जंत्र–मंत्र और अन्धविश्वास का मकड़जाल
जंत्र–मंत्र सब झूठ है, मत भरमो जग कोय।
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय।
–कबीर
कबीर दास ने बहुत पहले ही टोने–टोटके और जंत्र–मंत्र को झूठ बता दिया था। सबको सलाह दी थी कि इनके जाल में न फँसें। बातों का अर्थ और उनके पीछे के तर्क जाने बिना अज्ञान रूपी अन्धेरा रौशनी में नहीं बदल सकता।
कबीर की इस बात को छह सौ साल गुजर गये। अब हम अपनी आज की जिन्दगी पर एक नजर डालें। हमारा पूरा समाज टोने–टोटके, जादू–मन्त्र और बाबाओं के जंजाल में फँसा हुआ है। एक तरफ देश के आधे से ज्यादा जिलों में कोई मेडिकल कालेज नहीं है, दूसरी तरफ आलम ये कि देश में ऐसा कोई जिला नहीं जहाँ झाड़–फूँक वाले बाबा का किला नहीं। हर जिले में सैकड़ों बीघे जमीन घेरकर बाबा तरह–तरह की आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। बाबा के आश्रम वोट बैंक का अड्डा हैं। इसलिए चुनावी पार्टियाँ इनके अपराधों की अनदेखी करती हैं। बहुत लोगों का मासूम दिल भी अपनी जिन्दगी की तमाम परेशानियों का समाधान इन्हीं आश्रमों में ढूँढता है। बसों और घर की दीवार पर इश्तहार चिपके होते हैं कि पति–पत्नी के झगड़े, परिवार की कलह, जमीन का विवाद, बच्चे का पढ़ाई में मन न लगने, पढ़े–लिखे बच्चे का घर में बेरोजगार बैठे रहने, किसी का प्रेम–मोहब्बत तोड़ने तो किसी का जोड़ने, घर में छुपा खजाना निकलवाने के लिए फलाँ बाबा से मिले। भक्त ऐसे तमाम सवाल लेकर बाबाओं के आश्रम में भीड़ लगाये रहते हंै।
ऐसी बात नहीं है कि लोगों की समस्याएँ पूरी तरह से गलत हैं। हमारे समाज का जैसा ताना–बाना है उसमें ऐसी बहुतेरी समस्याएँ हैं। हर कोई इन समस्याओं का सामना करता है या कर रहा है। समझने की बात यह है कि इन समस्याओं का सही समाधान क्या है? बाबा की भभूत, कोई मन्त्र, कोई टोटका, किसी पीर–पैगम्बर के दर्शन या कुछ और?
सभी लोग अपनी बु(ि–विवेक और जिन्दगी से मिले अनुभवों के आधार पर जिन्दगी में आयी मुसीबतों का सामना करते हैं। कई बार तमाम पढ़े–लिखे डिग्री धारक भी इन बाबाओं के पिछलग्गू बने घूमते हैं जिनका प्रभाव कम पढ़े–लिखे लोगों पर भी पड़ता है। फिल्मों के हीरो और ऊँचे पदों पर काम करनेवाले लोग इन बाबा और मठाधीशों के साथ खड़े दिखाई देते हैं तो सामान्य इनसान अपने विवेक और बु(ि का इस्तेमाल न करके इन टीवी के नायकों पर भरोसा करके बाबाओं के जाल में फँस जाता है। उदाहरण के लिए सचिन तेन्दुलकर को लाखों लोग पसन्द करते हैं, वही सचिन तेन्दुलकर जो सत्य सार्इं बाबा के चेले हैं, वे उनके आश्रम में दान–दक्षिणा चढ़ाते हैं। ये सत्य सार्इं बाबा वही हैं जिन्होंने दावा किया था कि उनकी मृत्यु के इक्कीसवें दिन प्रलय आ जायेगी। आज उनकी मौत को दस साल बीत गये। प्रलय नहीं आयी।
दुनिया की हर घटना को, हर सवाल को समझने के कई तरीके होते हैं। इनमें एक तरीका ऐसा होता है जो अज्ञानता और मूर्खता का फायदा उठाता है, बेसिर–पैर की बातों के सहारे समाधान बताने की कोशिश करता है। इसके जरिये तंत्र–मन्त्र, जादू टोना, शनि का प्रकोप, बृहस्पति की छाया आदि का डर दिखाकर ग्राहकों से रुपये ऐंठे जाते हैं। ऐसे समाधानों पर भरोसा करने वालों को अंधविश्वासी कहते हैं। इसके विपरीत दूसरा तरीका है– समस्या की जड़ में जाकर तहकीकात करना, उसके असली कारण को ढँूढकर, उसको दूर करके समस्या हल करने की कोशिश करना। ऐसा करने वालों को तार्किक और वैज्ञानिक चेतना वाला कहा जाता है।
कहने को आज हम विज्ञान के युग में जी रहे हैं। स्मार्ट फोन, साइकिल, स्कूटर, कार, हवाई जहाज, बड़े–बड़े अस्पताल, तरह–तरह की जीवन रक्षक दवाइयाँ विज्ञान की वजह से ही सम्भव हुई हैं। लेकिन समाज में इन साधनों का आ जाना भर किसी समाज को वैज्ञानिक चेतना वाला नहीं बना देता। एक तरफ विज्ञान के बड़े–बड़े सि(ान्त इन सामानों को बनाने में लगते हैं। दूसरी तरफ, एक आम इनसान यह भी नहीं समझ पाया है कि हमारी धरती से करोड़ों किलोमीटर दूर स्थित शनि ग्रह की इस धरती के वासियों से कोई दुश्मनी नहीं है। यह ग्रह इनसानों के लिए किसी रूप में खतरनाक नहीं है। फिर भी किसी पढ़े–लिखे आदमी को भी शनि का डर दिखाकर एक बाबा एक किलो तेल और कुछ आटे का जुगाड़ कर लेता है। वहीं मजदूर को अपने परिवार के लिए इतना राशन जुटाने के लिए हफ्ते भर कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
सच पूछा जाय तो वास्तव में शनि बनकर हमारी जिन्दगियों में कौन बैठा है? सरकार की एक नीति से लाखों लोग बेरोजगार हो जाते हैं। सरकार पढ़ने–लिखने की ठीक व्यवस्था नहीं करती। करोड़ों अनपढ़ रह जाते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान नहीं देती। इसलिए लाखों मरीज बिना इलाज के मर जाते हैं। अब ये तमाम बेरोजगार, अशिक्षित और बीमार लोग सरकार और सामाजिक व्यवस्था को दोषी ठहराने के बजाय खुद की कुण्डली में बैठे शनि महाराज पर दोष मढ़ते हैं। इससे असली आरोपी बाइज्जत बरी हो जाते हैं जबकि समस्या दूर होने के बजाय और बढ़ती जाती है।
इसी तरह जिन्दगी में घटने वाली हर प्रिय और अप्रिय घटना पर तार्किक विचार किया जाय तो हम सही नजरिया हासिल कर सकते हैं। इसमें हमारा खर्च कुछ न होगा, बचेगा सब कुछ–– समय, धन, जान, विवेक और बुद्धि।