बुक बाइंडिंग फैक्ट्री के मजदूरों की हालत
मजदूर सहायक समिति (एमएसएस) के कुछ साथियों ने मेरठ की बुक बाइंडिंग की फैक्ट्री के मजदूरों का सर्वे किया। इस सर्वे में उनके कार्यस्थल, जीवन दशा और निवास स्थल के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें पता चलीं। उस सर्वे की संक्षिप्त रिपोर्ट यहाँ दी जा रही है।
एमएसएस– आजकल यह कहने का फैशन सा चल पड़ा है कि कोई किसी की मदद नहीं करता। लेकिन लॉकडाउन के समय हमने इस इलाके में बेहद जरूरतमन्द परिवारों को राहत बाँटने का काम किया। इसके लिए आर्थिक सहयोग भी जनता ने ही दिया। इस इलाके में गरीब परिवारों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का काम भी हम कर रहे हैं। बच्चों के लिए पेन, पेंसिल, कॉपी, किताब और चॉक डस्टर का खर्च भी लोगों से चन्दा लेकर ही जुटाया जा रहा है। कुछ लोगों ने पढ़ाने के लिए जगह देकर हमारी मदद की। इसका मतलब है कि अगर हम अच्छा काम करते हैं तो लोग हमारी मदद करते हैं।
आप देख रहे हैं कि हमारे कई साथी सामाजिक काम में तन–मन से लगे हुए हैं। हम सभी तरह के मजदूरों की हालत के बारे में जानना चाहते हैं। मेहनत करने वालों के लिए उनका काम–धन्धा ही उनकी जिन्दगी है। काम–धन्धा बन्द तो जिन्दगी खत्म। लॉकडाउन में लोगांे की हालत खराब हो गयी। आप अपने काम के बारे में बताइये। जहाँ काम करते हैं, अभी वहाँ की क्या हालत है?
मोनू– मैं और गुड्डू बुक बाइंडिंग की फैक्ट्री में काम करते हैं। आपने ठीक कहा कि लॉकडाउन में मजदूरों की हालत खराब हो गयी थी। लॉकडाउन हटने के महीनों बाद भी किताबों की बाइंडिंग का काम जोर नहीं पकड़ रहा है और हमारी हालत भी बढ़िया नहीं हुई है। हफ्ते में आज भी काम न होने की वजह से 3–4 दिन छुट्टी करते हैं। तनख्वाह भी कुछ खास नहीं है।
एमएसएस– फैक्ट्री में कितने लोग काम करते हैं? वहाँ कितनी मशीने हैं? यह सब बताइये।
मोनू–– हमारी फैक्ट्री में 35–40 लोग काम करते हैं। काम हाथ और मशीन दोनों से होता है। मशीन से कटिंग होती है। चार मशीने हैं–– दो रोलिंग की और दो कटिंग की। कटिंग वाली एक मशीन हाथ से चलती है और दूसरी बिजली से। एक पैकिंग मशीन भी है। छोटी मशीन पर दो लोग काम करते हैं। बड़ी मशीन पर 6 लोग–– दो ऑपरेटर हैं, एक ब्लॉक लगाता है, दूसरा खिसकाता है, तीसरा उठाता है, और चैथा यह देखता है कि कागज मुड़ा हुआ तो नहीं है। एक नयी मशीन आयी है, जिसे आये 15–20 दिन हो गये हैं।
एमएसएस– तनख्वाह का क्या हिसाब है? ओवरटाइम मिलता है या नहीं? गुड्डू भाई आप भी कुछ बताइये।
गुड्डू– पिछले 5–6 साल से तनख्वाह एक ढेला भी नहीं बढ़ी। ऑपरेटर का हिसाब महीने में होता है, बाकि लोगों का हफ्ते में। तनख्वाह घण्टे के हिसाब से बनती है ओवरटाइम भी होता है, लेकिन पेमेण्ट बराबर ही होता है। हमें लगता है कि शाम 6–7 बजे आकर क्या करेंगे? इसलिए 2–3 घण्टे का ओवरटाइम कर लेते हैं। काम पर कभी भी आ–जा सकते हैं। पैसे बहुत कम देते हैं। उससे गुजारा करना मुश्किल है। नये बन्दे को सिर्फ 6000 रुपये देते हैं।
(नोट– यह पूछे जाने पर कि कम से कम कितना मिले कि आपके परिवार का गुजारा ठीक से हो जाये, दोनों मजदूरों ने कहा कि कम से कम 10 से 15 हजार मिलना ही चाहिए। लेकिन मेरठ में कोई भी 10 हजार नहीं देगा।)
गुड्डू– जो 10 सालों से ज्यादा समय से ओपरेटर का काम कर रहा है, उसे भी 13–14 हजार ही दे रहे हैं। एक मजदूर पूरा काम जानता है, फिर भी उसे 8 हजार ही देते हैं। मैं 18 साल से काम कर रहा हूँ, जबकि मोनू 10 साल से। हमंे भी 10 हजार नहीं मिलते।
सेलरी बढ़ाने की मालिक ने बात नहीं सुनी। हमने हड़ताल कर दिया। हमारा मालिक जैन है? उसके अन्दर एक मुस्लिम ठेकेदार काम करता है। वह जब छोटा बच्चा था और अनाथ घूम रहा था तो मालिक ने रहम खाकर उसे पाल–पोसकर बड़ा किया। वह मालिक का पक्का भक्त है। गुण्डे की तरह रोब दिखाकर मजदूरों को धमकाता फिरता है। हड़ताल के समय उसने हड़ताल तोड़ने के लिए ठेके पर मुस्लिम मजदूर बुला लिये। काम तो रुका नहीं, हमें मजबूरन काम पर वापस जाना पड़ा। हमारे साथ के हड़ताल करने वाले भी एक–एक कर टूट गये। वे मालिक से मिलकर काम पर लौट गये।
हड़ताल के बाद भी 20 से 30 रुपये एक घण्टे का मिलता है। सबसे अधिक सेलरी 50 रुपये घण्टा या 8 घण्टे का 400 रुपये ही है। अभी हफ्ते में 3 दिन की छुट्टी रहती है। काम का बोझ इतना अधिक होता है कि नये आये 2–3 बन्दे खाना–खाने बाहर गये, तो वापस ही नहीं लौटे, भाग गये।
एमएसएस– अगर सारे मेरठ के मजदूर मिलकर आन्दोलन करें तो क्या सैलरी 10 हजार के ऊपर बढ़ सकती है?
