जनता पाठशाला : अमल और अनुभव

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

सितम्बर 2017 में तीन साथियों ने मिलकर शामली जिले के एक गाँव में ‘जनता पाठशाला’ की शुरुआत की थी। आज इस पाठशाला को 6 साल से ज्यादा हो गये हैं। इलाके के अनेक बच्चे इस पाठशाला में पढ़ चुके हैं। कुछ बच्चे जो पहले खुद पढ़ते थे अब पढ़ाने की जिम्मेदारी भी उठा रहे हैं। पूरे इलाके में सभी लोग ‘जनता पाठशाला’ का नाम जानते हैं। यह पाठशाला केवल इसलिए अनोखी नहीं है कि यह निशुल्क चलायी जा रही है, बल्कि इसी के साथ–साथ इस पाठशाला में बच्चों के सामाजिक और चारित्रिक विकास पर भी जोर दिया जाता है। इसके साथ ही, इलाके की मेहनतकश जनता को जन–नायकों के विचारों और बलिदानों से रूबरू कराने के लिए पाठशाला में समय–समय पर कार्यक्रम भी होते रहते हैं।

जनता पाठशाला के पिछले 6 सालों के सफर में अनेक उतार–चढ़ाव आये हैं। इस सफर में हम अनुभवहीन से अनुभवी बने। आशा–निराशा के अनेक दौर से गुजरे। हमें जनता के बीच काम करने की सही कार्यशैली की समझ नहीं थी, जिसे हम धीरे–धीरे सीख रहे हैं। ‘जनता के सहयोग से जनता के लिए काम’ के नारे को हमने समझा और अपने कामों में लागू किया। हम अपने कुछ जरूरी अनुभव इस लेख के जरिये साझा करना चाह रहे हैं। हमें आशा है कि हमारी गलतियों से इस काम में लगे साथी सही सबक लेंगे और साथ ही हमारे प्रयोगों के अनुभवों को आगे बढाएँगे।

 ‘जनता पाठशाला’ चलाने की योजना हमने लम्बे समय से बनायी हुई थी। 2015 में भी हमने पाठशाला शुरू की, लेकिन वह जल्दी ही बन्द हो गयी। अपनी पुरानी कमियों को चिन्हित करते हुए हमने इस बार पाठशाला को नियमित चलाने की सही योजना बनायी। इलाके में सर्वे के काम से शुरुआत की गयी। इससे हमें इलाके के लोगों की शैक्षिक स्थिति का पता चला। साथ ही हमने इलाके के लोगों के सामने पाठशाला चलाने की पूरी योजना रखी और उनसे सहयोग की अपील की जिसके चलते हमें पाठशाला के लिए एक घर सहयोग में मिला। इलाके के अलावा हमने अपने परिचितों और दोस्तों से भी सहयोग की अपील की। सबने हमें सहयोग किया और इसके बाद हमने पाठशाला शुरू कर दी। कुछ ही दिनों में इलाके के 50–60 बच्चे पाठशाला से जुड़ गये। शाम की इस पाठशाला में बच्चे बड़े उत्साह से पढ़ते और यह देख हमारे साथी भी पूरी मेहनत से बच्चों को पढ़ाते।

लेकिन सबकुछ कहाँ सही चलता है? जल्द ही हम कई तरह की समस्याओं से घिर गये। पाठशाला में बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही थी लेकिन उनके अभिभावकों और इलाके के मजदूरों से हमारा सम्पर्क कम हो रहा था। इसके चलते हमें इलाके से मिलने वाला सहयोग भी बन्द हो गया। हमारा सारा काम केवल स्कूल चलाने तक सिमट कर रह गया। समस्या को समझते हुए हमने मजदूरों की एक समिति बनाने का फैसला किया। लेकिन यह फैसला उचित योजना के अभाव में अमल में न आ सका। हमने बिना किसी मानदंड और जाँच–पड़ताल के अनेक स्थानीय लोगों को पाठशाला समिति में शामिल कर लिया। हमारी गलत कार्यशैली के बुरे नतीजे जल्दी ही हमारे सामने आ गये। समिति जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त लोगों का अड्डा बनने लगी। हमारे साथियों ने इसपर संघर्ष चलाया तो कुछ ही बैठकों में पूरी समिति ही टूट गयी। इस घटना ने समिति गठित करने के हमारे गलत तरीके से हमें परिचित कराया। साथ ही जल्दबाजी की जगह विचार–विमर्श से लिए गये फैसले लेने की समझ बनी।

