खेत मजदूर की जिन्दगी पर एक नजर

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

55 साल के प्रदीप (बदला हुआ नाम) ने सातवीं कक्षा तक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की है। कम उम्र से ही मजदूरी करने के कारण आगे पढ़ाई नहीं कर पाये। हिन्दी पढ़ लेते हैं। इनका पूरा जीवन मुख्यत: खेत मजदूर का रहा है। पिछले चार साल से लगातार बीमार रहने के कारण अब मजदूरी भी नहीं कर सकते। इनकी पत्नी की उम्र लगभग पचास साल है और वह अनपढ़ हैं। इनकी केवल एक ही सन्तान है– 22 साल की बेटी। वह कक्षा दो तक पढ़ी है। बीमार होने के कारण आगे पढ़ नहीं पायी। वह विवाहित है और पिछले दो साल से मायके में ही रहती है। आजकल प्रदीप साँस और आँत की बीमारी से पीड़ित हैं, उनकी पत्नी बेहद कमजोर हैं जो ज्यादातर समय बीमार रहती हैं और लड़की की भी रीढ़ की हड्डी बढ़ी हुई है। उनकी पत्नी ने बताया कि वह पड़ोस में दूध लेने जाती थी तो दूध बेचने वाली महिला ने मना कर दिया। पूछने पर कहा कि ‘‘तुम रोज वही साड़ी पहन कर आती हो।’’

प्रदीप के पिता गाँव में दिहाड़ी मजदूर थे। आज से करीब 40 साल पहले गाँव के दबंगों से परेशान होकर पूरा परिवार गाँव छोड़ने पर मजबूर हो गया। दरअसल गाँव में इनके घर पर लगातार चोरी होने लगी थी। आखिर में इनके घर में एक अचार का डिब्बा बचा था, उसे भी चोर उठा कर ले गये थे। ऐसी घटनाओं से परेशान आकर वह शहर के पास एक गाँव में आकर बस गये। घर बेचकर जो पैसे मिले वह भी दबंगों ने लूट लिये। तब से लेकर आज तक इनके पास कोई सम्पत्ति नहीं है।

यहाँ वे एक छोटे से कमरे में गुजर–बसर करते हंै, जिसकी छत को मरम्मत की जरूरत है। दीवारें भी मिट्टी से चिनी गयी हैं। घर में बिजली की कोई व्यवस्था नहीं है। पिछले साल ही अपने पैसों से शौचालय बनवाया था। घर में दो छोटी चारपाई है। उसके अलावा एक छोटा कीपेड वाला फोन है। एक साइकिल थी लेकिन पिछले साल मजबूरी में वह भी बेचनी पड़ी। घर में सिलिण्डर गैस नहीं है, खाना बनाने के लिए चूल्हे का इस्तेमाल करते हैं, जिसके लिए उपले खरीदने पड़ते हैं, जिसका खर्चा लगभग 200 रुपये प्रति माह आ जाता है। गैस कनेक्शन लेने की कोशिश की, लेकिन कभी ठगे गये तो कभी पैसे नहीं रहे। घर में टंकी का पानी आता है, जिसका सालाना खर्चा लगभग 100 रुपये का है। 25 रुपये में सरकारी गल्ले से 6 किलो गेहूँ और 4 किलो चावल प्रति माह मिलते हैं। लड़की की शादी होने के कारण उसके हिस्से का राशन नहीं मिलता, लेकिन वह पिछले 2 साल से घर पर ही रह रही है। 10 रुपये का दूध हर रोज लेते हैं। पूरे परिवार का मासिक खर्च लगभग 2 हजार रुपये तक आ जाता है, कमाई न होने के चलते कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। गाँव में ही कर्ज 10 प्रतिशत प्रति माह की ब्याज दर पर मिलता है। घर में केवल लड़की के नाम से एक बैंक खाता है जो अभी कुछ माह पहले बनवाया है। घर संकरी गली में है जो गहराई में भी है जिस कारण थोड़ी सी भी बरसात होने पर पानी गली में भर जाता है।

