मजदूर हकों पर हमला

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

आज मजदूरों के हकों पर चौतरफा हमला किया जा रहा है। सरकार ने चार श्रम संहिता पास करके मजदूरों पर हमला बोल दिया है। वह मजदूरों से सभी सरकारी संरक्षण छीन लेने पर आमादा है। न्यूनतम वेतन, यूनियन गठन, कार्यस्थल पर सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व लाभ, इलाज और रोजगार की गारण्टी खत्म की जा रही है। मालिक पूँजीपति बेखौफ होकर मजदूरों का निर्मम शोषण और उत्पीड़न कर रहे हैं। मजदूरों से 12 से 14 घण्टे काम कराया जा रहा है। उनकी मजदूरी गिरा दी गयी है। ग्रामीण मजदूरों और असंगठित क्षेत्र के बहुसंख्यक मजदूरों को श्रम कानून के दायरे से बाहर ही रखा गया है। मजदूरों के लम्बे संघर्ष के जरिये हासिल तमाम अधिकारों को लगातार छीना जा रहा है।

आशा वर्कर, आँगनवाड़ी, भोजन माता जैसे तमाम स्कीम वर्करोंऋ स्विगी, जोमाटो, ओला, उबेर जैसे गिग वर्करोंऋ घरेलू कामगार, आईटी–काल सेंटर वर्कर आदि को न तो मजदूरों का दर्जा हासिल है, न ही कोई अधिकार।  सरकारी विभागों में भी स्थायी भर्ती लगभग बन्द कर दी गयी है। वहाँ भी ठेके पर मजदूर रखे जा रहे हैं। इन मजदूरों से खराब शर्तों पर काम कराया जा रहा है। चाय–पानी या शौच के लिए छोटा–सा ब्रेक लेने पर भी अनुशासन का डण्डा चलाया जा रहा है।

ट्रेनिंग के नाम पर नये मजदूरों का भी बेरहमी से शोषण हो रहा है। उनसे 3 से 6 महीने तक भरपूर काम लिया जा रहा है और नाममात्र की भी मजदूरी नहीं दी जा रही है। नवउदारवादी नीतियों को लागू करते समय ही यह तय किया गया था कि मजदूरों का कानूनी अधिकार खत्म करना है। इसलिए सरकार ने मजदूरों के फायदे वाले श्रम कानूनों को बदलकर पूँजीपतियों के फायदे वाली श्रम संहिताएँ बनायी हैं।

1990 में लागू की गयी नवउदारवादी नीतियों ने देश को नयी गुलामी की ओर धकेल दिया है। एक समय मजदूरों–किसानों के शासन वाला देश रहे सोवियत संघ के विघटन के बाद अमरीका दुनिया का दादा बन बैठा और उसने भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों को गुलाम बनाने के लिए अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के जरिये नवउदारवादी नीतियों को लागू करने की चाल चली। इन नीतियों को लागू करने के मामले में कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, टीएमसी, जनता दल, शिव सेना आदि देश की लगभग सभी चुनावी पार्टियों की सहमति थी और सबने उन्हें आँख मूँदकर लागू किया। इन्हीं नीतियों का नतीजा है कि सरकारें देश के संसाधनों और उद्योग–धंधों को देशी–विदेशी पूँजीपतियों के हाथों में कौड़ियों के भाव बेच रही हैं। इन्हीं नीतियों के तहत प्राइवेट कम्पनियों के साथ–साथ सरकारी कम्पनियों में भी ठेका प्रथा को लागू किया जा रहा है।

पहले कम्पनियों में काम करने वाले मजदूरों और कर्मचारियों को परिवार के खर्चे के हिसाब से वेतन, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षित नौकरी और सम्मानजनक रोजगार मिलता था, लेकिन आज ठेके पर काम करने वाला कोई भी मजदूर या कर्मचारी उस संस्था या कम्पनी में रजिस्टर्ड नहीं होता। वह बेनाम मजदूर होता है जिसकी कोई पहचान नहीं होती। किसी भी तरह की समस्या होने पर पुलिस–प्रशासन उसके साथ खड़ा नहीं होता। बीमार या दुर्घटना होने पर संस्था या फैक्ट्री की ओर से उसे इलाज का खर्च नहीं मिलता। बीमारी के दौरान भी कोई छुट्टी नहीं मिलती या छुट्टी मिलने पर वेतन में कटौती की जाती है। काम के समय दुर्घटना होने पर परिवार वालों को कोई मुआवजा या नौकरी नहीं मिलती। ठेका मजदूरों की दुर्दशा अकथनीय है। दुनिया में कहीं भी ठेका प्रथा मजदूरों के हक में नहीं रही है।

मजदूरों की हालत बेजान मशीनों से भी ज्यादा खराब कर दी गयी है। मशीन खराब होने पर फैक्ट्री का मालिक उसकी मरम्मत करवाता है, उसे मशीन खराब होने का भी दुख होता है, लेकिन किसी भी मजदूर के लिए वह दुखी नहीं होता। वह सोचता है कि एक मजदूर मरेगा तो उसकी जगह लेने के लिए बाहर हजारों मजदूर खड़े मिलेंगे।

