एकजुट संघर्ष से मिला सीएचओ को बकाया वेतन

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

कर्मचारी अपने एकजुट संघर्ष के दम पर क्या कुछ हासिल कर सकते हैं, सीएचओ के एक संगठित आन्दोलन ने हाल ही में इसका एहसास करा दिया। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में सीएचओ के आन्दोलन लगातार चल रहे हैं। उनकी माँगें इस तरह हैं–– 1– लॉयल्टी बोनस दिया जाये, 2– वेतन विसंगति को खत्म किया जाये, 3– बिहार सरकार की तर्ज पर पीबीआई को सैलरी में मर्ज करो, 4– स्थानान्तरण नीति म्यूच्यूअल के आधार पर हो, 5– नौकरी को नियमित किया जाये और 6– बीमा पॉलिसी को सुधारा जाये आदि। सरकार ने आन्दोलन को खत्म कराने के लिए माँगों को मानने का आश्वासन दिया।

सितम्बर 2022 को उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन’ के तहत प्रदेश के विभिन्न जिलों में ‘सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों’ (सीएचओ) की भर्ती की थी। कहने को ये अधिकारी हैं, लेकिन इनकी कार्यस्थिति और सेवा शर्तें किसी ठेका मजदूर से अच्छी नहीं हैं। इनकी भर्ती ग्रामीण इलाकों में स्थित स्वास्थ्य उपकेन्द्रों में हुई है। यह केन्द्र प्रति 10 हजार की आबादी पर खोले गये हैं।

सरकार ने इस योजना को बहुत बढ़ा–चढ़ाकर पेश किया। यह बताया गया कि अब गाँव–गाँव तक सभी जरूरी स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुँचा दिया गया है। मुख्यमंत्री ने इन स्वास्थ्य केन्द्रों को ‘आरोग्य मंदिर’ तक का नाम दिया। लेकिन वहीं दूसरी तरफ सरकार इन मंदिरों के संचालकों के साथ बेहद बुरा बर्ताव कर रही है।

दरअसल, सहारनपुर जिले में कार्यरत लगभग 300 चयनित सीएचओ को 10 महीने तक सैलरी नहीं दी गयी। इनमें से अनेक सीएचओ 40–50 किलोमीटर तक की दूरी तय करके नौकरी करने आते हैं, तो कितने ही किराये पर रहते हैं। इतने लम्बे समय तक तनख्वाह न मिलने के कारण इनकी हालत बदतर हो चली थी। अधिकारियों के सामने अपनी समस्याओं को बार–बार अवगत कराने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई। केवल आश्वासन दे दिया जाता। हर जगह से नाउम्मीद होकर आखिकार इन्हें संघर्ष करने को मजबूर होना पड़ा। तीन सीएचओ ने पहलकदमी लेकर संघर्ष का नेतृत्व किया। उन्हें यह एहसास हो गया कि बिना संगठित प्रयास के उनकी माँगें नहीं मानी जाएँगी। इसलिए उन्होंने जिले के सभी सीएचओ को इस संघर्ष से जुड़ने का आह्वान किया। जल्द ही लगभग 300 सीएचओ ने संगठित हो संघर्ष का बिगुल बजा दिया। माँगें पूरी न होने तक काम के पूर्ण बहिष्कार और अधिकारियों के दफ्तर के सामने धरना देने की घोषणा की गयी। इस आन्दोलन को आगे बढ़ता देख अधिकारियों की आँख खुली और 3 दिन बाद ही दबाव में उन्हें बकाये वेतन का भुगतान करना पड़ा।

इस तरह संगठित प्रयास के चलते ही सीएचओ ने अपना वेतन हासिल किया। लेकिन उनकी अनेक माँगें अभी भी नहीं मानी गयी हैं। एक तरफ तो सरकार अपनी स्वास्थ्य योजनाओं के ढोल जोर–शोर से पीट रही है। वहीं दूसरी तरफ इस काम को करने वाले कर्मचारियों की स्थायी नौकरी खत्म कर उन्हें मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं को भी छीन रही है। दरअसल भर्ती के समय इनसे वादा किया गया था कि इनकी नौकरी स्थायी कर दी जाएगी और वेतन में भी बढ़ोतरी की जाएगी। लेकिन ये सभी वादे जुमले साबित हो रहे हैं। इन माँगों के लिए केवल कुछ जिले में संघर्ष चलाना नाकाफी है, इसके लिए बड़े स्तर की एकजुटता बेहद जरूरी है।

← अंक में अन्य लेख देखें

पत्रिका प्राप्त करें

नवीनतम अंक और लेख सीधे अपने ईमेल में प्राप्त करें