महिला मजदूरों की हालत और संघर्ष

07 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

पिछले तीस साल के दौरान महिला मजदूर नयी गुलामी की चक्की में पिसती रहीं। उनकी हालत लगातार खराब होती गयी है। उनका शोषण–उत्पीड़न भी लगातार बढ़ता गया है। जहाँ पहले महिलाओं को सम्पत्ति के अधिकार से, उत्पादन के साधनों और सभी सुख सुविधाओं से अलग कर दिया गया था वहीं 1990 के दशक के बाद हालात और भी बिगड़े हैं। लेकिन टीवी और अखबार दिखाते हैं कि महिलाएँ पहले से ज्यादा आजाद हैं, अपने पैरो पर खड़ी हैं और तरक्की कर रही हैं। तरक्की करने वाली महिलाओं में प्रियंका गाँधी, निर्मला सीतारामण, टीवी चैनल की रिपोर्टर श्वेता सिंह और अंजना ओम कश्यप, फिल्मों की हिरोइनें और कुछ मुट्ठी भर महिलाएँ आती हैं। ऐसी महिलाओं की संख्या काफी कम है। इनको छोड़ दिया जाये तो करोड़ों महिलाओं की हालत खराब है। मेहनतकश वर्ग का आधा हिस्सा होने के बाद भी महिलाएँ पीड़ित हैं। हम जानते हैं कि मजदूर पुरुष का शोषण उनके मालिक करते हैं और पुरुष उनकी गुलामी झेल रहे हैं, लेकिन महिलाएँ गुलाम की भी गुलाम हैं। उनका शोषण और उत्पीड़न सबसे ज्यादा है।

कोठियों में काम करने वाली महिलाएँ

जो महिलाएँ घरों और कोठियों में साफ–सफाई और खाना पकाने का काम करती हैं, वहाँ वे सुबह से शाम तक 12–14 घंटे काम करती हैं। वहाँ उन्हें 6 हजार से 8 हजार रुपये महीने के मिलते हैं। कई महिलाएँ 4–5 घरों में काम करके भी 6 हजार रुपये तक ही कमा पाती हैं। सोचने वाली बात है कि इतनी महँगाई में दिन भर काम करके वे जितना कमाती हैं, उससे महीने भर का घर खर्च कैसे चलाया जा सकता है? इतने कम पैसे में बच्चों की पढ़ाई, घर का राशन, बिजली, पानी और दवाएँ कैसे आ सकती हैं? फिर मजदूर महिलाएँ इतने कम पैसे में घर खर्च चलाने की कोशिश करती हैं और अपने लिए कुछ भी खर्च नहीं करतीं, बल्कि अपनी बीमारी का भी ठीक से इलाज नहीं कराती हैं। महिलाओं को कोठियों में साफ–सफाई करते समय और भी दिक्कतें झेलनी पड़ती है। मालिक का बाथरूम इस्तेमाल करने पर भी रोक होती है। सोचिये, ऐसे में बाथरूम जाये बिना, टायलेट–पेशाब रोककर दिन भर काम करते रहना कितना कठिन है। ज्यादातर घरों में चाय–नाश्ता नहीं मिलता, जहाँ मिलता भी है तो अलग बर्तन में। कितना खराब भेदभाव है यह। त्यौहारों पर छुट्टी नहीं मिलती हैं, उल्टा काम और बढ़ जाता है। दोहरे काम और दोहरी मेहनत के बावजूद काम का वाजिब दाम नहीं मिलता।

फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाएँ

फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाओं की हालत भी घरेलू महिला मजदूरों से कम खराब नहीं हैं। फैक्ट्रियों में महिलाएँ बड़ी संख्या में काम करती हैं क्योंकि वे आदमियों से कम पैसों में भी काम करने को तैयार हो जाती हैं। कई बार मालिक इनसे तय काम के अलावा कई और काम करवा लेते हैं। मेरठ की फैक्ट्री में पैकिंग का काम करने वाली एक महिला को महीने के 7000 रुपये मिलते हैं। आठ घण्टे पैकिंग के काम के साथ उससे साफ–सफाई और चाय बनाने का काम भी कराया जाता है। मालिक इसके अलग से पैसे नहीं देता। फैक्ट्रियों में महिलाओं के लिए शौचालय का अलग से इन्तजाम नहीं होता। मालिक, सुपरवाईजर या मैनेजर के द्वारा उनके साथ छेड़छाड़ और अभद्र व्यवहार किया जाता है। अगर महिला अपने शोषण–उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाये तो उसे काम से निकालने की धमकी दी जाती है और कई बार काम से निकल भी दिया जाता है।

