खड़गपुर रेलवे मजदूरों की हड़ताल : मजदूर संघर्षों के इतिहास का चमकता पन्ना
आज से लगभग सौ साल पहले, 1926 में खड़गपुर के रेलवे मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए एक शानदार संघर्ष किया था। उनके इस संघर्ष ने पूरी दुनिया को बता दिया था कि भारत का मजदूर वर्ग एक बड़ी ताकत बन चुका है और अब उसे जानवरों की तरह नहीं हाँका जा सकता।
उस जमाने के अंग्रेजी राज में रेलवे पर सरकार का नहीं, बल्कि कई निजी कम्पनियों का कब्जा था। हालाँकि बंगाल–नागपुर रेलवे में 75 प्रतिशत पूँजी अंग्रेज सरकार की लगी हुई थी लेकिन इस पर एक निजी कम्पनी का कब्जा था। खड़गपुर इस रेलवे की खास जगह थी। यहाँ बड़ा जंक्शन तो था ही, एक बहुत बड़ी वर्कशाप भी थी। खड़गपुर के रेलवे के अलग–अलग विभागों में तकरीबन 30 हजार मजदूर काम करते थे। वे सभी जातियों, धर्मों के और अलग–अलग भाषाएँ बोलने वाले थे। वे देश के अलग–अलग हिस्सों से उजड़े हुए किसान थे जो मजदूरी करने के लिए वहाँ आये हुए थे। यह कम्पनी की ही नीति थी जिससे मजदूरों में एका कायम न हो सके। लेकिन खड़गपुर के मजदूर ऐसे कारसाज निकले कि संघर्ष के वक्त उन्होंने इस बँटवारे को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। आम जनता को अपने पक्ष में ले आये और पूरे देश के मजदूरों में जागृति पैदा कर दी।
हर पेशे के मजदूरों की तरह उस समय रेलवे के मजदूरों की भी हालत बहुत खराब थी। उन्हें ठेके पर रखा जाता था। वेतन बहुत ही कम था। इसका भी एक हिस्सा कम्पनी तरह–तरह के जुर्माने लगाकर काट लेती थी। पहले भर्ती होने के लिए रिश्वत देनी पड़ती और बाद में साल भर नौकरी बनी रहे इसके लिए भी रिश्वत देती पड़ती थी। जाहिर है कि मजदूर और मालिक स्थायी दुश्मन होते हैं, एक की तबाही ही दूसरे के आगे बढ़ने की शर्त होती है।
1910 से 1920 के बीच भारत में मजदूरों के आन्दोलन की जबरदस्त लहर उठी थी। इस दौरान मजदूरों ने एक से बढ़कर एक जुझारू लड़ाइयाँ लड़ी थीं। देशी पूँजीपति हों या अंग्रेज, मजदूर आन्दोलन की दहशत सबके अन्दर समायी हुई थी। इसी दौरान पहला विश्व युद्ध भी हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजों के खेमे की जीत हुई। युद्ध के हालात से उबरते ही अंग्रेज सरकार ने भारत के मजदूरों पर चौतरफा हमला बोल दिया।
हिन्दुस्तान सभा और मुस्लिम लीग तो पहले से थी ही, 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक (आरएसएस) भी बन गया। धार्मिक आधार पर बने इन तीनों संगठनों ने ही मजदूर आन्दोलन की एकता को कमजोर किया। अंग्रेज सरकार ने खुले और छिपे दोनों तरीकों से इन संगठनों को बढ़ावा दिया। कांग्रेस के अन्दर मौजूद मजदूर हितैषी नेताओं पर भी मजदूरों को ज्यादा बढ़ावा न देने के लिए दबाव बनाया जाने लगा।
