कि, टीपू सुल्तान और औरंगजेब ने तो हिन्दुओं के लिए मन्दिर बनवाये थे। इस बात को भी प्रचारित–प्रसारित किया जाता है कि अकबर ने हिन्दुओं पर जुल्म किया था। बल्कि यह भी एक झूठ है। अकबर ने अपने समय में खेती में सुधार कर, जमीन का ठीक से बँटवारा किया था। इसी के चलते समाज में सम्पन्नता बढ़ी और हिन्दू–मुसलमान दोनों खुशहाल बने। इससे अकबर का शासन मजबूत हो गया। इन झूठी बातों को फैलाते हुए इनका आईटी सेल बताता है कि मुस्लिम कितने खूँखार और निर्दयी हैं। वे आज भारत पर कब्जा करना चाहते हैं। मुस्लिम ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं ताकि वे भारत पर कब्जा कर सकें। हम जानते हैं कि भारत में 80 प्रतिशत लोग हिन्दू है और महज 14 प्रतिशत लोग मुस्लिम है। सरकार के आँकडे़ बताते हैं कि मुसलमान ज्यादा बच्चे नहीं पैदा कर रहे हैं। ज्यादा बच्चे गरीब लोग पैदा करते हैं इस डर से कहीं उनका बच्चा मर न जायें। अगर कुछ बच्चे मर भी गये तो कुछ बच्चे तब भी जिन्दा रह सकेंगे। आज मुसलमानों के खिलाफ जो नफरत लोगों के दिमाग में भरी जा रही है उसका बुरा असर समाज पर साफ देखने के लिए मिल रहा है। हर रोज ऐसी घटनाएँ हो रही हैं जोे हमें शर्मसार कर देती हैं। मोदी योगी की जय न बोलने पर हिन्दू उन्माद में पागल एक जवान ने ट्रेन में मुस्लिमों को गोलियों से भून दिया। ऐसी घटनाओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। दिल्ली में आफताब और श्र(ा का कांड हुआ जिसमें एक मुस्लिम लड़के ने हिन्दू लड़की के 35 टुकड़े कर दिये थे। मीडिया ने इसे खूब फैलाया और जमकर मुसलमानों को कोसा। उसी समय देश में ऐसी घटनाएँ भी सामने आयीं जिसमें हिन्दू युवकों ने हिन्दू युवतियों की हत्या की थी। लेकिन इन घटनाओं का कोई जिक्र नहीं किया गया क्योंकि उसमें हिन्दू लड़का और लड़की थे। मुख्य धारा की मीडिया, अखबार और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के जरिये पूरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ जान–बूझकर नफरत फैलायी जा रही है जिससे हिन्दूआंे को धर्म के नाम पर पागल बना दिया जाये और वे इसी पागलपन में भाजपा को वोट देते रहें। हम मानते हैं कि चाहे अपराधी हिन्दू हो या मुसलमान उसे कानूनी तरीके से सजा मिलनी चाहिए, लेकिन ऐसा न करके पूरे मुस्लिम समुदाय को बदनाम करना कहाँ तक उचित है? हिन्दुओं को धर्म का खतरा दिखाने और मुसलमानों को बदनाम करने के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है। वह है भाजपा और मोदी–योगी को देवता की तरह स्थापित करना। हिन्दुओं को बताया जाता है कि मोदी हिन्दुओं को बचाएगा और मोदी को हिन्दुओं के रक्षक, एक हीरो के रूप में पेश किया जाता है। गोदी मीडिया और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के जरिये बताया जाता है कि मोदी श्री राम का अवतार है, तो कभी बताया जाता है मोदी श्री कृष्ण का अवतार है। मोदी को अवतार दिखाकर धर्म के नाम पर लोगों की ऐसी भीड़ इकट्ठी की जाती है जिन्हें महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, जलता मणिपुर, महिलाओं की समस्या, पर्यावरण की समस्या से दूर–दूर तक कोई मतलब नहीं होता। इन्हें ही चुनाव के समय वोट में बदल दिया जाता है। इसे हम कुछ उदाहरणों से समझ सकते हैं। एक महिला इंटरव्यू में कहती है कि अगर भाजपा से चुनाव में एक कुत्ता भी खड़ा हो तो हम कुत्ते को भी जिता देंगे। हम मोदी के भक्त हैं। दूसरे इंटरव्यू में एक नौजवान से पूछा जाता है कि तुम पढ़े–लिखे हो तो सरकार से सवाल क्यों नहीं करते तो नौजवान बोलता है–– पढ़े–लिखे होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि हम अपने दिमाग का इस्तेमाल करें। हमें अपने बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि मोदी को जिताना चाहिए। एक अन्य इंटरव्यू में युवक बोलता है कि महँगाई चाहे आसमान को छू जाये हमें तो मोदी ही चाहिए। इस तरह आरएसएस और भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति ने कई लोगों को मूर्ख और अंधा बना दिया है। वे अपना भला–बुरा नहीं देख सकते। वे देश का भला–बुरा भी नहीं देख सकते। वे मोदी सरकार का विरोध करने वालों को देशद्रोही कहते हैं। वे अपने हक के लिए आन्दोलन करने वाले मजदूरों और किसानों को गालियाँ देते हैं। वे इतने सड़–गल गये हैं कि समाज को साम्प्रदायिक राजनीति की आग में झोंक रहे हैं। दंगे को बढ़ावा दे रहे हैं। हालाँकि इस बार के चुनाव में भाजपा की हार से उनके हौसले पस्त हैं, लेकिन उनको पूरी तरह हराना अभी बाकी है। मजदूर वर्ग की दुश्मन है साम्प्रदायिक राजनीति और इसे मजदूर वर्ग ही अपनी संगठित ताकत से हरा सकता है। मजदूरों को सही विचार और वर्ग–चेतना हासिल करके आपस की एकता मजबूत करनी चाहिए और अपने संगठित ताकत के जरिये साम्प्रदायिक राजनीति को शिकस्त देनी चाहिए।
← अंक में अन्य लेख देखें

पत्रिका प्राप्त करें

नवीनतम अंक और लेख सीधे अपने ईमेल में प्राप्त करें