लकड़ी की चम्मच बनाने वाली महिला मजदूर

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

लकड़ी की चम्मच का इस्तेमाल हर किसी ने किया होगा, जैसे शादी–विवाह में चाट, रसगुल्ले खाने के लिए। हम इन चम्मचों का एक बार उपयोग करके कूड़ेदान में डाल देते हैं। कूड़ेदान में जाते ही इन चम्मचों की कहानी का अन्त हो जाता है लेकिन इन्हें बनानेवाले मजदूरों के दुखों का अन्त कभी नहीं होता। शायद ही आपने यह सोचा होगा कि कितनी मेहनत–मशक्कत के बाद यह हमारे हाथों तक पहुँचती है। जो मजदूर इन चम्मचों को बनाते और पैक करते हैं उनकी जिन्दगी कैसी है?

चम्मच बनानेवाले मजदूरों की जिन्दगी को समझने के लिए हम इन मजदूरों के घर गये। हमने उनसे बातें कीं। उन्होंने अपने बारे में जो बातें बतायीं, वे हमारे लिए बिलकुल अनजानी थीं। वे सब बातें और उनकी रिहाइश का आँखों देखा हाल हम यहाँ दे रहे हैं।

हम शामली शहर के दक्षिण में कुछ किलोमीटर की दूरी पर बसे गाँव में गये। शामली शहर के नजदीक होने के कारण गाँव के आसपास कई छोटी–छोटी फैक्ट्रियाँ बनी हुई हैं, जैसे–– नमकीन, धूपबत्ती, गाड़ी के रीम–धुरे, लकड़ी की चम्मच फैक्ट्रियाँ। शहरीकरण के कारण खेती की जमीन पर नयी–नयी कॉलोनी, शॉपिंग मॉल आदि बनाये जा रहे हैं। यहाँ के गरीब किसान उजड़कर मजदूर बन चुके हैं। इलाके के कुछ मजदूर सीधे फैक्ट्री में काम पा जाते हैं जबकि कुछ मजदूरों को दिहाड़ी के लिए भटकना भी पड़ता है। इलाके की ज्यादातर महिलाएँ घर पर पीस रेट पर काम करती हैं। सबसे खराब हालत दिहाड़ी और पीस रेट पर काम करने वाले मजदूरों की है।

शुरू में हम एक ऐसी महिला के पास गये जो फैक्ट्री में काम करती है। उससे बात करके हम फैक्ट्री मजदूरों की हालत को जान पाये।

फैक्ट्री में काम करने वाली उस महिला की उम्र 30 साल है। उसने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की है। काम के बारे में पूछने पर उसने बताया कि मैं फैक्ट्री में माल की गिनती करने, वजन मापने और पैक हुए चम्मच को भरने का काम करती हूँ। मुझे सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक काम करने के 8500 रुपये मिलते हैं। पूरे 30 दिन काम करना पड़ता है। कोई छुट्टी नहीं है। आगे बातचीत में उसने बताया कि खाना खाने के लिए आधा घंटा समय मिलता है। सभी महिलाओं में उसकी तनख्वाह सबसे ज्यादा है क्योंकि वह हिसाब रखने का काम भी करती है। जिस दिन छुट्टी करती है उस दिन का पैसा काट लिया जाता है। फैक्ट्री में लगभग 50 मजदूर काम करते हैं सबके काम अलग–अलग तरह के हैं। फैक्ट्री में सिर्फ पाँच महिला मजदूर हैं।

पॉपलर के बड़े–बड़े पेड़ों को काटकर फैक्ट्री में लाया जाता है। फिर उन्हें एक माप पर काटकर मशीन द्वारा लकड़ी की बारीक परतें बनायी जाती हैं। इन्हें फर्मे वाली मशीन से काटकर चम्मच निकाले जाते हैं। फिर चम्मचों को बाहर खुले मैदान में सूखने के लिए डाल दिया जाता है। एक महिला लगातार उन्हें पैरों से पलटती रहती है। इससे उसके पैर खराब हो जाते हैं। सूखने के बाद चम्मचों को पैक करने के लिए गाँव में भेज दिया जाता है। वहाँ से पैक होकर वे वापस फैक्ट्री में आती हैं। इसके बाद माल को बड़े–बड़े बोरों में भरकर ट्रकों में लादकर दूसरे प्रदेशों में ले जाया जाता है। उसने कहा कि मुझे सही नहीं पता कि माल कहाँ–कहाँ जाता है, लेकिन एक गाड़ी 10–10 टन माल भरकर ले जाती है।