चेन्नई के पास श्रीपेरम्बदूर में एप्पल कम्पनी के सबसे महँगे मोबाइल आईफोन के पुर्जे को जोड़ने का काम होता है जिसे ताइवान की फॉक्सकॉन कम्पनी चलती है। इस कम्पनी में ज्यादातर कम उम्र की लड़कियाँ मजदूरी करती हैं जो मोबाइल के छोटे–छोटे हिस्सों को आपस में जोड़ने का काम करती हैं। कम्पनी का दावा है कि वह अपने कारीगरों को अच्छी तनख्वाह के साथ–साथ खाने और रहने की व्यवस्था भी देती है। यहाँ काम करने वाली महिलाएँ बताती हैं कि उनकी स्थिति काफी खराब है। खाने की क्वालिटी सही नहीं है और जिन हॉस्टल में वे रहती हैं, वहाँ कैदी से भी बुरी उनकी हालत होती है। हालत इतनी खराब है कि कोई मेडिकल इमरजेंसी होने पर भी इन महिलाओं को होस्टल से बाहर निकलने नहीं दिया जाता है।

ईंट–भट्ठे पर काम करने वाली महिलाएँ

जो महिलाएँ ईंट–भट्ठे पर काम करती हैं, उनके साथ परिवार के पुरुष और बच्चे भी भट्ठे पर काम करते हैं। यहाँ मजदूरी बेहद कम होती है। मजदूर लगभग गुलामों जैसे हालात में काम करते रहते हैं। वे झुग्गियों में रहते हैं और खुले में शौच करते हैं। महिलाओं के लिए यह स्थिति बहुत अपमानजनक होती है। मजदूर अपनी जरूरतों के लिए ठेकेदारों से कर्ज लेते हैं और जिन्दगी भर कर्ज के भँवर में फँसे रहते हैं। कुछ मजदूर अपने गाँव या आसपास के साहूकार से कर्ज लेते हैं और फिर उसे मजदूरी करके सालों–साल चुकाते रहते हैं। इनकी हालत बँधुआ गुलाम जैसी रहती है। भट्ठे गाँव या आबादी वाले क्षेत्र से इतनी दूर होते हैं कि कई बार इमरजेंसी की हालत में भी मजदूरों तक मदद नहीं पहुँच पाती। जब किसी गर्भवती महिला को भट्ठे पर काम करते समय प्रसव का दर्द होता है तो साधन के अभाव में अक्सर उसे अस्पताल ले जाने में देरी होती है। मालिक भी अपनी गाड़ी देने में आनाकानी करते हैं। मेरठ के एक ईंट–भट्ठे में काम करने वाली गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने में देरी हो गयी जिससे उस महिला और उसके बच्चे की वहीं मृत्यु हो गयी। आज मजदूर और गर्भवती महिलाएँ भी दिन–रात मेहनत करके मालिक के मुनाफे को लगातार बढ़ाते रहते हैं, फिर भी उनकी बुरी हालत देखकर मालिक अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं और उनकी किसी तरह की मदद नहीं करते।

महिला मजदूरों की स्वास्थ्य समस्याएँ और इलाज की सुविधाओं का अभाव

ज्यादातर मजदूरों की तबियत काफी खराब रहती है, उसमें भी विशेष रूप से महिला मजदूर की हालत हद से ज्यादा खराब रहती है। अक्सर ऐसा होता है कि महावारी के समय महिलाओं के पास सेनेटरी पैड खरीदने तक के पैसे नहीं होते और इन्हें कपड़े का इस्तेमाल करना पड़ता है। असुरक्षित कपड़े से कई बीमारियाँ हो जाती हैं जिन्हें महिलाएँ नजरन्दाज करती रहती हैं। वे अपनी बीमारी के बारे में अपने परिवार में किसी से कुछ नहीं बताती और न ही ठीक से इलाज करवा पाती हैं। महिलाएँ अपनी बीमारी को बताने में शर्म महसूस करती हैं और खुलकर बात नहीं कर पातीं। ऐसे में महिलाओं के लिए बोलने की आजादी और लोकतंत्र के क्या मायने रह गये हैं?

