बंगाल के जूट–मिल मजदूरों की आम हड़ताल

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

आज से सौ साल पहले 1920 में भारत में मजदूर आन्दोलन की जबरदस्त लहर उठी थी। उस समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था। हालाँकि छिटपुट आन्दोलन और हड़तालें 1830 से ही शुरू हो गयी थीं, लेकिन 1920 की लहर कमोबेश देश के सभी औद्योगिक इलाकों में फैल गयी थी। यह लहर बहुत ताकतवर थी। इसी लहर के चलते भारत के मजदूरों ने देश की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनायी।

इन आन्दोलनों से मजदूरों ने बहुत शानदार सबक सीखे। उन्होंने देखा कि मजदूरों का शोषण करने में अंग्रेज और भारतीय पूँजीपति एक समान हंै और संगठित हैं। संगठित मजदूर आन्दोलन के बिना पूँजीपतियों को चुनौती नहीं दी जा सकती। उस समय की राष्ट्रवादी पार्टी कांग्रेस और इस जैसी दूसरी पार्टियों के नेता तथा तरह–तरह के धार्मिक और सामाजिक आन्दोलन के नेता मजदूर आन्दोलन की अगुआई नहीं कर सकते।

अंग्रेज सरकार और पूँजीपतियों के जबरदस्त दमन के बावजूद मजदूर आन्दोलन की लहर को दबाया नहीं जा सका। सरकारी पुलिस–फौज और मालिकों के गुण्डों ने हजारों मजदूरों का कत्ल किया, लाखों को घायल किया, सैंकड़ों हड़तालों और प्रदर्शनों को कुचला, लेकिन मजदूरों का आन्दोलन लगातार बढ़ता ही गया।

उस समय सैंकड़ों आन्दोलन हुए। कुछ में मजदूरों की जीत हुई और कुछ में हार। हार से उन्होंने नये–नये सबक सीखें। 1928–29 में कलकत्ता और उसके आस–पास के चटकल यजूट–मिलद्ध मजदूरों का आन्दोलन इसी लहर की एक शानदार कड़ी है।

जूट–मिल मजदूर आन्दोलन की शुरुआत

1929 के तूफानी आन्दोलन के पहले करीब दस साल से ही बंगाल, खासकर कोलकाता और उसके आस–पास के औद्योगिक इलाकों में मजदूरों का असन्तोष बढ़ रहा था। लेकिन बर्धमान तथा संथाल परगना इलाके की कोयला खदानों को छोड़ दिया जाये तो सबसे बड़ा औद्योगिक इलाका कोलकाता ही हुआ करता था। अंग्रेज हुकूमत और उसके सहयोगी देशी जमींदारों के राज में ही खेती–किसानी अब पेट भरने लायक आमदनी का स्रोत नहीं रह गयी थी। कोलकाता में सिर्फ बंगाल ही नहीं, बल्कि बिहार, संयुक्त प्रदेश यअब उत्तर प्रदेशद्ध और यहाँ तक की पंजाब से भी भारी पैमाने पर लोग मजदूरी करने आते थे।

अलग–अलग कारखानों के मजदूरों में से ही कुछ समझदार लोग निकलकर सामने आये। वे अपने–अपने कारखानों में मजदूरों को शिक्षित कर चुके थे कि वे अपना हक लेने के लिए प्रदर्शन और हड़ताल कर सकें। पहले विश्वयु( में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल हुए बहुत से बंगाली नौजवानों को यह जानकारी थी कि किस तरह रूस के मजदूरों ने क्रान्ति की और अपना राज कायम किया। इन बंगाली नौजवानों में एक प्रमुख नाम है काजी नजरुल इस्लाम जो पहले विश्वयु( में अंग्रेज सेना का हिस्सा बनकर इराक गये थे और वहीं उन्हें रूसी क्रान्ति के बारे में जानकारी मिली। वापस आकर अपने दोस्तों के साथ उन्होंने ‘लांगल’ ययानी खेत जोतने वाला हलद्ध पत्रिका निकालनी शुरू की, जिसका मकसद था–– मजदूरों और किसानों को जागरूक करना। यह पत्रिका कोलकाता में छपती थी और पूरे बंगाल में पढ़ी जाती थी। उनके ही सहपाठी शैलजानन्द मुखोपाध्याय ने अलग–अलग पत्रिकाओं में कोयला खदान के मजदूरों की जिन्दगी के बारे में कहानियाँ लिखकर मजदूरों की स्थिति सबके सामने लाने का काम किया।

