इस साल मई–जून के महीने में आग उगलती गरमी ने सबको हलकान–परेशान किया। ऐसी हालत में जब मध्यम वर्ग के लोग एसी–कूलर की ढंडी हवा में राहत के मजे ले रहे थे, मजदूर जलती लू में सड़कों, फैक्टरियों और खेतों में दो जून की रोटी के लिए अपना शरीर जला रहे थे। उत्तर भारत की भीषण गर्मी और लू के चलते हजारों लोग भयानक रूप से बीमार पड़े। अस्पताल मरीजों से भर गये। सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गवाँ दी। उत्तर प्रदेश में केवल 18 जून को 170 लोगों की मौत गर्मी के चलते हो गयी। दिल्ली की सड़कें बेघर लोगों की लाशों से पट गयीं। 11 से 19 जून के बीच दिल्ली में भयानक गर्मी के चलते 192 लोगों की मौत हुई। ये बेघर लोग कौन थे जिनका कोई रहनुमा नहीं था? दरअसल मौजूदा विकास की अंधी दौड़ ने इन लोगों को उजाड़कर राजधानी में ला पटका है। वे दिन में दिहाड़ी मिल जाये तो कर लेते हैं या कपड़े–लत्ते बेचकर काम चला लेते हैं और रात में खुले आसमान के नीचे सो जाते हैं। जलती हुई लू ने इनमें से कई लोगों की जान ले ली।
इतना ही नहीं, जलाती हुई गर्मी ने खेत–खलिहान और फैक्टरियों को भी नहीं बख्शा। बीते 8 जून को दिल्ली के नरेला इलाके में मूँग दाल बनाने वाली एक फैक्ट्री में आग लगने से तीन मजदूरों की मौत हो गयी, जबकि 6 मजदूर गम्भीर रूप से घायल हैं। इससे पहले भी आग लगने की कई घटनाएँ नरेला की अन्य फैक्ट्रियों में हो चुकी है जिनमें दर्जनों मजदूर अपनी जान गवाँ चुके हैं। जून में ही दिल्ली के निठौली गाँव की फैक्ट्री, नरेला स्थित फैक्टरियों, लुधियाना की प्लास्टिक फैक्ट्री, गाजियाबाद की ट्रोनिका सिटी इण्डस्ट्रियल एरिया की फैक्टरियों, सोनीपत की रबर फैक्ट्री... सूची अन्तहीन है, इन फैक्टरियों में आग लगी। पूरी गर्मी भर देश के कोने–कोने की फैक्टरियों में आग लगती रही और वे धूँ–धूँ कर जलती रहीं। सैकड़ों लोग आग में जलकर काल के गाल में समाते गये।
प्रशासन ने कार्रवाई के नाम पर आग बुझाने के लिए दमकल की गाड़ियाँ दौड़ायीं। पहले से तैयारी के नाम पर सरकार और प्रशासन शून्य नजर आया। फैक्ट्री मालिक जो दिन–रात मजदूरों से काम लेते हैं वे अपनी फैक्टरियों में सुरक्षा का कोई इन्तजाम नहीं रखते। अगर रखते तो शायद इन दुर्घटनाओं को रोका जा सकता था। इस देश में मजदूरों की जान की कीमत कुछ नहीं है। अफसोस की बात है कि इस बारे में न सरकार को कोई चिन्ता है और न ही फैक्ट्री मालिकों को। टीवी और अखबार में भी ऐसी घटनाओं पर ज्यादा चर्चा नहीं होती। आज देश में किसी नेता–मंत्री को मजदूरों के हित के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है। इस साल के लोकसभा चुनाव में भी किसी पार्टी ने मजदूरों के मुद्दों को नहीं उठाया।
दूसरी जगहों के मजदूरों को अपने भाइयों की इन दुर्दशाओं की खबर तक नहीं क्योंकि खबर देने वाला मीडिया नदारद है। वहीं ज्यादातर मजदूर अन्धविश्वासी हैं जो अपने ऊपर आयी विपदा को भाग्य का लेखा या पिछले जन्म का कर्म मानकर शान्त हो जाते हैं। उनका गुस्सा पुलिस–प्रशासन की नाकामी, सरकार की गलत नीतियों और मालिकों के बेलगाम शोषण–उत्पीड़न पर फूटना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पाता। कहीं–कहीं मजदूरों में उबाल आता है, लेकिन व्यापक एकता के अभाव में उनकी लड़ाई दूर तक नहीं जा पाती। उनके अन्दर कई तरह के बँटवारे हैं। हिन्दू–मुसलिम साम्प्रदायिकता और जाति–भेद की दीवारें हैं जो उन्हें एक नहीं होने देतीं।
आज मजदूरों के बीच एकता का अभाव और उनके संगठन का न होना सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है। अगर मजदूरों का संगठन हो और मजदूर अपने हक के लिए संघर्ष करने को जागरूक हों तो मालिकों की हिम्मत नहीं है कि उनका शोषण–उत्पीड़न कर सकें और नेता–मंत्री उनकी अनदेखी कर सकें।
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का सातवाँ अंक प्रस्तुत करते हुए हमें बहुत खुशी हो रही है। इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है। इसकी बढ़ती माँग से साफ है कि मजदूरों को जगाने का काम करने वाले कार्यकर्ता साथी दिन–रात कठिन मेहनत कर रहे हैं। वे इस पुस्तिका को मजदूरों के बीच ले जाते हैं। उनके बीच उसे पढ़ते हैं और उस पर बहस चलाते हैं। यही एकमात्र सफल तरीका है मजदूरों को जागरूक करने का।
इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर आ सको तो आओ
मिरे घर के रास्ते में कोई कहकशाँ नहीं है ––मुस्तफा ज़ैदी
हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं। हमेशा काम करते हैं,........
