आलू गोदाम में काम करने वाली महिला मजदूरों की हालत
मजदूर एकता पुस्तिका के दूसरे अंक में मलियाना के उत्तरी इलाके में गिल्ली ठोकनेवाले मजदूरों का सर्वे छपा था। उस दौरान हमें कुछ ऐसे काम की भी जानकारी मिली जो इस इलाके की महिलाएँ करती हैं, उनमें आलू गोदाम में काम करनेवाली महिला मजदूर मुख्य हैं।
मलियाना का उत्तरी इलाका घनी मजदूर आबादी वाला है। यहाँ के मजदूर अस्थाई और खुली मजदूरी करते हैं। यहाँ न तो कोई प्राथमिक स्कूल है और न ही कोई सरकारी चिकित्सा परामर्श केन्द्र। एक सर्वे के दौरान हमको यह पता चला कि बच्चों से बूढ़ों तक को खुजली, खासी–बुखार, एलर्जी जैसी बीमारियाँ हैं और कम उम्र के बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। उसी दौरान यह पता चला कि यहाँ की कुछ महिलाएँ आलू गोदाम में काम करती हैं। लगभग नौ से दस महिलाएँ हैं जिनमें से तीन महिलाओं की उम्र पच्चास साल से ऊपर, चार महिलाओं की उम्र पैंतीस साल के आस–पास और अन्य कुछ लड़कियाँ हैं जिनकी उम्र बीस से पच्चीस साल के बीच है।
हमने जिस महिला से बात की उनकी उम्र बत्तीस साल है। उनके घर में पाँच सदस्य हैं–– एक लड़का और एक लड़की इण्टर पास हैं। महिला के पति और देवर दोनों मकानों में पुताई का काम करते हैं।
महिला से सवाल पूछने पर उन्होंने बड़ी ही नरमी और सहजता से जवाब दिया। उन्होंने हमें बताया कि वह आलू गोदाम में आठ साल से काम कर रही हैं। इलाके से नौ महिलाएँ उसके साथ काम पर जाती हैं। जाड़ा हो या गर्मी वे नौ बजे काम के लिए निकल जाती हैं और आने का कोई टाइम नहीं है, कभी छ: बजे आ जाती हैं तो कभी आठ बजे, माल के ऊपर निर्भर करता है। वे सब टैम्पो से जाती हैं। आने–जाने में एक महिला के बीस रुपये लग जाते हैं। सीजन के समय माल ज्यादा होने पर काम ज्यादा होता है। ऑफ सीजन में काम कम होता है।
हमने पूछा कि किस हिसाब से दिहाड़ी मिलती है? उन्होंने बताया कि ठेके का काम है, नौ रुपये कट्टा हिसाब है। एक दिन में हम जितने कट्टे गोदाम से निकलवा लेते हैं उतने कट्टे के पैसे मिलते हैं, गोदाम से निकलवाने के बाद हमने कितने कट्टे भरे उससे कोई मतलब नहीं होता। गोदाम से कितने कट्टे निकले इसका हिसाब कौन रखता है, पूछने पर उन्होंने बताया कि इसका हिसाब हमारे साथ–साथ मुनीम भी रखता है, और वही हमें पैसे भी देता है। एक दिन में वे नौ लोग मिलकर डेढ़ सौ से दो सौ कट्टे निकाल लेती हैं, यह सब माल पर निर्भर करता है। जब आलू का सीजन आता है तो माल ज्यादा निकलता है, इस दौरान हम सब तीन सौ कट्टे निकाल लेती हैं। बहुत ज्यादा माल होने पर हम सब मिलकर तीन से चार सौ कट्टे निकाल लेती हैं जिससे हममें हर एक को तीन से चार सौ रुपये मिल जाते हैं। और सबसे कम कितना मिला है? अस्सी से सौ रुपये। हमारा काम चार से पाँच महीने चलता है।
हमने पूछा कि क्या हमेशा से एक कट्टे का रेट नौ रुपये रहा है? उन्होंने बताया कि नौ रुपये तो अभी हुए हैं, इससे पहले आठ रुपये थे, और एक साल पहले साढ़े सात रुपये कट्टा था। हमने पूछा कि क्या आपको कट्टे का रेट बढ़वाने के लिए मालिक से बोलना पड़ता है या वह खुद बढ़ाता है? उनका जवाब था कि नहीं, कहना पड़ता है और इस समय दूसरे आलू मिलों में दस रुपये कट्टा देते हैं, और ये लोग नौ रुपये दे रहे हैं। इस बाबत हमने कई बार कहा लेकिन कोई सुनता ही नहीं, बोलते हैं कि छाँटना है तो छाँटों वरना काम करने वाले और भी मजदूर हैं। इन महिलाओं का यह भी कहना था कि रेट मुंशी नहीं बढ़ने देता, मालिक तो बढ़ा देगा, अच्छा आदमी है।
