कविता : सर्वहारा

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

हजारों वर्षों से हम पत्थर काट रहे हैं

महलों और गुम्बजों का निर्माण कर रहे हैं

बिड़लाओं के भगवान गढ़ रहे हैं

औजार हमारे हाथ हैं

शोहरत और सुविधा उसके साथ

हम पत्थर काट रहे हैं

हम अन्धी गुफाओं के द्वार काट रहे हैं

भित्ति–चित्रों का निर्माण कर करे हैं

रंग और तूलिका हमारे हाथ है

नाम और इतिहास उसके साथ

हम गुफाएँ काट रहे हैं

हम खदानों के पेट काट रहे हैं

आग का निर्माण कर रहे हैं

र्इंधन जुटा रहे हैं

अन्धेरा जुटा रहे हैं

अन्धेरा हमारे साथ है

उजाला उसके साथ

हम अपना पेट काट रहे हैं

हम लोहा गला रहे हैं

विभिन्न औजारों का निर्माण कर रहे हैं

तिजोरियाँ बना रहे हैं

हथौड़ा हमारे साथ है

पूँजी उसके साथ

हम लोहा पीट रहे हैं

हम मिट्टी और जंगल काट रहे हैं

खेतों का निर्माण कर रहे हैं

फसलें उगा रहे हैं

उत्पादन हमारे हाथ है

मुनाफा उसके हाथ

हम मिट्टी और जंगल काट रहे हैं

हम पेड़ों की छाल काट रहे हैं

नहीं, अपना पेट काट रहे हैं

बीबी–बच्चों के तन गला रहे हैं

भूख और पत्ता हमारे साथ हैं

देश की सत्ता उसके हाथ

हम पेड़ों की छाल काट रहे हैं

हम लकड़ी काट रहे हैं

मेज और कुर्सियाँ बना रहे हैं

दरवाजे और खिड़कियाँ जड़ रहे हैं

आरी और रन्दा हमारे हाथ है

आरामगाह उसके साथ

हम लकड़ी काट रहे हैं

हम धागे कात रहे हैं

वस्त्रों का निर्माण कर रहे हैं

बेल–बूटे काढ़ रहे हैं

सूई की चुभन हमारे हाथ है

रंगों की फड़कन उसके साथ

हम धागे कात रहे हैं

हम सीसा गला रहे हैं

जरूरतों के सामान निर्मित कर रहे हैं

साँसों की धौंकनी से उसे बल दे रहे हैं

आग हमारे हाथ है

आग का खेल उसके साथ

हम सीसा गला रहे हैं

हम हजारों वर्षों से गन्दगी काट रहे हैं

सफाई का इन्तजाम कर रहे हैं

मैला ढो रहे हैं

झाड़ू और मटका हमारे हाथ है

फूलों का गुच्छा उसके साथ

हम हजारों वर्षों से गन्दगी काट रहे हैं

हम रिक्शा खींच रहे हैं

अपना खून जला रहे हैं

तपेदिक की बीमारियाँ हासिल कर रहे हैं

बीबी–बच्चों का दुख हमारे साथ है

खून का किराया उसके हाथ

हम अपना खून जला रहे हैं

हम दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता के

नरक काट रहे हैं

जिस्म और जान बेच रहे हैं

झुग्गी–झोपड़ियाँ हमारे साथ हैं

कार और बंगले उसके साथ

हम नगरों के नरक काट रहे हैं

हम धूप और बारिश काट रहे हैं

ठण्ड की सघनता सह रहे हैं

वज्र आत्माओं का निर्माण कर रहे हैं

धरती और आकाश हमारे साथ है

हवाई–सुख उसके साथ

हम धूप और बारिश काट रहे हैं

हम पहाड़ काट रहे हैं

दुखों और यातनाओं के पहाड़ काट रहे हैं

चार पहाड़ काट रहे हैं

औजार हमारे हाथ है

कागजी बाघ उसके साथ

हम पहाड़ काट रहे हैं

हम गलत इतिहासों के शब्दजाल काट रहे हैं

शोषितों का साहित्य लिख रहे हैं

नया समाज गढ़ रहे हैं

अक्षरों और शब्दों की फौज हमारे साथ है

प्रेस और मशीनरी उसके हाथ

हम गलत इतिहासों के शब्दजाल काट रहे है

हम कलाकार हैं, कारीगर हैं, कवि हैं

मजदूर हैं, किसान हैं

देश की बहादुर जनता हैं

क्रान्ति का रास्ता हमारे साथ है

दमन और शोषण का मार्ग उसके साथ

हम सब क्रान्तिकारी हैं

हम भविष्य के कारीगर हैं, इंजीनियर हैं

मानव आत्माओं के शिल्पी हैं

मुक्ति–सेना के विशाल फौज हैं

लाल सुबहों के प्रकाश हैं

मैदानों, घाटियों और पर्वतों पर छा जाना चाहते हैं

हम धरती के लाल हैं

–– राणा प्रताप

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