रेलवे ट्रैकमैन आन्दोलन में उतार–चढ़ाव

01 Jan 2025 • मजदूर एकता पत्रिका- ९ • 5 बार पढ़ा गया

रेलवे ट्रैकमैन आन्दोलन लगभग एक दशक पुराना है। यह आन्दोलन ट्रैकमैन यूनियन के गठन के साथ शुरू हुआ। रेलवे के इतिहास में सबसे वंचित यह कैडर कभी अपने हक की आवाज बुलन्द नहीं कर पाया बल्कि यह भ्रष्ट स्थापित यूनियनों के हाथों की कठपुतली बन रहा। यह कैडर अपने दम पर अपने हक की लड़ाई लड़ सकता है यह चेतना करीब दस साल पहले उसमें आनी शुरू हुई। यही वह दौर था जब पीढ़ियों से अशिक्षित इस कैडर में शिक्षित नौजवानों की भर्ती शुरू हुई। उन्होंने बहुत जल्द पुरानी स्थापित यूनियनों के अवसरवादी, समझौतावादी और समर्पणवादी चरित्र को भाँप लिया और उनसे नाता तोड़कर अपने हक की लड़ाई खुद लड़ने का फैसला किया। यह लगभग 2014 के दौर की बात है। तब से लेकर आज तक यह आन्दोलन कई उतार–चढ़ाव से गुजरा है।

ट्रैकमैन कैडर अपनी यूनियन में संगठित होने के बाद से कई हक हासिल कर चुका है। पहला, कड़ी मेहनत और बेहद जोखिम वाला काम होने के बावजूद इस कैडर को बेहद कम वेतन दिया जाता था। ट्रैकमैन यूनियन ने रेलवे में मान्यता में न होने के बावजूद शुरुआत से ही इस मुद्दे को अपने एजेण्डे में सबसे ऊपर रखकर अपनी आवाज बुलन्द करनी शुरू की। यूनियन नेतृत्व ने अपने संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए साल 2016 में एक आम जनसभा की। इसमें विरोध के एक बेहद रचनात्मक तरीके से तत्कालीन रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा को मजबूर किया कि वह ट्रैकमैनों के लिए जोखिम भत्ता जारी करवायें। दूसरा, पहले अधिकांश रेल फाटकों पर बिना किसी विशेष सुरक्षा के ट्रैकमैनों को ड्यूटी करनी पड़ती थी जिससे आये दिन आने–जाने वाले लोग फाटक वाले कर्मचारी के साथ मारपीट और अभद्रता करते रहते थे। ट्रैकमैन यूनियन के नेतृत्व ने बेहद सूझबूझ दिखाते हुए धरना–प्रदर्शन और पत्राचार के जरिये लगातार रेलवे प्रशासन पर दबाव बनाया कि वह प्रत्येक फाटक पर सुरक्षा जाल लगवाये। इसके अलावा ट्रैकमैनों के लिए सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित करवाने के लिए भी ट्रैकमैन यूनियन ने संघर्ष किया। इस मामले में पूर्व रेलवे बोर्ड चेयरमैन श्री अश्विनी लोहानी ने ट्रैकमैन यूनियन का विशेष सहयोग किया और ट्रैकमैनों को सुरक्षा उपकरण समय पर उपलब्ध करवाने के आदेश जारी किये। इसके अलावा नौकरी के दौरान होने वाले रोजमर्रा के शोषण–उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष करने का हौसला ट्रैकमैनों के अन्दर ट्रैकमैन यूनियन बनने के बाद ही आया है। ये कुछ ऐसी शुरुआती उपलब्धियाँ हैं जो ट्रैकमैन यूनियन ने बिना मान्यता मिले ही अपने कैडर के लिए हासिल की। इस सबके बावजूद ट्रैकमैन कैडर के साथ–साथ दूसरे विभाग के भी कर्मचारियों के शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष को अगले स्तर पर ले जाने के लिए यह आवश्यक था कि ट्रैकमैन यूनियन भी मान्यता हासिल करे जिसके लिए ‘मान्यता चुनाव’ में भागीदारी करना पहला कदम था।