इन सबके बावजूद, धीरे–धीरे ही सही लेकिन मजदूरों का आन्दोलन बढ़ता ही गया। आन्दोलन सरकार के काबू में ही रहे इसके लिए 1926 में ट्रेड यूनियन कानून बनाया गया। इस कानून को मजदूर हितैषी बताकर इसका जबरदस्त प्रचार किया गया। बताया जाता था कि अंग्रेज सरकार पूरी तरह मजदूरों की ओर झुक गयी है। अब मजदूरों को इसी कानून के तहत अपनी सारी लड़इयाँ लड़नी चाहिए। जबकि इस कानून में मजदूरों को आसानी से अपना संगठन बनाने की छूट नहीं दी गयी थी। इस कानून के झूठे प्रचार की आड़ में ही सरकार दो काले कानून लेकर आयी–– औद्योगिक विवाद का कानून और जन सुरक्षा का कानून। ये दोनों कानून मजदूरों समेत देश की सारी मेहनतकश जनता का गला घोंट देने वाले कानून थे। अंग्रेज सरकार के इन जबरदस्त हमलों से हर इंसाफ पसन्द आदमी का गुस्से से भर जाना लाजिमी था। गौरतलब है कि इन्हीं कानूनों के खिलाफ भगत सिंह और वटुकेश्वर दत्त ने संसद भवन में बम फेंका था। सरकार के इन तमाम कुकर्मों से मजदूरों के अन्दर भी गुस्सा भर गया था।
मजदूरों की माली हालत यूँ तो पूरे देश में ही खराब थी, लेकिन इनमें भी बंगाल, बिहार और उड़ीसा के मजदूरों की हालत सबसे खराब थी। उस समय की रिपोर्ट बताती है कि मजदूरों की औसत मजदूरी–– पुरुष की 8 आना, महिला की 6 आना और बच्चे की 4 आना रोजाना थी। बहुत से मजदूरों की मजदूरी इससे भी कम थी। जैसे रानीगंज कोयला खान में काम करनेवाले पुरुष मजदूरों को साढ़े छ: आना और महिला मजदूरों को पाँच आना औसतन रोजाना मिलते थे।
1928 में इंग्लैण्ड से अंग्रेज मजदूरों के कुछ नुमाइन्दे भारत का हाल जानने के लिए आये थे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि भारत में सबसे ज्यादा मजदूर बंगाल में हैं। यहाँ मजदूरी इतनी कम है कि मजदूरों की गर्भवती पत्नी और छोट–छोटे बच्चे भी मजदूरी करते हैं, फिर भी परिवार का गुजारा करने लायक कमाई नहीं हो पाती है। वे सीलन भरी अंधेरी कोठरियों में रहते हैं और उनमें से अधितर बीमार हैं।
इन भयावह हालात का अंत यहीं नहीं होता। भारत के मजदूरों का हाल जानने के लिए बनाये गये एक रायल कमीशन की रिपोर्ट बताती है कि किसानों की तरह ही अधिकतर मजदूर भी कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। उनकी नाममात्र की कमाई का 25 प्रतिशत हिस्सा तो कर्ज चुकाने में ही खर्च हो जाता है। सूदखोर इन कंगाल लोगों से भी 75 प्रतिशत से लेकर 150 प्रतिशत सालाना तक निर्मम ब्याज वसूलते हैं।
कमजोर होकर नरकंकालों में बदल चुके इन मजदूरों से पूँजीपति और ज्यादा मुनाफा निचोड़ना चाहते थे। कपड़ा कम्पनियाँ अपनी रिपोर्टों में दूसरी कम्पनियों को मजदूरी घटने के नये–नये तरीके सिखा रही थीं। जूट मिल मालिकों ने मजदूरों के नाममात्र के वेतन में भी 15 प्रतिशत की कटौती का फैसला किया था। रेलवे ही क्यों पीछे रहे, 1926 के आखिर में उन्होंने वेसेंट रोवेन कमिटी की रिपोर्ट के जरिये 75 हजार रेलवे मजदूरों की छँटनी की घोषणा कर दी।
छँटनी की घोषणा से सभी रेलवे मजदूरों का खून खौल रहा था, लेकिन पहली चोट खड़गपुर के मजदूरों ने की। यूनियन के पदाधिकारियों ने इसके खिलाफ इंग्लैण्ड में बैठे कम्पनी मालिकों को कई चिट्ठी लिखी, लेकिन उन्होंने किसी का भी जवाब नहीं दिया। यूनियन वालों के खिलाफ मजदूरों का गुस्सा तेजी से बढ़ता जा रहा था। मजदूर भले ही भूखों मर रहे थे, लेकिन वे हड़ताल करके जवाबी हमला करना चाहते थे। जबकि यूनियन के पदाधिकारी कम्पनी के साथ मान–मनौव्वल करके रास्ता निकालना चाह रहे थे। इसी दौरान रेलवे के नयी तकनीक अपनाने का बहाना बनाकर मजदूरों की छँटनी भी शुरू कर दी। यूनियन के पदाधिकारी उग्र मजदूरों के सामने आने से भी डरने लगे। उन्हें देखकर मजदूर भाले की तरह तन जाते और उनकी आँखों से गुस्से की चिन्गारियाँ फूटने लगती। 11 फरवरी 1926 के दिन कम्पनी ने यूनियन के स्थानीय नेता का तबादला दूसरी जगह कर दिया। अब तो हद हो गयी। उसी दिन 26 हजार मजदूरों ने एक आवाज पर हड़ताल कर दी।