उस समय बंगाल के हथियारबन्द क्रान्तिकारी संगठन ‘युगान्तर’ और ‘अनुशीलन समिति’ का आन्दोलन कुछ धीमा तो पड़ गया था, लेकिन उस आन्दोलन के कार्यकर्ता अब उससे बेहतर रास्ता तलाश रहे थे। ऐसे में दुनियाभर में चल रहे मजदूर आन्दोलन और रूसी क्रान्ति ने इनके सामने मिसाल बनकर रोशनी देने का काम किया। देश की दूसरी जगहों की तरह बंगाल के मजदूरों ने भी अपने अधिकार के लिए मिल मालिकों के खिलाफ संगठित होकर लड़ना शुरू किया। जुझारू मजदूर और गैर–मजदूर कार्यकर्ताओं ने 1920 में ‘आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की स्थापना की। लेकिन अब भी मजदूर आन्दोलन का नेतृत्व गैर–मजदूर राजनीतिक कार्यकर्ताओं के हाथ में था। ऐसे में कोलकाता के चटकल यजूट–मिलद्ध मजदूरों को संगठित करने के काम में कुछ क्रान्तिकारियों ने उत्साह के साथ काम करना शुरू किया। नतीजे के बारे में इतना कहना काफी होगा कि सिर्फ सन् 1921–29 के बीच नौ सालों में जूट–मिलों में 201 हड़तालें हुर्इं जिसमें सात लाख से भी ज्यादा मजदूरों ने हिस्सेदारी की थी। इसमें कुछ आन्दोलन में उन्हें जीत मिली और कुछ में हार।

मजदूर आन्दोलन आगे बढ़ा

इसको आगे बढ़ाने में उन लोगों की भूमिका सबसे ज्यादा रही जो अंग्रेजों की गुलामी को समझते थे और वे यह भी समझते थे कि देशी जमींदार और मालिकों की गुलामी से भी आजाद होने की जरूरत है। काजी नजरुल इस्लाम और उनके दोस्त मुजफ्फर अहमद ने आन्दोलन को आगे बढ़ाने में बढ़–चढ़कर काम किया। मुजफ्फर अहमद क्रान्तिकारी थे। 1929 के मजदूर आन्दोलन की जीत के बाद उन्हें मेरठ षडयंत्र मामले में अंग्रेज सरकार ने गिरफ्तार किया था। हालाँकि इस मामले में गिरफ्तार सभी क्रान्तिकारी देश के अलग–अलग हिस्से में मजदूर आन्दोलन को आगे बढ़ाने में समर्पित थे।

उस समय महात्मा गाँधी कांग्रेस पार्टी के नेता थे, न तो कांग्रेस पार्टी और न ही महात्मा गाँधी मजदूर आन्दोलन को बढ़ते और जीत हासिल करते देखना चाहते थे। वे पूँजीपतियों के साथ खड़े थे। देश के अलग–अलग औद्योगिक इलाकों के मजदूरों ने समझ लिया था कि कांग्रेस पार्टी और इसके नेता विदेशी मालिक के साथ नहीं भी तो देशी जमींदार और कम्पनी मालिकों के साथ जरूर खड़े हैं।