हमने यह भी पूछा कि आप सभी संगठन क्यों नहीं बनाते? संगठन होता तो दस क्या बारह रुपये भी हो जाते। उनका जवाब था कि अब क्या कहें, कोई इस पर बात ही नहीं करता। हमारे कहने और करने से क्या होगा, दूसरे मजदूर भी तो हैं, वे भी कुछ नहीं कहते और न हमारी सुनते हैं। इस पर मुंशी बोलता है कि तुमको ही बस दिक्कत है और कोई तो कुछ नहीं बोलता। एकजुट होने की कई बार कोशिश की है, लेकिन कुछ हुआ नहीं।
इस काम से घर का कितना खर्च चल जाता है? उन्होंने बताया कि इससे बहुत मदद हो जाती है, जब लॉकडाउन में मेरे पति का काम बन्द हो गया था तो इसी से हमारा घर खर्च चलता था और सब मैं ही देखती थी। कभी कोई समस्या आने पर मुंशी या मालिक उधार या एडवांस दे देते हैं, एक बार में चार से पाँच हजार तक दे देते हैं। बाकी कितने दिन का काम बचा है और माँगने वाला कितना पुराना है, इसपर भी निर्भर करता है। लेकिन मैंने खुद कभी उधार नहीं लिया।
हमने पूछा कि जैसा कि आपने बताया कि आपकी एक दिन की कमाई डेढ़ से दो सौ तक होती है, उसमें से आपके बीस रुपये किराये में लग जाते हैं। वहीं पुरुष मजदूर को इतने ही काम के लिए तीन सौ रुपये दिहाड़ी मिलती है। क्या आपके काम में कम मेहनत लगती है? उन्होंने बताया कि इस काम में मेहनत बहुत है। सुनने पर लगता है, बहुत आसान काम होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। इस काम को करने के बाद इनसान उठ के पानी तक नहीं पी पाता, हाथ, पैर और कमर में बहुत दर्द होता है। उनका यह भी कहना था कि इतनी धूल–मिट्टी उड़ती है कि हम ठीक से साँस भी नहीं ले पाते, अगर मुँह ढक लो तो काम करते समय साँस फूलने लगती है जिस वजह से हमें अक्सर नजला–जुकाम रहता है। इस काम से हमारे हाथ भी खराब हो जाते हैं। हमने पूछा कि मालिक दस्ताने नहीं देता? उनका जवाब था कि यह काम दस्ताने पहनकर नहीं हो पाता है।
हमने पूछा कि आप घर पर आलू वहीं से लाती हैं या खरीदती हैं? उनका जवाब था कि जो आलू खराब होते हैं या जो वे फेंक देते हैं उनमें से हम आलू का अच्छा हिस्सा काट लेते हैं जिससे हमको खरीदना नहीं पड़ता। एक दिन में हम तीन से चार किलो ले आते हैं। बचे हुए आलू को बेचते नहीं हैं, लेकिन मोहल्ले में जिनको जरूरत पड़ती है दे देते हैं। लेकिन कुछ किस्मत की मारी महिलाएँ ऐसी हैं जो बेच भी देती हैं, जिससे उनके ऊपर मुसीबत का जो पहाड़ टूटा है, वह हल्का हो जाता है।
हमने पूछा कि आज तक कभी काम के दौरान महिलाओं के साथ छेड़–छाड़ या बुरा बर्ताव हुआ है? उन्होंने बताया कि नहीं, कभी नहीं, उनकी पूरी जिम्मेदारी होती है। जब तक हम सब घर नहीं आ जाते मुंशी भी वही रहता है।
काम के दौरान मुंशी वहाँ पर रहता है या मालिक? उन्होंने बताया कि मालिक भी आ जाता है, बाप–बेटा दोनों और मुंशी तो हमेशा रहता ही है। मालिक और मुंशी कहाँ के रहने वाले हैं, पूछने पर उन्होंने बताया कि मालिक तो यहीं के हैं। लेकिन मुंशी रहने वाला बिहार का है। मुंशी ने अपना घर यहीं बना लिया है। उसका घर पीर के सामने ही है।
हमने पूछा कि मालिक का और भी कोई काम है? उन्होंने बताया कि मालिक का बर्फ का भी काम है। मटर और चाप का कोल्ड स्टोरेज भी है–– आलू गोदाम के पीछे ही।
हमने पूछा कि आप सब को यहाँ से ठेके पर कौन ले जाता है? उन्होंने बताया कि एक बूढ़ी औरत हैं, जो इस इलाके से महिलाओं को ठेके पर ले जाती हैं। हम उन्हें ठेकेदारनी कहती हैं। हमने ठेकेदारनी के घर का पता लिया और उनसे भी बात की।