इसी दौरान कम्पनी ने एक गाँव की रेलवे की जमीन पर झोपड़ी डालकर रह रहे मजदूरों को उजाड़ना शुरू कर दिया। मजदूरों ने इसका जबरदस्त विरोध किया। रेलवे की स्थानीय सेना हड़ताली मजदूरों पर टूट पड़ी। कई जगह मजदूरों पर गोली चलायी गयी, लाठियाँ और कोड़े बरसाये गये। उनके नेताओं के घर ढहाये गये, जला दिये गये। उनके परिवार बेघर हो गये। भूखों मरने की नौबत आ गयी, लेकिन मजदूर पीछे नहीं हटे। आम जनता के बीच किये गये प्रचार और मजदूरों की दृढ़ता के चलते खड़गपुर शहर और आस–पास की किसान जनता भी मजदूरों के समर्थन में आ गयी।
बंगाल–नागपुर के सभी मजदूर हड़ताल के समर्थन में आ गये थे। उनकी तादाद बहुत ज्यादा थी और एकता बहुत जबरदस्त। उनमें सभी धर्मों और जातियों के लोग शामिल थे। सरकार के साथ ही यूनियन के पदाधिकारी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता भी इस एकता से बहुत घबरा गये। मजदूरों का पलड़ा काफी भारी था। सरकार भी यह समझती थी कि ऐसे में उनसे वार्ता करने का एक ही मतलब था–– उनकी सारी माँगें मानना।
हड़ताल की खबरें बड़े–बड़े अखबारों में छपने लगीं। मजदूरों की सहायता के लिए कलकत्ता के भद्रजन और कांगे्रस के नेता रोज नयी–नयी समीतियाँ बनाने लगे। देश के नामचीन नेता खड़गपुर आकर मजदूरों की हड़ताल को समर्थन देने लगे। जब मजदूर भूखे मर रहे थे तो कम्पनी के फोरमैन उन्हें पीटते थे। उनकी नौकरियाँ छीनी जा रही थीं। तब इनमें से कोई मजदूरों का पुरसाहाल नहीं था। अब यही लोग मजदूरों के लिए मरे जा रहे थे और साबित कर रहे थे कि मजदूरों का इनसे बड़ा कोई हितैषी नहीं है। आखिरकार यह जमात मजदूरों के गुस्से पर कुछ ठण्डा पानी डालने और जबरन उनका नेता बनने में सफल हो गयी। हड़ताल के एक महीना बाद 10 मार्च को यूनियन के पदाधिकारियों और कम्पनी के प्रबन्धकों के बीच बातचीत हुई। मजदूरों के जुझारू संगठन ने बंगाल–नागपुर रेलवे कम्पनी को तूफान में सूखे पत्ते की तरह थर्रा दिया था, लेकिन 10 मार्च को केवल कम्पनी के जबानी आश्वासन पर हड़ताल खत्म करवा दी गयी। मजदूरों को छोड़कर सभी खुश थे। मजदूर खुश नहीं थे क्योंकि वे जान गये थे कि उन्हें ठग लिया गया है।
इस संघर्ष में भले ही फैरी तौर पर मजदूरों की हार हुई थी, लेकिन उन्होंने इससे बहुत से सबक सीखे थे।
खड़गपुर रेलवे मजदूरों के आन्दोलन में एक और खास घटना हुई थी। हड़ताल के दौरान मुजफ्फर अहमद, एस ए डांगे, भूपेन्द्र नाथ दत्त, धरावी गोस्वामी जैसे कई पढ़े–लिखे होनहार नौजवान मजदूरों के बीच पहुँचे थे। इन नौजवानों ने मजदूरों की तरह–तरह से मदद की। उनके आन्दोलन के प्रचार के लिए पर्चे और पुस्तिकाएँ तैयार किये, आम जनता से सहयोग लेकर हड़ताली मजदूरों के परिवारों की गुजर–बसर का इन्तजाम किया और सबसे महत्वपूर्ण यह कि मजदूरों की छोटी–छोटी टोलियाँ बनाकर उनकी पढ़ाई–लिखाई करवाई। उन्हें देश–दुनिया में हो रहे बदलावों के बारे में बताया और मजदूरों को अपने दोस्त–दुश्मन की पहचान करना सिखाया। जल्दी ही ये नौजवान हड़ताली मजदूरों के लाडले बन गये।