गुड्डू– हम मुहल्ले के लोगों में एका नहीं है, पूरे मेरठ के मजदूर कैसे एक हो जायेंगे? फैक्ट्री के मजदूरों में भी एका नहीं है।
मुस्लिम ठेकेदार के अण्डर में 6–7 मजदूर हैं। मालिक से उसका रिश्ता बहुत अच्छा है। वह नेकर–बनियान पहने काम सीखने आया था। आज मालिक का चहेता है।
(नोट– गुड्डू तमाम समस्याओं का कारण मुस्लिम ठेकेदार और मुस्लिम मजदूरों को मान रहा था, जब उससे पूछा गया कि वह भी तो आपकी तरह मजदूर हैं, उनके परिवार की हालत खराब है, जबकि मालिक तो मुसलमान नहीं हैं, उसे क्यों कुछ नहीं कहते? इसके बाद गुड्डू ने बात का रुख दूसरी ओर मोड़ा।)
गुड्डू– मेरे पापा ने कई साल काम करके जब छोड़ा तो कम्पनी की तरफ से उन्हें कुछ नहीं मिला। मालिक बहुत कंजूस है। दीवाली पर केवल 500 रुपये का इनाम और गजक का छोटा डिब्बा देता है। नये कपड़े नहीं देता। हम पाँच बन्दों को कोई काम देता है कि इतनी देर में पूरा करके दे दो, फिर बीच में ही किसी और काम में लगा देता है, फिर काम कैसे पूरा होगा? उस पर भी कुछ उल्टा–सीधा सुना देता है।
मालिक टॉयलेट की सफाई का सामान नहीं देता, तो सफाई करनेवाली औरत कैसे साफ करेगी? मजदूर भी बीड़ी–दिलबाग खा–पीकर टॉयलेट में थूकते हैं। सड़ाकर रखते हैं। दिन में सफाई वाली औरत आती है। उसे केवल 4 हजार ही देते हैं। टॉयलेट की सफाई के बाद फैक्ट्री की दूसरी जगहों को साफ करती है।
एमएसएस– फैक्ट्री में हुई दुर्घटनाओं के बारे में बताइये। मालिक ने इलाज करवाया था या नहीं? मुआवजा दिया था या नहीं?
