प्राइवेट हॉस्पिटल में कार्यरत एक महिला गार्ड से बातचीत

01 Feb 2022 • मजदूर एकता पुस्तिका- ३ • 5 बार पढ़ा गया

आज से लगभग 15 साल पहले एक मजदूर परिवार मेरठ के गाँव नारंगपुर जाठोला से मलियाना में आकर बस गया था। गाँव के आर्थिक और सामाजिक परिवेश ने इस परिवार को जड़ से उखाड़ दिया। गाँव में खेती न होने और रोजी–रोटी का कोई और जरिया न होने के कारण इस परिवार को अपना गाँव छोड़ना पड़ा। अब इस परिवार को गन्दगी और कूड़े से भरे तालाब के पास सिर ढकने के लिए कच्ची छत मिल पायी है। परिवार में पति–पत्नी और तीन बच्चे हैं। पति राजमिस्त्री हैं, लेकिन चिनाई का काम बारह महीने चलता नहीं, इसलिए खराब सेहत के बावजूद पत्नी को गार्ड की नौकरी करनी पड़ती है। उनका दो कमरों का एक टूटा–फूटा घर है। एक कमरे के बाहर छप्पर डालकर एक घेर बना है उसी में जमीन पर गैस–चूल्हा रखकर खाना पकाया जाता है और वहीं पीछे ईटों से बना बिना दरवाजे का एक टॉयलेट है जिस पर पर्दा लटका दिया गया है। आसपास के इलाके में साफ सफाई की कमी और घर के ठीक पीछे ही तालाब में सड़ते कूड़े–करकट की वजह से मच्छर–मक्खियाँ झुण्ड के झुण्ड हमला करते रहते हैं। पूरे इलाके में गन्दे और प्रदूषित पानी पीने की वजह से लोगों को पेट की बीमारी बनी रहती है। इस सर्वे में जिस महिला गार्ड के बारे में बताया जा रहा है, वे भी पेट की गम्भीर बीमारी से जूझ रही हैं। इतनी भयावह परिस्थितियों में भी वह जीवन से निराश नहीं हैं। घर की माली हालत खराब है फिर भी उनके तीनों बच्चे पढ़ाई कर पा रहे हैं।

वह अपने बारे में बताते हुए कहती हैं–– मैं प्राइवेट हॉस्पिटल में गार्ड का काम करती हूँ। काम 8 घण्टे भी चलता है और 12 घण्टे भी। लेकिन मैं 8 घण्टे वाली शिफ्ट में काम करती हूँ। 8 घण्टे काम करने पर 6000 और 12 घण्टे काम करने पर 8500 मिलता है। मुझे यह काम करते हुए 8 साल हो गये हैं। नाइट ड्यूटी भी होती है। मैं आज भी नाइट ड्यूटी करती हूँ। नाइट ड्यूटी दूसरे हॉस्पिटल में करती हूँ। इसलिए नाइट ड्यूटी करने पर सैलरी ज्यादा (ओवरटाइम) मिलने का सवाल ही नहीं है।

मेरे साथ बारह–तेरह महिलाएँ दिन में ही काम करती हैं, नाइट ड्यूटी में इससे भी ज्यादा काम करती हैं। इनमें से कुछ महिलाओं की हालत तो बहुत अच्छी है उसके बावजूद काम कर रही हैं, लेकिन कुछ की हालत मुझसे भी खराब है। एक महिला तो ऐसी है जिसके पति का पैर टूट गया है और घर में बच्चे भी हैं, फिर भी उसे काम पर आना पड़ता है। दो–तीन महिलाएँ आसपास की ही हैं, बस कभी–कभार उनके यहाँ आना–जाना होता है।

वह आगे कहती हैं–– लंच ब्रेक तो नहीं होता लेकिन फिर भी हम लोग लंच कर लेते हैं। भीड़ कम होने का इन्तजार करते रहते हैं जैसे ही भीड़ कम होती है हम लंच कर लेते हैं। इसके लिए न हमें कुर्सी मिलती है और न ही अलग से रूम, बल्कि कहीं भी गैलरी में या कोने में बैठकर खाना खा लेते हैं। हॉस्पिटल की तरफ से दिन में एक चाय मिलती है, उसकी भी क्वालिटी खराब होती है।

