बुनियादी शिक्षा की सही रूपरेखा

01 Apr 2021 • मजदूर एकता पुस्तिका- १ • 2 बार पढ़ा गया

किसानों–मजदूरों में दो तरह की शिक्षा की जरूरत है–– छोटे बच्चों के लिए और प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए। इस लेख में छोटे बच्चों की शिक्षा के बारे में बात की जायेगी। बच्चों की बुनियादी शिक्षा (बेसिक एजुकेशन) आठवीं कक्षा तक चलती है। बुनियादी शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है, जिसे मुफ्त में उपलब्ध कराया जाना सरकारों का कर्तव्य है। लेकिन जब से शिक्षा का निजीकरण किया गया, इसकी खराब हालत की तस्वीर सबके सामने है। इसलिए यह हमारे कन्धों पर बड़ी जिम्मेदारी लाता है कि न्यूनतम पफीस में देश के हर बच्चे को बुनियादी शिक्षा उपलब्ध कराने में सहयोग करें।

बुनियादी शिक्षा कैसी हो? इस पर भी विचार करना जरूरी है। स्कूली शिक्षा के पतन को ध्यान में रखते हुए हमें शिक्षा व्यवस्था का ऐसा मॉडल बनाना चाहिए जो छात्रों का सभी दिशाओं में विकास करे। छात्रों को कक्षा की पढ़ाई के साथ–साथ स्कूल के बाहर सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कामों की भी ट्रेनिंग दी जाये। इस दिशा में उनकी रुचियों का विस्तार किया जाये। उन्हें समाज का एक बेहतर नागरिक बनना सिखाया जाये। इसके लिए विविध तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाने चाहिए। उन्हें नाटक और गीत–संगीत का भी प्रशिक्षण देना चाहिए। उनके लिए सामाजिक विषयों पर गोष्ठी, सेमिनार और बहस–मुबाहसा आयोजित करें। विज्ञान प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें। ऐतिहासिक और प्राकृतिक स्थानों की सैर पर ले जायें। इससे उन्हें दुनिया को सही नजरिये से देखने में मदद मिलेगी। वे खुद में सिमटे रहने के बजाय मिलनसार बनेंगे और जिन्दगी के संघर्ष को सही तरीके से समझ पायेंगे।

सैद्धांतिक शिक्षा के साथ–साथ प्रायोगिक शिक्षा पर भी जोर देना भी बहुत जरूरी है। टीचर को चाहिए कि वह छात्रों को वैज्ञानिक सिद्धान्त बताने के साथ–साथ उनके सामने प्रयोग करके भी दिखायें। उपलब्ध साधनों के आधार पर प्रयोग करके छात्रों को विज्ञान समझाने की कोशिश करें। हर टीचर को रचनाशीलता से पढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। जैसे– दिन–रात कैसे होते हैं? यह एक सरल प्रयोग से दिखाया जा सकता है, उसके लिए एक गोला और एक टॉर्च की जरूरत होती है। एक और गोला ले लें तो सूर्य–ग्रहण और चन्द्र–ग्रहण भी समझाया जा सकता है। ऐसी साधारण चीजों से सैकड़ों प्रयोग किये जा सकते हैं। नये–नये प्रयोग से छात्रों में रचनात्मक विकसित होती है और पढ़ाई में उनका मन भी लगा रहता है।

छात्रों को छोटे–छोटे औजारों और उपकरणों के बारे में जानकारी दी जाये। ये हमारे आस–पास से ही जुटाये जा सकते हैं, जैसे–– बल्ब ले लीजिए। अब उसकी मदद से छात्रों को समझाइये कि बिजली क्या है? कैसे तारों में बहती है? बल्ब का फिलामेण्ट गरम कैसे होता है? सभी उपकरणों को दो भागों में बाँटकर समझाइये। जैसे–– बिजली से चलने वाले उपकरण और बिना बिजली से चलने वाले उपकरण।