मोनू– कभी कोई बड़ी घटना नहीं हुई। छोटी–मोटी चोट तो लगती रहती है। पिछले साल पेपर काटने वाली छुरी मेरे पैर पर गिरी। जूते ने बचा लिया। मालिक की ओर से जूता नहीं मिलता और न ही सुरक्षा का कोई सामान।
एक बार एक मजदूर के दोनों हाथ की चार–चार उँगलियाँ कट गयीं। मालिक ने इलाज करवाया। यह हादसा 12–13 साल पहले हुआ था। बाद में उसे दो लाख देकर चलता कर दिया। दुर्घटना होने पर कोई मुआवजा नहीं मिलता।
गुड्डू– कम्पनी की तरफ से टी ब्रेक में चाय और बिस्किट मिलते हैं। कुछ को नाश्ता भी मिलता है, कुछ को नहीं। मेरे पापा ने इसके खिलाफ आवाज उठायी थी तो मालिक ने कहा कि काम करना हो तो करो वरना जाओ। मालिक के दुर्व्यवहार से परेशान होकर उन्होंने काम छोड़ दिया। वे अपनी शादी के पहले से वहाँ काम करते थे। फिर भी उनकी बात नहीं मानी। पापा ने मालिक के दो बेटों को गोद में खिलाया है, उन्हें निप्पल से दूध पिलाते थे।
फैक्ट्री में मजदूरों का कोई रजिस्टर नहीं है और न ही हमारे आने–जाने पर कोई सिग्नेचर होता है। हमारा कोई रिकोर्ड भी नहीं रखा जाता। लॉकडाउन के समय मालिक ने कुछ मजदूरों को पैसे दे दिये थे, लेकिन जिन्होंने पहले हड़ताल किया था उन्हें कुछ नहीं दिया और न ही उन्हें पता चला कि पैसे बँट रहे हैं। मुझे पता चला तो मैं मालिक के पास गया और मदद की बात कही। उसने कुछ पैसे दिये थे। अब हालत यह हो गयी है कि चाहे जितने दिन की छुट्टी मारो, मालिक कुछ कहता नहीं। धंधा मन्दा चल रहा है। पहले भी जब धंधा तेज चलता था, तो मालिक का व्यवहार अच्छा हो जाता था और वह समय से सेलरी दे देता था। माँगने पर उधार भी दे देता था। लेकिन आजकल पूछता तक नहीं। कभी–कभी वह एक–दो रुपये की ढेर सारी रेजगारी सेलरी में दे देता है। हमें इससे बड़ी दिक्कत होती है।
मोनू– मैं एक दिन काम पर नहीं गया तो फोन आ गया कि अगर काम पर नहीं आया तो अपना हिसाब ले जाओ। मुझे लगता है कि 100 में से 5 मालिक ही ठीक होते हैं। मेहनत का काम करने वालों को कम पैसा देते हैं, लेकिन दिमाग से काम करने वालों को अधिक देते हैं। दिमाग से काम करने वाला 2–3 पेज गिनकर या कुछ कमी निकालकर कहता है कि काम ऐसे नहीं, ऐसे करो।
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मोनू और गुड्डू से लम्बी बातचीत हुई, जिसे यहाँ छोटा करके दिया गया है। दोनों परिवार एक ही मोहल्ले में रहते हैं। मोहल्ले के घर पक्के बने हैं। जिन पर प्लास्टर नहीं चढ़ा है। कमरे छोटे–छोटे हैं। एक मकान में 4–6 कमरे होते हैं, जिनमें इतने ही परिवार रहते हैं। अलग से रसोई नहीं है, कमरे में ही खाना बनाते हैं। टॉयलेट–बाथरूम साझा है। पीने के पानी की टोंटी अलग है। सप्लाई का पानी आता है। फिल्टर नहीं लगे हुए हैं। कमरों में सीलन रहती है और अजीव सी दुर्गन्ध आती है। प्लास्टर भी उखड़ते रहते हैं। जगह–जगह कुछ प्लाट खाली हैं, जिनमें कूड़ा–करकट और कीचड़ सड़ता रहता है। उनमें सूअर और कुत्ते लोटते हैं। कहीं गलियाँ खड़ंजे की हैं, कहीं कच्ची हैं। नगर निगम वाले कभी–कभी सफाई के लिए आ ही जाते हैं। कई बार महीनों नहीं आते। बिजली का बिल बकाया होने पर अकसर लोगों के कनेक्शन काट दिये जाते हैं। चोरी–छिपे बिजली का इस्तेमाल करने वाले कुछ लोग भारी जुर्माने का शिकार भी हुए।
गुड्डू की बूढ़ी दादी बीमार रहती हैं, पूरे शरीर में खुजली है। वह हमेशा खुजाते–खुजाते तंग आ जाती हैं। गुड्डू का परिवार मोनू के परिवार से थोड़ी बेहतर स्थिति में है। मोनू का परिवार किराये के कमरे में रहता है। माँ–बाप के अलावा परिवार में कोई नहीं है। बहन की शादी हो चुकी है। मोनू कुँवारे हैं। पिताजी रिक्शा चलाते थे। कुछ दिन पहले अचानक उनकी तबियत खराब हुई। बुखार, जुखाम, खून की उलटी और मौत। पूरा परिवार सदमे में। बिना डॉक्टर को दिखाये दवा लिया था। पैसे नहीं थे। झाड़–फूँक भी कराया। तबियत बिगड़ती गयी। बच नहीं पाये। माँ के पैरों में बीमारी है, चलना–फिरना मुश्किल है। शायद हाई ब्लड प्रेशर भी है, कभी कभी दिल घबराता है। पैसे की कमी के चलते डॉक्टर को नहीं दिखा पा रही हैं।
मोनू और गुड्डू की तरह छोटी फैक्ट्रियों में काम करनेवाले मजदूरों के कार्यस्थल की दशा खराब है। वहाँ उनका बड़ी बेरहमी से शोषण–उत्पीड़न होता है। उनके घर और मोहल्ले रहने लायक स्थिति में नहीं हैं। जब वे मिलकर अपने हक के लिए संघर्ष करते हैं तो मालिक तरह–तरह की तिकड़म करके उनकी एकता को तोड़ देता है, जिससे उन्हें हक नहीं मिल पाता। जब तक छोटी फैक्ट्रियों के मजदूर स्थायी यूनियन बनाकर संघर्ष नहीं करते, तब तक उनकी छोटी–मोटी माँग भी मालिक नहीं मानेगा।