देवी की चुनरी और रुबीना

07 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

गाँव के एक छोर पर जोहड़ के किनारे बसे मुस्लिम और दलित मजदूरों के मोहल्ले में हमारे चाचा और दोस्त रोजूदीन का घर है। चाचा अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन परिवार के साथ आज भी हमारा रिश्ता उतना ही गहरा है। चाचा नयी सोच के मजदूर थे, किताबें पढ़ते थे और हमने उनके घर में आम परिवारों की तरह औरतों को परदे में छिपे हुए नहीं देखा। उनका घर एक बन्द गली के छोर पर है। गली इतनी संकरी है कि दो आदमी साथ–साथ नहीं चल सकते। बरसात के मौसम में गली में जोहड़ का पानी भरा रहता है और अक्सर ही पनैले साँप घरों में घुस जाते हैं। गली में जितने भी घर हैं, सभी अपने दरवाजों के सामने कतार में ईंट रख देते हैं, उन्हीं पर पैर जमाकर गली से गुजरना होता है।

मैं लगभग एक महीने बाद चाचा रोजूदीन के घर गया। बैठक में धूल और पसीने में लिथड़े हुए, मोहल्ले के बच्चे खेल रहे थे। मैं बैठक से निकलकर छप्पर में बँधी भैंस से बचते हुए छोटे से आँगन में आ गया। सामने, घर के इकलौते कमरे की देहरी के ठीक पीछे, रुबीना सिलाई कर रही थी। कमरे के बाहर दीवार से सटी छोटी–सी खाट पर बैठी चाची किसी पुराने कपड़े की सीवन उधेड़ रही थी।

रुबीना वैसे तो घर की बहू है लेकिन चाचा ने परदा हटवा दिया था और वह शादी के पहले से इस घर में आती–जाती थी और हम सब लोगों को जानती थी इसलिए ऐसा रिश्ता बन गया कि घर की बहू और बेटी का फर्क ही मिट गया। रुबीना लगभग 25 साल की है और उसके दो बेटे हैं। वह जितनी मेहनती है उतनी ही खुशमिजाज और इसलिए सबकी बहुत लाड़ली भी है।   

वह पैर से चलने वाली सिलाई मशीन पर बिजली की रफ्तार से कुछ सिल रही थी। पहले उसके पास हाथ की मशीन थी और पिछली बार उसने इसे पैर वाली मशीन में बदलवाने की बात कही थी, जिस पर 1400 रुपये का खर्च आना था। 

चाची को नमस्ते करके मैं रुबीना की नयी मशीन को देखते हुए कमरे के दरवाजे तक पहुँच गया था। उसके पीछे, कमरे के बीच पड़े पलंग पर चुनरियों का ढेर लगा था। उसी पर घर के इकलौते टेबल पंखे के सामने रुबीना का छोटा बेटा सोया हुआ था। अस्त–व्यस्त कमरे के दरवाजे से सटी रुबीना की सिलाई मशीन एक नीरस धुन पर उसके पैरों से एकाकार होकर पूरी रफ्तार से नाच रही थी। जबरदस्त गर्मी थी, रुबीना का चेहरा और बाजू पसीने से तरबतर थे। मेरे आने से रुबीना के पैर और मशीन दोनों रुक गये।

मैंने सीधे सवालिया ढंग से पूछा फ्मशीन के पैर लगवा लिये।” उसने नमस्ते के  साथ ही हँसते हुए जवाब दिया "हाँ भाई, हाथ वाली से काम नहीं चलता था।” यह कहते–कहते रुबीना स्टूल पीछे खिसकाकर खड़ी हो गयी। उसने चप्पल नहीं पहनी थी। मैंने वजह पूछी तो बोली "पाँव जलें”और फिर मशीन को पैरों से चलने वाली बनवाने का किस्सा बताने लगी। उसे सुनते हुए मैं चाची के पास खाट पर बैठ गया। बीच–बीच में चाची भी इस किस्से में कुछ जोड़ती–घटाती रही। मुझे पानी देने के बाद रुबीना ने चाय बनाने के सरसों की तुड़ी के जलावन से चूल्हा सुलगाना शुरू कर दिया।

बात घूम–फिर कर रुबीना के नये रोजगार पर आ गयी। चाची ने बड़े गर्व से बताया "इब तो या टेलरानी होगी। देबीयों की चुनडी पै गोट लगवे, भाई, कितना ही खर्चा दब जा।”मैं मन ही मन बहुत खुश था। हमने और चाचा ने, रुबीना कुछ कमाये, पैसे के मामले में थोड़ा खुदमुख्तार हो जाये, इसके लिए काफी जोर लगाया था।

मैंने बड़ी उत्सुकता से रुबीना की कमाई की जानकारी लेनी शुरू की। उसने बताया कि गाँव का ही एक आदमी उसे बड़ौत से चुनरी और गोट लाकर देता है, "मेरी तो बस रील लगे।... मैं रोज 300 चुनडी तैयार कर दूँ, पर इसमें तो कुछ मिलता नी। एक दर्जन के बस तीन रुपे मिलें। एक चुनडी के 25 पैसे पड़ें।” मैं भौचक्का रह गया। इतने कम दाम में कोई कैसे काम कर सकता है!

मैंने रुबीना से पूछा “मशीन पर कितनी देर बैठती है?” चाय में उबाल आ रहा था। जबाब चाची ने दिया। “ भाई बिचारी दिन–रात लगी रह। दो याणे बालक, सारा घर का काम, भाई बहोत काम हो जा।...  मैं तो तड़की खेत में चली जाऊँ, रुबीना का पति छोटू मजदूरी पै चला जा। मेरी बच्ची की फिरकी बण री। आधी रात तक इन्हीं मरी चुनड़ियों में लगी रह।” सास से तारीफ सुनकर रुबीना हमें चाय देते हुए मुस्कुरा रही थी। चाची बोले जा रही थी। “एक या मरी गर्मी, ईन्ने बी खून पी लिया, ना कहीं बैठण के, ना लोटण के। म्हारी याद में तो इतनी गर्मी कभी हुई नी।”

मैंने रुबीना से जो सवाल पूछा था, वह उसे याद था। मौका मिलते ही बताने लगी। “एक दिन हमने हिसाब जोड़ा था। मैं 10 घण्टे मशीन पै बैठूँ, अर मुझे 75 रुपये पड़ें रोज के।” चाची से रुका नहीं जा रहा था, बोली “पां  सूझ जाँ मेरी बच्ची के, इस उमर में चीस मारें इसके पैरों में। क्या बचे, 300 रुपे के तो मैं छोल में तै रोज गोले बणा लाऊँ, जाड्डों में। मरे सब मजदूरों कू खाण लघरे। तेरा चचा ठीक ई कह करे था।”

चाची के तेवर से रुबीना को मशीन पर खतरा नजर आया। बचाव के अंदाज में बोली “जो मशीन पै मोटर लग जा, फेर तो मैं रोज 50 दर्जन चुनडी बना दूँगी। 150 रुपे आ जा करेंगे।” मैंने नया मुद्दा उठा दिया। “चाची वैसे तो वे मुसलमानों को मन्दिर में नहीं घुसने देते लेकिन देवी–देवता को मुसलमानों की बनाई चुनरी से कोई दिक्कत नहीं होती।” “अ, मरे पागल हैं”, चाची ने एक ही बात में नतीजा निकाल दिया। मैं उठकर एक बार फिर कमरे के दरवाजे तक गया, एक बार फिर लाल चुनरियों पर निगाह डाली। मुझे वे रुबीना के खून–पसीने से तरबतर लगीं।       –– प्रवेन्द्र

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