बुनकर कबीर दास का संघर्ष और जीवन
सन्त कबीर को कौन नहीं जानता? कबीर मेहनत–मजदूरी करके जिन्दगी बिताने वाले इनसान थे। वे कपड़े की बुनाई किया करते थे। समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए अपने पद और दोहे लोगों को सुनाया करते थे। वे हमें प्रेरणा देते हैं कि हम मालिक की गुलामी से आजाद हो जायें। वे खुद स्वीकार करते हैं कि उनके विचार इनसान की स्वतंत्रता के लिए जरूरी हैं। वे कहते हैं––
बिन कबीर हम मालिक की वस्तु, संग कबीर इंसाना रे।
भक्ति का खूब बखान किया, अब शक्ति को पहचाना रे।।
कबीर का जन्म आज से लगभग छ सौ साल पहले काशी के लहरतारा नामक स्थान पर हुआ था। लोग कहते हैं कि कबीर लिखना नहीं जानते थे, लेकिन उनकी रचनाओं को देखकर ऐसा नहीं लगता कि वे कम ज्ञानी थे। वे उस समय पैदा हुए जब हिन्दू और मुस्लिम धर्म में पाखण्ड और अन्धविश्वास बहुत बढ़ गया था। उन्होंने दोनों धर्मों के पाखण्ड के खिलाफ आवाज उठायी। वे मुसलमानों को फटकारते हुए कहते हैं––
काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दै, क्या बहिरा हुआ खुदाय।।
अन्धविश्वास पर हिन्दुओं को आइना दिखाते हुए कहते हैं––
पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहाड़,
घर की चाकी कोई न पूजे, जाको पीस खाय संसार।
सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने हिन्दू–मुसलिम एकता का संदेश दिया है––
वो ही मोहम्मद, वो ही महादेव, ब्रह्मा आदम कहिए।
को हिन्दू, को तुरूक कहाए, एक जिमि पर रहिए।
जातिवाद के खिलाफ उन्होंने कहा, "जाति न पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान।" और "ऊँचे कुल का जनमिया पर करनी ऊँची न होय।” उनकी नजर में व्यक्ति की गलतियों को दूर करने का उपाय आलोचना है। इसलिए वे अपनी आलोचना–निन्दा को आमंत्रित करते हुए कहते हैं––
निन्दक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
दूसरे (पर) इनसान के दुख (पीर) को देखकर कबीर रो उठते हैं। इनसानियत का इतना बड़ा संदेश देने वाले अपने दौर के दार्शनिक कवियों में से वे बिरले ही हैं––
सुखिया सब संसार है, खाए और सोवे।
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोवे।।
कबीरा वो ही पीर है, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जाने, वो जाहिल के पीर।।
दुखी–पीड़ित इनासानों की दशा सुधारने के लिए संघर्ष जरूरी है। वे धैर्यपूर्ण संघर्ष के महत्व को स्थापित करते हुए कहते हैं––
धीरे–धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।
धैर्यपूर्ण संघर्ष करते रहने से ही सही समय पर सही फल मिलता है। जब काम में सफलता मिल जाये तो हमें अहंकार नहीं करना चाहिए। वे सचेत करते हुए कहते हैं, फ्मत कर माया रो अभिमान, मत कर काया रो अहंकार।” वे सत्य, साहस और विद्रोह के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हुए कहते हैं––
कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकठिया हाथ
जो घर फूँके आपणो, चले हमारे साथ।
इस तरह के सैकड़ों दोहे उन्होंने कहे, जिनसे आज हम सही सबक लेकर अपने संघर्षों को आगे बढ़ा सकते हैं।
उनके समय यह अन्धविश्वास फैला हुआ था कि काशी में मरने पर स्वर्ग मिलता है। इस अन्धविश्वास को तोड़ने के लिए वे मरने से पहले काशी से मगहर चले गये और वहीं शरीर को त्याग दिया। ऐसे थे हमारे सन्त कबीर।