ऐसा देखा गया है कि गरीब मजदूर परिवार में जब शादी करके लड़की आती है तो उसे कई मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। कम उम्र में गर्भवती होने और कमजोर शरीर होने के चलते वे खून की कमी का शिकार हो जाती हैं जो उनकी जिन्दगी के लिए बहुत खतरनाक होता है। सस्ते झोला छाप डॉक्टर से दवाइयाँ लेने से कई बार जच्चा और बच्चा दोनों की हालत खराब हो जाती है क्योंकि महँगा और अच्छा इलाज वे करा नहीं सकतीं।

अगर डिलीवरी के समय बच्चा कमजोर हो और उसमें खून की कमी हो तो उसे बचा पाना बहुत मुश्किल होता है। मेरठ में ऐसी ही एक गर्भवती महिला काफी कमजोर हो गयी। जब डिलीवरी का समय आया, तब महिला की हालत काफी खराब हो गयी और उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। कुछ समय बाद डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। अस्पताल बदलने के लिए जाते समय महिला ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। यह दृश्य इतना दर्दनाक था कि सोच कर ही हर बार दिल काँप उठता है। मजदूर इलाकों में ऐसे हालात हर दूसरे तीसरे घर में देखने को मिलते हैं। फिर भी सरकार की तरफ से इन घटनाओं को रोकने के लिए किसी तरह की कोई मदद नहीं मुहैया करायी जाती।

मजदूरों के इलाके में अच्छी इलाज सुविधा वाले सरकारी अस्पताल नहीं होते हैं और न ही ऐसा कोई क्लीनिक ही होता है जहाँ मजदूर अच्छा इलाज करवा सकें। इलाज के नाम पर कुछ झोला–छाप डॉक्टर होते हैं जो मजदूरों का कम पैसों में इलाज कर देते हैं। सोचिए अगर वे भी न रहे तो मजदूर कहाँ जाये? लेकिन कई बार बीमारी बड़ी हो और स्थिति बिगड़ जाये तो केस उनके हाथ से निकल जाता है क्योंकि वे विशेषज्ञ नहीं होते। ऐसे में कई बार मरीज की जिन्दगी संकट में पड़ जाती है। एक बार एक महिला के इंजेक्शन की अदला–बदली हो गयी और उसे गलत इंजेक्शन लग गया, जिससे उसकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गयी, उसे बड़े अस्पताल में एडमिट करवाना पड़ा, तब कहीं उसकी जान बची, लेकिन महँगे इलाज से उसके परिवार पर कर्ज चढ़ गया।

मोदी सरकार के द्वारा लायी गयी चार श्रम संहिताओं ने मजदूरों पर बहुत बड़ा हमला किया है। इन संहिताओं के अनुसार, महिलाओं से रात की पाली में भी काम कराया जाएगा, यानी जिन्हें दिन के समय अक्सर छेड़छाड़ और अभद्र व्यवहार का सामना करना पड़ता है, उन्हें जब रात में भी काम कराया जाएगा तो वे कितनी असुरक्षित रहेंगी? 12 घंटे काम के कानून के चलते महिलाओं पर कामों का बोझ और बढ़ जाएगा जिसका सीधा असर उनकी सेहत पर पड़ेगा।

मजदूरों के इलाज के लिए मेडिकल कैंप का आयोजन

लॉकडाउन के बाद, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग–अलग इलाके की मजदूर बस्तियों में ‘मजदूर सहायता समिति’ ने मेडिकल कैंप लगाने का काम किया। यहाँ ज्यादातर घरों के बच्चों में खाँसी, बुखार और पोषण की कमी देखने को मिली। महिलाएँ घुटने और शरीर में दर्द, आँखों की रोशनी कम हो जाना जैसी दिक्कतों से जूझ रही हैं। कुपोषण के कारण ज्यादातर बच्चे अक्सर बीमार पड़े रहते हैं। मजदूर इलाकों में सफाई का कोई विशेष इन्तजाम नहीं होता। गन्दगी के चलते मच्छर पनपते हैं जो लोगों में मलेरिया डेंगू जैसी बीमारियाँ फैलाते हैं।