रेलवे में किसी यूनियन द्वारा मान्यता के चुनाव में भागीदारी करने की सबसे बुनियादी शर्त यह है कि वह यूनियन रेलवे के अन्दर के सभी उप–विभागों के कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करती हो और भारतीय ट्रेड यूनियन अधिनियम–1926 के तहत पंजीकृत हो। इनमें पहली शर्त को लेकर अक्सर कानूनी दाँव–पेंच के जरिये किसी यूनियन की पात्रता पर सवाल खड़ा किया जाता है। ऐसी ही बाधा ट्रैकमैन यूनियन के रास्ते में खड़ी करने की कोशिश की गयी ताकि मान्यता के चुनाव में भागीदारी न कर सके। दरअसल रेलवे ट्रैकमैन यूनियन अपने शुरुआती दौर में केवल ट्रैकमैन कर्मचारियों का ही प्रतिनिधित्व करती थी अन्य किसी विभाग का नहीं। संघर्ष के दौरान जब ट्रैकमैन यूनियन को इस बात का एहसास हुआ कि बड़े बदलावों के लिए मान्यता प्राप्त यूनियन का दर्जा हासिल करना जरूरी है और मान्यता के चुनाव के लिए उसकी पात्रता पूरी नहीं है तो उसने अपने संविधान में संशोधन करके खुद को ट्रैकमैन सहित सभी विभागों के कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने लायक बना लिया।

पिछला चुनाव हुए ग्यारह साल बीत गये थे। उसके बाद 2024 के सितम्बर महीने में रेलवे प्रशासन ने ट्रेड यूनियन मान्यता चुनाव करवाने की अधिसूचना जारी की जबकि चुनाव पाँच साल पहले ही हो जाने चाहिए थे। इससे ट्रैकमैन यूनियन कार्यकर्ताओं सहित सभी ट्रैकमैनों में खुशी की लहर दौड़ गयी और उन्हें लगा कि जैसे उनके लिए शोषण से मुक्ति का दरवाजा खुल गया है। सभी ट्रैकमैन कार्यकर्ता बेहद लगन और त्याग भावना से चुनाव प्रचार में जुट गये। अपनी यूनियन को मान्यता दिलाने के लिए सबने दिन–रात एक कर दिया। लेकिन रास्ता इतना सीधा नहीं था। रेलवे प्रशासन सहित अन्य यूनियन के कुछ नेताओं की आँखों में ट्रैकमैन यूनियन की सक्रियता काँटे जैसी चुभ रही थी। ट्रैकमैन यूनियन के खिलाफ तरह–तरह की अफवाहों का दौर चल पड़ा। सबसे जोर–शोर से यह अफवाह फैलायी गयी कि ट्रैकमैन यूनियन मान्यता के चुनाव लड़ने की पात्रता ही नहीं रखती। ऐसी अफवाहों का मकसद ट्रैकमैनों के भीतर अपनी यूनियन के प्रति अविश्वास और निराशा पैदा करना था ताकि वे अपना वोट किसी दूसरी यूनियन को दे दें।

रेलवे प्रशासन भी अन्दरूनी तौर से यही चाहता था कि पुरानी स्थापित और भ्रष्ट यूनियनों के अलावा कोई नयी यूनियन चुनाव में भागीदारी न करे और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के नेतृत्व वाली ट्रैकमैन यूनियन तो खास तौर से भागीदारी न कर पाये। इसलिए यूनियन के कानूनी दस्तावेजों में ऐसे किसी बिन्दु की खोज होनी शुरू हुई जिसके बहाने यूनियन को रोका जा सके। चुनाव के नामांकन के कुछ दिन बाद रेलवे प्रशासन ने एक बहाना बनाकर सभी यूनियनों में से केवल ट्रैकमैन यूनियन को अयोग्य घोषित कर दिया। कारण यह बताया कि आपका दस्तावेज तो ठीक है लेकिन यूनियन के नाम में ‘ट्रैकमैन’ शब्द होने के चलते आप चुनाव नहीं लड़ सकते। यह बहुत ही हास्यास्पद और घृणा से भरा तर्क था क्योंकि नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण किसी ट्रेड यूनियन का संविधान होता है जिससे तय होता है कि वह यूनियन किन–किन कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करती है। रेलवे के इस आदेश से सारे ट्रैकमैनों में भयानक निराशा फैल गयी। सबकी उम्मीदें टूटती दिखायी दीं। इस आदेश के खिलाफ ट्रैकमैन यूनियन बॉम्बे हाईकोर्ट चली गयी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने रेलवे को फटकार लगाते हुए यूनियन को योग्य घोषित कर दिया। हाईकोर्ट के फैसले से जहाँ एक तरफ सभी ट्रैकमैन दोबारा ऊर्जा से भर गये वहीं दूसरी तरफ अन्य यूनियनों को अपनी सत्ता डगमगाती हुई महसूस हुई। लेकिन संघर्ष में अभी कई टेढ़े–मेढ़े रास्ते और पड़ाव बाकी थे।