मजदूर जानते थे कि 10 मार्च को कम्पनी के साथ हुआ समझौता फर्जी है। उन्होंने अगले ही दिन से अगली हड़ताल की तैयारी शुरू कर दी। सितम्बर का महीना आते–आते कम्पनी ने फिर से छँटनी शुरू की तो मजदूर तुरन्त हड़ताल पर बैठ गये। उनका इस बार का संघर्ष पिछले संघर्ष से दो कदम आगे बढ़ा हुआ था। हड़ताल तीन महीने चली, लेकिन जीत मजदूरों की हुई।
खड़गपुर के मजदूरों की जीत के बाद पूरे देश में जुझारू हड़तालों का तूफान उठ खड़ा हुआ था। इस आन्दोलन ने देश के दूसरे मजदूर आन्दोलनों को भी एक नयी दिशा दी। धार्मिक संगठन कछुए की तरह अपनी खोल में दुबककर बैठने को मजबूर हो गये। इसने आजादी के आन्दोलन को भी आगे बढ़ाने में मदद की। कांगे्रस में भी हलचल मच गयी। एक साल बाद ही कांगे्रस और गाँधी जी को भी पूर्ण स्वराज्य की माँग उठानी पड़ी थी। भारत की जनता खड़गपुर के रेलवे मजदूरों की हमेशा एहसानमन्द रहेगी।
सफाईकर्मियों की बदतर हालत
–– 30 मार्च 2022 को संजय गांधी ट्रांसपोर्ट नगर के एक सीवर मेंं उतरे चार लोगों की दम घुटने से मौत हो गयी। मरने वालों में एक ठेकेदार, दो मजदूर और एक ई–रिक्शा चालक था। मजदूर एमटीएनएल सीवर लाइन में तार बिछाने का काम करते थे। ई–रिक्शा चालक की मजदूरों को बचाने में जान चली गई थी।
–– 27 अप्रैल 2022 को बवाना औद्योगिक क्षेत्र के सीवर में उतरे दो युवकों की जहरीली गैस की चपेट में आने से मौत। एक युवक सीवर से कचरा निकालने के लिए घुसा था, जबकि दूसरा युवक उसे निकालने के दौरान सीवर में अचेत हो गया।
–– 9 सितम्बर 2022 को दिल्ली, मुंडका के लोकनायक पुरम कॉलोनी में शुक्रवार की शाम सीवर की सफाई के दौरान दो लोगों की दम घुटने से मौत हो गयी। इनमें से एक कॉलोनी का सफाई कर्मी था और दूसरा गार्ड था। सीवर लाइन में भरी जहरीली गैस की चपेट में आने से जब सफाई कर्मी बेहोश हो कर गिर गया तो उसे बचाने के लिए सोसाइटी में तैनात सुरक्षा गार्ड भी मेन होल में उतर गया। इससे वह भी जहरीली गैस के प्रभाव में आ गया और फिर दोनों की दम घुटने से मौत हो गई।
हजारों सालों से अमानवीय जाति–प्रथा की सबसे निचली पायदान पर जी रही जातियों से आने वाले सफाईकर्मियों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। हाथ से मैला साफ करने की प्रथा पर बड़ी–बड़ी बातें करनेवाले लोग पीढ़ी–दर–पीढ़ी दरअसल जिस विशेषाधिकार का सुख भोगते आ रहे हैं, उसे वे क्यों खोना चाहेंगे? आज भी हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई, सभी धर्मों की कुछ खास जातियाँ ही मैला ढोने और सफाई करने के लिए निर्धारित कर दी गयी हैं जो नरक से भी बदतर हालात में जिन्दगी बसर करती हैं।
