कोरोना महामारी से जुड़े अन्धविश्वास
कोरोना महामारी का कहर अभी खत्म नहीं हुआ है। कोरोना फैलने के तुरन्त बाद से दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने इसे जानने–समझने का प्रयास शुरू कर दिया। तमाम प्रयोगों के बाद कुछ सफलता हासिल हुई। आज कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिए कई वैक्सीन उपलब्ध हैं। लोगों की जान बचाने के लिए दवाइयाँ, ऑक्सीजन, वेन्टीलेटर भी हैं। आज ये सभी चीजें वैज्ञानिकों द्वारा की गयी खोज का ही नतीजा है। किसी बीमार आदमी के इलाज के लिए परिवार के लोग डॉक्टर के पास या अस्पताल की ओर भागते हैं। वे जानते हैं कि अगर एक अच्छे डॉक्टर का इलाज मिल जाये तो मरीज बच जायेगा। डॉक्टर के हाथ में वह कौन सी चमत्कारिक ताकत है जिससे मरीज की जान बच जाती है? वह है विज्ञान की ताकत। वह है सच की ताकत। विज्ञान ही सबसे सही ज्ञान है और भरोसे के लायक है। यह विज्ञान की ही देन है जिसके चलते लोग डॉक्टर को भगवान कहते हैं।
एक ओर जहाँ विज्ञान लोगों की जान बचाने का काम कर रहा है, वहीं दूसरी ओर, पैसे की लूट के चलते कुछ निजी अस्पतालों ने इलाज इतना महँगा कर दिया है कि एक गरीब आदमी इलाज नहीं करा सकता। इसके लिए विज्ञान को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। बिजली के करेन्ट का उपयोग पंखा, बल्ब और अन्य कई उपकरणों को चलाकर लाभ उठाने के लिए किया जा सकता है तो उससे किसी को करेन्ट देकर मारा भी जा सकता है। इसलिए अगर विज्ञान की ताकत अच्छे इनसान के हाथ में रहेगी, तो लोगों की भलाई होगी और अगर वह बुरे इनसानों के हाथ पड़ जाये तो विनाश को दावत देती है। किसी मरीज को सही इलाज न मिलने का असली कारण है–– लोभ–लालच पर टिकी हमारी समाज व्यवस्था। अमीरों के साथ खड़ी सरकारें भी जनता के हित में विज्ञान के लाभ का इस्तेमाल नहीं करतीं। यह भी एक समस्या है।
इन सब से अलग एक बड़ी समस्या हमारे समाज को बरबादी की ओर ले जा रही है–– वह है अन्धविश्वास। कोरोना महामारी आने के बाद से ही देश भर में अन्धविश्वास का बाजार गर्म रहा। दूसरे देशों में इस महामारी को विज्ञान से जोड़कर देखा और समझा गया तथा इसकी रोकथाम के वैज्ञानिक उपाय किये गये। चीन ने ऐसा ही करके इस महामारी पर पूरी तरह काबू पा लिया, लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो सका क्योंकि हमारे यहाँ इसे विज्ञान से नहीं अन्धविश्वास से जोड़कर देखा जा रहा है। इसे रोकने की बात तो दूर, रोज–रोज अजीबोगरीब नुस्खे पेश करके देश की जनता को गुमराह किया जा रहा है। कहीं कोरोना को राक्षस तो कहीं देवी–देवता के रूप में दिखाया जा रहा है। हद तो यह है कि देश के प्रधानमंत्री ने भी अपनी ताली–थाली, दीया–बाती की अपीलों से जाने–अनजाने अन्धविश्वास को बढ़ावा दिया। इस समय कोरोना को लेकर दर्जनों अन्धविश्वास प्रचलित हैं, इनमें से पाँच प्रमुख अन्धविश्वासों की छानबीन यहाँ की जा रही है।