मजदूर नेता मुजफ्फर अहमद आन्दोलन को संगठित करने की दिशा में बांग्ला अखबार ‘गणबानी’ छपवाते थे। उसमें उन्होंने लिखा कि ज्यादातर जूट–मिलों में मजदूरों का हड़ताल अलग–अलग समय में हो रहा है और इस तरह से मजदूरों की माँग पूरी नहीं हो सकती। उन्होंने अपील की कि जूट–मिलों में काम कर रहे करीब साढ़े तीन लाख मजदूरों को इकठ्ठा होकर आन्दोलन में उतरना पड़ेगा, तभी कुछ जीत हासिल हो सकती है। कोलकाता के नजदीक हावड़ा जिले के बाउडिया और चेंगाइल के जूट–मिल में मजदूर तेजी से संगठित हुए और छोटे–छोटे मुद्दे पर मिल मालिकों से लगातार टकराने लगे। मार्च 1928 में चेंगाइल के लाडलो जूट–मिल के मजदूरों ने ‘लाडलो जूट–मिल वर्कर्स यूनियन’ स्थापित किया जिसके सचिव बने बंकिम मुखर्जी। नजदीकी बाउडिया की फोर्ट ग्लास्टर जूट–मिल के मालिक घबरा गये और यहाँ मजदूर अपना यूनियन न बना पायंे, इसकी हर मुमकिन कोशिश की। इसके बावजूद 15 जुलाई, 1928 को बाउडिया के मजदूर भी ‘बाउडिया चटकल मजदूर यूनियन’ बनाने में कामयाब हुए।

अगले ही दिन 16 जुलाई, 1928 से फोर्ट ग्लास्टर मिल मजदूरों की आम हड़ताल की शुरुआत हुई जो छ: महीने तक चली य16 जनवरी, 1929 तकद्ध। इस हड़ताल के दौरान सरकार, मिल मालिक एशोसिएशन और प्रशासन ने मिलकर इसे नाकाम करने की हर मुमकिन कोशिश की। सरकार ने इसे नजरअन्दाज करके थका देने का काम किया। बहुत से बेरोजगार नौजवानों को पैसे देकर इसमें फूट डालने की कोशिश की। पुलिस ने कम्पनी के खरीदे गुण्डों का साथ देते हुए हड़ताली मजदूरों पर गोली भी चलायी जिससे 28 मजदूर घायल हुए। लेकिन जितने दिन बीतते गये मजदूरों की एकता उतनी बढ़ती गयी। एक बार स्थानीय पुलिस और मिल मालिकों ने पैसे देकर कुछ गुण्डों को हड़ताली मजदूरों के बीच उपद्रव करने के लिए भेजा और उन्होंनेे जमकर मारपीट की। इस लड़ाई में मजदूरों ने जीत हासिल नहीं की, पर मजदूरों को सीखने को मिला कि उनके दोस्त और दुश्मन कौन हैं। इस आन्दोलन के नेता थे–– बंकिम मुखर्जी, राधारमण मित्र, गोपन चक्रबर्ती, फिलिप स्प्राट आदि। गौर करने वाली बात है कि फिलिप स्प्राट अंग्रेज होते हुए भी मजदूर अन्तरराष्ट्रीयतावाद से प्रभावित होकर भारत आये थे, वे मजदूर संगठन और आन्दोलन में भागीदारी करने के लिए ही भारत आये थे। जवाहरलाल नेहरु ने खुद इस आन्दोलन के समर्थन में बाउडिया आकर जनसभाएँ की और हड़ताली मजदूरों की मदद के लिए आम जनता से अपील की।

