अंधविश्वास छोड़ वैज्ञानिक नजरिया अपनाओ

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

मथुरा के पास एक गाँव है–– ऊँचा खेड़ा। वहाँ एक ‘श्याम बाबा’ आसपास के इलाके में अचानक मशहूर हो गये। मशहूर होने की वजह थी एक अफवाह। हुआ कुछ यूँ कि एक खबर उड़ी कि श्याम बाबा का नियमित व्रत रखने और सुबह–सुबह उन पर जल चढ़ाने से बेरोजगार को नौकरी मिल जाएगी। यह खबर सुनकर इलाके से हजारों नौजवान जो पुलिस फौज में भर्ती होना चाहते थे श्याम बाबा के भक्त बन गये। व्रत रखने लगे, जल चढ़ाकर प्रसाद बाँटने लगे। सुबह चार बजे से ही इलाके की सड़कें जिन नौजवानों के जूतों की थाप से जाग उठती थीं, वे थाप अब मंदिर की ओर मुड़ गयीं। उनमें से एक नौजवान ने कई बार फौज की भर्ती में दौड़ लगायी पर सलेक्शन न हुआ। कभी रिटेन तो कभी मेडिकल से बाहर निकाल दिया जाता। नौजवान ने व्रत रखना शुरू किया। खबर आयी कि वह फौज में भर्ती हो गया। खबर पूरे इलाके में आग की तरह फैलाई गयी। सभी माँ–बाप अपने बच्चों को व्रत न रखने और श्याम बाबा पर न जाने के लिए कोसने लगे। देखते–देखते कुछ ही हफ्तों में ऊँचा खेड़ा में सोमवार को मेला लगने लगा। नौजवानों का हुजूम उमड़कर आने लगा। खैर, इस घटना से फौज में भर्ती होने वालों की संख्या में कोई इजाफा नहीं हुआ। जितने लोग पहले भर्ती होते थे उतने ही इस क्षेत्र से अभी भी भर्ती हो रहे थे। पर क्रेडिट श्याम बाबा को मिलने लगा।

अब सरकार ने फौज में भर्ती के नियम ही बदल दिये। पहले फौज में एक स्थायी सिपाही की भर्ती होती थी, रिटायर्मेंट के बाद उसे पेंशन और अन्य सुविधाएँ मिलती थीं। अब सरकार ने सेना के आधुनिकीकरण के नाम पर सैनिक के ऊपर होने वाले खर्चों में कटौती कर दी। स्थायी सिपाही की जगह अस्थ्याई अग्निवीर की भर्ती शुरू कर दी। इससे नौजवानों की फौज में भर्ती होने की रुचि खत्म हो गयी। अब सड़कों पर सुबह चार बजे उमड़ने वाला हुजूम भी ख़त्म हो गया। सोमवार को व्रत रखने वालों की संख्या फिर कम हो गयी। अब हर कोई समझ गया कि श्याम बाबा के हाथ में नौकरी नहीं रही। व्रत रखने और जल चढ़ाने से सेना में अब स्थायी नौकरी नहीं मिलने वाली। अचानक से देवता बने श्याम बाबा की छवि धूल में मिल गयी।

ज्यादातर अंधविश्वास की कहानियाँ इसी तरह की हैं। बस उनकी पोल खुलने भर की देर है। रहस्य से पर्दा उठते ही सब चमत्कारी सड़क छाप हो जाते हैं। पर अंधविश्वासियों में एक भेड़चाल होती है। स्वार्थ और जल्दी से कुछ पा जाने की लालसा होती है। असल जिन्दगी में जो मयस्सर नहीं उसके ख्याली पुलाव बनाकर अंधविश्वासियों को मानसिक सुख मिलता है। इस मनोदशा को आध्यात्मिक गुरु भलीभाँति समझते हैं। वे इसे अपने कारोबार में बदलने का हुनर जानते हैं। सभी बाबाओं के धंधे इसी सिद्धान्त पर चल रहे हैं।     

जनता की बदहाली और रोज ब रोज बढ़ती समस्याएँ बाबाओं के लिए नये–नये अवसर पैदा करती हैं। बेरोजगारी, महँगाई जनता के ऊपर कहर बनकर टूट रही है। ऐसे में कोई अफवाह उड़ा दे कि फलाने को इसलिए नौकरी मिली कि उसने व्रत रखा, तो लोग सहज विश्वास कर लेते हैं। लोग अपनी समस्याओं के हल के लिए नित नये चमत्कारी बाबा खोजते हैं। बाबा उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान मन्त्र, ताबीज और लच्छेदार प्रवचनों से करते हैं। समस्याओं से घिरे लोग बाबाओं के चंगुल में फँस जाते हैं। जबकि ढोंगी बाबाओं के बताये गये समाधान का समस्या से दूर–दूर तक कोई नाता नहीं होता।