यह पूछने पर कि आपको एक जगह खड़ा रहना होता है या गश्त भी करती हैं? उन्होंने कहा–– दोनों ही करना पड़ता है। कभी–कभी गेट पर खड़ा रखते हैं कभी वार्ड में ड्यूटी लगाते हैं और कभी–कभी पेट्रोलिंग भी करनी पड़ती है। कई गेट हैं, कभी–कभी अलग–अलग गेट पर गश्त भी करनी पड़ती है।

तनख्वाह बढ़ाने की बात पर वह कहती हैं–– 4 साल पहले बढ़ाई थी। पहले चार हजार रुपये थी लेकिन छ: हजार रुपये हो गये। पिछले 4 साल से तो बढ़ाई भी नहीं है। सुनने में आ रहा है कि जनवरी में बढ़ाएँगे लेकिन ऐसा लगता नहीं है। क्योंकि हर साल ऐसा ही कहते हैं और बढ़ाते नहीं हैं। हमने तो ठेकेदार से बोला भी था कि हमें भले ही दिवाली पर कुछ मत दो लेकिन हमारी सैलरी बढ़ा दो। लेकिन नहीं बढ़ायी। दिवाली पर बस आधा किलो सोनपापड़ी दे कर टरका दिया।

हम पति–पत्नी दोनों ही काम करते हैं। इसलिए हममें से हर एक को 8 घण्टे वाली शिफ्ट के लिए कम से कम 10 हजार तो मिलना ही चाहिए, तब जाकर काम चल पाएगा। 12 घण्टे वाली शिफ्ट के लिए तो कम से कम 15 हजार मिलना ही चाहिए। यानी परिवार की कुल आमदनी 20 हजार रुपये से ऊपर होनी चाहिए।

आप महिला हैं, आपको मजदूरी करने के साथ–साथ घर का काम भी करना पड़ता है, बहुत ही मुश्किल होती होगी? इसके जवाब में वह कहती हैं–– शुरू में बहुत परेशानी होती थी। जब बच्चे हुए तो दिक्कत बढ़ गयी और काम छूट गया। पति ने काफी सहारा दिया। लेकिन अब बच्चे बड़े हो गये हैं और वे भी काम में हाथ बँटाते हैं, इन सबके चलते उतनी ज्यादा दिक्कत नहीं होती। एक बात और है–– अब तो परेशानी उठाने की आदत सी हो गयी है। मैंने तो दिन और रात दोनों पाली में ड्यूटी की है आज भी करती हूँ।

संजय वन के सामने कपड़े की फैक्ट्री में पावरलूम का काम होता है। पहले मैं उसमें काम करती थी। उसमें तो इससे भी कम रुपये मिलते थे। वहाँ 3500 रुपये पर ही काम करना पड़ता था। गार्ड वाला काम फैक्ट्री के काम से थोड़ा आरामदायक है, लेकिन कभी–कभी ऐसा होता है कि सुबह 8 बजे से शाम को 4 बजे तक खड़े ही रहना पड़ता है। अभी कुछ दिन पहले एक नेता आये थे। देखरेख में हमें सुबह से शाम तक खड़ा ही रहना पड़ा था। मुझे तो थकान की वजह से बुखार भी हो गया था, बच्चों ने टेबलेट लाकर दी तो ठीक हुई।

मैं अलग–अलग प्राइवेट हॉस्पिटल में नौकरी करती रही हूँ, लेकिन मेरी ही तबियत खराब हो जाये, तो उनमें इलाज नहीं करा सकती क्योंकि वे अपने कर्मचारियों से भी इलाज के मनमाने पैसे लेते हैं और उनका इलाज इतना महँगा है कि हम उसे नहीं दे सकते। इसलिए मेडिकल स्टोर से या गली–नुक्कड़ के झोला छाप डॉक्टर से दवा लेते हैं।

क्या आपकी नौकरी सीधे प्राइवेट हॉस्पिटल वालों ने दी है या आपका मालिक कोई और है?