सिर पर मैला ढोनेवाले मेहनतकश लोगों के प्रति सरकार की उपेक्षा का हाल ये है कि देश के विभिन्न हिस्सों में उनकी कुल संख्या और सामाजिक–आर्थिक स्थिति के बारे में कोई सर्वे या अध्ययन नहीं कराया गया। 2015 में भारत सरकार ने लोकसभा में यह जानकारी दी थी कि 2011 की जनगणना के आँकड़े के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में 1,80,657 परिवार मैला सफाई का काम कर रहे थे। इनमें से सबसे ज्यादा 63,713 परिवार महाराष्ट्र में थे। इसके बाद मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, त्रिपुरा और कर्नाटक का स्थान है। यह संख्या परिवारों द्वारा दी गयी जानकारी पर आधारित है। दूसरी ओर, 2011 की जनगणना के अनुसार देश में हाथ से मैला सफाई करनेवाले कर्मियों की कुल संख्या 7,94,000 थी। राज्य सरकारें सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों के बारे में केन्द्र को सही–सही सूचना नहीं देतीं। 2017 में 6 राज्यों ने केवल 268 मौतों की जानकारी दी। गजब तो यह कि एक सरकारी सर्वे के अनुसार 13 राज्यों में सिर्फ 13,657 सफाईकर्मी हैं। 19 सितम्बर 2018 को द गार्डियन की एक रिपोर्ट में बताया गया कि राज्य सरकारें हाथों से मैला सफाई करने वाले मजदूरों के अस्तित्व से ही इनकार करती हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार जब राज्य सरकारों से हाथों से मैला सफाई करने और ढोने वाले सफाईकर्मियों की संख्या पूछी गयी तो तत्कालीन छत्तीसगढ़ सरकार ने 3 और गुजरात सरकार ने 2 बतायी। उन राज्यों में सफाईकर्मियों की अक्सर होने वाली मौत की खबरें इस गलतबयानी का पर्दाफाश करती हैं, जिनमें से एक इस लेख की शुरुआत में ही दी गयी है।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार 2017 से हर पाँचवें दिन कोई न कोई अभागा सीवर या सेफ्टी टैंक की सफाई के दौरान मौत का शिकार बन जाता है। हैरत की बात यह कि इस तरह की मृत्यु के बारे में यह पहला आधिकारिक आँकड़ा था। सीवर सफाई के दौरान हुई मृत्यु के बारे में आयोग द्वारा दिये गये आँकड़े के मुताबिक देशभर में तामिलनाडु का पहला और गुजरात का दूसरा स्थान है। आयोग के अध्यक्ष ने स्वीकार किया था कि यह आँकड़ा अंतिम और पूर्ण नहीं है क्योंकि ज्यादातर राज्यों में इस तरह की मृत्यु की रिपोर्ट दर्ज ही नहीं होती। इसलिए इनको हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों में छपी खबरों तथा 29 राज्यों और 7 केन्द्र शासित प्रदेशों में से सिर्फ 13 द्वारा दी गयी जानकारी के आधार पर तैयार किया गया था। इनमें सफाई के काम में लगी जातियों के स्त्री–पुरुषों की विभिन्न रोगों से होनेवाली मौत के आँकड़े भी शामिल नहीं थे। सुरक्षा साधनों के बिना ही हाथ से मैला और गन्दगी उठाने के चलते उन्हें तरह–तरह के संक्रामक रोग हो जाते हैं और इनकी औसत आयु बेहद कम हो जाती है।
हमरे देश में जब कोई समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है और सरकार के लिए उस पर पर्दा डालना कठिन हो जाता है तो वह उस पर कोई आयोग बैठाकर या कानून बनाकर अपने कर्तव्यों का इतिश्री कर लेती है। इस समस्या पर भी सरकारों का यही रवैया रहा है। 