विज्ञान बताता है कि हर घटना के पीछे कोई कारण होता है। वहीं अन्धविश्वासी मानते हैं कि हर घटना के पीछे कोई दैवीय शक्ति होती है। जैसे किसी नौजवान को परमानेंट नौकरी नहीं मिल रही तो इसकी वजह है कि सरकारी कम्पनियाँ बिक रही हैं, प्राइवेट कम्पनियाँ ठेके पर काम करा रही हैं लेकिन बाबा दावा करते हैं कि उनके बनाये ताबीज न पहनने की वजह से नौकरी नहीं मिल रही है। या ग्रह ठीक नहीं चल रहे इसलिए नौकरी नहीं मिल रही आदि–आदि। गरीब बच्चे स्कूल में पढ़ नहीं पा रहे हैं, क्योंकि स्कूल की पढ़ाई महँगी हो गयी है। बीमार और बूढ़े माँ–बाप घर में बिना दवा खाट पर पड़े कराहते रहते हैं क्योंकि सरकारी अस्पताल में मरीजों को भर्ती करने के लिए न तो पर्याप्त बेड हैं न उनकी देखभाल करने के लिए पर्याप्त डॉक्टर और नर्स। सौ में से नब्बे आदमी आर्थिक कंगाली के चलते महँगे प्राइवेट हॉस्पिटल में अपने मरीज को दिखा ही नहीं सकते। बेरोजगारी साल दर साल नयी ऊँचाइयाँ छू रही है क्योंकि उद्योग–धंधे बन्द हैं। सरकारी कम्पनियाँ बिक गयी हैं। बचे–खुचे काम स्थायी कर्मचारी की जगह ठेके पर करवाये जा रहे हैं। किसान को फसल में भी हर साल नुकसान हो रहा है, क्योंकि लागत महँगी होती जा रही है–– खाद, बीज और कीटनाशक की कीमत हर साल बढ़ जाती हैं।

इसके आलावा घरों में लड़ाई झगड़े, पति पत्नी, भाई–भाइयों के संबंधों में खटास या बाप–बेटे के झगड़े को सुलझाने के लिए भी लोग बाबाओं के आश्रम में शरण लेते हैं। सालों तक वहाँ ठगे जाते हैं जब तक ठगे जाने का एहसास होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। एक कहावत है कि एक बुराई सौ बुराई को जन्म देती है, ठीक वैसे ही इन सारी जन समस्याओं की जड़ में है आर्थिक तंगी। लोगों की खराब हालत के लिए सरकार की आर्थिक नीतियाँ और गलत राजनीतिक फैसले जिम्मेदार हैं। फिर सोचने की बात ये है कि इनके समाधान आध्यात्मिक कैसे हो सकते हैं? इनका हल बाबा के आश्रम में कैसे हो सकता है?

हमारे देश में अंधविश्वास की गहरी जड़ों की एक वजह यह भी है कि यहाँ पीढ़ी–दर–पीढ़ी जो ज्ञान आगे बढ़ रहा है उसमें बड़ा हिस्सा अंधविश्वास से भरा हुआ है। देश भर में होने वाले धार्मिक उत्सव धीरे–धीरे बचपन से ही तार्किकता को खत्म करते चलते हैं। टीवी पर प्रसारित होने वाले धार्मिक प्रोग्राम इसमें सहायक की भूमिका निभाते हैं। इसका असर इतना ज्यादा होता है कि दस–पन्द्रह साल का होते–होते एक बच्चा अंधविश्वासी बनकर तैयार हो जाता है। वह एक तार्किक नौजवान बनने के बजाय कूपमंडूक बन जाता है। ऐसी सोच वाले करोड़ों लोग मिलकर आध्यात्मिक गुरुओं के लिए सम्भावनाएँ पैदा करते हैं। आज भारत में हर पाँच हजार लोगों के ऊपर एक बाबा है। जैसे–जैसे देश में आर्थिक संकट गहराता जा रहा है वैसे–वैसे बाबाओं की संख्या बढ़ रही है।     

अंधविश्वास एक खतरनाक बीमारी की तरह समाज में फैला हुआ है। इसकी चपेट में सिर्फ अनपढ़ और गरीब लोग ही नहीं, बड़े–बड़े डिग्रीधारी, मध्यम वर्गीय लोग, नेता, अभिनेता और क्रिकेटर भी आ रहे हैं। आध्यात्मिक गुरु जीवन में आयी मुसीबतों को हल करने के नाम पर अपने भक्तों को ठगते हैं और महिलाओं के साथ बहला–फुसलाकर बलात्कार करते हैं। अÕयाशी के अड्डे बन गये आश्रमों में सालों तक आर्थिक और मानसिक उत्पीड़न होता रहता है। आध्यात्मिक गुरुओं का राजनीतिक दबदबा इतना व्यापक होता है कि उन्हें कोर्ट तक ले जाना भारी मुसीबत से कम नहीं।

अंधविश्वास, ढोंग–पाखंड हमारे दिमाग की बेड़ियाँ हैं। इन मानसिक बेडियों से बचने का सबसे आसान तरीका है–– वैज्ञानिक नजरिया अपनाना। सुनी–सुनायी बातों पर यकीन करने के बजाय तार्किक बनना। हर घटना के पीछे के कारण को जानने की कोशिश करना। रोजमर्रा की गतिविधियों के बारे में वैज्ञानिक तरीके से सोचना और व्यवहार करना। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि जो पीड़ित हैं वे समस्या का समाधान वैज्ञानिक नजरिये से सोचें न कि भेड़चाल में आकर किसी बाबा के पीछे लग लें।

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