मजदूर वर्ग शोषित–पीड़ित है। उसकी जिन्दगी बद से बदतर होती जा रही है। छोटे–छोटे बच्चे भी स्कूल और खेल–कूद के मैदान में जाने के बजाय दर–दर की ठोकर खाकर रोजी–रोटी जुटाने को मजबूर हैं। हमारे देश में दस करोड़ से अधिक बच्चे ऐसी हालत में हैं। यह सब देखकर मन कराह उठता है। दिल रो पड़ता है। उम्मीद की कहीं कोई किरण दिखायी नहीं देती। ऐसे में कुछ सचेत और सक्रिय नौजवानों को मजदूरों के बीच जाना चाहिए, उन्हें मजदूरों की जिन्दगी बदलने का काम करना चाहिए। इससे अच्छा और महान काम कोई नहीं है क्योंकि मजदूर वर्ग ही दुनिया का निर्माण करने वाला है और जो दुनिया का निर्माण सकता है, तो वह उसे बदल भी सकता है। इसलिए मजदूर वर्ग ही दुनिया को बदल सकता है।
सरकार ने हाल ही में मजदूरों के हित में बने श्रम–कानूनों को खत्म कर दिया है। इससे मालिक बेलगाम हो गये हैं और मजदूरों की मेहनत को जमकर लूट रहे हैं। कोरोना महामारी और लॉकडाउन में मजदूरों को बहुत दु:ख सहने पड़े। इसके बाद भी ज्यादातर मालिकों ने रहम नहीं किया। सरकार तो इस आपदा में अवसर ढूँढती रही। उसने भी क्रूरता की सारी हदें पार कर ली। क्या ये बातें मजदूर नहीं समझते हैं? मजदूर इन बातों को अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन वे अपनी लूट के खिलाफ लड़ नहीं पाते।
कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। मजदूर वर्ग बिखरा हुआ है। उसे टुकड़ों में तोड़ दिया गया है। दो दुखियारे व्यक्ति सच्चे दोस्त होते हैं। एक–दूसरे के दु:खों को साझा करते हैं। एक–दूसरे की मदद करते हैं। मिल–जुलकर अपनी समस्याओं को दूर करते हैं। लेकिन ज्यादातर मजदूरों के साथ ऐसा नहीं है। यह कहते हुए अच्छा नहीं लग रहा है कि बात–बात पर वे एक–दूसरे से लड़ते हैं। एक–दूसरे को नीचा दिखाते हैं। वे साथ–साथ बैठना पसन्द नहीं करते। इससे उनकी एकता कमजोर होती है। उनके नेता भी उन्हें जातियों में बाँटकर लड़वाते हैं, दो धर्मों के लोगों में दंगे करवाते हैं। इससे इन नेताओं का ही फायदा होता है। नेता धाँधली करके, जातिवाद फैलाकर और दंगे कराकर चुनाव जीतते हैं। क्या ऐसे नेता मजदूरों का भला करेंगे? नहीं। वे अपना घर भरने के लिए चुनाव लड़ते और जीतते हैं, सरकार बनाते और बिगाड़ते हैं तथा जनता की गाढ़ी कमाई लूटकर अपनी तिजोरी भरते हैं। वे उन मालिकों का साथ देते हैं, जो मजदूरों का शोषण करते हैं।
आज ज्ञान सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए मजदूरों को पढ़ने–लिखने से रोका जा रहा है। ज्यादातर मजदूर दो–दो शिफ्टों में काम करके अपने परिवार की गाड़ी खींच रहे हैं, जबकि छोटे बच्चे भी काम पर जा रहे हैं। फिर वे पढ़ाई कब करें? अगर वे पढ़ने का समय निकाल लें, तो महँगी फीस कैसे चुकायेंगे? सरकरी स्कूलों में पढ़ाई की हालत खराब कर दी गयी है। अगर किसी तरह मजदूर और उनके बच्चे अक्षर ज्ञान कर लेते हैं और हिन्दी पढ़ना जान जाते हैं, उसके बाद भी उनकी यह पढ़ाई उनकी जिन्दगी में बहुत कम काम आती है। उनकी यह पढ़ाई आपसी एकता कायम करना और संघर्ष करना नहीं सिखाती।