शादी के कुछ महीने बाद ही इनकी पत्नी हीटर से करेण्ट लगने के कारण गम्भीर रूप से जल गयी थी। इनके दाहिने हाथ का मांस जल गया था। शुरुआत में किसी भी डॉक्टर ने इलाज नहीं किया। बोले पुलिस केस है, पुलिस रिपोर्ट के बिना इलाज नहीं करेंगे। बाद में गाँव के लगभग 60 लोगों के हस्ताक्षर करवाकर दिखाये तब मेरठ के एक प्राइवेट अस्पताल में उनका इलाज हुआ। डॉक्टर ने सर्जरी करने को कहा लेकिन इतने पैसे नहीं जुटा पाये। 17–17 रुपये की 20 ट्यूब रोजाना लगानी पड़ी, जिससे जले हुए पर मांस बन सके। पूरे इलाज में लगभग 2 लाख तक का खर्चा हुआ। 8–10 कमेटी थी, उन सबको तुड़वाना पड़ा, जिस कारण उनमें भी घाटा हुआ। बाकी पैसे उधार लिये। लगभग 10 साल लगे कर्ज चुकाने में। इनकी पत्नी की तबीयत अभी भी बेहद खराब रहती है। मार्च महीने में ही ज्यादा तबीयत खराब होने पर उन्हें अपने मायके जाना पड़ा, ताकि इलाज हो सके।

 इनकी लड़की जब एक साल की थी, तब गाँव के ही एक झोलछाप डॉक्टर ने निमोनिया में ग्लूकोज लगा दिया था, जिससे उसके पूरे शरीर में लकवा मार गया था। 2 साल तक लगातार लेटे रहने के कारण उनकी बच्ची की रीढ़ की हड्डी बाहर निकल आयी। डॉक्टर की एक गलती ने उस बच्ची को जीवन भर का दर्द दे दिया। 19 साल की उम्र में लड़की की शादी मोदीनगर में की। शादी में 50 हजार का खर्च आया था जिसके लिए दुबारा कर्ज लेना पड़ा। माँ–बाप न होने के कारण लड़की का पति अपनी बड़ी बहन के पास रहता है। पति और उसकी ननद मिलकर लड़की को बहुत परेशान करते थे। ननद के पति ने लड़की के साथ बलात्कार किया। लड़की ने जब सब कुछ घर बताया तो उसकी जान पर बन आयी, बड़ी मुश्किल से उसे वहाँ से मायके लेकर आये। उसके बाद से लड़की अपने पिता के ही पास रहती है।

प्रदीप ने लगभग 35 साल सरकारी फार्म में ज्वार, बाजरा, मक्का की कटाई का काम किया है। यह काम ठेकेदार द्वारा कराया जाता था। काम की शुरुआत रात 3 बजे से लेकर सुबह 10 बजे तक होती थी। बड़ी दराँती से ज्वार, बाजरा आदि काटकर इन्हें ट्रैक्टर में भरना होता था। यह काम कड़ी मेहनत का था क्योंकि झुककर लगातार 8 घण्टे काम करना पड़ता था और साथ ही वजन भी उठाना पड़ता था। लगभग हर रोज 30–40 कुण्टल ज्वार काट लेते थे और फिर उसे ट्रैक्टर में लादते थे। यह काम खाली पेट करते थे क्योंकि इतनी सुबह खाना नहीं बन पाता था। घर से केवल एक कप चाय पीकर जाते थे। इस काम के लिए पुरुषों को फिलहाल 350 रुपये मिलते हैं और महिलाओं को मात्र 150–180 रुपये। लगभग पुरुषों जितना काम करने पर भी उन्हे पुरुषों के मुकाबले आधे पैसे दिये जाते हैं। पिछले 4–5 सालों से अब इस काम में पुरुषों को बेहद कम लगाया जाता है सारा काम ठेकेदार बेहद कम पैसों में महिलाओं से करवा लेते हैं। यह काम साल में 6 महीने ही मिल पाता है बाकी 6 महीने उन्हें सब्जी या फिर रिक्शा चलाने का काम करना पड़ता था। प्रदीप ने बताया कि पहले किराये पर रिक्शा 10 रुपये में दिन भर के लिए मिल जाता था जिससे उनकी रोजी–रोटी चलती रहती थी। लेकिन अब पुराने रिक्शे की जगह नये इलेक्ट्रोनिक रिक्शे ने ले ली है, जिसका दैनिक किराया 350 रुपये है। पूरे दिन में मेहनत करने पर भी किराया जुटाने तक के पैसे नहीं हो पाते हैं। इसलिए पहले किसी तरह गुजर बसर करने वाले अनेकों मजदूरों की जिन्दगी नर्क बन गयी है।

