अक्लमन्द, मूर्ख और गुलाम

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

एक गुलाम हमेशा लोगों का इन्तजार करता रहता था, जिससे उनके सामने अपना दुखड़ा रो सके। वह बस ऐसा ही था और बस इतना ही कर सकता था। एक दिन वह एक अक्लमन्द आदमी से मिला।

‘‘श्रीमान!” वह उदास स्वर में रोते हुए बोला, उसके गाल आँसुओं से भीग गये, ‘‘आप जानते हैं, मैं कुत्ते जैसी जिन्दगी जी रहा हूँ। मुझे दिन भर में एक बार भी खाना नसीब नहीं, और अगर मिलता भी है तो बस वही बाजरे की भूसी, जिसे सुअर भी नहीं खाता। और उसकी भी क्या शिकायत करूँ जो एक छोटी कटोरी भर से ज्यादा नहीं मिलतीं।”

‘‘यह तो वाकई बहुत बुरा है,” अक्लमन्द आदमी ने सहानुभूति जतायी।

‘‘और क्या?”, वह कुछ उत्तेजित हो उठा, ‘‘जबकि मैं सारा दिन और सारी रात खटता रहता हूँ। पौ फटते ही मुझे पानी भरना पड़ता है, साँझ को मैं खाना पकाता हूँ, सुबह मैं सौंपे गये काम निपटाता हूँ, शाम को मैं गेहूँ पीसता हूँ, जब मौसम अच्छा होता है तो मैं कपड़े धोता हूँ, और जब बारिश होती है तो मुझे छाता थामना पड़ता है, जाड़े में मैं अँगीठी सुलगाता हूँ, और गर्मी में पंखा झलता हूँ। आधी रात को मैं खुम्मियाँ उबालता हूँ और जुआरियों की पार्टियों में व्यस्त अपने मालिक का इन्तजार करता हूँ। लेकिन कभी मुझे कोई बख्शीश नहीं मिलती, बस जब–तब चाबुक ही खानी पड़ती हैं।”

‘‘मेरे प्यारे” अक्लमन्द आदमी ने नि:श्वास छोड़ी। उसकी आँखों के किनारे कुछ–कुछ लाल हो चुके थे, मानो अब वह रो देने वाला हो।

‘‘मैं ऐसे नहीं जी सकता, श्रीमान। मुझे कोई न कोई उपाय ढूँढना ही होगा। लेकिन मैं क्या करूँ?”

‘‘मुझे विश्वास है कि हालात जरूर सुधरेंगे।”

‘‘क्या आप ऐसा सोचते हैं? निश्चय ही मैं इसकी उम्मीद करता हूँ। लेकिन अब जबकि मैंने आपको अपना दुखड़ा सुना दिया है और आपने इतनी हमदर्दी के साथ मेरा हौसला बढ़ाया है, मैं पहले से बेहतर महसूस कर रहा हूँ। इससे जाहिर होता है कि अभी भी दुनिया में कुछ इंसाफ है।”

हालाँकि थोड़े ही दिन बाद वह फिर उदासी से भर उठा और अपना दुखड़ा सुनाने के लिए किसी दूसरे आदमी से मिला।

‘‘श्रीमान!” उसने आँसू बहाते हुए सम्बोधित किया, ‘‘आप जानते हैं, जहाँ मैं रहता हूँ वह सुअरबाड़े से भी बदतर जगह है। मेरा मालिक मुझे आदमी नहीं समझता। वह अपने कुत्ते को मुझसे दस हजार गुना बेहतर समझता हैं।”

‘‘उसका सत्यानाश हो!” दूसरे व्यक्ति ने इतने जोर से गाली दी कि गुलाम भौचक्का रह गया। यह दूसरा आदमी मूर्ख था।

गुलाम ने कहा, ‘‘मैं जिसमें रहता हूँ, श्रीमान, वह टूटी–फूटी एक कमरे वाली झोपड़ी है, जिसमें सीलन, ठण्डक और बेशुमार खटमल है। ज्यों ही मैं सोने जाता हूँ वे काटने लगते हैं। वह जगह बदबू से भरी हुई है और उसमें एक भी खिड़की नहीं है––।”

मूर्ख ने पूछा, ‘‘क्या तुम अपने मालिक से एक खिड़की बनवाने के लिए कह सकते हो?”

गुलाम बोला, ‘‘मैं कैसे कह सकता हूँ?”

मूर्ख ने जवाब दिया, ‘‘ठीक है, मुझे दिखाओ वह जगह कैसी है।”

मूर्ख आदमी गुलाम के पीछे–पीछे उसकी झोपड़ी में गया और मिट्टी की दीवार पर चोट करने लगा।

‘‘यह आप क्या कर रहे हैं, श्रीमान?” गुलाम डर गया था।

मूर्ख ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए एक खिड़की खोल रहा हूँ।”

गुलाम बोला, ‘‘यह ठीक नहीं होगा। मालिक मुझे मारेगा।”

‘‘मारने दो।” मूर्ख आदमी दीवार पर चोट करता रहा।

‘‘दौड़ो! एक डाकू घर तोड़ रहा है। जल्दी आओ नहीं तो वह दीवार ढहा देगा।” चिल्लाते–सिसकते वह गुलाम पागलों की तरह जमीन पर लोटने लगा। गुलामों का एक पूरा दल ही उमड़ आया और उस मूर्ख को खदेड़ दिया। इस हल्ले–गुल्ले को सुनकर जो सबसे आखिर में धीरे–धीरे बाहर आया, वह मालिक था।

‘‘एक डाकू हमारा घर गिरा देना चाहता था। मैंने सबसे पहले खतरे की सूचना दी, और हम सबने मिलकर उस मूर्ख को खदेड़ दिया।” गुलाम ने ससम्मान और विजय गर्व से कहा।

‘‘तुम्हारा भला हो!” मालिक ने उसकी प्रशंसा की।

उस दिन हमदर्दी दिखाने कई लोग आये, जिनमें वह अक्लमन्द आदमी भी था।

‘‘श्रीमान, चूँकि मैंने अपने को काम लायक सि( किया, इसलिए मालिक ने मेरी प्रशंसा की। आप सचमुच दूरदर्शी हैं, आपने उस दिन कहा था कि हालात सुधरेंगे”, वह बहुत आशान्वित और खुश होकर बोला।

‘‘यह सही है।” अक्लमन्द आदमी ने जवाब दिया, और वह भी अपने पर खुश लग रहा था।

––लू शुन

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