 एक सही दिशा–निर्देशक समिति के अभाव में हमारा काम धीरे–धीरे गलत दिशा में चल पड़ा। यह भी संदेह हुआ कि कहीं हम एनजीओवादी  भटकाव की तरफ तो नहीं बढ़ने लगे हैं। हालाँकि हम किसी संस्था से एक पैसा भी सहयोग नहीं लेते थे, लेकिन हमारे साथी बिना स्थानीय जनता से सहयोग लिए अपने पैसे से पाठशाला का संचालन कर रहे थे। इससे स्थानीय जनता से हम दूर होते चले गये और अब स्थानीय लोगों ने हमें सहयोग देना भी बन्द कर दिया। हमने अपनी बीमारी को छिपाया और यह सिलसिला लगभग 3 सालों तक चलने दिया। लेकिन आखिरकार हमें अपनी गलती का एहसास हुआ और हमने इसपर बात करनी शुरू की।

अनुभवी साथियों से जब इसे लेकर बात हुई तो उन्होंने हमारी गलत कार्यशैली की आलोचना की। उन्होंने हमें जनता में काम करने की सही दिशा–– जनदिशा के बारे में जानकारी दी और बताया कि जनता में हमारे सभी काम उसके सहयोग से होने चाहिए। केवल स्कूल चलाना हमारा उद्देश्य नहीं है, बल्कि हम चाहते हैं कि अन्याय और शोषण पर टिकी यह व्यवस्था भी बदले। मजदूरों को उनका हक मिले। उनके बीच धर्म, जाति और क्षेत्र का भेदभाव दूर हो और उनकी एकता मजबूत बने। वे जागरूक हों। एक सामाजिक कार्यकर्ता का कर्त्तव्य है कि वह मजदूरों को जागरूक करे और उन्हें न केवल अक्षर ज्ञान सिखाये, बल्कि समाज बदलने में उनकी जिम्मेदारी का भी उन्हें एहसास दिलाये। हमें ‘जनता के लिए, जनता के द्वारा जनता के काम’ के नारे को अमल में लाना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता और जनता के बीच मछली–पानी का रिश्ता होना चाहिए।

हमें अपनी गलती का एहसास हुआ और हमने अपनी कार्यशैली में सुधार किया। 31 मार्च 2020 को पाठशाला की तरफ से इलाके में एक प्रोग्राम किया गया। इसका संचालन अनुभवी साथी कर रहे थे। इस प्रोग्राम के जरिये अनुभवी साथियों ने पाठशाला चलाने के महत्व और साथ ही साथ मौजूदा परिवेश में मजदूरों की स्थिति पर बात की। उन्होंने बताया कि एक तरफ अमीरों के बच्चे बड़े–बड़े विश्वविद्यालयों और महँगे स्कूलों में पढ़ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ मजदूरों के बच्चों के लिए सामान्य शिक्षा भी दुर्लभ हो गयी है। उन्होंने जनता पाठशाला के महत्त्व को सबके सामने पुरजोर तरीके से रखा। उन्होंने सवाल किया कि क्या बड़े–बड़े भवनों, अस्पतालों और स्कूलों का निर्माण करने वाले मेहनतकश अपने बच्चों के लिए चलाये जा रहे स्कूल का सहयोग नहीं करेंगे–––?

इलाके के मजदूरों पर उनके भाषण का जबरदस्त प्रभाव पड़ा। इसी प्रोग्राम में उन्होंने जनता पाठशाला को तब तक बन्द करने की घोषणा कर दी जब तक स्थानीय लोग उनके सहयोग में साथ नहीं आ जाते। लेकिन एक तरफ हमने स्थानीय लोगों के साथ संवाद बनाया, वहीं दूसरी तरफ अपनी गलत कार्यशैली को भी सुधारा। हमारे साथियों ने इलाके के मजदूरों के बीच जाना शुरू किया और अपने उद्देश्य को उनके सामने स्पष्ट रूप से रखा। हमने समाज में व्याप्त गैर–बराबरी के खिलाफ अपनी लड़ाई में उनका समर्थन माँगा। कुछ ही समय में मजदूरों का जुड़ाव हमसे बढ़ने लगा और वे हमें अपना मानने लगे। एक महीने बाद ही इलाके के लोगों ने अपनी पहलकदमी लेकर पाठशाला के लिए जरूरी सामान का इन्तजाम कर दिया और वे हर तरह से हमारा सहयोग करने लगे। यह सहयोग आज तक चला आ रहा है। इस तरह हमें अपने कामों के दौरान जनता से जुड़ने के सही अर्थों का अनुभव हुआ।

–– मजदूर सहायता समिति, शामली

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