धर्मगुरुओं का फलता–फूलता कारोबार
अपनी अनुयायी दो लड़कियों के साथ बलात्कार के आरोपी, पहले से ही जेल में बन्द, ‘डॉ सन्त गुरमीत सिंह राम रहीम इंसान’ को एक पत्रकार को मारने के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी। 16 साल पहले पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति ने बाबा के कुकर्मों से सम्बन्धी एक पर्चा छापा था, जिसकी कीमत पत्रकार को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। यह बाबा हरियाणा में हजार एकड़ में बने आश्रम में दसियों हजार अनुयायियों के साथ रहता था। हजारों करोड़ की सम्पत्ति का मालिक है। बाबा ने बॉलीवुड में भी एण्ट्री की। फिल्में भी बनायीं। बाबा के अनुयायी करीब छ: करोड़ हैं।
आसाराम बापू, नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के आरोप में जेल में बन्द है। इनकी सम्पत्ति भी हजारों करोड़ में है। इनकी महीने की कमाई आठ करोड़ है। इनके अनुयायी भी करोड़ों की संख्या में हैं।
श्री श्री रवि शंकर की हर महीने की कमाई करीब सात करोड़ है। इनकी दवा कम्पनियाँ हैं, इनके और भी कई तरह के बिजनेस हैं।
बाबा सद्गुरु, इनके अनुयायी भी करोड़ों में हैं। इनकी भी कुल कमाई करोड़ों में है। आध्यात्मिकता के क्षेत्र में इनके योगदान को दे•ते हुए 2017 में इन्हें भारत सरकार ने पद्म विभूषण से सम्मानित किया था।
माता अमृतानन्दमयी, इनकी सम्पत्ति भी करोड़ों में हैं। हर महीने की आय नौ करोड़ से भी ज्यादा है। वह अपने भक्तों में अम्मा के नाम से मशहूर हैं। अपने भक्तों को माँ जैसा बिना शर्त के ममता बि•रने के लिए जानी जाती हैं। बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण भी देश के सबसे धनी बाबाओं की सूची में शामिल हैं।
एक थे गोल्डन बाबा। यह सोने के आभूषणों से लदे रहते थे। बीस किलो से ज्यादा सोना इनके शरीर पर रहता था। इनका इतिहास भी आपराधिक है। कहते हैं कि ये सन्यासी ही अपने अपराधों का ङ्क्तायश्चित करने के लिए बने। पूर्वी दिल्ली में इनके ऊपर अपहरण, फिरौती, जबरन वसूली, जान से मारने की धमकी आदि मामलों में मुकदमे दर्ज हैं। मतलब अपने इलाके के कुख्यात गुण्डा थे। बाकी की तरह इस सन्यासी के पास भी धन–दौलत, गाड़ी–बंगला और सुरक्षाकर्मियों की कोई कमी नहीं थी।
इनके अलावा, साक्षी महाराज, ङ्क्तज्ञा ठाकुर, योगी आदित्यनाथ जैसे साधु–साध्वी राम–नाम जपने और योग–तपस्या करने के बजाय संसद और विधान सभाओं में मौज मार रहे हैं।
कभी धर्म के बारे में कहा जाता था कि फ्धर्म सरित निर्मल रहे, मैल न मिश्रित होय। जन–जन का होवे भला, जन–जन मंगल होय” पर आज धर्म के ठेकेदार, धर्मगुरु, मठाधीस और धर्म के नाम पर धन्धे चलाने वाले गिरोह ने ही धर्म की लुटिया डुबो दी है। धर्म गुरुओं के आश्रम में भगवान की भक्ति में लीन होने के बजाय तरह–तरह के रास रचाये जाते हैं। धर्मगुरुओं के तमाम आश्रम ड्रग, मर्डर और बलात्कार जैसे वीभत्स अपराधों के अड्डे बन गये हैं। इनके अनुयायी करोड़ों की संख्या में होते हैं। राजनेता इनके पास आशीर्वाद लेने जाते हैं। पुलिस बल इनके कार्यक्रमों में व्यवस्था सम्भालते हैं। रक्षा मंत्रालय के सीधे आदेश पर श्री श्री रवि शंकर के कार्यक्रम में तो फौज ने मोर्चा सम्भाला था।
हमारे देश में एक अजीब परम्परा है। घर–बार, बाल–बच्चे की जिम्मेदारी छोड़कर भागने वाले को महान माना जाता है। सन्यासी के बारे में ऐसी गलत धारणाएँ फैलायी जाती हैं कि वह किसके लिए बेईमानी करेगा? इसका तो कोई है ही नहीं। वह भ्रष्टाचार क्यों करेगा? वह किसी तरह के मोह या लालच में नहीं फँसेगा। निर्णय लेने से घबराएगा नहीं। इस धारणा के हिसाब से तो घर–परिवार वाला व्यक्ति ईमानदार नहीं हो सकता, साहसी नहीं हो सकता। भगवान जाने, बहादुर होने का सम्बन्ध बच्चे पैदा करने से कैसे है!