लम्बे समय तक खेत मजदूर के तौर पर काम करते रहने पर प्रदीप की आँतों में दिक्कत होने लगी क्योंकि काम खाली पेट करना पड़ता था। समस्या धीरे–धीरे उम्र के साथ बढ़ने लगी और 4 साल पहले चलने–फिरने में भी दिक्कत होने लगी। पहले गाँव में इलाज कराया लेकिन कोई आराम न मिलने पर मेरठ के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में दिखाया, जहाँ 3 महीने इलाज चला और 30 हजार तक खर्च हुए। यह पैसे भी कर्ज पर लिये। ज्यादा बीमार होने के कारण कर्ज देनेवाले ने ब्याज नहीं लिया, लेकिन पैसे खत्म होने पर इलाज बन्द कराना पड़ा और एक साल पहले बहुत ज्यादा हालत खराब होने पर दुबारा डॉक्टर को दिखाया जहाँ उन्हंे फेफड़ों में इन्फेक्शन और टीबी निकला। कुछ महीने दवाई खायी, लेकिन फिर कोरोना के कारण देश भर में लॉकडाउन लग गया। जो दवाई पहले 150 रुपये प्रति हफ्ते की मिलती थी, वह लॉकडाउन में 250 रुपये तक बढ़ा दी। पहले से कोई आय का साधन न होने और उस पर दवाई महँगी होने से उन्होंने बीच में ही दवाई छोड़ दी। दवाई छोड़ने के कारण उनकी हालत बेहद गम्भीर हो गयी, बाद में कुछ लोग उनकी मदद के लिए आगे आये तब उनका इलाज सरकारी अस्पताल में कराया गया। 6 महीने टीबी की दवाई खायी, जिससे टीबी तो खत्म हो गया, लेकिन आँत और फेफड़े का इन्फेक्शन अभी बना हुआ है, जिससे साँस लेने में बेहद दिक्कत बनी हुई है। उन्होंने कहा कि गरीब आदमी अपनी जिन्दगी काट रहा है, जी नहीं रहा। हमारे द्वारा यह पूछने पर कि आपकी जिन्दगी कैसे और कब बेहतर हो सकती है? इस पर उन्होंने कहा कि जिन्दगी बेहतर होने के कोई आसार नहीं, अब तो अन्त नजर आ रहा है। सरकारी सहायता पर उनका कहना था–– हमें थोड़े अनाज के अलावा सरकार के होने न होने का कोई लाभ नहीं, आज तक कोई भी सरकारी योजना हम तक नहीं पहुँची। मजदूरों में एकता न होने की वजह के बारे में उन्होंने बताया कि निजी स्वार्थ अब मजदूरों में भी बढ़ गया है जो उन्हें एक होने से रोकता है। उन्होंने बताया कि पत्नी के न होने पर उनके लिए दिन में एक बार बहन के यहाँ से खाना आता था लेकिन मेरे पड़ोस में एक वृ( व्यक्ति हैं जो अकेले रहते हैं, मैं कुछ खाना उन्हें दे देता था, कुछ अपने छोटे भाई को और कुछ मेरे पास रहने वाले कुत्ते को बाकी थोड़ा बहुत जो भी बचता मैं वही खा पाता था। बोले मजदूरों का भला भी इसी तरह एक दूसरे का साथ देने और निजी स्वार्थ से ऊपर उठने से ही होगा।

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