मजदूरों की चेतना बढ़ायी गयी

यह बात हम पहले ही बता चुके हैं कि बंगाल के हथियारबन्द आन्दोलन के कार्यकर्ता ही नये उत्साह और नजरिये के साथ इस मुहीम में बढ़–चढ़कर हिस्सेदारी कर रहे थे। लेकिन पहले विश्वयु( के तुरन्त बाद मजदूर अपने अनुभव से जितना सीख पाये थे, क्रान्तिकारी कार्यकर्ता अब भी उस समझदारी से बहुत दूर थे। लेकिन इस मुहीम में काम करने की उनकी इच्छा ने उन्हें मजदूरों की जिन्दगी से रूबरू होने को मजबूर किया। करीब एक दशक में राजनीतिक कार्यकर्ता और मजदूर एक–दूसरे की जरूरत समझने लगे थे। कोलकाता के मटियाबुरुज इलाके में यूनियन जूट–मिल, क्लाइव जूट–मिल के मजदूरों के बीच काम करने वाले एक कार्यकर्ता मणि सिंह कहते हैं, शुरू में उन्हें गैर–बंगाली मजदूरों की भाषा यज्यादातर हिन्दी/उर्दू भाषीद्ध समझने में ही परेशानी होती थी। इस परेशानी को उन्होंने परिचित दोस्त के उस्ताद एक मौलवी साहब की मदद से दूर करने की कोशिश की। इसके साथ–साथ उन्हीं मजदूरों में रोज उठने–बैठने से भी  उनकी भाषा समझने में मदद मिली। आन्दोलन की एक मुख्य समस्या यह थी कि मजदूरों की समस्याओं को पहचानना ताकि उसके आधार पर कोई मुहीम शुरू की जा सके। कुछ मजदूरों से बात करके कुछ पता चला और मजदूरों ने ही अपनी समस्याएँ समझाने के लिए उन्हें एक उस्ताद बुनकर के पास पहुँचा दिया। उस्ताद जी ने धैर्य के साथ समझाया। पहले सूत काटने की दिहाड़ी वजन के अनुपात में दी जाती थी, अब लम्बाई के अनुपात में दी जाती है। अब भी उन्हें समझ नहीं आया तो उस्तादजी ने समझाया वजन के हिसाब से दिहाड़ी मिले तो मजदूरों का फायदा है और लम्बाई के हिसाब से मालिक का। इसी तरह धीरे–धीरे क्रान्तिकारी कार्यकर्ता और मजदूरों की आपसी समझदारी बढ़ती गयी। बंगाल में जूट–मिल मजदूर संगठनों के हिन्दी और उर्दू पर्चे लाखों की संख्या में छपने लगे। इससे पता चलता है कि जूट–मिल मजदूर संगठन की ताकत और समर्थन बहुत ज्यादा था।

हरेक मिल में अब मजदूर यूनियन का दफ्तर भी बन रहा था। यूनियन की सदस्यता बढ़ाने के लिए अभियान चलाया जा रहा था। यह भी तय हुआ कि हरेक मजदूर अपनी एक दिन की दिहाड़ी यूनियन को देंगे, जिससे यूनियन के सभी काम चलते रहें। दक्षिणी कोलकाता की एक छोटी सी मिल में मजदूर यूनियन की गतिविधियों में मजदूरों ने हर साल 400 रुपये का खर्चा उठाया। मजदूर सभा के लिए पर्चे–पोस्टर छपवाने से लेकर उन्हें बाँटने–चिपकाने में मजदूर खुद ज्यादा शामिल होते थे। प्रगतिशील राजनीतिक अखबारों को उनके बीच पढ़ने–पढ़ाने का काम भी उनके नेताओं ने किया।

आन्दोलन की शानदार जीत

आन्दोलन की शानदार जीत हुई, मजदूरों ने नये सबक सीखे और भारत का मजदूर आन्दोलन नये चरण में प्रवेश किया।

जनवरी, 1929 में बाउडिया के जूट–मिल मजदूरों की लम्बी हड़ताल भंग होने के कुछ महीने बाद फिर जुलाई में सभी जूट–मिल के मजदूरों ने एक साथ आम हड़ताल की शुरुआत की। मिल मालिकों के संगठन ने साप्ताहिक काम का समय 54 घण्टे से बढ़ाकर 60 घण्टे करने का नोटिस जारी किया था। मजदूरों को सड़क पर लाने के लिए इतना काफी था। उनकी माँगे थी–– य1द्ध ओवरटाइम काम के अनुपात में दिहाड़ी और कुल वेतन में बढ़ोत्तरी। य2द्ध किसी तरह का उत्पीड़न बन्द हो। य3द्ध चाहे कम्पनी की तरफ से तालाबन्दी हो या मजदूरों का हड़ताल हो, उस समय का पूरा वेतन दिया जाये। य4द्ध अन्य शिकायतों पर विचार करने के लिए मालिक और मजदूर तथा उनके चुने हुए प्रतिनिधियों से एक बोर्ड का गठन। य5द्ध महिला मजदूरों के लिए मातृत्वकालीन सुविधाओं का प्रावधान। य6द्ध किसी तरह की गलती होने पर शारीरिक सजा के प्रावधान खत्म हों।