इस सवाल के जवाब में महिला बोली–– नहीं, हम सीधे प्राइवेट हॉस्पिटल से नहीं जुड़े हैं। हमारा मालिक देहरादून का है वह इसी तरह का काम करवाता है। हमारे ऊपर एक ठेकेदार है। वह बगल के गाँव में रहता है। एक बार हॉस्पिटल में वैकेंसी निकली थी, लेकिन हमारा कोई सोर्स नहीं था इसलिए हमारा फार्म कैंसिल हो गया। मेरे ठेकेदार ने मुझे एनओसी भी नहीं दी।

मालिक से कभी–कभी मुलाकात हो जाती है। पिछले आठ सालों में केवल दो बार मुलाकात हुई है। मालिक वहाँ से चेक भिजवा देता है और ठेकेदार हमें यहाँ सैलरी दे देता है। ठेकेदार का बरताव बहुत बुरा है। एक–दो बात तो ठीक से करता है फिर डाँट–फटकार लगाना शुरू कर देता है। मेरी तो कई बार उससे झड़प भी हो गयी है।

क्या आपकी ठेकेदार से झड़प हो जाने के बावजूद वह सैलरी समय पर दे देता है?

महिला ने उत्तर दिया–– सैलरी क्यों नहीं देगा, हम लोगों से ही तो उसको फायदा होता है। मालिक से दस हजार लेता है और हमें छ: हजार ही देता है। इतने सारे गार्ड हैं, सोचिए उसे कितना फायदा होता होगा।

क्या बीमार होने पर आपको छुट्टी मिलती है? इसके जवाब में महिला ने कहा–– बीमार होने पर भी कोई छुट्टी नहीं मिलती है। अगर काम पर जाने के बाद बीमार हुए तो कहते हैं कि जब बीमार थे तो आये ही क्यों? कहते हैं कि दवाई ले लो और समय पर चले जाना। इसलिए थोड़ी बहुत तबीयत खराब होने पर काम पर चली जाती हूँ। ज्यादा बीमार होने पर छुट्टी करनी ही पड़ती है लेकिन उसका कोई पैसा नहीं मिलता है। ये तो त्योहारों की भी छुट्टी नहीं करते। अभी मैंने दिवाली की छुट्टी की थी तो उसके भी पैसे काट लिये थे। अगर हम सीधे प्राइवेट हॉस्पिटल से जुड़कर काम करते तो रविवार की छुट्टी मिलती लेकिन ठेकेदार हमें रविवार की भी छुट्टी नहीं देता है।

मेरी सैलरी इतनी कम है और मैं बीमार भी रहती हूँ, पैसे तो कुछ नहीं बचते क्योंकि महीने में 4–5 छुट्टियाँ हो जाती हैं। आखिर में तनख्वाह भी ज्यादा से ज्यादा पांच हजार मिलती है। इसी में दवाइयों का भी खर्चा है।

(तभी छोटे लड़के ने बताया कि मम्मी तो महीने में एक हफ्ता ही ठीक रहती हैं। डॉक्टर ने बाकी दवाओं के साथ कैल्शियम और विटामिन की गोलियाँ दी थीं जिसे माँ ने नहीं खाया तो बड़े भाई ने खा लिया।)

आप पति–पत्नी की कमाई से घर का खर्च चल जाता है? अपने बेटे की ओर इशारा करते हुए वह बोली–– इसके पापा का काम अगर चलता रहता है तब तो ज्यादा दिक्कत नहीं होती, लेकिन कभी–कभी पन्द्रह–बीस दिन तक काम नहीं मिलता तो बहुत परेशानी खड़ी हो जाती है।

यह है एक ऐसे परिवार की कहानी जो हॉस्पिटल को सुरक्षा मुहैया कराता है और खुद ही किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा से वंचित है।

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