हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएँ
07 Jun 2025
• फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
पूछने लगे मजदूर
पूछने लगे मजदूर भवन बनाने वाले
भैया हमसे क्यों घिन खाते भवन में रहने वाले
हम ही इसे उठाते ऊँचा
हम ही इसे रंग पोत चमकाने वाले
काम हुआ खत्म हम पर ही लग जाते ताले
पाते खूब रुपैया कलम चलाने वाले
क्यों भूखे रह जाते कुदाल चलाने वाले
अन्न उपजाने वाले
भर जाता गोदाम सेठ का
क्यों झोपड़ी में रह जाते बोझ उठाने वाले
काम करने वाले को मिलता कम है
क्यों मोटा माल पाते काम कराने वाले
बता इसे हमारा भाग्य
देखो कैसे इतराते कलम चलाने वाले
अन्न हम उपजाते हैं
महल हम उठाते हैं
कपड़े जूते कार सब बनाते हैं
मगर मालिक आप कहलाते हैं
हमें देकर टुकड़े जूठन दया दिखलाते हैं
हमें नचाकर अपना जी बहलाते हैं
पीकर–खाकर अपनी महफिल से हमें भगाते हैं!
आगरे से आया राजू
गोरखपुर में फेमस दुकान है चाय की
मऊ से आकर बस गये गोरख राय की
वहीं बरतन धोता आगरे से आया राजू
बैठ गया जाकर एक दिन उसके बाजू
बरतन धोता जाता था
क्या खूब सुरीला गाता था
उमर महज बारह की थी
मगर खैनी वह खाता था
खैनी खाकर बोला, भैया
दस साल की उमर रही
मर गयी खाँस–खाँस कर मैया
बापू के बदन पे फटी बनियान थी
हम तीन भाई बड़े थे
बहन मेरी नादान थी
और दिखाएँ
बापू कैसे अब भूख मिटाता सबकी
गैया तो हमलोगों की बिक गयी थी कबकी
मामू कलकत्ता से
घर मेरे आ टपका एक बार
उसने ही किया हम सबका बेड़ा पार
लग गये सब अपने खित्ते
भले गया बिखर अपना परिवार
बड़का रहता एक साहेब के घर
चलकर अब बंगाल में
उससे छोटका काम करता असम के चाय बागान में
बहन की हो गयी शादी
जीजा का चलता है ट्रक
देख रहे हैं भैया हम लोगों का लक
बापू की उमर छियालीस साल
पक गये हैं उसके सारे बाल
टूट गये हैं दांत सब
पिचके उसके गाल
आगरे में टेसन पे रिक्शा चलाता है
बाबूजी वह भी अच्छा कमाता है
मेरा तो देख ही रहे हैं हाल
राय ससुर आदमी है या बवाल
बाबूजी इधर आइये
कान में बोला, बाबूजी इसके ठीक नहीं हैं चाल
रात में मुझे भी जबरन पिलाता है
मुर्गा अपने हाथ से खिलाता है
बाबूजी लेकिन अपनी खटिया पर ही
अपनी खटिया पर ही
मुझे भी सारी रात सुलाता है!
जैसे यह जीवन
हींग हल्दी जीरा लहसुन
कभी ड्यूटी
कभी दुकान परचून
ड्यूटी है करोल बाग में
डेरा यमुना पार
मालिक देखता हमें बैठकर
सीसीटीवी में नौ से चार
आती पगार तीस–इकतीस को
उड़ जाती लगते बीस को
किराया बिजली राशन–पानी
भैया को लगता
बबुआ काट रहा दिल्ली में चानी
जैसे–तैसे कटते
महीने के अन्तिम दस दिन
काम आ जाते बच्चों के गुल्लक
जिसमें रखते चिल्लर गिन
घरनी के हैं छोटे–छोटे अरमान
गुस्सा जाती है देख झोला भर सामान
पगार मिलने के दिन
जब थोड़ा पी लेता हूँ
जरा–सा जी लेता हूँ
सो जाती है पगली चादर तान
उसके छोटे–छोटे अरमान
यार यह जीवन जैसे जंग हो
बताना भाई
अगर कोई सुविधाजनक ढंग हो!
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(आलोचना पत्रिका से साभार)