छात्रों को विज्ञान पढ़ाने पर जोर देना चाहिए। उनके अन्दर वैज्ञानिक नजरिये का विकास करना चाहिए, जिससे वे तर्कशीलता अपना सकें। घटनाओं के कार्य–कारण सम्बन्ध को समझ सकें और अंधविश्वास से छुटकारा पा सकें। वे सवाल पूछने के लिए प्रेरित हों और जवाब ढूँढने की कोशिश करें।

छात्रों को पढ़ाते समय उनकी उम्र, समझदारी और रूचि का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जैसे–– तीसरी कक्षा तक छात्रों को कहानी, कविता, गाना, वीडियो के माध्यम से समझाइये। उससे ऊपर के बच्चों को कक्षा और कोर्स के अनुसार वैज्ञानिक प्रयोग और औजारों–उपकरणों की जानकारी दीजिए। अगर हम इस बात का ध्यान नहीं रखते तो बच्चे ठीक से सीख नहीं पायेंगे। यह सब सिखाते हुए उन्हें भी खुद से प्रयोग करके सीखने दीजिए।

छात्रों को मानव समाज के विविध पहलुओं के बारे में जानकारी भी दी जाये। जैसे–– स्वास्थ्य, खान–पान, पहनावा, गली–मकान, मनोरंजन, समाज सेवा, संस्कृति आदि। खान–पान की शिक्षा देते समय उन्हें सन्तुलित और पूर्ण आहार का महत्व समझाइये। पौष्टिकता की कमी से होने वाली बीमारियों के बारे में बताइये। घर में खाना बनाने, साफ–सपफाई करने और दूसरे कामों में परिजनों की मदद करने के लिए बच्चों को प्रेरित कीजिए। खाद्य पदार्थों पर प्रयोग करके भी दिखाइये। जैसे, आलू मँगा लें और उसे कैसे छीला, काटा, भूना, उबाला जाता है और उसके चिप्स, पापड़, सब्जी, नमकीन, हलवा कैसे बनाये जाते हैं, समझायें। इस तरह उन्हें रसोई से लेकर फैक्ट्री और खेत तक समाज में चल रही सभी उत्पादक गतिविधियों से परिचित कराना चाहिए। इसके लिए उत्पादन में लगने वाले कच्चे माल के बारे में और वे कहाँ से आते हैं, उसकी भी जानकारी देनी चाहिए। उत्पादक गतिविधियों के बारे में बताते समय सबसे जरूरी है, उन इनसानों के बारे में बताना जो उत्पादन का काम करते हैं। उत्पादन से ही समाज चलता है। यह मानव समाज की सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण कार्रवाई है। उत्पादन करने वाले सबसे महत्वपूर्ण इनसान हैं। जैसे किसान, मजदूर और खाना बनाने वाले स्त्री–पुरुष आदि। छात्रों को बताना चाहिए कि उन्होंने जो कपड़े पहन रखे हैं, उसे किसने बनाया है और जिस मजदूर ने उन्हें बनाया है, उसकी हालत कितनी खराब है। हमें छात्रों को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जो उन्हें उत्पादक वर्ग से प्रेम करना सिखाये। उत्पादक वर्गों की बेहतरी के लिए काम करने की प्रेरणा दे। उन्हें ऐसी शिक्षा भी देनी चाहिए जो उन्हें अपराधियों, लुटेरों, भ्रष्ट नेताओं और शोषण करने वाले पूँजीपतियों से नफरत करना सिखाये।

छात्रों को मानवीय मूल्यों के बारे में जानकारी देनी चाहिए और खुद में उन्हें कैसे विकसित करें। यह सिखाना चाहिए। जैसे, शारीरिक श्रम का महत्व, सहयोग की भावना, लगन–मेहनत, आत्मनिर्भरता, सामूहिकता, सम्मान करना, सह्रदयता और उदारता, ईमानदारी और सच्चाई, नियमितता और समयब(ता, अनुशासन और समर्पण।