उनका शरीर बूढ़ा और कमजोर हो गया है, मुश्किल से चल पाती हैं। उम्र साठ साल से ऊपर होगी। उन्हें तो अपनी उम्र भी याद नहीं है। उनका अपना घर है, सौ गज से कम में। चार हिस्से बने हुए। चार परिवार के हिसाब से। घर टूटा–फूटा ही है और टायलेट सहित हर काम के लिए जुगाड़ लगाया गया है। तीनों बेटों की शादी हो गयी है। एक बेटा मर गया। एक अपाहिज है, कुछ कर नहीं पाता। एक बेटा ट्रांसपोर्ट में मजदूरी करता है। वह हफ्तों बाहर रहता है। कोरोना लॉकडाउन में उसका काम भी बन्द हो गया था, जिससे परिवार की माली हालत बेहद खराब हो गयी थी। तीनों बेटों का परिवार घर के तीन हिस्सों में और बूढ़ी महिला चौथे हिस्से में रहती हैं।
बूढ़ी महिला अम्बाला शहर की रहने वाली हैं। मायके में इस समय उनके माँ–बाप की मौत हो गयी है, बस भाई, भतीजा और उनका परिवार है। हमने उनसे पूछा कि आप आलू गोदाम में कितने सालों से काम कर रहीं हैं? उनका जवाब था कि जब से मेरे पति की मौत हुई है, तब से। साल तो याद नहीं। पच्चीस से तीस साल हो गये होंगे। वे कहीं भी काम कर लेती हैं, खेत में भी काम मिले तो कर लेती हैं। आलू गोदाम से दिन का डेढ़ सौ कमा ही लेती हैं। कभी–कभी सत्तर रुपये। वे अपने साथ काम पर नौ औरतों को ले जाती हैं। उनके अलावा एक और बूढ़ी औरत हैं, जो काम पर जाती हैं। दोनों लड़कियों के साथ लग कर किसी तरह काम कर लेती हैं। लेकिन अकेले उनके बस का नहीं है यह काम। हमने पूछा कि मुंशी कैसा आदमी है? उन्होंने बताया कि मुंशी पटना का है और बहुत अच्छा आदमी है। उसने अपनी एक लड़की की शादी कर दी है और दो लड़के अभी जवान हैं।
गोदाम में हम लोगों के अलावा तीस से चालीस पट्टेदार भी काम करते हैं। वे कट्टे निकालते हैं गोदाम के अन्दर से और गाड़ी पर कट्टे को लादने का काम करते हैं। यह पट्टेदार ठेका लेते हैं कट्टे उतारने का और लदवाने का। वे चार से पाँच महीने काम करते हैं, जब तक माल रहता है।
यह पूछे जाने पर कि आलू गोदाम में आप लोग क्या काम करती हैं? उन्होंने बताया कि हमारा काम आलू की छँटाई का है, हम कटे गन्दे आलू, छोटे और बड़े आलू को अलग करने का काम करती हैं, फिर उनको कट्टे में भरते हैं। आलू कहाँ से आते हैं, पूछने पर उन्होंने बताया कि कोल्ड स्टोरेज में से आते हैं। छँटने के बाद आलू, भराई और तुलाई करके मण्डी में चले जाते हैं। सड़े आलू से इतनी बदबू आती है कि सहा नहीं जाता।
आलू में लगी मिट्टी से रगड़ खाकर उँगलियाँ घिस गयी हैं और भाग्य की रेखायें मिट गयी हैं। श्रम कार्ड बनवाते समय ऊँगली के निशान भी नहीं आ पाते, जिससे उनका श्रम कार्ड नहीं बन पा रहा है। यह एक विडम्बना ही है। प्रधानमन्त्री की यह योजना यहाँ आकर मजाक बनकर रह गयी है।
आलू गोदाम में काम करने वाली महिला मजदूरों की जिन्दगी बहुत कठिन है। सुबह से शाम तक जी–तोड़ मेहनत करने के बावजूद वे इतना नहीं कमा पातीं कि ठीक से घर का खर्च चला सकें, बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा सकें और बीमार पड़ने पर किसी का इलाज करा सकें। क्या हम आलू के पकवान का चटकारा भरा स्वाद लेते हुए उनके बारे में कभी सोचते हैं? क्या हम इस बात का एहसास कर पाते हैं कि जिन आलूओं के पकवान हमारी थाली में हैं, उन्होंने ही किसी मजदूर के भाग्य की रेखाओं को भी मिटा दिया है। यह सब सच है और हम उनके बारे में बहुत कम जानते हैं क्योंकि ये मजदूर लुटते–पिटते चुपचाप बिना कोई हो–हल्ला किये दर्द सहते हुए अपना काम करते रहते हैं, जिससे हमारी थाली में स्वादिस्ट व्यंजन आ सके और यह सब करते हुए एक दिन दुनिया छोड़कर चले जाते हैं।