दुनिया बदलने का क्या मतलब है?
दुनिया को बदलने के लिए, सबसे पहले हमारे पास उस दुनिया के बारे में कम से कम एक सामान्य विचार होना जरूरी है, जिसमें हम जीना चाहते हैं, और दूसरा, हमें यह जानने की जरूरत है कि ऐसी दुनिया को अस्तित्व में कैसे लाया जाये। हम यह कहते हुए शुरू कर सकते हैं कि यदि मजदूर वर्ग और उसके किसान साथियों के सामने आने वाली तमाम समस्याओं की असली वजह पूँजीवाद है, तो हम जो चाहते हैं वह पूँजीवादी समाज का प्रतिपक्ष या विलोम है। इसका मतलब होगा––
–– भूमि सहित उत्पादन के सभी साधनों के निजी स्वामित्व का खात्मा।
–– मुनाफे पर आधारित उत्पादन का खात्मा।
–– अन्तहीन आर्थिक विकास की सनक का खात्मा।
–– दिहाड़ी मजदूरों के शोषण का खात्मा।
–– किसान की जमीन, शहरी और ग्रामीण सार्वजनिक स्थानों, मजदूर और महिलाओं के शरीर, काले शरीर की बेदखली का अन्त तथा पितृसत्ता और नस्लवाद के सभी रूपों का खात्मा।
–– प्राकृतिक जगत की निजी लूट का खात्मा।
–– साम्राज्यवाद का खात्मा।
–– परिवार से लेकर राज्य तक और शिक्षा और मीडिया से कानूनी व्यवस्था तक, समाज को पुनरुत्पादित करने वाली सभी संस्थाओं और तंत्रों की पूँजीवाद समर्थक भूमिका का खात्मा।
सीधे शब्दों में कहा जाये तो पूँजी के शासन को समाप्त किया जाना जरूरी होगा। क्योंकि वह सब कुछ जिसका खात्मा होना जरूरी है, वे पूँजी के निरन्तर संचय के लिए अहम हैं, इस व्यवस्था की सीमाओं के भीतर इनमें से किसी को भी खत्म करना नामुमकिन है। संघर्ष के विभिन्न रूपों के जरिये जीत हासिल करके शोषण और सम्पत्ति हड़पने में कुछ कमी आ सकती है। दिहाड़ी मजदूर सुरक्षित कार्यस्थल हासिल कर सकते हैं, नागरिक अधिकार कानून महिलाओं और अश्वेत लोगों के जीवन में कुछ सुधार कर सकते हैं, साम्राज्यवादी युद्धों को कभी–कभी टाला जा सकता है, या गरीब राष्ट्र थोड़ी आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कर सकते हैं। किसान कम से कम अस्थायी रूप से पूँजीपतियों को अपनी जमीन देने से इनकार कर सकते हैं, कुछ अच्छे राजनेता चुनाव जीत सकते हैं, स्कूल कुछ सुधार कर सकते हैं, और मीडिया कभी–कभार जनता की सेवा कर सकता है। लेकिन इनमें से कोई भी चीज पूँजीपति वर्ग की अन्तिम शक्ति, यानी दुनिया की उत्पादक सम्पत्ति पर उसके एकाधिकारी मालिकाने को कम नहीं करती है।
हालाँकि, अगर हम स्वीकार करते हैं कि पूँजीवाद को उखाड़ फेंकना चाहिए, तो यह पूछना उचित है कि इसकी जगह क्या? बहुत से वामपंथी इसका उत्तर यह देते हैं कि हमें भविष्य के समाज का विस्तृत ब्योरा नहीं देना चाहिए। हम दुनिया को बदलने का प्रयास करते हुए ही, यह देखते हुए इन्हें विकसित करेंगे कि व्यवहार में क्या काम करता है और क्या नहीं। शायद ऐसा हो, लेकिन सामान्य रूप से नहीं भी, तो उत्तेजक शब्दों में ही सही, हम कम से कम इतना तो बता सकते हैं हम क्या चाहते हैं? कम से कम, क्या निम्नलिखित माँगें जरूरी नहीं होंगी?