फैक्ट्री में कभी किसी को चोट लगी? यह पूछने पर उसने बताया कि हाँ, एक बार मशीन चलाते वक्त एक लड़के का अँगूठा कट गया था। मालिक ने उसे इलाज के लिए दस हजार रुपये दिये थे। फिर उसको बिना वेतन की छुट्टी पर भेज दिया।

फैक्ट्री में कई बार महीने भर काम मिल जाता है, लेकिन जब बारिश का मौसम चलता है या सर्दी ज्यादा हो जाती है जिसके चलते चम्मच सूख नहीं पाती तो काम बन्द कर दिया जाता है और मजदूरों को वापस भेज दिया जाता है। आजकल बारिश की वजह से काम बन्द है। इसका कोई पैसा नहीं मिलेगा। ऐसे में कई मजदूर यह काम छोड़कर दूसरा काम कर लेते हैं।

इसी दौरान हम एक ऐसी महिला से मिलने उसके घर गये जो पीस रेट पर चम्मच पैक करने का काम करती है। इस इलाके में पीस रेट पर काम करने वाली महिलाओं की संख्या की सही जानकारी हम नहीं जुटा पाये।

महिलाओं के साथ छोटे–छोटे बच्चे घर के बाहर बैठकर चम्मच पैक करते हैं। इनके मकान इतने जर्जर और छोटे हैं कि वे बाहर खुले में काम करने को मजबूर होते हैं। इनके इलाके के बीच से शामली शहर का गन्दा नाला गुजरता है। यह नाला किसी नहर जितना बड़ा है। गन्दगी के कारण इसका पानी बिल्कुल काला हो गया है। पूरे इलाके में इससे बदबू फैलती रहती है। बदबू बर्दाश्त से बाहर है। हमें यहाँ से नाक पर कपड़ा रखकर गुजरना पड़ा। नाले को पार करने के बाद हम चम्मच पैक करने वाली महिला के पास पहुँचे जिसकी उम्र 50 साल से ज्यादा है। यह महिला चम्मच पैक करने का काम 17 सालों से कर रही है।

हमने उससे पूछा कि एक दिन में कितनी मजदूरी बन जाती है?

उसने जवाब दिया कि यही 30–40 रुपये। यह सुनते ही हमें गहरा धक्का सा लगा। उसने आगे कहा कि कभी–कभी तो इतनी भी नहीं बनती। जब मौसम खराब हो जाता है तो माल ही नहीं आता। बस बेटा, हम तो समय काट रहे हैं कोई काम नहीं है तो इन चमचों को पैक कर लेते हैं।

पूरे दिन काम करने के बाद भी आप लोगों को इतनी कम मजदूरी क्यों मिलती है?

महिला ने काम के बारे में बताना शुरू किया। एक पैकेट बनाने का 1 रुपये 10 पैसे मिलते हैं। एक गड्डी को पैक करने के लिए 21 चम्मच को तह करके उस पर रबर चढ़ायी जाती हैं। ऐसी ही 10 गड्डियों को एक पन्नी में डालकर पैक करने पर एक पैकेट बनता है। इसका मतलब एक पैकेट में लगभग 210 चम्मच पैक करने के बाद 1 रुपया 10 पैसे बनते हैं। महिला ने हमें इशारा करके चम्मच का बोरा दिखाया और बताया कि इस बोरे को पैक करने में लगभग 5 दिन लग जाते हैं और इस बोरे में लगभग 200 पैकेट आ पाते हैं। इस बोरे को 3 दिन हो गये, अब तक आधा भी पैक नहीं हुआ। महिला ने आगे बताया कि अगर हम सुबह से लेकर शाम तक काम करते हैं तो मुश्किल से 40 पैकेट बन पाते हैं यानी 40 रुपये। इसमें भी अपने पति और बच्चों की मदद लेनी पड़ती है। उसने बताया कि महँगाई के इस जमाने में पूरा परिवार पालना मुश्किल हो गया है। सुबह से शाम तक मेहनत करने के बाद भी दो वक्त की रोटी तो दूर, चाय का खर्च भी ठीक से नहीं निकलता।