हमारे समाज में ढोंग–पाखंड, जादू–टोना, बाबा–ओझा और अन्धविश्वास का बहुत बोलबाला है। मजदूर वर्ग भी इनसे मुक्त नहीं है। हम देखते हैं कि अन्धविश्वास के चलते ही छोटे बच्चों की बलि चढ़ा दी जाती है, इनसान की जानवरों से शादी करायी जाती है, गम्भीर बीमारी या साँप काटने के बाद झाड–फूँक से मरीज की मौत हो जाती है। अन्धविश्वास से मजदूरों का इससे भी बड़ा नुकसान होता है। अन्धविश्वासी मजदूर ........
आज के दौर में साम्प्रदायिकता अपने चरम पर है। असली हिन्दू होने का मतलब मुस्लिमों से नफरत करना, उन्हें गाली देना हो गया है। भारत में साम्प्रदायिकता का अपना इतिहास रहा है और वह धीरे–धीरे बढ़ते हुए यहाँ तक पहुँची है। 1990 में देश की केन्द्र सरकार ने मेहनतकश जनता को गरीबी में झोंकने वाली नवउदारवादी नीतियों को लागू किया और अमरीका की गुलामी स्वीकार कर ली। मजदूर विरोधी इन नीतियों को साम्प्रदायिक दंगों की आड़ में लागू किया गया।........
मैं एक मजदूर हूँ और ‘मजदूर सहायता समिति’ से जुड़ा हूँ। हमारी समिति मजदूरों की राजनीतिक चेतना बढ़ाने पर बहुत जोर देती है। एक प्लांट में काम करने वाले अपने मजदूर दोस्तों के साथ बातचीत में मैंने खुद इस जरूरत को बहुत शिद्दत से महसूस किया है। अपने उसी अनुभव को आपके साथ साझा कर रहा हूँ।........
पिछले तीस साल के दौरान महिला मजदूर नयी गुलामी की चक्की में पिसती रहीं। उनकी हालत लगातार खराब होती गयी है। उनका शोषण–उत्पीड़न भी लगातार बढ़ता गया है। जहाँ पहले महिलाओं को सम्पत्ति के अधिकार से, उत्पादन के साधनों और सभी सुख सुविधाओं से अलग कर दिया गया था वहीं 1990 के दशक के बाद हालात........
गाँव के एक छोर पर जोहड़ के किनारे बसे मुस्लिम और दलित मजदूरों के मोहल्ले में हमारे चाचा और दोस्त रोजूदीन का घर है। चाचा अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन परिवार के साथ आज भी हमारा रिश्ता उतना ही गहरा है। चाचा नयी सोच के मजदूर थे, किताबें पढ़ते थे और हमने उनके घर में आम परिवारों की तरह औरतों को परदे में छिपे हुए नहीं देखा। उनका घर एक.........
सन्त कबीर को कौन नहीं जानता? कबीर मेहनत–मजदूरी करके जिन्दगी बिताने वाले इनसान थे। वे कपड़े की बुनाई किया करते थे। समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए अपने पद और दोहे लोगों को सुनाया करते थे। वे हमें प्रेरणा देते हैं कि........
“हड़ताल कौन करेगा?, मैं करूँगा, हम करेंगे।”यह नारा 1974 के ऐतिहासिक आन्दोलन में मजदूरों ने बुलन्द किया था। इस नारे के साथ लाखों मजदूरों ने 20 दिन तक रेलवे की देशव्यापी हड़ताल की थी। यह हड़ताल मजदूरों की असीम ताकत का एक नमूना थी। उन्होंने दिखा दिया कि........
अठारवीं लोकसभा का चुनाव पूरा हो गया है। भाजपा के नेतृत्व में राजद की नयी गठबन्धन सरकार बन गयी। वह कितने दिन चलेगी, कहा नहीं जा सकता। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान ही यह साफ हो चुका था कि सरकार किसी भी पार्टी की बने, वह मजदूर वर्ग का........
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