–– एक टिकाऊ पर्यावरण। हम प्रकृति से जो पाते हैं उसको लौटाया जाना चाहिए। हम मानव अस्तित्व को खतरे में डालने वाली कई तरह की पर्यावरणीय आपदाओं की ओर बढ़ रहे हैं। इसलिए अगर ऐसा नहीं किया गया तो मजदूर वर्ग को बदलने के लिए कोई दुनिया नहीं होगी। सभी आर्थिक निर्णय एक टिकाऊ पर्यावरण को एक केन्द्रीय निर्धारक कारक मानकर लिये जाने चाहिए।
–– एक नियोजित अर्थव्यवस्था। बाजार की अराजकता की जगह उत्पादन की सचेत योजना को स्थापित किया जाना चाहिए। आवर्ती आर्थिक संकट और अनर्थकारी असमानता बाजार पर निर्भरता के प्रत्यक्ष परिणाम हैं। ये न तो उचित हैं और न ही जरूरी हैं। जब निगम योजना बनाते हैं, तो समाज ऐसा क्यों नहीं कर सकता?
–– यथासम्भव उपभोग का समाजीकरण, विशेष रूप से परिवहन और चाइल्डकेअर। रहने की व्यवस्था भी अधिक सामूहिक हो सकती है। इससे न केवल संसाधनों की बचत होगी, बल्कि यह हमें अपनेपन और खुशी की भावनाओं को बढ़ावा देने वाले तरीकों से सामाजिक भी बनाएगा। हम सामाजिक प्राणी हैं जो गैरजरूरी निजी मालिकाने वाली उपभोक्ता वस्तुओं से घिरे, अलग–थलग जीवन जीने के लिए नहीं बने हैं।
–– कार्यस्थलों पर लोकतान्त्रिक मजदूर–समुदाय का नियंत्रण, जहाँ तक सम्भव हो, श्रम के विस्तृत विभाजन के उन्मूलन के साथ–साथ सामाजिक उपयोगिता को मार्गदर्शक सिद्धान्त मानते हुए निर्मित और प्रस्तुत मशीनरी का इस्तेमाल।
–– स्कूलों से लेकर मीडिया तक, सभी सामाजिक पुनरुत्पादन संस्थानों का सार्वजनिक स्वामित्व। उत्पादन के लिए भी यथासम्भव यही स्थिति होनी चाहिए। कई मामलों में, उत्पादन और वितरण के निर्णयों की जिम्मेदारी मजदूरों और समुदायों द्वारा संचालित सहकारी समितियों की होनी चाहिए। भोजन के लिए स्थानीय आपूर्ति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, परिवहन व्यय और स्वस्थ वातावरण दोनों के लिहाज से। पोषक तत्वों को जैविक रूप से मिट्टी में वापस करना बहुत आसान होगा, जब भोजन को उस जगह के करीब उगाया जाता है जहाँ उसका सेवन किया जाता है।
–– मौलिक रूप से समतावादी समाज, जिसमें जीवन के सभी क्षेत्रों में समानता हो–– पुरुषों और महिलाओं के बीच, सभी नस्लीय और नृजातीय समूहों के बीच, किसी की लैंगिक पहचान या यौन वरीयता का लिहाज किये बगैर सभी लोगों के बीच, हर देश के भीतर और देशों के बीच काम, भूगोल और पहुँच से सम्बन्धित किसी भी भेदभाव के बिना सभी सामाजिक सेवाएँ और सुविधाएँ मुहैया कराना।
मजदूर वर्ग को एक ऐसे समाज के खिलाफ होना चाहिए जो व्यक्तिवाद पर आधारित हो और जहाँ कुछ लोगों द्वारा बहुतों के ऊपर शासन किया जाता हो। शक्ति की असमानता और कई पदानुक्रमों के साथ कोई भी सामाजिक व्यवस्था मुक्तिकारी नहीं हो सकती है, अगर मुक्ति का अर्थ है अलगाव के बिना जीवन जीना, जीवन जिसमें हम कृत्रिम रूप से और जानबूझकर एक दूसरे से, जो हम पैदा करते हैं उससे, एक चिन्तनशील और सोद्देश्य प्राणी होने के चलते हम प्रकृति से और प्राकृतिक दुनिया से अलग नहीं किये जाते हों। इसके विपरीत, मजदूर वर्ग को जो कुछ भी सामाजिक, सामूहिक, साझा करने योग्य और अलगाव न पैदा करने वाली हो, उसके पक्ष में होना चाहिए।
(माइकल डी– येट्स की किताब ‘हाड़तोड़ मेहनत’ से साभार)