कोरोना महामारी का बहाना बनाकर देश के कई राज्यों ने श्रम कानूनों में बदलाव करके मजदूरों पर हमला बोल दिया गया है। इसमें उत्तर प्रदेश सरकार सबसे आगे है। योगी सरकार ने 38 श्रम कानूनों में से लगभग 35 श्रम कानूनों को अगले 3 सालों के लिए स्थगित कर दिया है। श्रम कानूनों को खत्म करना मजदूरों को कई दशकों से मिलते आ रहे अधिकारों और सुविधाओं से वंचित करना है। इनको हासिल करने के लिए मजदूरों ने न जाने कितनी लड़ाइयाँ लड़ी और कुर्बानियाँ दी हैं। श्रम कानूनों को खत्म करने का सिलसिला 1990 के बाद से ही शुरू हो गया था और सरकारें इसे जल्द से जल्द खत्म करना चाहती थीं। लेकिन मजदूर संगठनों के दबाव और विरोध के चलते यह काम इतना आसान नहीं था। कोरोना महामारी के दौरान पहले से ही संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था को सुधारने और निवेश बढ़ाने के नाम पर सरकार ने श्रम कानूनों को पूँजीपतियों के हक में ढील दे दी और ‘आपदा को अवसर’ में बदल लिया है।
श्रम कानून मजदूरों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। श्रम कानूनों को खत्म कर देने से मजदूरों को संगठित होने और अपने हक के लिए आवाज उठाने का कानूनी अधिकार नहीं रहा। फैक्ट्री मालिक मजदूरों से मनमानी शर्तों पर काम करवाने लगे। काम के घण्टे बढ़ा दिये गये और अब न्यूनतम मजदूरी की कोई गारण्टी नहीं रही। मजदूरों को नौकरी से निकाल दिये जाने या अन्य किसी भी प्रकार के विवाद होने पर अब उनकी कोई भी शिकायत नहीं सुनी जाएगी। मजदूरों को मिलने वाली छुट्टी, सुरक्षा व्यवस्थाएँ, कैण्टीन की सुविधा आदि सभी खत्म कर दिये जाएँगे। उन्हें कोई बोनस नहीं दिया जाएगा। दुर्घटना होने पर उनके इलाज और मुआवजे की कोई व्यवस्था नहीं होगी। कुल मिलाकर बात यह है कि सरकार ने मजदूरों को गुलामों से भी बदतर हालत में रखने की कवायद जोर–शोर से शुरू कर दी है।
कोरोना महामारी से पहले भी मजदूरों की हालत बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन इस महामारी ने मजदूरों को कंगाल बना दिया है। ज्यादातर मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है और जो मजदूर काम पर जा भी रहे हैं उनसे 10–12 घण्टे काम करवाया जा रहा है और पूरी मजदूरी भी नहीं दी जा रही है। एक तरफ दिन–रात मेहनत करने के बावजूद मजदूरों को खाने के लाले पड़े हुए हैं तो दूसरी ओर पूँजीपतियों की दौलत लगातार बढ़ रही है।
आज कोरोना महामारी के कारण मालिक लोगों को काम से छाँट रहे हैं, बेरोजगारी अपने चरम पर है और काम न मिलने के कारण मजदूर परिवारों की हालत बद से बदतर हो रही है, ऐसी हालत में हमारे देश की सरकारें मजदूरों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा देने के बजाय उन्हें उनके रहे–सहे अधिकारों और सुविधाओं से भी वंचित कर रही हैं।
छोटी फैक्ट्रियों और कारखानों में काम करने वाले मजदूर, दुकानों और मॉल में काम करने वाले मजदूर, ठेला और रिक्शा चलाने वाले, टेंपो और दूसरी छोटी गाड़ियों के ड्राइवर, अस्पताल, स्कूल और कॉलेजों में काम करने वाले मजदूर, मोमो–चाउमीन, पकौड़े, पापड़ और सब्जी की ठेली लगाने वाले, चिनाई, बेलदारी, फिटिंग, सैटरिंग, प्लम्बर का काम करने वाले मजदूर, झाड़ू–पोंछा और सफाई करने वाले मजदूर, घरेलू काम करने वाले बच्चे और महिलाएँ, नाई, धोबी और ऐसे ही छोटे–मोटे काम करके गुजारा करने वाले मजदूरों की गिनती असंगठित क्षेत्र में होती है। ऐसे मजदूर अधिकतर गाँव से उजड़ कर शहरों में अपनी आजीविका की तलाश में आते हैं। इनमें ऐसे मजदूर भी शामिल हैं जो फसल की बुवाई और कटाई के समय गाँव चले जाते हैं और बाकी समय में शहरों और महानगरों में मजदूरी करने के लिए वापस आ जाते हैं क्योंकि केवल खेती के काम से उनका गुजारा नहीं हो पाता है।
असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की आमदनी बहुत कम होती है और कभी–कभी तो जिन्दगी जीने के लिए भी पर्याप्त नहीं होती है। वैसे भी श्रम कानूनों का लाभ संगठित क्षेत्र के मजदूरों को ही मिलता है जिसमें बड़ी–बड़ी फैक्ट्रियों में स्थायी तौर पर काम करने वाले मजदूर आते हैं। असंगठित क्षेत्र के मजदूर पहले से ही ज्यादातर श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हैं, हालाँकि कुछ श्रम कानूनों का लाभ उन्हें भी मिलता था। जैसे–– निर्माण मजदूरों के लिए 1996 में दो कानून पास हुए थे। एक था बिल्डिंग एण्ड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स एक्ट और दूसरा द बिल्डिंग एण्ड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर सेस एक्ट। पहले कानून में मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याणकारी योजनाओं का प्रावधान है तो दूसरे में उनके लिए फण्ड की व्यवस्था करने का। इसी तरह असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के लिए भी कुछ कानून हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को बहुत कम कानूनी हक मिले हुए हैं।
असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के रोजगार की कोई गारण्टी नहीं होती है। ठेकेदार जब चाहे इन्हें काम पर रख सकता है या बाहर निकाल सकता है। इनके रहने के लिए घर और पीने के लिए साफ पानी की कोई व्यवस्था नहीं होती है। सड़कों के किनारे फुटपाथ पर, फ्लाईओवरों के नीचे या शहरों के बाहर गन्दी बस्तियों में रहने को मजबूर होते हैं। ऐसे मजदूरों के लिए इलाज, दुर्घटना होने पर मुआवजा, बच्चों के शिक्षा की व्यवस्था, उनके वेतन, अवकाश और पेंशन की कोई ठोस योजना नहीं होती है। कोरोना महामारी के दौरान सबसे अधिक परेशानी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को ही उठानी पड़ रही है। अकसर ऐसा होता है कि इनके घरों में खाने के लिए राशन और इलाज के लिए पैसे भी नहीं होते हैं। सरकार ने भी इन्हें इनके हाल पर ही छोड़ दिया है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का कोई देशव्यापी संगठन भी नहीं है जो इनकी परेशानियों और माँगों को उठा सके।
मुख्य बात यह है कि मजदूरों के संघर्ष के चलते जो कानूनी अधिकार संगठित क्षेत्र को मिले हुए हैं, उनका विस्तार असंगठित क्षेत्र तक भी किया जाये और उन्हें जमीन पर लागू करवाने की लड़ाई लड़ी जाये। लेकिन ऐसा न होकर उल्टे जिन संगठित क्षेत्र के मजदूरों को श्रम कानूनों का लाभ मिलता था, उनसे भी उनका यह हक छीना जा रहा है। इसलिए आज मजदूरों के सामने दुहरी लड़ाई है, श्रम कानूनों को बचाने की लड़ाई और उनका असंगठित क्षेत्र तक विस्तार करके जमीन पर लागू करवाने की लड़ाई।
अब मजदूरों के पास दो ही रास्ते हैं। पहला रास्ता यह है कि मजदूर सरकार और पूँजीपतियों की मिलीभगत से चल रही इस अमानवीय व्यवस्था में भूख और बीमारी से तड़पकर दम तोड़ दें या फिर एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण के लिए कमर कस लें जिसमें काम के घण्टे ऐसे निर्धारित हो कि वे अपने परिवार के साथ समय बिता सकें और उनके पास मनोरंजन के लिए भी पर्याप्त समय हो। मजदूर और उनके बच्चों के लिए शिक्षा और इलाज की व्यवस्था सरकार निशुल्क करे। हर एक आदमी के पास काम हो और सभी अपनी इच्छा और योग्यता के अनुसार काम का चुनाव करें। हर आदमी अपनी क्षमता के अनुसार काम करे और जरूरत के अनुसार उपभोग करे।
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