महिला मजदूरों का संघर्ष

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

पिछले साल लॉक डाउन के दौरान एक महिला मजदूर जो अपने गाँव वापस लौटने को अकेले ही निकल पड़ी, 300 किमी चलने के बाद उसकी हालत गम्भीर हो गयी और उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

उसी दौरान अपने घर बिहार वापस जाते समय एक प्रवासी महिला मजदूर ने बस में ही दो बच्चियों को जन्म दिया और उनके पैदा होने के महज एक घण्टे बाद ही दोनों बच्चियों की मृत्यु हो गयी। हापुड़ में र्इंटभट्टे पर काम करनेवाले इस मजदूर दम्पत्ति ने सरकार को उन्हें घर भिजवाने के लिए अर्जी भी दी थी, लेकिन वहाँ से कोई जवाब न आने पर उन्होंने 42 अन्य लोगों के साथ मिलकर किराये पर बस लेकर घर जाने का फैसला किया। उस समय वह महिला छ: महीने की गर्भवती थी। और भी न जाने कितनी मजदूर महिलाओं की रास्ते मे ही डिलीवरी हुई और उसके एक–डेढ़ घण्टे बाद ही उन्होंने फिर से चलना शुरू कर दिया।

हाल ही में अप्रैल में मुरादाबाद की पटाखा फैक्ट्री में आग लगने से पुरुष मजदूरों के साथ–साथ कुछ महिला मजदूरों के शरीर का अधिकतर हिस्सा आग में झुलस गया। मध्यप्रदेश के हरदा में तो 85 वर्ष की एक बुजुर्ग मजदूर महिला की पटाखा फैक्ट्री में आग लगने से झुलसकर मौत तक हो गयी।

ये सब घटनाएँ बहुत दूर दराज की नहीं हैं, बल्कि हमारे आस–पास की उन मजदूर महिलाओं की हैं जो उतनी ही हाड़तोड़ मेहनत करती हैं जितना कि कोई मजदूर पुरुष। लेकिन उसके बाद भी महिला होने के कारण उनको अपने पुरुष साथी की अपेक्षा अधिक तकलीफ सहना पड़ता है, घर और बच्चों की जिम्मेदारी निभाने के साथ–साथ पति का गुस्सा और पिटाई भी सहन करनी पड़ती है। लेकिन फिर भी एक मजदूर औरत को मजदूर के रूप में कोई पहचान नहीं मिलती, उसको मजदूर माना भी नहीं जाता।

यदि हम अपने आस–पास नजर डालें तो तमाम निर्माण की जगहों, कारखानों, रेहड़ी पटरी, घरों में सफाईकर्मी आदि जगहों पर महिला मजदूरों की संख्या बहुत अधिक होती है क्योंकि वे बहुत कम मजदूरी पर ही काम करने को तैयार हो जाती हैं। पुरुषों के बराबर काम करने के बावजूद भी उन्हें उनके बराबर तनख्वाह नहीं मिलती। कारखानों में उनसे ओवरटाइम लिया जाता है। कार्य स्थल पर उनको किसी भी तरह की कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती, बल्कि कई बार उन्हें छेड़खानी और यौन–उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है और इसके लिए सरकार की तरफ से भी कोई कानूनी सहायता नहीं मिलती। काम की जगह पर ही उन्हें बच्चों को सम्भालना पड़ता है, उनको दूध पिलाना, सुलाना पड़ता है, इन सब के लिए कोई सुविधा नहीं होती। यहाँ तक कि उनके लिए कार्यस्थल पर शौचालय तक की सुविधा नहीं होती और वे खुले में ही शौच जाने को मजबूर होती हैं जिससे बहुत सी बीमारियों से भी ग्रसित हो जाती हैं।

जो महिलाएँ बाहर काम करने नहीं जा पातीं, वे घर पर ही बैडमिण्टन बनाना, मोमबत्ती बनाना, लिफाफे तैयार करना आदि काम बहुत ही कम मजदूरी पर पीस रेट पर करती हैं। कुछ महिलाएँ नौकरी से घर आकर भी इस तरह के काम अलग से कर लेती हैं ताकि इस बढ़ती महँगाई में थोड़ा और पैसा कमा सके, बल्कि ज्यादातर महिलाएँ तो ऐसे असंगठित क्षेत्रों में ही काम करती हैं जहाँ उनकी हालत बदतर है। एक सर्वे के अनुसार भारत मे 97 प्रतिशत महिला मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं।

महिला किसानों की हालत भी महिला मजदूरों से कम नहीं। देश की 79 फीसदी महिलाएँ कृषि क्षेत्रों में काम करती हैं, उसके बाद भी उन्हें किसान नहीं कहा जाता। पूरे–पूरे साल, दिन–रात जिन खेतों में वे काम करती हैं, जब उस फसल को बेचने का समय आता है तो उनसे कोई सलाह–मशविरा तक नहीं लिया जाता और न ही उससे मिले पैसों पर ही उनका कोई अधिकार होता है। इससे अलग कुछ महिलाएँ खेतों में खेतिहर मजदूर का काम करती हैं, खेतों में निराई–गुड़ाई, बीज बोने तक का सारा काम करती हैं, वह भी बहुत कम मजदूरी पर।