मजदूरों को ऐसी शिक्षा की जरूरत है, जो उनकी एकता कायम करने में मदद करे। उनको यह बताये कि उनकी बदहाली का कारण क्या है? उन्हें शोषण और लूट के खिलाफ संघर्ष की प्रेरणा दे। वह उन्हें सिखाये कि आपस में कैसे मिल–जुलकर रहें। अपने झगड़े कैसे सुलझायें। मजदूरों को ऐसी शिक्षा चाहिए, जो उनकी जिन्दगी को बेहतर बनाये। सरकार, पूँजीपति और मालिक मिलकर यह शासन चलाते हैं। ये लोग ऐसा काम जान–बूझकर करते हैं, जिससे मजदूर पढ़–लिख न पायें। उनके अन्दर समझदारी पैदा न हो। वे आपस में लड़ते रहें। एक–दूसरे के खून के प्यासे बने रहें। वे जानते हैं कि अगर मजदूर एक हो गये तो उनकी लूटपाट बन्द करा दी जायेगी। उन्हें भी मेहनत करके रोटी खानी पड़ेगी, उनकी मौज–मस्ती पर रोक लग जायेगी और तिजोरी में पड़ा माल–असबाब सब खत्म हो जायेगा।
भारत में 50 करोड़ से अधिक मजदूर हैं, जो मेहनत की कमाई पर गुजारा करते हैं। यानी परिवार के सभी सदस्यों को लेकर गिने तो 100 करोड़ से अधिक लोग मेहनत–मजदूरी पर निर्भर हैं। यह इनकी ताकत भी है, कमजोरी भी। देश का मतलब इन्हीं से है। इनकी जिन्दगी को बेहतर बनाये बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता। देश को महाशक्ति बनाने की बातें केवल ढोंग और जुमला हैं। देश को आगे बढ़ाना है, तो मजदूर वर्ग को मजबूत बनाना पड़ेगा। उस विकास का क्या फायदा जिससे 100 करोड़ लोगों की जिन्दगी खुशहाल नहीं होती, बल्कि चन्द पूँजीपतियों की सम्पत्ति दुगुनी–तिगुनी हो जाती है। मजदूर वर्ग ही देश की असली ताकत है, बशर्ते वह खुद को पहचान जाये और संगठित हो जाये।
अलग–अलग रहकर मजदूर कुछ भी नहीं है। एकजुट होकर वे सब कुछ हैं। अलग–अलग रहकर वे अपने दु:खों में जकड़े रहते हैं और घुट–घुट कर जीते हैं। एकजुट होकर उन दु:खों के खिलाफ लड़ सकते हैं, उन्हें दूर कर सकते हैं। इसलिए हमें इसका प्रयास करना चाहिए कि मजदूर एकजुट हों।
आज मजदूरों के लिए बहुत कम किताबें मौजूद हैं। जो किताबें उपलब्ध हैं, वे भी कठिन और उबाऊ हैं। मजदूरों की जिन्दगी को बेहतर बनाने और उनमें जागरूकता पैदा करने के लिए उनकी अपनी किताबें होनी चाहिए। मजदूरों की जिन्दगी से जुड़ी कहानी, कविता, लेख, उपन्यास और उन्हें प्रेरणा देनेवाली किताबों की कमी है और जो हैं वे मजदूरों के पास नहीं पहुँच पातीं। मजदूरों की जिन्दगी को सुधारने वालों को रोज इस कमी से जूझना पड़ता है। साहित्य की इस कमी को पूरा करने की जरूरत है। इस दिशा में यह पुस्तिका एक शुरुआती कोशिश भर है।
यह पुस्तिका मजदूरों की भलाई और एकता के लिए समर्पित है। यह हमारी पहली कोशिश है। उम्मीद है पुस्तिका पढ़ने वाले साथी हमें बतायेंगे कि उन्हें यह पुस्तिका कैसी लगी। इस काम में सहयोग देने वाले साथियों का तहे दिल से स्वागत है।
एक गुलाम हमेशा लोगों का इन्तजार करता रहता था, जिससे उनके सामने अपना दुखड़ा रो सके। वह बस ऐसा ही था और बस इतना ही कर सकता था। एक दिन वह एक अक्लमन्द आदमी से मिला।........