आजकल सन्यासी का भेष धरे ज्यादातर बाबा, पादरी और मौलवी कोई सन्त नहीं हैं। अÕयासी भरी जिन्दगी जीने वाले इन लोगों के पास कार, बंगला, बैंक बैलेंस, बॉडीगार्ड, मसाज के लिए महिलाओं की टीम, फैक्ट्री, अस्पताल, फिल्म स्टूडियो और टीवी चैनल तक होते हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की तरह उनके धन्धे भी देश की सीमाओं में नहीं बँधे हैं। विदेशों में उनकी जमीन जायदाद है, कारोबार हैं। भारत में उनके मखमली शरीर को गर्मी सताती है तो वे स्वीटजरलैण्ड और कनाडा में स्वास्थ लाभ लेते हैं। मालों के व्यापारी हैं, जमीन •रीद–फरोख्त करनेवाले ङ्क्तॉपर्टी डीलर हैं, अन्धविश्वासी हैं, अपने भक्तों को ठगते हैं। असल में अपनी सेवा के लिए रखी तमाम महिलाओं से उनका मन नहीं भरता तो वे अपने भक्तों की पत्नी और बेटियों की इज्जत पर हाथ साफ करते हैं। भोग–विलास भरी जिन्दगी जीनेवाले बाबा, पादरी और मौलवी आम लोगों को मोहमाया से मुक्त होने का उपदेश देते हैं। यह ढोंग–पाखण्ड नहीं तो और क्या है।
संविधान के अनुसार हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा दे क्योंकि यह वैज्ञानिक चेतना ही है जो धर्मनिरपेक्षता और मानवतावाद को बढ़ाती है। साथ ही सवाल करके नये बदलाव के लिए ङ्क्तेरित करती है। असल में सभी धार्मिक गुरु जो बलात्कार या दूसरे आरोपों में शामिल नहीं भी हैं वे भी संविधान का उल्लंघन करने के दोषी तो हैं ही। पर सरकार ने तो अन्धविश्वास को बढ़ावा देने वाले और विज्ञान का मजाक उड़ाने वाले बाबा सद्गुरु को अध्यात्म के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म विभूषण से सुशोभित किया है। वाह! भारत सरकार वैज्ञानिक चेतना के लिए कितनी ङ्क्ततिब( है?
सोचने वाली बात यह भी है कि जिन बाबाओं के ऊपर आरोप सि( हुए हैं, जो अभी जेल में हैं उनके भक्तों की संख्या में कोई कमी नहीं आयी है। उन्हें अभी भी लगता है कि उनके गुरु को किसी गलत आरोप में फँसा दिया गया है। उनके भक्त आज भी उसी श्र(ा के साथ उन्हें पूज रहे हैं। इन भक्तों में ऐसा नहीं है कि सिर्फ अनपढ़ और गँवार लोग शामिल हैं। अधिकारी, सेलिब्रिटी, क्रिकेटर्स, डॉक्टर्स, बीटेक, एमबीए, आईआईटी से पीएचडी डिग्री धारक तक शामिल हैं। एक बाबा से मोह भंग होता है तब तक कोई नया बाबा ङ्क्तगट हो जाता है और यह अन्तहीन सिलसिला चलता जा रहा है।
व्यस्वस्था सड़ रही है और लोग परेशान हाल हैं। इस •राब व्यवस्था से तंग आकर, लोग कहीं विरोध शुरू न कर दें, इसके लिए सरकार अन्धविश्वास और बाबाओं को बढ़ावा दे रही है। नर्क जैसी जिन्दगी से तंग आकर लोग एक काल्पनिक स्वर्ग की तलाश में बाबाओं की शरण लेते हैं। इससे सरकार के लिए मजदूरों–किसानों का हक छीनना और पूँजीपतियों के लिए काम करना आसान हो जाता है। सभी नेताओं का बाबाओं, मौलवियों और पादरियों के साथ मिलीभगत है। सरकारें इनको चैनल चलाने की, कारोबार करने की, भीड़ जुटाने की अनुमति देती हैं। इसलिए वह बाबाओं से वोट की •रीद–फरोख्त करती हैं। विधायक, सांसद से लेकर वर्तमान प्रधानमन्त्री तक अपने क्षेत्रों में बाबाओं के दरबार में मत्था टेककर ही चुनाव जीतते हैं।
आज जनता का बड़ा हिस्सा आश्रमों, मठों, गिरजाघरों और पीर–मजारों की गुलामी कर रहा है, जिसे अपने हक के लिए सड़कों पर आन्दोलन करना चाहिए था।
ग्रामीण क्षेत्र में अस्पताल और अच्छे डॉक्टर्स की भारी कमी की वजह से भी बहुत लोग अपनी बीमारियों के लिए बाबाओं के आश्रमों का रु• करते हैं। भयानक अभाव और असमानता में जी रहे लोगों के लिए आश्रम शरण स्थली बने हुए हैं। साथ ही कुछ मध्यमवर्गीय लोगों के लिए जो गलत कामों से पैदा हुए अपराध बोध के साथ जीते हैं, उनमें आश्रमों को चन्दा देकर परोपकार की भावना पैदा होती है। साल में दो बार आश्रम में सेवा करके खुद को पवित्र मान लेते हैं।
अगर देश में सबके लिए उचित शिक्षा, बेहतर स्वास्थ सुविधाएँ और जातिगत भेदभाव खत्म हो जाये तो आधे से ज्यादा बाबाओं के कारोबार खत्म हो जाएँगे। लोग बाबा के दरबार में मत्था टेकने से पहले बस कुछ सवाल करने की हिम्मत जुटा लें तो बचे आधे बाबाओं का भी बोरिया–बिस्तर बँध जाये। हजारों महिलाएँ बलात्कार से बच जायें। सैकड़ों पत्रकार की जान बच जाये। पर दुर्भाग्यवश हम सवाल करने के बजाय भीड़ का हिस्सा बन जाना पसन्द करते हैं। इसीलिए बाबाओं का धन्धा चलता ही जा रहा है।