किसी महिला का पति शराब पीता है, पीकर उसको पीटता है, कुछ काम नहीं करता। किसी के पति ने उसको छोड़ दिया है, किसी के पति काम भी करते हैं तो महीनों–महीनों तक तनख्वाह नहीं आती। ऐसे में घर चलाने, बच्चों का पेट पालने, उन्हें पढ़ाने की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं पर ही आ जाती है। किसी हारी–बीमारी के समय भी उन्हें कोई आराम नहीं है, छुट्टी करने पर मालिक लोग तनख्वाह काटते हैं।

आँगनबाड़ी महिला कामगार और आशा वर्करों की तो और भी बुरी स्थिति है। वे गाँव और शहरी इलाकों में मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर काम करती हैं। उनको सरकार की तरफ से इसका कोई वेतन तक नहीं मिलता, बस महीने के 500 या 1000 रुपये मानदेय के रूप में मिलते हैं।

मेहनतकश महिलाएँ और मजदूर महिलाएँ खराब परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं, अपनी जिन्दगियाँ चलाने के लिए हर रोज संघर्ष करती हैं। ऐसे में अपनी स्थिति को बेहतर करने के लिए उनके पास एकजुट होकर लड़ने के अलावा अब कोई रास्ता नहीं बचता है। हमंे यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि इतिहास में भी मजदूर महिलाओं ने अपने हकों की लड़ाई खुद लड़ी और अपने अधिकार हासिल करने में कामयाब रहीं।

पूरी दुनिया मे 8 मार्च को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। तकरीबन 100 साल पहले मजदूर महिलाओं ने कई बड़े आन्दोलन किये थे। उन्होंने अपने काम के घण्टे कम कराने, वोट देने का अधिकार पाने और बराबर वेतन पाने को लेकर लड़ाई लड़ी थी। उस समय उन्हें 16–16 घण्टे काम करना पड़ता था, काम के साथ–साथ घर और बच्चों की जिम्मेदारी के दोहरे बोझ की शिकार थीं। जब ढेर सारी महिलाओं का हुजूम सड़क पर उतरा तो उनको अपनी ताकत का अहसास हुआ। हजारों–हजार औरतों ने सड़क पर नारेबाजी की, अपने अधिकारों के लिए कई औरतें जेल भी गयीं। उनका यह संघर्ष बेकार नहीं गया, उनको अपने अधिकार मिल गये।

आज भारत की मजदूर महिलाओं को अपने हक के लिए आवाज उठाना जरूरी हो गया है, क्योंकि सामूहिक संघर्ष से ही कोई हल खोजा जा सकता है। किसान आन्दोलन इसका सबसे शानदार उदाहरण है जिसमें महिलाओं ने बढ़–चढ़कर हिस्सा लिया। इससे पहले भी कई बार जब–जब महिलाओं के लिए स्थिति असहनीय हुई, उन्होंने आगे आकर लड़ाइयाँ लड़ी हैं, आन्दोलन किये हैं, हड़तालें की हैं।

अभी पिछले दिनों मध्य प्रदेश के भोपाल में 20 हजार से अधिक मजदूरों ने न्यूनतम वेतन 15 हजार करने के लिए अपनी आवाज उठायी। इस धरना प्रदर्शन में बड़ी संख्या में महिला कर्मचारी भी शामिल थीं। आँगनबाड़ी महिलाएँ गुलाबी साड़ी पहनकर और आशा कार्यकर्ता नीली साड़ी पहनकर विरोध प्रदर्शन करने वहाँ आयीं और जमकर नारेबाजी करती हुई अपना विरोध जताया।

गाँव की खेतिहर महिला मजदूर भी मजदूरी बढ़ाने की माँग को लेकर अलग–अलग जगह हड़तालें करती रहती हैं। उनको रोज तकरीबन 8 से 9 घण्टे काम करने के बावजूद महज 100 रुपये की मजदूरी मिलती है जो कि न्यूनतम से भी बहुत कम है। अपनी मजदूरी बढ़ाने की माँगों के साथ कई बार इस तरह के विरोध–प्रदर्शन की खबरें सामने आयी हैं।

तकरीबन 3 साल पहले झारखण्ड की एक पंचायत के आठ गाँवों की बीड़ी पत्ता तोड़ने वाली महिलाओं ने अपनी न्यूनतम मजदूरी की माँग पर हड़ताल की। उन्होंने बताया कि 100 बण्डल बीड़ी पत्ता तोड़ने पर 58 से 100 रुपये दैनिक मजदूरी दी जाती है जो बहुत ही कम है, 100 से ऊपर उपस्थित महिलाओं ने अपनी इस माँग के लिए हड़ताल की। सरकार का रवैया बहुत खराब होता है, वह मजदूरों की माँग का समर्थन नहीं करती। उनके लिए बने श्रम कानूनों को खत्म करती जा रही है। इससे मालिक मजदूरों का ज्यादा से ज्यादा शोषण कर रहे हैं। सरकार के नये कानूनों के अनुसार मजदूरों को अपनी माँगों के लिए हड़ताल करने के लिए 14 दिन पहले कम्पनी के मालिक से इजाजत लेनी होगी और हर हाल में 60 दिनों के अन्दर हड़ताल बन्द करना भी अनिवार्य होगा।

अपने इन हकों को वापस पाने के लिए सारे मजदूरों को एक होना होगा। मजदूरों की लड़ाई महिला मजदूरों को साथ लिए बगैर सफल नहीं हो सकती। इसके लिए जरूरी है कि महिला मजदूर भी संगठन का हिस्सा बनंे, अपने अधिकारों के प्रति सचेत हों और मिल जुलकर अपने अधिकारों के लिए लड़े, क्योंकि अकेले–अकेले कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।

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