किसानों–मजदूरों में दो तरह की शिक्षा की जरूरत है–– छोटे बच्चों के लिए और प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए। इस लेख में छोटे बच्चों की शिक्षा के बारे में बात की जायेगी।........
मजदूर सहायक समिति (एमएसएस) के कुछ साथियों ने मेरठ की बुक बाइंडिंग की फैक्ट्री के मजदूरों का सर्वे किया। इस सर्वे में उनके कार्यस्थल, जीवन दशा और निवास स्थल के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें पता चलीं। उस सर्वे की संक्षिप्त रिपोर्ट यहाँ दी जा रही है।........
प्रदीप ने लगभग 35 साल सरकारी फार्म में ज्वार, बाजरा, मक्का की कटाई का काम किया है। यह काम ठेकेदार द्वारा कराया जाता था। काम की शुरुआत रात 3 बजे से लेकर सुबह 10 बजे तक होती थी। बड़ी दराँती से ज्वार, बाजरा आदि काटकर इन्हें ट्रैक्टर में भरना होता था। यह काम कड़ी मेहनत का था क्योंकि झुककर लगातार 8 घण्टे काम करना पड़ता था और साथ ही वजन भी उठाना पड़ता था। लगभग हर रोज 30–40 कुण्टल ज्वार काट लेते थे और पिफर उसे ट्रैक्टर में लादते थे। यह काम खाली पेट करते थे क्योंकि........
यदि तुम्हें, धकेलकर गाँव से बाहर कर दिया जाय पानी तक न लेने दिया जाय कुएँ से दुत्कारा फटकारा जाय चिल–चिलाती दोपहर में कहा जाय तोड़ने को पत्थर काम के बदले दिया जाय खाने को जूठन तब तुम क्या करोगे?.......
नौजवान होना खुशी की बात है। रगों में गर्म खून झरने की तरह दौड़ता है। शरीर में ताजगी बनी रहती है। ऊर्जा और उत्साह से भरपूर मन हमेशा कुछ न कुछ करने के लिए बेचैन रहता है। मजदूर होना भी खुशी की बात है। मजदूर मेहनत से घबराता नहीं। काम करने के लिए उसके कदम........
..... कुछ मजदूर अधिक मेहनत करके ज्यादा पैसे कमाकर अपनी जिन्दगी सुधारना चाहते हैं। वहीं, कुछ मजदूर अपने मालिक से लड़–झगड़कर अपना हक पाना चाहते हैं। इन सबसे अलग कुछ मजदूर ऐसे भी हैं, जो खुद मालिक बनने का सपना देखते हैं।........
आज मजदूरों की जिन्दगी पर गौर करें तो हमें क्या नजर आता है? सुबह से शाम तक हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी केवल जिन्दा रहने जितनी कमाई। एक तरफ रोजगार के साधन कम होते जा रहें हैं, मजदूरी घट रही है, तो वहीं दिन पर दिन महँगाई बढ़ती जा रही है। ऐसी हालत में मजदूरों के लिए अपने परिवार का भरण–पोषण भी बेहद मुश्किल हो गया है। इस परिस्थिति से बाहर निकलने का क्या रास्ता है?.......
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