बंगाल की आम जनता ने भी बढ़–चढ़कर हड़ताल का समर्थन किया। अगस्त, 1929 में कोलकाता में हड़ताल के समर्थन में सभा की गयी जिसमंे भारी तादाद में दूसरे तबकों के लोग शामिल थे। इस सभा में हड़ताली मजदूरों के लिए आर्थिक मदद की अपील भी की गयी। इस सभा के अध्यक्ष जतिन्द्र मोहन सेनगुप्ता की तरफ से यह अपील आयी थी, जो पेशे से इंजीनियर और जनपक्षधर कवि थे।

मजदूरों की अटूट एकता छ: महीने पहले चोट खाने से ही मजबूत हुई थी। इस बार ‘इंडियन जूट–मिल एसोसिएशन’ के गुण्डे उन्हें तोड़ने में पूरी तरह नाकाम रहे। जबकि हड़ताल के समर्थन में सामान्य लोगों का उत्साह देखने लायक था। आखिरकार, मिल मालिकों का एशोसिएशन मजदूर नेतृत्व के साथ समझौता वार्ता के लिए मजबूर हो गया। उसने ऊपर लिखी छ: माँगों में से कुछेक को छोड़कर बाकी माँगों को मान लिया। 18 अगस्त को समझौते पर दोनों तरफ के प्रतिनिधियों ने दस्तखत किया।

आन्दोलन के सबक

इस आन्दोलन ने न सिर्फ जूट–मिल के मजदूरों, बल्कि किसी भी क्षेत्र के मजदूरों के सामने एक मिसाल पेश की। पूरे देश के स्तर पर इसका प्रभाव बहुत दूरगामी हुआ जिसके चलते दूसरे प्रान्तों में भी अलग–अलग कारखानों के मजदूर यूनियनों ने आपसी तालमेल रखकर आन्दोलन को आगे बढ़ाना सीख लिया। इसी से प्रेरणा लेकर आगे महाराष्ट्र, संयुक्त प्रदेश, पंजाब, तेलंगाना आदि प्रान्तों के मजदूर यूनियन की गतिविधि में वृ(ि हुई और देश में कई बेहतरीन और सफल मजदूर आन्दोलन हुए।

इस आन्दोलन से मजदूरों को कई सबक हासिल हुए। पहला सबक, अपने संगठन और टेªड यूनियन के बिना मजदूरों का संघर्ष जीत हासिल नहीं कर सकता। इसलिए सभी मजदूरों का कर्तव्य है कि वे टेªड यूनियन की मदद करें। दूसरा सबक, मजदूर आन्दोलन को जीत हासिल करने के लिए लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ती है। तीसरा सबक, आन्दोलन को कभी–कभी हार का सामना करना पड़ता है। उससे हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि अपनी गलतियों को समझकर, उसे दूर करके नये सिरे से दुबारा संघर्ष शुरू कर देना चाहिए। चौथा सबक, आन्दोलन को सही दिशा देने के लिए और मजदूरों को शिक्षित करने के लिए सच्चे, समझदार और ईमानदार नेताओं की जरूरत होती है। अगर ऐसे नेता न हों तो आन्दोलन दूर तक नहीं जा सकता। पाँचवा सबक, मजदूरों की एकता सही विचारधारा पर टिकी होती है। सही विचारधारा से ही मजदूरों के अन्दर वर्गीय नजरिये का विकास होता है और मजदूर अपने वर्ग के प्र्रति पक्षधर बनता है और इससे मालिकों की हर शातिराना चाल को समझने में मदद मिलती है।

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