लोकसभा चुनाव और मजदूर वर्ग

07 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

अठारवीं लोकसभा का चुनाव पूरा हो गया है। भाजपा के नेतृत्व में राजद की नयी गठबन्धन सरकार बन गयी। वह कितने दिन चलेगी, कहा नहीं जा सकता। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान ही यह साफ हो चुका था कि सरकार किसी भी पार्टी की बने, वह मजदूर वर्ग का कोई भला नहीं करेगी।

दो महीना चले चुनावी दौर में मजदूरों ने सभी पार्टियों के लिए हजारों पंडाल और मंच सजाये रैलियों और सभाओं का इन्तजाम किया लेकिन किसी भी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में या उनके स्टार प्रचारक नेताओं ने अपने भाषणों में मजदूर वर्ग के हित में कोई ठोस कदम उठाने का वादा नहीं किया। यहाँ तक कि किसी ने संसद में मंजूर हो चुकी न्यूनतम मजदूरी भी मजदूरों को दिलवाने का वादा नहीं किया।

चुनावी माहौल से लगा ही नहीं कि इस देश में मजदूर भी रहते हैं। किसी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मजदूरों के लिए नारे नहीं लगाये। पार्टियों को अलग–अलग जातियों और धर्मों के वोटों की चिन्ता तो सताती रही लेकिन देश की आबादी का एक तिहाई हिस्सा होने के बावजूद किसी ने मजदूर वर्ग की बहलाने–फुसलाने की भी जरूरत नहीं समझी।

भारत के मजदूर वर्ग का आकार दुनिया में चीन के बाद सबसे बड़ा है। देश की हर चीज का निर्माण इन्हीं के हाथों से होता है। सरकार के ई–पोर्टल पर ही असंगठित क्षेत्र के 30 करोड़ मजदूर दर्ज हैं। लगभग इन सभी की आय मात्र 10 हजार रुपये मासिक या उससे भी कम है। किसानों की तरह इनकी आत्महत्या की दर भी बेहद खतरनाक स्तर पर पहुँच चुकी है।

सारी चुनावबाज पार्टियों ने मान लिया है कि मजदूरों को पाँच किलो अनाज की भीख से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। चुनाव में करोड़ों मजदूरों से ज्यादा चर्चा उन 5–7 पूँजीपतियों की हुई जिन्होंने चुनावी बॉन्ड के जरिये भाजपा को मोटा चन्दा दिया।

भारत को किसानों–मजदूरों का देश कहा जाता है। पिछले सालों में कई जुझारू आन्दोलन चलाकर और सैंकड़ों किसानों की कुर्बानियों के बाद आखिरकार किसान इस चुनाव में चर्चा में रहे। लेकिन इनमें भी खेतिहर मजदूरों की समस्याओं की चर्चा गायब रही जो कुल मजदूरों का 41 फीसदी हैं, और वे भी दिल्ली के बार्डरों पर तीन काले कानूनों के खिलाफ चले ऐतिहासिक आन्दोलन में जी–जान से लड़े थे।

चुनाव शुरू होने से ठीक पहले फरवरी में देश के करोड़ों औद्योगिक और खेतिहर मजदूरों ने किसानों के साथ मिलकर एक दिन की आम हड़ताल की थी। उससे ठीक पहले सेवा क्षेत्र के ड्राइवर मजदूरों ने नये परिवहन कानून के खिलाफ ऐतिहासिक हड़ताल करके जीत हासिल की थी। मोदी सरकार को मजबूरी में इस कानून पर रोक लगानी पड़ी थी। श्रम कानूनों को खत्म करके भाजपा सरकार उनकी जगह मजदूर विरोधी चार श्रम संहिताएँ लेकर आयी तो मजदूरों ने उसका विरोध किया और आज तक केन्द्र सरकार उन्हें लागू करने की हिम्मत नहीं कर पायी है, हालाँकि सरकार का समर्थन पाकर पूँजीपतियों ने मजदूरों को बेलगाम लूटना–खसोटना शुरू कर दिया है। वे  मजदूरों से 12–12 घण्टे काम कराकर नाममात्र की मजदूरी दे रहे हैं।

जब मोदी सरकार ने चार श्रम संहिताएँ संसद में पास करवायी तो भाजपा सरकार ने अपने इस कदम की तरफदारी करते हुए इन संहिताओं को जरूरी आर्थिक सुधार बताया था, जबकि उसका विरोध करते हुए  कांग्रेस ने इन्हें मजदूरों के सर पर लटकी तलवार बताया था लेकिन चुनाव के समय किसी पार्टी ने यह नहीं बताया कि सत्ता पाने की मुराद पूरी होने के बाद वे इन संहिताओं को लागू करेंगी या मजदूरों के हक में इन्हें रद्द कर देंगी। यहाँ तक कि इस बाबत किसी नामचीन पत्रकार ने किसी कद्दावर नेता से कोई सवाल भी नहीं पूछा।

लोकसभा चुनाव की शुरुआत से ठीक पहले मार्च के महीने में अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट आयी थी, जिसमें भारत के मजदूरों की भयावह हालत के बारे में बताया गया था। इस रिपोर्ट में तथ्यों के साथ बताया गया था कि भारत में मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा लगभग खत्म हो चुकी है। ठेकेदारी प्रथा बेतहाशा बढ़ गयी है जिससे मजदूरों का शोषण–उत्पीड़न बढ़ गया है। महँगाई की तेज बढ़ोतरी के दौर में भी मजदूरों की दिहाड़ी में गिरावट आयी है। और भारत के अधिकतर मजदूर अर्ध–भुखमरी की हालत में जीवन जी रहे हैं। लेकिन किसी भी पार्टी ने इसे चुनाव में मुद्दा नहीं बनाया।