यह सब सिखाते हुए इन सभी में उनकी क्या भूमिका हो, वे कौन–सी जिम्मेदारी ले सकते हैं, उसे कैसे पूरा करें? इसे भी सिखाना चाहिए। आत्म–सम्मान जागरूकता, अपनत्व, उत्तरदायित्व के महत्व के बारे में भी। आत्म–सम्मान की बात ले लें। वे मेहनत करके गुजारा करने वाले मजदूरों के बच्चे हैं। यह बात सोचकर दु:खी और शर्मसार होने के बजाय स्वाभिमानी बने और इस बात को जाने कि मजदूर वर्ग ही दुनिया का निर्माता है। इतिहास का सबसे अगुआ है और पूरी दुनिया को बदलने तथा बेहतर बनाने की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है। यह बात उनमें गर्व, आत्म–विश्वास और दृढ़ता पैदा करे।

छात्रों को मजदूर वर्गीय नैतिकता सिखानी चाहिए। अपनी मेहनत से जिन्दगी गुजर–बसर करना सबसे बड़ी नैतिकता है। दूसरों के श्रम को चुराना, किसी का शोषण करना और बराबरी वाले समाज निर्माण के बजाय निजी सम्पत्ति का पहाड़ खड़ा करना सबसे बड़ी अनैतिकता है। यहीं से सभी अपराधों की शुरुआत होती है। इसके साथ ही पुरानी और सड़ी–गली नैतिकता की जगह नयी जनवादी नैतिकता का पालन करना सिखाना चाहिए। पितृसत्तात्मक मूल्यों की जगह स्त्री–पुरुष की बराबरी का मूल्य सिखाना चाहिए।

छात्रों को ऐसी शिक्षा दी जाये, जो उन्हें स्वार्थी बनाने के बजाय परमार्थी बनाये। प्रतियोगिता करने के बजाय सहयोग करने और एक–दूसरे से सीखने–सिखाने पर जोर दें। दूसरे छात्रों को विरोधी या दुश्मन मानने के बजाय सहयोगी और दोस्त बनना सिखाये। आपसी मतभेद को धैर्यपूर्वक और शांति से हल करना सिखाये।

इस लेख में हमने बुनियादी शिक्षा के कुछ बिन्दुओं की चर्चा की है। शिक्षा देते समय एक टीचर को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। जाहिर सी बात है कि टीचर खुद जब इन बातों को अच्छी तरह समझेंगे, तभी वे अपने छात्रों को ठीक से सिखा पायेंगे। इसलिए टीचर का सबसे पहला कर्त्तव्य है कि पहले वे खुद को शिक्षित करें। शिक्षा से जुड़ी इन बुनियादी बातों पर अपनी पकड़ कायम करें और उसे अपनी जिन्दगी में बरतें। यानी खुद इन बातों पर चलें, तभी वे छात्रों को सही दिशा दे पायेंगे।

हम ऐसी नयी पीढ़ी चाहते हैं जो पुराने समाज की बुराइयों से मुक्त हो। इसके लिए उसे श्रम–शिक्षा के साथ–साथ वैज्ञानिक शिक्षा देना जरूरी है। पुरानी पीढ़ी जिन दु:ख–तकलीपफों से घुटती और मरती रही, उनसे मुक्त होकर अपनी तकदीर बदलने की शिक्षा भी उसके पास नहीं थी। हम चाहते हैं कि नयी पीढ़ी के साथ ऐसा न हो। हमारी किस्मत को बदलने के लिए कोई पीर–पैगम्बर, देवी–देवता, या अवतार नहीं आने वाला, जिसके इन्तजार में तमाम पीढ़ियाँ बूढ़ी होकर मर–खप गयीं। नयी पीढ़ी भी अगर ऐसे पैगम्बर या अवतार के इन्तजार में बैठी रहेगी तो नरक जैसी व्यवस्था कभी नहीं बदलेगी। उसे अपनी किस्मत की बागडोर अपने हाथ में लेनी पड़ेगी। नयी पीढ़ी के पास श्रम–शिक्षा, वैज्ञानिक शिक्षा और संघर्ष की शिक्षा होनी चाहिए, जिससे वह पुराने समाज की सड़ांध और बुराइयों को दूर करके एक नये समाज का निर्माण कर सके।