ट्रैकमैन यूनियन के यहाँ तक के संघर्ष में सबको लग रहा था कि उनकी असल विरोधी रेलवे में लम्बे समय से स्थापित ट्रेड यूनियनें हैं, लेकिन आश्चर्य का तब कोई ठिकाना नहीं रहा जब बॉम्बे हाईकोर्ट से मिली अनुमति के खिलाफ खुद रेलवे बोर्ड, जिसके सदस्यों को केन्द्र सरकार अपनी पसन्द से चुनती है, उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी और सुप्रीम कोर्ट ने तुरन्त हाईकोर्ट के अन्तरिम आदेश पर रोक लगा दी। भारत सरकार ने ट्रैकमैन विरोधी रुख दिखाते हुए अपने पाँच सरकारी वकीलों को ट्रैकमैन यूनियन के खिलाफ खड़ा कर दिया जिनमें भारत के दूसरे सबसे बड़े वकील यानी सॉलिसिटर जनरल ऑफ इण्डिया भी शामिल थे।

इस तरह एक बार फिर ट्रैकमैनों के प्रचार अभियान पर ब्रेक लग गयी। अब ट्रैकमैन यूनियन को सीधे भारत सरकार से कानूनी लड़ाई लड़नी थी। रेल मंत्रालय ने जिस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में अपील की कि हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी जाये वे बेहद भ्रामक तथ्यों से भरे हुए और दुर्भावनापूर्ण थे। ट्रैकमैन कैडर समझ गया कि सरकार द्वारा ऐसा करने की एक मुख्य वजह यह है कि मौजूदा केन्द्र सरकार अपनी हितैषी यूनियन को रेलवे में मान्यता दिलाना चाहती है और उसको लग रहा था कि अगर ट्रैकमैन यूनियन को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाये तो स्थापित यूनियनों से नाराज सभी ट्रैकमैन एक साथ सरकार हितैषी यूनियन को वोट कर देंगे और वह मान्यता में आ जाएगी। लेकिन यह सरकार का बहुत बड़ा भ्रम था।

चुनाव की तारीख तेजी से नजदीक आती जा रही थी। सबको उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट भी हमें हाईकोर्ट की तरह ही चुनाव में भागीदारी करने की अनुमति दे देगा। लेकिन यह सोच गलत साबित हुई। हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने लम्बे समय तक अगली सुनवाई नहीं की और इस दौरान मान्यता के चुनाव पूरे हो गये। पूरे देश के ट्रैकमैनों में भयानक निराशा छा गयी। रेलवे प्रशासन को पता था कि उसके आरोप एकदम निराधार हैं और एक सुनवाई में ही याचिका निरस्त हो जाएगी। इसलिए ट्रैकमैन यूनियन को चुनाव में भागीदारी करने से रोकने का एकमात्र तरीका यही था कि सुनवाई की तारीख इतनी आगे बढ़वा दी जाये कि उससे पहले चुनाव ही निपट जाये।

इतने कठिन हालात के बावजूद ट्रैकमैन यूनियन का नेतृत्व मैदान में डटा रहा और लगातार सबकी हौसला अफजाई करता रहा। चुनाव होने के एक सप्ताह बाद सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई और पहली सुनवाई में ही रेलवे बोर्ड की याचिका खारिज हो गयी। लेकिन अब तक चुनाव बीत चुके थे इसलिए इस फैसले का तुरन्त कोई असर जमीन पर पड़ता नहीं दिखायी दिया। इसके बावजूद ट्रैकमैन यूनियन नेतृत्व ने हिम्मत का परिचय दिया और संघर्ष को विजय हासिल होने तक जारी रखने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ही असर रहा कि सभी मान्यता प्राप्त ट्रेड यूनियनों के मान्यता पत्र पर रेलवे प्रशासन को लिखना पड़ा कि आपकी मान्यता चुनाव सम्बन्धित कोर्ट केस के अन्तिम फैसले से प्रभावित हो सकती है। इससे ट्रैकमैन यूनियन के संघर्ष की ताकत और स्थापित यूनियनों की कमजोरी का एक संकेत सबको दिखायी दिया। फिलहाल ट्रैकमैनों की कानूनी लड़ाई बॉम्बे हाईकोर्ट में चल रही है और स्थापित यूनियनों की अपनी–अपनी मान्यता को लेकर साँसें अटकी हुई हैं। इन सब उतार–चढ़ावों से गुजरते हुए ट्रैकमैन यूनियन के कार्यकर्ता लगातार परिपक्व हो रहे हैं और संघर्ष की मशाल जलाये हुए हैं।

– विशाल विवेक

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