आजादी के समय भारत के उद्योग–धंधों का विकास सीमित था और बड़ी आबादी को नये–नये उद्योग या संगठित क्षेत्र में रोजगार नहीं दिया जा सकता था। फिर भी 90 प्रतिशत से अधिक मजदूर संगठित क्षेत्र से बाहर ही थे। अगर उनके लिए रोजगार का इन्तजाम नहीं किया जाता तो उनके भूखों मरने की नौबत आ जाती। वे मरते क्या न करते, शासक वर्ग की नींद हराम कर देते। इसलिए सरकार ने उन्हें राहत देने का फैसला किया। हालाँकि, जो इन्तजाम किया गया उससे भी मजदूरों की जिन्दगी बहुत बेहतर नहीं हुई, लेकिन बड़े पैमाने पर भुखमरी से बचाव हो सका और लोग दो सूखी रोटी खाकर जिन्दा रह सके।

उनकी दो सूखी रोटी के इन्तजाम के लिए बहुत बड़ा असंगठित क्षेत्र तैयार किया गया। इसके लिए कई छोटे–छोटे उद्योग–धंधों जैसे–चमड़ा, कपड़ा, शीशा, लकड़ी, मसाले और दूसरे खाने–पीने के सामान के उद्योगों को संरक्षण दिया गया। छोटे–छोटे गृह उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया। इन सब में देश की भारी आबादी को रोजगार मिला। इस क्षेत्र में बड़े पूँजीपति अपना कारोबार नहीं कर सकते थे।

लेकिन, 1990 में नवउदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद धीरे–धीरे हालात बद–से–बदतर होते गये। लघु उद्योगों से सरकारी संरक्षण खत्म कर दिया गया जिससे लाखों की संख्या में छोटे उद्योग बन्द हो गये। उसके चलते बेरोजगार हुए  असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों को अपने हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया गया। सरकार के द्वारा छोटे–छोटे उद्योग–धंधों से संरक्षण खींच लेने के चलते, ये उद्योग असहाय हो गये। बड़े उद्योगों से प्रतियोगिता करने के लिए उन्होंने मजदूरों का बेरहमी से शोषण किया। पूँजी और तकनीकी के अभाव में छोटे उद्यमी खुद को बचाये रखने के लिए इससे अलग कोई तरीका नहीं अपना सकते थे।

सरकारी संरक्षण के अभाव में और बड़े पूँजीपतियों के आगे टिके रहने के लिए छोटे उद्यमियों ने अपनी फैक्ट्री में सुरक्षा के उपायों में कटौती कर दी और उनमें मजदूरों का निर्मम शोषण करके लाभ कमाने की प्रवृत्ति बढ़ी, जिसके चलते छोटी फैक्ट्री और उद्योग–धंधे दुर्घटना के जीते–जागते उदाहरण बन गये। इनमें होने वाली दुर्घटनाओं में हर साल हजारों मजदूर जान गँवा देते हैं और लाखों मजदूर उम्र भर के लिए अपाहिज हो जाते हैं जो मरते दम तक घुट–घुटकर जीते हैं। उनका परिवार भी हादसे से तबाह हो जाता है।

इन घटनाओं के प्रति सरकार मूकदर्शक और समाज संवेदनहीन बना रहता है। मजदूरों का कोई रिकॉर्ड न होने के चलते मालिक भी अपनी जिम्मेदारियों से बरी हो जाते हैं। ज्यादातर मजदूरों में भी कुछ खास आक्रोश नहीं दिखता है, क्योंकि वे अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं हैं। वे भगवान और भाग्य को कोसकर तथा अपनों के खोने के गम में रो–पीटकर शान्त हो जाते हैं।

मजदूर आज भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय और क्षेत्र में बँटे हुए हैं। उनके बीच एकता और संगठन की बेहद कमी है जबकि देश के पूँजीपति एकजुट हैं और उन्होंने फिक्की और एसोचैम जैसे संगठन बना रखे हैं। वे इन संगठनों के तहत मीटिंग करके अपने जर–खरीद सरकारों को निर्देश और सुझाव देते हैं कि वे उनके फायदे में नीतियाँ बनाये और उन्हें सहूलियते दें।

अगर मजदूरों को अपने फायदे की नीतियाँ बनवानी हैं तो उन्हें भी अपना संगठन बनाकर एकजुट होने और अपनी माँगों को लेकर संघर्ष करने की जरूरत है। इस साल की शुरुआत में ट्रांसपोर्टर कर्मचारियों ने देश भर में एक साथ हड़ताल करके सरकार को मजबूर कर दिया कि वह उनकी बात सुने। आखिरकार, बिना लड़े हक नहीं मिलता और एका कायम किये बिना लड़ाई जीती नहीं जा सकती।

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