जंत्र–मंत्र और अन्धविश्वास का मकड़जाल

जंत्र–मंत्र सब झूठ है, मत भरमो जग कोय।

सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय।

                                                            –कबीर

कबीर दास ने बहुत पहले ही टोने–टोटके और जंत्र–मंत्र को झूठ बता दिया था। सबको सलाह दी थी कि इनके जाल में न पफँसें। बातों का अर्थ और उनके पीछे के तर्क जाने बिना अज्ञान रूपी अन्धेरा रौशनी में नहीं बदल सकता।

कबीर की इस बात को छह सौ साल गुजर गये। अब हम अपनी आज की जिन्दगी पर एक नजर डालें। हमारा पूरा समाज टोने–टोटके, जादू–मन्त्र और बाबाओं के जंजाल में पफँसा हुआ है। एक तरफ देश के आधे से ज्यादा जिलों में कोई मेडिकल कालेज नहीं है, दूसरी तरफ आलम ये कि देश में ऐसा कोई जिला नहीं जहाँ झाड़–पफूँक वाले बाबा का किला नहीं। हर जिले में सैकड़ों बीघे जमीन घेरकर बाबा तरह–तरह की आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। बाबा के आश्रम वोट बैंक का अड्डा हैं। इसलिए चुनावी पार्टियाँ इनके अपराधों की अनदेखी करती हैं। बहुत लोगों का मासूम दिल भी अपनी जिन्दगी की तमाम परेशानियों का समाधान इन्हीं आश्रमों में ढूँढता है। बसों और घर की दीवार पर इश्तहार चिपके होते हैं कि पति–पत्नी के झगड़े, परिवार की कलह, जमीन का विवाद, बच्चे का पढ़ाई में मन न लगने, पढ़े–लिखे बच्चे का घर में बेरोजगार बैठे रहने, किसी का प्रेम–मोहब्बत तोड़ने तो किसी का जोड़ने, घर में छुपा खजाना निकलवाने के लिए फलाँ बाबा से मिले। भक्त ऐसे तमाम सवाल लेकर बाबाओं के आश्रम में भीड़ लगाये रहते हैं।

ऐसी बात नहीं है कि लोगों की समस्याएँ पूरी तरह से गलत हैं। हमारे समाज का जैसा ताना–बाना है उसमें ऐसी बहुतेरी समस्याएँ हैं। हर कोई इन समस्याओं का सामना करता है या कर रहा है। समझने की बात यह है कि इन समस्याओं का सही समाधान क्या है? बाबा की भभूत, कोई मन्त्र, कोई टोटका, किसी पीर–पैगम्बर के दर्शन या कुछ और?

सभी लोग अपनी बुदधि–विवेक और जिन्दगी से मिले अनुभवों के आधार पर जिन्दगी में आयी मुसीबतों का सामना करते हैं। कई बार तमाम पढ़े–लिखे डिग्री धारक भी इन बाबाओं के पिछलग्गू बने घूमते हैं जिनका प्रभाव कम पढ़े–लिखे लोगों पर भी पड़ता है। फिल्मों के हीरो और ऊँचे पदों पर काम करनेवाले लोग इन बाबा और मठाधीशों के साथ खड़े दिखाई देते हैं तो सामान्य इनसान अपने विवेक और बुद्धि का इस्तेमाल न करके इन टीवी के नायकों पर भरोसा करके बाबाओं के जाल में फँस जाता है। उदाहरण के लिए सचिन तेन्दुलकर को लाखों लोग पसन्द करते हैं, वही सचिन तेन्दुलकर जो सत्य सार्इं बाबा के चेले हैं, वे उनके आश्रम में दान–दक्षिणा चढ़ाते हैं। ये सत्य सार्इं बाबा वही हैं जिन्होंने दावा किया था कि उनकी मृत्यु के इक्कीसवें दिन प्रलय आ जायेगी। आज उनकी मौत को दस साल बीत गये। प्रलय नहीं आयी।