पहला अन्धविश्वास–– पवित्र संख्या नौ
सबसे पहले लॉकडाउन के नौ दिन बाद पाँच अप्रैल ययानी चैथा महीना और पाँच तारीख, दोनों मिलकर नौ हुएद्ध को प्रधानमंत्री मोदी ने सुबह नौ बजकर नौ मिनट पर देश को सम्बोधित किया। इसमें उन्होंने देशवासियों से कोरोना यो(ाओं के सम्मान में शाम को नौ बजकर नौ मिनट के लिए घरों की लाइट बन्द करने को कहा। इन नौ मिनट के दौरान मोमबत्ती/दीया या टोर्च जलाने की अपील की।
इस घटना के तुरन्त बाद अन्धविश्वासी सक्रिय हो गये। यह कहा गया कि जब सभी देशवासी एक साथ दीया या मोमबत्ती जलाएँगे तो तापमान नौ डिग्री बढ़ जाएगा। तापमान बढ़ने से कोरोना मर जायेगा। यह सब पूरी तरह से अवैज्ञानिक और झूठी बाते हैं। इसका सच्चाई से कोई लेना–देना नहीं है। कोरोना की पहली लहर ने ही इन सब अन्धविश्वासों की पोलपट्टी खोलकर रख दी और इन अन्धविश्वासों को फैलाने वालों को नंगा कर दिया। अगर इन झूठे अन्धविश्वासों पर वैज्ञानिक विश्वास कर लेते तो सोचिए कितना अनर्थ होता, क्योंकि वे वैक्सीन बनाने के बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते। लेकिन वे इतना जानते हैं कि अंक नौ कोरोना को मारने में कोई मदद नहीं करनेवाला।
दूसरा अन्धविश्वास–– ताली बजाना और बर्तन पीटना
पिछले साल 22 अप्रैल को जनता कफ्र्यू लगाया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बार फिर जनता को सम्बोधित किया और चैदह घण्टे घर में रहने के लिए अपील की। साथ ही कोरोना यो(ा के सम्मान में बालकनी में खड़े होकर पाँच मिनट ताली या थाली पीटने की भी अपील की। इस सन्देश को भी अन्धविश्वास से जोड़कर फैलाया गया। लोगों ने बालकनी, गली, चैराहेें पर ढोल–नगाड़े और डीजे बजाया। थाली पीटते हुए ‘गो कोरोना गो’ के शोर से देश भर में ध्वनि प्रदूषण हुआ। ‘गो कोरोना गो’ का शोर महज बेवकूफी के अलावा कुछ भी नहीं। लेकिन इस अन्धविश्वास की चपेट में अच्छे–खासे पढ़े–लिखे लोगों ने भी अपनी अकल बेच खायी। पता नहीं कि जब कोरोना उनके ध्वनि प्रदूषण से नहीं मरा और कोरोना संक्रमित लोग बढ़ते ही गये तो उन्हें अपनी मूर्खता पर शर्म आयी या नहीं।
तीसरा अन्धविश्वास–– गौमूत्र और गोबर
एक अफवाह और उड़ी कि कोरोना मांसाहार खाने से फैलता है और गौमूत्र पीने से मर जाता है। उत्तर प्रदेश के एक बीजेपी विधायक ने गौ मूत्र पीते हुए एक वीडियो बनवाया और गौमूत्र को कोरोना रक्षक के तौर पर प्रचारित किया। असम के एक विधायक ने कहा कि गोबर के लेप से भी घर शु( हो जाता है, यह कोरोना से लड़ने में भी मदद करेगा। कुछ लोगों ने अपने पूरे शरीर पर गाय का गोबर लपेटने का सामूहिक आयोजन किया। हम सभी जानते हैं कि ऐसी बातें अन्धविश्वास की श्रेणी में आती हैं और इन सब बातों को सुनकर कोई भी समझदार आदमी अपना माथा जरूर पीट लेगा। लेकिन हमारे समाज में अन्धविश्वास का इतना बोलबाला है कि कुछ लोग इन्हीं मूर्खता भरी बातों को सच मान लेते हैं।
