अगस्त क्रान्ति की अमर कहानी

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

 “अगस्त क्रान्ति” मेहनतकश जनता के संघर्षों की वीर गाथा है। एक ऐसा विद्रोह जिसने अंग्रेजों को ही नहीं बल्कि अत्याचारी जमींदारों, राजाओं और कारखाना मालिकों को नाकों चने चबाने के लिए मजबूर कर दिया। यह विद्रोह उस समय हुआ जब दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध का विनाश झेल रही थी। हिटलर समेत सभी फासीवादी ताकतों ने पूरे यूरोप में तबाही मचा रखी थी। इस युद्ध में हजारों लोग हर रोज अपनी जान गवाँ रहे थे। अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों को जबरन इस लड़ाई मे झोंक दिया था। इस लड़ाई में बेमौत मरते अपनो को देख भारत की जनता का गुस्सा अंग्रेजों पर फूटने लगा। युद्ध के सामानों की आपूर्ति के लिए कारखानों में मजदूरों से 16–16 घण्टे जबरन काम कराया जा रहा था। वहीं दूसरी ओर पहले से जमींदारों और सामन्तों का शोषण झेल रहे किसानों पर बेहिसाब टैक्स लगाकर उन्हें तिल–तिल मरने को मजबूर कर दिया गया। किसान, मजदूर, नौजवान और बेबस महिलाओं समेत देश की बहुसंख्यक आबादी पर रोज नयी मुसीबतों के पहाड़ टूट रहे थे।

इतने अत्याचारों के बावजूद आम जनता का मनोबल नहीं टूटा बल्कि उसने संघर्ष का रास्ता चुना। जनता ने अलग–अलग लड़ने के बजाय एक साथ मिलकर अपना संघर्ष तेज किया। यही संघर्ष “अगस्त क्रान्ति” के रूप में जाना जाता है। इस आन्दोलन की शुरुआत 9 अगस्त 1942 को मुम्बई के एक मैदान से “अंग्रेजों भारत छोड़ो” के नारे के साथ हुई। बाद में वह मैदान अगस्त क्रान्ति के नाम से जाना गया। आन्दोलन देखते–देखते पूरे देश में फैलने लगा। हर जगह आन्दोलन और हड़तालों का सिलसिला चल पड़ा। शुरू में कुछ सुधारवादी नेताओं ने इस आन्दोलन को अपने ङ्क्तभाव में लेने का ङ्क्तयास किया। उनका कहना था कि पहले हम युद्ध में अंग्रेजों की मदद करेंगे, बदले में अंग्रेज हमें आजादी दे देंगे। लेकिन जनता जल्दी ही समझ गयी कि यह केवल एक झाँसा है। इसलिए जनता खुद अपने हकों के लिए सड़कों पर आ गयी। सरकारी ईमारतों के साथ–साथ डाक–तार विभाग, रेलवे यातायात पर आन्दोलनकारियों ने कब्जा करना शुरू कर दिया। मजदूर काम बन्द कर हड़ताल पर चले गये। नौजवानों और क्रान्तिकारियों ने गाँव–गाँव जाकर ङ्क्तचार–ङ्क्तसार करके आन्दोलन को तेज करने का काम किया। आन्दोलन को और आगे बढ़ाने का काम युगान्तर और अनुशीलन जैसी क्रान्तिकारी संस्था ने किया।

बनारस में 13 अगस्त को एक विशाल जुलुस निकाला गया। बच्चे, बूढ़े, छात्र–नौजवान और महिलाओं ने इसमें बढ़–चढ़कर हिस्सा लिया। बनारस की सड़क आजादी के नारों से गूँजने लगीं। शहर में जनता का शैलाब उमड़ पड़ा। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र, अध्यापक और छोटी–छोटी गलियों से आम जनता तक सभी इसमें शामिल हो गये। इतने विशाल जुलुस को देखकर अंग्रेज सरकार के हाथ–पैर फूल गये और वह किसी भी तरह आन्दोलन को कुचलने की तैयारी में जुट गयी। जैसे ही जुलुस गंगा पुल के पास पहुँचा पुलिस ने सामने से आकर जुलुस का रास्ता रोक लिया। थोड़ी देर बाद पुलिस निहत्थे आन्दोलनकारियों पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलाने लगी। चारों ओर हाहाकार मच गयी। कितने ही लोग लहूलुहान होकर जमीन पर गिर पड़े। जैसे ही लोग घायलों को उठाने पहुँचे, पुलिस ने उन पर लाठियाँ बरसानी शुरू कर दी। इतने भयंकर दमन के बाद भी बनारस के आन्दोलनकारियों का मनोबल नहीं टूटा। घायलों को किसी तरह अस्पतालों में भर्ती कराया गया। लोगों का लम्बे समय से चला आ रहा गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा। आधी रात होने के बावजूद लोग घर नहीं लौटे, सड़कों पर डटे रहे। हर गली–मोहल्ला शहीदों की जय–जयकार और आजादी के नारों से गूँज रहा था। लोगों का हुजूम अगले कई दिनों तक बनारस की सड़कों पर जमा रहा। देखते–देखते इसी तरह के आन्दोलन देश के हर हिस्से में बढ़ने लगे।