दुनिया की हर घटना को, हर सवाल को समझने के कई तरीके होते हैं। इनमें एक तरीका ऐसा होता है जो अज्ञानता और मूर्खता का फायदा उठाता है, बेसिर–पैर की बातों के सहारे समाधान बताने की कोशिश करता है। इसके जरिये तंत्र–मन्त्र, जादू टोना, शनि का प्रकोप, बृहस्पति की छाया आदि का डर दिखाकर ग्राहकों से रुपये ऐंठे जाते हैं। ऐसे समाधानों पर भरोसा करने वालों को अंधविश्वासी कहते हैं। इसके विपरीत दूसरा तरीका है– समस्या की जड़ में जाकर तहकीकात करना, उसके असली कारण को ढूढ़कर, उसको दूर करके समस्या हल करने की कोशिश करना। ऐसा करने वालों को तार्किक और वैज्ञानिक चेतना वाला कहा जाता है।

कहने को आज हम विज्ञान के युग में जी रहे हैं। स्मार्ट फोन, साइकिल, स्कूटर, कार, हवाई जहाज, बड़े–बड़े अस्पताल, तरह–तरह की जीवन रक्षक दवाइयाँ विज्ञान की वजह से ही सम्भव हुई हैं। लेकिन समाज में इन साधनों का आ जाना भर किसी समाज को वैज्ञानिक चेतना वाला नहीं बना देता। एक तरफ विज्ञान के बड़े–बड़े सिद्धान्त इन सामानों को बनाने में लगते हैं। दूसरी तरफ, एक आम इनसान यह भी नहीं समझ पाया है कि हमारी धरती से करोड़ों किलोमीटर दूर स्थित शनि ग्रह की इस धरती के वासियों से कोई दुश्मनी नहीं है। यह ग्रह इनसानों के लिए किसी रूप में खतरनाक नहीं है। फिर भी किसी पढ़े–लिखे आदमी को भी शनि का डर दिखाकर एक बाबा एक किलो तेल और कुछ आटे का जुगाड़ कर लेता है। वहीं मजदूर को अपने परिवार के लिए इतना राशन जुटाने के लिए हफ्ते भर कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।

सच पूछा जाय तो वास्तव में शनि बनकर हमारी जिन्दगियों में कौन बैठा है? सरकार की एक नीति से लाखों लोग बेरोजगार हो जाते हैं। सरकार पढ़ने–लिखने की ठीक व्यवस्था नहीं करती। करोड़ों अनपढ़ रह जाते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान नहीं देती। इसलिए लाखों मरीज बिना इलाज के मर जाते हैं। अब ये तमाम बेरोजगार, अशिक्षित और बीमार लोग सरकार और सामाजिक व्यवस्था को दोषी ठहराने के बजाय खुद की कुण्डली में बैठे शनि महाराज पर दोष मढ़ते हैं। इससे असली आरोपी बाइज्जत बरी हो जाते हैं जबकि समस्या दूर होने के बजाय और बढ़ती जाती है।

इसी तरह जिन्दगी में घटने वाली हर प्रिय और अप्रिय घटना पर तार्किक विचार किया जाय तो हम सही नजरिया हासिल कर सकते हैं। इसमें हमारा खर्च कुछ न होगा, बचेगा सब कुछ–– समय, धन, जान, विवेक और बुद्धि।

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