कैसे बनती है पत्रिका

01 Jan 2025 • मजदूर एकता पत्रिका- ९ • 5 बार पढ़ा गया

कैसे बनती है पत्रिका

 

नहीं बनती है जनता की पत्रिका

केवल कागज, कलम और स्याही से

उसमें लगते हैं––

दिन और रातें

सुबहों और शामें

अनगिनत कार्यकर्ताओं के

जो सड़कों पर आवारागर्दी कर सकते थे,

मौज–मस्ती और सैर–सपाटे में

दिन गुजार सकते थे

लेकिन उन्होंने अपना हर पल

उस तरह खर्च किया

जैसे कि खर्च करता हो कोई

मरने वाला आदमी

अपनी आखिरी साँस

तब जन्मते हैं लेख,

बनती है कविता,

छपती है पत्रिका,

मजदूरों–किसानों के घर–घर जाती है

यह मत पूछो कि कितनी मेहनत लगी

यह पूछो कि कितनी जवानी खप गयी

लेकिन, सब बेकार

अगर पत्रिका पढ़ी न जाये

अमल में लायी न जाये।

हाय, तब कितने दिल टूटेंगे

कितनी उम्मीदें धूल-धूसरित होंगी

कितनी जिन्दगियों को न मिलेगा

उनका मानी, हक और मोहब्बत।

अगर पत्रिका जिन्दा रहेगी,

तो जिन्दा रहेंगे शब्द, उम्मीद, जिन्दगी और संघर्ष।

–– विक्रम प्रताप

← अंक में अन्य लेख देखें

पत्रिका प्राप्त करें

नवीनतम अंक और लेख सीधे अपने ईमेल में प्राप्त करें