1993 में 6 राज्यों ने केन्द्र सरकार से मैला ढोने की प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए कानून का निर्माण करने का अनुरोध किया। तब ‘द एम्प्लॉयमेण्ट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राई लैट्रिन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट 1993” नरसिम्हा राव सरकार द्वारा पारित किया गया। इस कानून के बनने के बाद से सीवर सफाई के दौरान जहरीली गैसों के कारण हुई 1800 सफाईकर्मियों की मौत की तथ्यपरक जानकारी सफाई कर्मचारी आन्दोलन के समन्वयक और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता बेजवाड़ा विल्सन और उनके साथियों के पास मौजूद हैं। यह संख्या केवल उन मामलों की है जिनके विषय में दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं। वास्तविक संख्या तो इससे कई गुना अधिक है क्योंकि इस तरह की अधिकांश मौतों के मामले दबा दिये जाते हैं। मृतक के परिजन अशिक्षा और गरीबी के कारण कानूनी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं होते। मृत्यु के लिए जिम्मेदार ठेकेदार और अधिकारी अपने रसूख के बल पर अक्सर ऐसे मामले को रफा–दफा कर देते हैं।
सितम्बर 2013 में सरकार ने इस सम्बन्ध में एक और नया कानून बनाया–– फ्प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेण्ट एज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन रूल्स 2013” जिसे दिसम्बर 2013 में लागू किया गया। लेकिन कानून बनाने से किसी समस्या का समाधान कैसे होगा, जब न तो समाज में उसे लागू किये जाने की परिस्थिति है और न ही शासन–प्रशासन उसे मुस्तैदी से लागू करने में कोई रुचि लेता हो। निजीकरण के मौजूदा दौर में ज्यादातर सफाईकर्मी निजी ठेकेदारों के अधीन काम करते हैं–– कोई सम्मानजनक वेतन नहीं, कोई सेवा शर्त नहीं, बीमा नहीं, पेन्शन नहीं। पुलिस, अधिकारी और ठेकेदार का गठजोड़ मृत्यु के कारण को बदलने का कार्य करता है। एक नाममात्र की राशि मृतक के परिजनों को ठेकेदार द्वारा दे दी जाती है। सरकारी काम करने के बावजूद सरकारें इन्हें अपना कर्मचारी नहीं मानती हैं, इसीलिए इन्हें मुआवजा देने से भी इनकार कर देती हैं।
जहरीली गैसों की जाँच के लिए एक विशेषज्ञ इंजीनियर की उपस्थिति जरूरी होती है। एम्बुलेंस की और डॉक्टर का मौजूद होना भी जरूरी होता है। सीवेज टैंक में उतरने वाले मजदूर को गैस मास्क, हेलमेट, गम बूट, ग्लव्स, सेफ्टी बेल्ट आदि से सुसज्जित पोशाक पहनना होता है। इसके बाद मौके पर मौजूद किसी जिम्मेदार अधिकारी द्वारा यह प्रमाणित करने पर कि सभी सुरक्षा नियमों का पूरी तरह पालन कर लिया गया है, मजदूर को सीवर में उतारा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 2014 में निर्णय दिया था कि आपातस्थितियों में भी बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर लाइन्स में प्रवेश अपराध की श्रेणी में आएगा।
जमीनी सच्चाई यह है कि ठेकेदार बिना किसी सुरक्षा उपकरण के 200–250 रुपये की दिहाड़ी पर काम कर रहे सफाई मजदूरों को रस्से के सहारे मैनहोल से नीचे उतार देते हैं। ये मौतें प्राय: सेफ्टी टैंक के भीतर मौजूद मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि जहरीली गैसों के कारण होती हैं। इन गैसों की जाँच के लिए ठेकेदार के पास माचिस की तीली जलाकर देखना और जीवित कॉकरोच डालकर जाँच करने जैसे आदिम तरीके ही होते हैं।