महिला का पति भी उन्हीं के पास बैठे हाँ में हाँ मिला रहा था। उसकी उम्र 60 साल के करीब थी। महिला अपने घर के सामने बैठकर चम्मच पैक कर रही थी, उसका घर सिर्फ दो कमरों का था और उस पर भी प्लास्टर नहीं हुआ था। कमरों के सामने छप्पर डाल रखा था। उसी छप्पर के नीचे खाना बनाने के लिए चूल्हा और लेटने के लिए एक चारपाई के अलावा कपड़े व अन्य सामान रखे हुए थे। आपको लग रहा होगा कि एक मजदूर परिवार के लिए इतनी जगह तो पर्याप्त है, हमें भी ऐसा ही लगा था, तो रुकिए और आगे सुनिए।

जब बात आगे बढ़ी तो झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आयी। उन्होंने बताया कि इसी दो कमरे के मकान में हम 16 लोग रहते हैं जिसमें मेरे 5 लड़के, एक लड़की और दो लड़कों की शादी हो चुकी है जिनके तीन–तीन बच्चे हैं। आधे परिवार को छप्पर के नीचे ही सोना पड़ता है।

हमने जब परिवार की शिक्षा के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि छोटे लड़के को छोड़कर हमारे घर में कोई पढ़ा–लिखा नहीं है। जब हमने यह पूछा कि घर में कोई गम्भीर बीमारी से पीड़ित तो नहीं है? इस पर झट से आदमी ने कुर्ता उठाकर दिखाया कि यह देखो भाई, पेट में कई साल से गाँठ है। डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए बोला था और कहा था कि 40 हजार रुपये का खर्च आएगा। पैसों की तंगी की वजह से ही ऑपरेशन भी नहीं हो पाया।

क्या आपका आयुष्मान कार्ड बना हुआ है? नहीं भाई, हमारा कोई आयुष्मान कार्ड नहीं है। पास ही बैठी उनकी लड़की रोटी बना रही थी। उसने बताया कि भाई, मेरा तो आधार कार्ड भी नहीं बना हुआ है, फिर दूसरी औरत ने बताया कि मेरे बच्चों का भी आधार कार्ड नहीं बना हुआ है।

आधार कार्ड न बनने की समस्या कुछ दिन पहले हमने एक परिवार में देखी थी। उस परिवार में एक औरत और उसके 4 बच्चे हैं। चारों बच्चों का आधार कार्ड नहीं बन पाया। इससे उन बच्चों का स्कूल में नाम भी नहीं लिखा गया। हमने उनका आधार कार्ड बनवाने की कोशिश की। हमें पता चला कि आधार कार्ड बनवाने के लिए आशा वर्कर के पास से जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के बाद वीडिओ से लेटर लिखवाकर, उसके मोहर लगवाकर और एसडीएम के साइन करवाने के बाद आधार कार्ड बन सकता है। सभी जगह पैसे खिलाने पड़ते हैं। मजदूर खुद पैसों का मारा, वह इन जोंकों का पेट कैसे भरे? ऐसी ही वजहों से इनका और इनके बच्चों का भी आधार कार्ड नहीं बन पाया।

जब हमने उनसे पूछा कि आप पर कोई कर्ज है? उन्होंने बताया कि भाई, गरीब आदमी का कर्ज ही तो सहारा है। कर्ज बगैर तो गरीब आदमी का कुछ भी काम नहीं होता। बच्चों की शादी की तो कर्ज लेना पड़ा था। अब एक साल पहले मकान बना था तब भी कर्ज लेना पड़ा, उसी कर्ज को अब तक नहीं चुका पाये। गाँव में तो 5 और 10 रुपये सैकड़ा (यानी सौ रुपये पर सालाना ब्याज 60 से 120 रुपये है।) के हिसाब से कर्ज मिलता है। इसी वजह से समूह वाले 5 लोन ले रखे हैं जो तीस–तीस हजार रुपये के हैं जिनको अब तक नहीं चुका पाये।

उसने बताया कि कई बार कर्ज की वजह से हम इतने परेशान हो जाते हैं कि रात को ठीक से सो भी नहीं पाते। जाने कैसे कर्ज चुकता होगा और हम ठीक से जिन्दगी गुजार सकेंगे।

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