गोबर पोतने की बात को डॉक्टरों ने भ्रामक और झूठा बताया और लोगों को चेताया कि ऐसा करने से कोरोना के केस और बढ़ेंगे। देश–दुनिया की किसी भी प्रयोगशाला ने गौ मूत्र को फायदेमन्द नहीं बताया। न ही गौमूत्र में ऐसा कोई पोषक तत्व पाया गया जो पौष्टिक हो और कोरोना को मार सके।
चौथा अन्धविश्वास–– गंगाजल
कुछ नेताओं और धार्मिक कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि पवित्र गंगाजल पीने से कोरोना से बचा जा सकता है। भारतीय मेडिकल अनुसंधान परिषद ने जाँच की तो ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिसके आधार पर गंगाजल का इस्तेमाल कोरोना की रोकथाम के लिए किये जा सके। वैज्ञानिकों ने इस बात को भी गलत साबित कर दिया। इस तरह एक और अन्धविश्वास ने विज्ञान के आगे घुटने टेक दिया।
हालत तो यह हो गयी है कि कई जगहों पर गंगा नदी का पानी इतना प्रदूषित हो गया है कि अगर कोई उसे पी ले तो वह खुद बीमार हो जायेगा।
पाँचवाँ अन्धविश्वास–– धार्मिक कूपमण्डूकता
यह हर इलाके में अलग तरह से देखने को मिली। ज्यादातर अफवाह फेसबुक, व्हाट्सअप और फोन कॉल से फैली। एक रिश्तेदार ने दूसरे रिश्तेदार को फोन करके बताया। जैसे–– एक औरत फोन पर अपनी बहन को समझा रही थी। घर में जितने सदस्य हैं शाम को उतने दीये घूरे पर जलाकर आना है। इससे घर में किसी को कोरोना नहीं होगा। कहीं यह अफवाह उड़ी कि घर में जितने लोग है उतनी बाल्टी पानी कुएँ में डालने से कोरोना नहीं होगा। एक वैद्य ने दावा किया कि उनके पास एक ऐसा मन्त्र है जिससे बुखार नहीं आयेगा और जब बुखार नहीं आएगा तो कोरोना तो हो ही नहीं सकता। एक खबर उड़ी कि जिन्हें अल्लाह में भरोसा है उन्हें कोरोना नहीं होगा। कोरोना केवल अल्लाह द्वारा लिया जाने वाला इम्तहान है।
धार्मिक कूपमण्डूकता अपने शिखर पर तब पहुँची, जब कोयम्बटूर के एक मन्दिर में डेढ़ फुट ऊँचा काला पत्थर रखा गया और इसे कोरोना देवी मानकर इसकी पूजा अर्चना की गयी।
इन अन्धविश्वासों को बढ़ावा देने में सिर्फ धार्मिक कूपमण्डूक लोग ही नहीं, बल्कि अच्छे खासे पढ़े–लिखे लोग, डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर और नेता शामिल हैं। इन सबका परिणाम यह कि अन्धविश्वास के चलते उपजी लापरवाही से समस्या खत्म होने के बजाय और बढ़ती जा रही है।
इन अन्धविश्वासों से बचने का एक बहुत सरल सा उपाय है। सवाल करो। किसी पर यूँ ही विश्वास मत कर लो। कोरोना की चेन के साथ–साथ इन अफवाहों की चेन तोड़ना भी जरूरी है। नहीं तो इससे पहले कि कोरोना हमारे शरीर को खत्म करे, ये अफवाह और अन्धविश्वास हमारी बु(ि को खत्म कर देंगे। तब दुनिया हम पर हँसेगी। वैसे भी इन्हीं अन्धविश्वासों और सरकार की बदइन्तजामी के चलते हमारे देश ने कोरोना की दूसरी लहर ने लाखों लोगों की जान ले ली। वहीं दूसरी ओर, ढेर सारे देश कोरोना से लड़ने के लिए विज्ञान का सहारा ले रहे हैं और इस महामारी पर लगभग काबू पा चुके हैं। हम आज नहीं सम्हलेंगे तो कल तक बहुत देर हो जायेगी।