मेडिकल कैंप के दौरान डॉक्टरों ने बताया कि बच्चों और महिलाओं की दिक्कतों का सबसे मुख्य कारण खाने में सही पोषण की कमी है। वे बताते हैं कि एक स्वस्थ शरीर के लिए व्यक्ति के भोजन में दूध, दही, घी, फल, सब्जियाँ, रोटी, दाल और मेवे जैसे सामान सन्तुलित मात्रा में होने चाहिए। वहीं आज ज्यादातर मजदूर परिवार हाड़तोड़ मेहनत करके भी दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पा रहे हैं। वे इन पौष्टिक भोजन का इन्तजाम कैसे करें? इन घरों की महिलाएँ सबसे आखिरी में बचा हुआ खाना खा कर  अपना पेट भरती हैं। उन्हें पोषण कैसे मिल सकता है?

कमजोर शरीर के बाद भी मजदूर महिलाएँ घर और बाहर का काम करती हैं, जिसमें उन्हें ज्यादा ताकत की जरूरत होती है। ऐसे में इतना काम और असन्तुलित खाना खाकर उनका शरीर भला कैसे स्वस्थ रह सकता है? क्या उन्हें पोषण की जरूरत नहीं है? बड़े लाला और पूँजीपति चाहते ही नहीं हैं कि देश की महिला आबादी स्वस्थ रहे और मजदूर परिवार आगे बढ़ें। उन्हें इनके जीवन से कोई लेना–देना नहीं है। उन्हें बस मतलब है कि मजदूर मरते–जीते किसी तरह उनका काम करें और उनका मुनाफा बढ़ायें।

बदहाली से मुक्ति कैसे मिलेगी?

हमने अभी तक जितनी भी समस्याओं पर बात की है वे पूँजीवादी व्यवस्था की देन है। महिलाओं के जीवन में सदियों से चली आ रही सामन्ती गुलामी तो थी ही, कोढ़ में खाज यह कि इसमें पूँजी की गुलामी और जुड़ गयी। हमारी मेहनतकश महिलाओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जो असंगठित क्षेत्र में काम करता है जहाँ उन्हें ज्यादा उत्पादकता वाला कठिन और उबाऊ काम करना पड़ता है। जैसे–– सफाई का काम, गिल्ली बनाने का काम, बॉल बनाने का काम और भी बहुत सारे काम महिलाएँ करती हैं, लेकिन फिर भी इन्हें मजदूर तक नहीं माना जाता। यह सब हालात देखते हुए साफ जाहिर होता है कि हमें तब तक अपना हक नहीं मिल सकता, जब तक हम पूँजीवादी व्यवस्था के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष शुरू नहीं करतीं। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है, बल्कि इतिहास में महिलाओं ने आजादी के संघर्ष में अपना योगदान दिया है। कई बार उन्होंने आगे बढ़कर क्रान्ति का झंडा भी अपने हाथ में लिया है। रूस की क्रान्ति के समय भी महिलाओं ने पुरुषों के साथ मिलकर बराबर संघर्ष किया था और अपना खून भी बहाया था। इसके बाद मजदूरों ने जब रूस की सरकार बनायी तो उसमें भी महिलाओं ने बढ़–चढ़कर हिस्सेदारी की। अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस भी मेहनतकश महिलाओं की जीत का जश्न है जिसे हम हर साल 8 मार्च को मनाते हैं। इसके अलावा आज भी संघर्ष का सिलसिला थमा नहीं है, पूरे देश में छोटे बड़े स्तर पर लड़ाई जारी है और कई बार उन्हें सफलता भी मिली है।

पिछले कई सालों से मजदूर महिलाओं ने कई संघर्ष किये हैं और सड़कों पर उतर कर अपने हक के लिए आवाज उठायी है। इससे आशा की किरण पैदा होती है जो इन संघर्षों को और भी आगे लेकर जायेगी। हमें लगातर इन संघर्षों को बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए हमें यह अहसास कराना होगा कि मजदूरों की लड़ाई हो या समाज बदलने की लड़ाई इसमें महिलाओं का बहुत ही बड़ा योगदान होता है। मजदूर महिलाओं के संघर्ष के बिना पूँजीपति की लूट खत्म नहीं होगी और एक बेहतर समाज बनाने का सपना पूरा नहीं होगा।

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