कोरोना जैसी किसी ऐतिहासिक त्रासदी को मात्र 4 साल में नहीं भुलाया जा सकता। साल 2020 में कोरोना के नाम पर लगाये गये लॉकड़ाऊन से 10 करोड़ प्रवासी मजदूर दर–बदर हुए थे। लाखों को जान से हाथ धोना पड़ा। उस समय मोदी सरकार द्वारा मजदूरों पर ढाये गये जुल्म की तस्वीरें पीढ़ियों तक भुलायी नहीं जा सकतीं। ताज्जुब है कि भारत के राजनेता उसे इतनी जल्दी भूल गये कि दो महीना चले चुनाव प्रचार में किसी ने उस महाविपदा पर कोई गम्भीर चर्चा नहीं की। 

देश में प्रवासी मजदूरों की संख्या 13 करोड़ के आस–पास होने का अनुमान लगाया जाता है। इनमें से अधिकतर अपने मूलनिवास से सैंकड़ों किलोमीटर दूर रहकर अपना काम करते हैं और 500 से 800 रुपये  दिहाड़ी कमाते हैं। जाहिर है कि हजारों रुपये खर्च करके इनमें से शायद ही कोई वोट डालने अपने मूलनिवास जाता हो। जो चुनाव आयोग ‘एक–एक वोट कीमती है’ का प्रचार करने पर अरबों रुपये फूँकता है उसे करोड़ों प्रवासी मजदूरों के वोट की कोई चिन्ता नहीं है।

इन्हीं चुनावों में ऐसे और दर्जनों उदाहरण मिल जाएँगे जिनसे साबित होता है कि चुनावबाज पार्टियों में कोई भी मजदूर वर्ग की पार्टी नहीं है और इनका बनाया लोकतंत्र मजदूर वर्ग के हित में काम नहीं कर सकता। ये पार्टियाँ और इनका लोकतंत्र केवल मजदूर वर्ग के दुश्मन वर्ग–– पूँजीपति वर्ग के लिए काम करते हैं। 

बेशक इस चुनाव में कुछ पार्टियों ने किसानों के हितों की थोड़ी–बहुत चर्चा की है लेकिन इसका कारण यह नहीं है कि ये पार्टियाँ किसानों की हितैषी हैं, उन्होंने यह किसानों के देशव्यापी आन्दोलन के दबाव के चलते किया है। मजदूरों की सबसे बड़ी यूनियनें ऐसा करने में नाकाम रही हैं। देश में उनकी पाँच सबसे बड़ी यूनियनें केवल संगठित क्षेत्र के मजदूरों में काम करती हैं, जो कुल मजदूरों का 10 फीसदी भी नहीं हैं। वे मजदूरों की समझदारी बढ़ाने की कभी कोई कोशिश नहीं करतीं, कभी जुझारू आन्दोलन नहीं चलातीं, मजदूरों को केवल आना–पाई की लड़ाइयों में ही उलझाए रखती हैं। निश्चय ही आज मजदूर वर्ग बेहद राजनीतिक पिछड़ेपन का शिकार है।

आज मजदूर वर्ग अपने संघर्षमय इतिहास और युगपरिवर्तनकारी ताकत को भूल चुका है। इतिहास गवाह है कि भारत की आजादी के संघर्ष में मजदूर वर्ग सबसे अगली कतार में लड़ा था। आजादी के बाद इस देश के निर्माण में सबसे ज्यादा भूमिका मजदूर वर्ग ने ही निभायी। 1960 के दशक में रोटी और लोकतंत्र के लिए आन्दोलन मजदूर वर्ग ने ही खड़ा किया था। 1974 की रेलवे मजदूरों की हड़ताल आपातकाल की तानाशाही के खिलाफ ध्वजवाहक बनी थी। इन सबके बावजूद उसे आज हासिये पर धकेल दिया गया है क्योंकि आज उसकी एकता और संघर्ष कमजोर पड़ गये हैं।

मजदूर वर्ग सभी मेहनतकश वर्गों का अगुआ है, बेशक आज भी वह सबसे ज्यादा संघर्ष करता है लेकिन उसकी समझदारी बहुत कमजोर है। वह जाति, धर्म, इलाके और पेशे में बँटा हुआ है। उसकी एकता कमजोर है। इसके साथ ही उसकी अपनी कोई ऐसी पार्टी नहीं है, जो देशभर के मजदूरों को एकता के धागे में पिरो सके। लेकिन निराशा के इसी घटाटोप में आशा के सितारों की तरह मजदूर वर्ग के सच्चे संगठन भी निर्मित हो रहे हैं। वे मजदूर वर्ग को जगाने में लगे हुए हैं। निश्चय ही देर–सबेर वे मजदूरों को उनकी ऐतिहासिक जगह–– एक समतामूलक समाज के निर्माण का अगुआ की जगह दिलाने में कामयाब होंगे। एक न एक दिन भारत का मजदूर वर्ग उठ खड़ा होगा और संघर्ष के जरिये अपना हक हासिल करके दम लेगा।

← अंक में अन्य लेख देखें

पत्रिका प्राप्त करें

नवीनतम अंक और लेख सीधे अपने ईमेल में प्राप्त करें