इस विद्रोह को सफल बनाने में मजदूरों की अहम भूमिका रही थी। अंग्रेजों की कमर तोड़ने का असली काम भारत के मजदूरों ने किया। 1942 में युद्ध में फँसा इंग्लैण्ड अपने लिए खाद्य सामग्री की आपूर्ति भारत के मजदूरों को दिन–रात कारखानों में खपाकर कर रह था। लेकिन मजदूरों ने एक आ”वान पर काम करना बन्द कर दिया और कारखानों के बाहर हड़ताल पर बैठ गये। रेल मजदूरों ने रेल रोको अभियान शुरू कर दिया। कारखाने और रेल बन्द होने से अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिल गयी। एक तो माल कम पड़ने लगा, दूसरा आवाजाही का कोई साधन न मिलने से सैनिक गतिविधियाँ भी कमजोर पड़ने लगीं। मजदूरों की हड़ताल किसी एक जगह न होकर अब बहुत तेजी से देश के कोने–कोने तक फैलने लगी। अंग्रेजी शासन के खात्मे के साथ–साथ मजदूरों ने अपनी माँगों पर भी संघर्ष शुरू कर दिया था।

1942 की “अगस्त क्रान्ति” की सफलता मजदूर, नौजवान और किसानों की एकता पर बनी थी। 1857 के बाद का यह विद्रोह दूसरी जंगे आजादी कहा जाने लगा। जनता ने अपनी साझा ताकत का एहसास अंग्रेजी हुकूमत को करा दिया था। यह आन्दोलन एक और मामले में अलग था कि इसने संवैधानिक सुधार के कानूनी रास्ते का बहिष्कार कर दिया। अंग्रेजों ने जनता के आन्दोलन को गुमराह करने के लिए देश के कुछ हिस्सों में चुनाव कराये। यह काम उन्होंने लोगों को जन–आन्दोलन के रास्ते से हटाने के लिए किया। लेकिन आन्दोलन से जुड़े क्रान्तिकारियों ने इन चुनावों का बहिष्कार किया। उन्होंने कहा कि चुनाव एक ढकोसला है, असली आजादी तो लड़कर ही हासिल होगी। उन्होंने भगतसिंह के ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ के नारे को बुलन्द किया, जिस कारण इसका ङ्क्तभाव क्षेत्र उन रियासतों तक भी गया जहाँ पहले कोई विद्रोह नहीं पहुँच पाया था। यह आन्दोलन सुधारवाद को खारिज करते हुए जनता की असली लड़ाई तक पहुँचा था। अंग्रेजी शासन के भयंकर दमन के बाद भी उनके लिए अब शासन करना पहले जितना आसान नहीं रह गया। जनता हर रोज नयी उफर्जा और उम्मीद के साथ एक नये संघर्ष की तरफ बढ़ रही थी। देश की आजादी में “अगस्त क्रान्ति” का बहुत बड़ा योगदान है।

देश को आजाद हुए 70 साल से भी ज्यादा समय हो गया, लेकिन आज भी अधिकतर मेहनतकश आबादी तंगहाली, गरीबी और अभाव में जीने को मजबूर है। तब से अब तक मेहनतकश आबादी की जिन्दगी में छोटे–मोटे सुधारों के अलावा कोई मौलिक बदलाव दिखायी नहीं देता। दिन–रात जी–तोड़ मेहनत करने के बाद भी उन्हें मूलभूत जरूरतों से वंचित रहना पड़ता है। दिन पर दिन बढ़ती महँगाई और बेरोजगारी ने हालत को बद से बदतर बना दिया है। दूसरी तरफ इसी देश के मुट्ठीभर सेठों की दौलत बिना कुछ काम किये दिन–दूनी, रात–चौगुनी बढ़ रही है। आखिर इसका रहस्य क्या है? आज करोड़ों मेहनतकश लोगों के शोषण से कुछ लोग आबाद हो रहे हैं?

आज मेहनतकश आबादी का एक बड़ा हिस्सा मालिक और सेठों द्वारा फैलाये झूठ के जाल में फँसा हुआ है। वह मान बैठा है कि उसकी जिन्दगी में कोई बदलाव नहीं हो सकता। हताश और निराश होने के कारण वह अपने को कमजोर समझने लगा है। लेकिन इतिहास इस बात को गलत साबित करता है। साधारण समझे जानेवाले मेहनतकश लोगों ने कितनी ही बार इतिहास को भी किसी इमारत की तरह रचा है। अपने हकों को लड़कर हासिल किया है। आज इतिहास के उन पन्नों को दुबारा पलटने की जरूरत है। हमारे देश का एक ऐसा ही जनविद्रोह “1942 की अगस्त क्रान्ति” के नाम से इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

आज जनता के संघर्षों की अमर गाथा “अगस्त क्रान्ति” को इतिहास के पन्नों से हटाने का काम किया जा रहा है। समस्याओं से अकेले–अकेले लड़ते हुए मेहनतकश आबादी कभी अपने दुखों को दूर नहीं कर सकती। उसे इतिहास के उन पन्नों को दोबारा पलटना होगा जिसमें उसकी एकजुटता, साहस और वीरता की हजारों कहानियाँ मौजूद हैं। अगस्त क्रान्ति हमें यह भी सिखाती है कि शोषित–उत्पीड़ित जनता के दुख–दर्द दूर करने के लिए कोई मसीहा नहीं आयेगा, न ही छोटे–मोटे सुधारों से उसकी हालत बदलेगी। उसे खुद आगे बढ़कर अपने लिए एक सच्चे संगठन का निर्माण करना होगा। आपसी भेदभाव को भुलाकर एकता कायम करनी होगी। यही उसकी आजादी की एकमात्र शर्त है।

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